Wednesday, September 9, 2015

दर्द का यूं दवा बनना

अलविदा अलान पिता अब्दुल्लाह बच्चे को अंतिम विदाई देते हुए।  तस्वीर रायटर

हम में से लगभग सभी ने नीली शर्ट और लाल शॉर्ट्स  पहने उस बच्चे की तस्वीर देखी होगी जो टर्की के समंदर किनारे औंधा पड़ा है। टर्की के तटीय सुरक्षाकर्मी ने जब पिछले बुधवार उसे  उठाया तो उसके दिल ने यही कहा कि काश धड़कनें चल रही हों लेकिन वह मृत था।
तीन साल का अलान कुर्दी अपने बड़े भाई गालिब, मां रिहाना और पिता अब्दुल्लाह के साथ बरास्ता ग्रीस, कनाडा जाकर बस जाना चाहता था। उसके मुल्क सीरिया में इस्लामिक स्टेट के आतंकियों ने कहर मचा रखा है। इस कहर से बचने के लिए उसके पिता ने समुद्री स्मगलरों को चार हजार यूरो (एक यूरो लगभग ७५ रुपए) दिए। वह एक रबर बोट थी जिसमें पर्याप्त लाइफ जैकेट्स नहीं थे। रात के तीन बजे यह सफर शुरू हुआ। पता चला कि लहरें कभी-कभी पंद्रह फुट ऊंची भी हो जाती हैं। नाव पलट गई। माता-पिता ने दोनों बच्चों का सिर पानी से ऊपर रखने की भरपूर कोशिश की। अलान ने पापा से कहा 'पापा आप मेरा हाथ पकडऩा, मैं आपका पकडूंगा तो छूट जाएगा।' पकड़ नहीं बनी अलान छूट गया और अब्दुल्लाह का पूरा परिवार जल समाधि में लीन हो गया। 
 अलान की मासूमियत क्यों किनारे आ लगी? उसे क्यों समंदर में पनाह लेनी पड़ी? इस दर्द भरे सच ने पूरी दुनिया को झकझोरा है। ऐसी अनेक दुर्घटनाएं सीरिया छोड़कर यूरोप में शरण पाने की आस में जा रहे परिवारों के साथ घट रही हैं । यूरोपीय देशों की सीमा बंद करने की नीतियों ने ऐसे खतरनाक रास्तों को जन्म दे दिया है। जान बचाने के लिए लोग इन देशों में शरण लेना चाहते हैं और इसके लिए वे समुद्री दलालों को मुंहमांगी कीमत देने को मजबूर हैं। पूरे परिवार से बिछुडऩे के बाद अब अब्दुल्लाह किसी देश की शरण नहीं चाहते। वे कहते हैं- अब दुनिया के सारे देश भी मुझे पनाह  दें तो भी नहीं चाहिए, जो कीमती था वह चला गया है। व्यथित अब्दुल्लाह किनारे जाकर लोगों से इल्तिजा कर रहे हैं  कि यूं  सीमा पार मत करो, खतरा है। 
राहत की बात ये है कि अब यूरोपीय मुल्कों ने अपनी सरहद शरणार्थियों के लिए खोलने की पहल की है। लाखों लोग इस आंतरिक युद्ध का शिकार हैं लेकिन यह अलान की निर्जीव देह थी जिसने इन मुल्कों की मृत सोच में प्राण फूंके हैं। ऐसा क्यों है कि हर कहीं दो व्यक्ति, दो परिवार, दो मजहब, दो मुल्क , दो विचार एक-दूसरे के कट्टर दुश्मन हैं? क्या शांति के बीज बोने का पारिवारिक संस्कार खत्म हो रहा है। दुनिया के हालात तो यही बता रहे हैं। यह सुखद संयोग है कि ऐसेे माहौल में बोध गया को दुनिया की आध्यात्मिक राजधानी बनाने का विचार भारत सरकार की ओर से आया है। बोध गया वही जगह है जहां गौतम बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था। वे बुद्ध जिन्होंने सांसारिक दुखों पर विजय पाने के लिए परिवार से मोह छोड़ा था और दुनिया को त्याग और अहिंसा के मार्ग पर अग्रसर किया था। बेशक बुद्ध, महावीर और गांधी की भारत भूमि दुनिया के लिए एक मिसाल है जहां शरण चाहने वालों का हमेशा स्वागत हुआ। हम ऐसे ही हैं, मानवतावादी। पाकिस्तान, बांग्लादेश, तिब्बत, अफगानिस्तान से करोड़ों शरणार्थी भारत आकर रह रहे हैं। इस संख्या बल ने भारत का नुकसान ही किया है लेकिन यह दुनिया एक परिवार है, के भारतीय संस्कार यहां हावी रहे। तिब्बत के दलाई लामा और बांग्लादेश की तस्लीमा नसरीन का भारत में रहना किसी एक राजनीति सोच का नतीजा नहीं, भारतीय संस्कार है।
शांति के  इस संदेश को हमारे पूर्व राष्ट्रपति और शिक्षक एपीजे कलाम ने भी खूब ताकत बख्शी। वे तो बच्चों के बीच पहुंचकर अक्सर उनसे एक कविता दोहराने के लिए कहते थे कि यदि दिल में सुंदर चरित्र बसता है तो घर में सौहार्द्र होता है और जो घर में सौहा
र्द्र होता है तो देश व्यवस्थित होता है और जब देश व्यवस्थित होता है तो दुनिया में शांति स्थापित होती है।
जाहिर है दो को एक होने की प्रेरणा के बीज घर से ही बोए जाने चाहिए। असद भोपाली का एक बहुत प्यारा गीत है दो दिल धड़क रहे हैं और आवाज एक है, नग्मे जुदा-जुदा हैं  मगर साज एक है... जब ये दो यूं एक होंगे तब ही रोशनी से रूबरू हो सकेंगे। अलान जैसे मासूम बच्चे की जिंदगी सख्त बड़ों ने छीनी है। ये बड़े जो उदार होते, मानवता पर ऐसी तोहमत न लगती। इस बच्चे की तस्वीर भले ही दर्द भर देती हो लेकिन यही दवा बनकर भी सामने आई है। सरहद की हद से मानवता बड़ी है।

4 comments:

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, परमवीरों को समर्पित १० सितंबर - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

रश्मि शर्मा said...

इस चित्र ने दि‍ल दहला दि‍या। बहुत बढ़ि‍या आलेख।

varsha said...

blog bulletin aur rashmi ji shukriya

suraj kumar said...

बहुत बढ़िया आलेख