Wednesday, October 21, 2015

लौटाने वालों के हक़ में

सब अपने-अपने तर्क गढ़ रहे हैं।  शशि थरूर कहते हैं रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने अंग्रेजों का नाइटहुड  सम्मान था कोई साहित्य का नोबेल नहीं।  राजस्थान के आईदान सिंह भाटी लिखते हैं जिस साहित्य अकादमी ने मेरी राजस्थानी भाषा को मान्यता दी, उसे लौटाने का कदम कोई कैसे उठा सकता है। सबके अपने तर्क हैं लेकिन विरोध के विरोध में शायद कोई नहीं



लेखक अपने अवार्ड्स लौटा रहे हैं। वह सम्मान, जिसे पाकर उन्हें अपना जीवन सार्थक लगा होगा उसे वे लौटा रहे हैं। क्यों लौटा रहे हैं? क्या मिल जाएगा उन्हें? शायद आत्मरक्षा। यह सुरक्षा के  लिए उठाया गया कदम है। उन्होंने देखा कि कन्नड़ साहित्यकार कलबुर्गी गोलियों से शूट कर दिए जाते हैं। पानसरे  और दाभोलकर की भी हत्या कर दी जाती है। किसी के लिए किसी की विचारधारा को सहन नहीं कर पाने की संकीर्ण मानसिकता इस कदर सिर उठाती है कि कभी भीड़ तो कभी हथियारबंद समूह व्यक्ति को मार डालते हैं। या तो मरने के लिए तैयार हो जाओ या फिर अपना रक्षाबल खुद खड़ा करो। लेखकों ने यही किया है उन्होंने प्रतीकात्मक विरोध खड़ा किया है। लोकतंत्र में इससे शांतिप्रिय और कुछ नहीं हो सकता।  नाइटहुड सम्मान लौटाकर ही रवींद्रनाथ टेगौर ने अंग्रेजों के जलियावाला बाग हत्याकांड का विरोध किया था। 
क्या कहा, ये राजनीति है? ये लोग उस समय क्यों नहीं सामने आए जब पश्चिम बंगाल सरकार ने तसलीमा नसरीन  की किताब पर प्रतिबंध लगाते हुए उन्हें अपने राज्य से बाहर चले जाने के  आदेश दिए थे।सलमान रश्दी की किताब द सैटेनिक वर्सेज पर तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने प्रतिबंध लगाया था। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में भी उन्हें शामिल होने नहीं दिया गया। मकबूल फिदा हुसैन को दुनिया बतौर भारतीय पेंटर जानती है, लेकिन उन्हें अपने प्राण कतर नामक मुल्क में त्यागने पड़े। हम गुस्से में कहते हैं कि यह स्वनिर्वासन उन्होंने खुद को दिया था, लेकिन आताताइयों के डर से सुरक्षा कवच तो लेना ही पड़ता है। तसलीमा कहती हैं यह चयनित विरोध है। आप केवल एक तरह के कट्टरपंथ का विरोध करते हैं। दूसरे और तीसरे पक्ष की ओर नहीं देखते। उनका कट्टरपंथ क्यों जायज माना जाता है? बहरहाल तसलीमा को जवाब देना चाहिए कि जब बीस साल पहले बांगलादेश में रहते हुए उन्होंने हिंदुओं पर मुसलमानों के जुल्म पर आधारित लज्जा लिखी थी वह क्या था?      सोमवार को ऑस्ट्रेलियाई मूल के जोड़े को बेंगलूरु में इसलिए प्रताडि़त किया गया कि उनके पैर में जो टैटू था वह एक समूह विशेष को देवी मां जैसा लगा। इस विराट और वैभवशाली संस्कृति की पैरवी करने  ये कौन लोग इन दिनों निकले हुए हैं। कौन हैं जो ये कह रहे हैं कि यहां लिखा है कि ये खाने पर इन्हें मार दो। खुर्शीद कसूरी पाकिस्तानी हैं, जो इनकी किताब का मुंबई में विमोचन करवा रहे हैं उनके मुंह पर कालिख पोत दो। कालिख पुते चेहरे के साथ सुधींद्र कुलकर्णी कहते हैं- ये मेरा नहीं मेरी शर्ट पर लगे इस तिरंगे का अपमान है जिसे भी काला कर दिया गया है। कौन इजाजत देता है इन्हें कि  क्रिकेट मैच के लिए जिम्मेदार लोगों के कैबिन में जबरन घुसकर हंगामा करो। यह किस दौर में पहुंच रहे हैं हम। पाकिस्तान से मैच नहीं कराने हैं, ना हो। सरकार फैसला करेगी लेकिन  यहां तो कोई और ही फैसले पर आमादा है।
कल को हमें अपने पड़ोसी का चेहरा पसंद नहीं है तो हम खुद ही हिसाब करने लगेंगे। सभ्यता हमें हर हाल में हद में रहने की ताकीद करती है। यही कानून और व्यवस्था संभालने वालों के भी प्रयास होते हैं, लेकिन बात-बात में लोग और भीड़ कानून हाथ में लेने लगेंगे, तो भरोसा किस पर होगा। फिलहाल यहीं भरोसा टूट रहा है। बेशक लेखक समूह अपनी बरसों की इस पूंजी को लौटाकर खुश नहीं होगा लेकिन उसके पास चारा नहीं है। उसे आश्वासन चाहिए। प्रजातांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार से आश्वासन। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के मुखिया से आश्वासन। उस मजबूत सरकार से मजबूत वादा जिसे भारतीयों ने चुना है। विकास की राह में दौड़ते हुए यह भटकाव किसी को भी तकलीफदेह लगेगा। यह संघर्ष खत्म होना चाहिए। इस लौटाने पर उनका यह कहना कि ये लेखक दूसरे दलों के मोहरे हैं, अशोभनीय है। संवादहीनता की इस परिस्थिति को बदलना चाहिए। संवाद का पुल बनना ही चाहिए। जो बात भारत-पाकिस्तान के संदर्भ में लागू होती है वह हालात देश में क्यों बनने चाहिए? कौन जिम्मेदार होगा इसके लिए?