Wednesday, August 26, 2015

सानदार, जबरजस्त, जिंदाबाद,

सानदार, जबरजस्त, जिंदाबाद,  केतन मेहता की हालिया रिलीज मांझी का नायक दशरथ मांंझी जब ये तीन शब्द बोलता है तो उस पूरे मंजर में जान पड़ जाती है फिर चाहे हालात कितने भी बदतर, वाहियात और मुर्दानगी वाले क्यों ना हों। हालात और व्यवस्था के खिलाफ लडऩे वाला मांझी खुद इस कदर तकलीफों का मारा है कि देखने वाले को घनघोर निराशा होती है और जब फिल्म में यही सब गरीबी और अभाव की पृष्ठभूमि में हो तो कम अज कम भारतीय दर्शक उस फिल्म को सिनेमा हॉल तक देखने नहीं जाता। उसके लिए फिल्म के मायने मसाला मनोरंजन से है। मांझी कुव्यवस्थाओं के बीच से रास्ता निकालने की कोशिश है, जो आखिर में मोहब्बत के शाहकार ताजमहल से भी बड़ी पैरवी मोहब्बत के लिए कर जाती है। अपनी बीवी फगुनिया को याद करने वाला दशरथ  मोहब्बत का मसीहा मालूम होता है। दिलों को जोडऩेवाला दशरथ सब बराबर सब बराबर गाता है लेकिन जात-पांत की गहरी खाई में फंसे देश में होते कई प्रयास भी इस खाई को नहीं पाट पाते।
      दशरथ मांझी की पत्नी फगुनिया का पैर उस समय पहाड़ से फिसल जाता है जब वह पति के लिए रोटी ला रही होती है। गेहलोर गांव (बिहार में गया के समीप) एक ऐसा गांव है जिसके भीतर और बाहर के रास्ते को पहाड़ रोके बैठा है। गर्भवती पत्नी फगुनिया बच सकती थी यदि वजीरगंज के अस्पताल जाने के लिए ये पहाड़ उसका रास्ता ना रोकता। मांझी की जिंदगी का फिर एक ही लक्ष्य हो जाता है। पहाड़ तोड़कर रास्ता बनाना। वह हथौड़ी और छेनी से  इस महायुद्ध को जीतता है। 'जब तक तोड़ेंगे नहीं, तब तक छोडेंग़े नहीं।
फिल्म में एक पत्रकार दशरथ मांझी से कहता है बहुत हो गयी 'दल्लागिरी' लेकिन खुद का अखबार निकालना बहुत मुश्किल काम है तब दशरथ कहते हैं पहाड़ तोड़ने से भी ज़्यादा मुश्किल है क्या  पहाड़ को चुनौती देते हुए मांझी के सफर में कई उतार-चढ़ाव आते हैं। भ्रष्टाचारी रास्ता बनाने के नाम पर आए पैसे ही खा जाते हैं। पहाड़ को संरक्षित बताते हुए मांझी पर मुकदमा हो जाता है लेकिन धुन के पक्के मांझी 22 साल तक पहाड़ चीरते हुए 110 मीटर लंबा और नौ मीटर चौड़ा रास्ता उसमें से बना देते हैं।  अफसोस कि मांझी के गुजरने के चार साल बाद यानी 2011 तक भी पक्की सड़क नहीं बन पाती है। 17 अगस्त को इस नायक की पुण्यतिथि थी।
    मांझी को अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह में भी सराहना मिली है। कहने वाले कह सकते हैं कि भारत की ऐसी गरीबी को हमेशा ही विदेश में सराहना मिला करती है। सत्यजीत रॉय की पाथेर पांचाली को भी खूब सराहा गया था। यह भारत की हकीकत है और निर्देशक केतन मेहता ने इस हकीकत को परदे पर साकार कर दिया है। इससे पहले फिल्म्स डिवीजन ने भी द मैन हू मूव द माउंटेन के नाम से एक डॉक्यूमेंट्री दशरथ मांझी पर बनाई है। बिहार सरकार ने पद्मश्री की सिफारिश भी मांझी के लिए की और जब मौत हुई तो पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया। आमिर खान ने भी अपने कार्यक्रम सत्यमेव जयते में मांझी के बेटे और बहू बसंतिया को बुलाया था। बसंतिया को तब इलाज की सख्त जरूरत थी। कार्यक्रम के दौरान वादा किया गया था कि बसंतिया का इलाज कराया जाएगा लेकिन एक साल पहले उसका भी देहांत हो गया। फगुनिया हो या बसंतिया, इलाज का इन तक ना पहुंचना पहाड़ बनकर ही रोड़े अटकाता है। बसंतिया के समय पहाड़ में से रास्ता बन चुका था लेकिन व्यवस्था के रास्ते अब भी बंद है।
     एक टीवी चैनल की रिपोर्टर कैमरे पर दशरथ का गेहलोर गांव दिखा रही थीं। घर और हालात वही 1960 के समय के थे जब दशरथ जवान थे। गांव के घरों में अब तक शौचालय नहीं है। व्यवस्था के रास्तों को यहां तक पहुंचने में बहुत समय लग रहा है। केतन मेहता बेहद प्रतिभाशाली निर्देशक हैं। उनकी मिर्च मसाला स्मिता पाटिल और नसीरुद्दीन शाह के अभिनय को नई ऊंचाई पर ले गई। एक लंपट सूबेदार को गांव की औरतें मिर्च के जरिए जो संदेश देती हैं वह क्रांति अपने आप में अनूठी थी। गुजराती पृष्ठभूमि में बनी मिर्च मसाला के  लिए स्मिता पाटिल को श्रेष्ठ अभिनयके लिए चुनिंदा पच्चीस फिल्मों में रखा गया है। केतन स्वयं गुजरात (नवसारी) में जन्मे हैं। इस बार उन्होंने दशरथ मांझी में प्राण फूंके हैं। मांझी को जीवंत किया है नवाजुद्दीन सिद्दिकी ने। अपनी नस-नस से वे वही नजर आते हैं। जिंदा तो फगुनिया (राधिका आप्टे) भी हो गई है। काश अब हमारा सिस्टम भी जिंदा हो जाए।

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