Wednesday, July 22, 2015

मंटो से विजयेंद्र तक हम

मंटो ने  बंटवारे का जो दर्द कहानी टोबाटेक सिंह में लिखा वह खुशवंत सिंह के उपन्यास ट्रेन  टू पाकिस्तान से अलग था। ये दर्द इन दोनों ने जिया था।  आज के लेखक वी. विजयेंद्र प्रसाद हैं  और वे बजरंगी भाईजान रचते हैं। यह आज के समय की ज़रूरत है।

हमारे बच्चे भारत के साथ जिस एक और मुल्क का नाम लेते हुए बड़े होते हैं वह है पाकिस्तान। अखबार की सुर्खियां पढ़ते हुए, टीवी पर बहस देखते हुए उन्हें समझ में आ जाता है कि यह दुश्मन मुल्क केवल हमारे देश का अमन-चैन बर्बाद करने के लिए बना है। यह एक ऐसा देश है जिसकी ओर हमारी तमाम मिसाइलों का रुख होना चाहिए। हमारे जन्नत से खूबसूरत कश्मीर में इन्होंने ही तबाही मचा रखी है और सरहद पर ये आए दिन गोलीबारी करते रहते हैं। बच्चे ये भी जानते हैं कि क्रिकेट के मैदान में हमें पाकिस्तान को हराकर जितनी खुशी मिलती है उतनी इंग्लैंड को परास्त कर नहीं मिलती। उन्होंने हिंदुस्तान के एथलीट मिल्खा सिंह की ओलंपिक्स में हार के लिए बंटवारे को जिम्मेदार ठहराने वाली फिल्म भाग मिल्खा भाग देखी और पसंद की है। उनके जेहन में पाकिस्तान के लिए नफरत है। उतनी नहीं जितनी बंटवारे के आसपास जन्मी पीढ़ी की है, पर है। जिन्होंने अपना सबकुछ छोड़ दो मुल्क को यात्रा सआदत हसन मंटो की कहानियां पसंद करने वाले जरूर खुद की जहनियत टोबा टेकसिंह कहानी के उस पागल बिशन सिंह जैसी मानते हैं जो विभाजन को कभी कुबूल नहीं कर पाया।
   एक दूसरी हकीकत  में मंटो (बंटवारे के समय वे पाकिस्तान चले गए थे) लिखते हैं, अदालतें मुझे अश्लील लेखक की हैसियत से जानती है। सरकार मुझे कभी कम्युनिस्ट कहती है कभी देश का सबसे बड़ा अदीब। कभी मेरे लिए रोजगार के दरवाजे बंद किए जाते हैं और कभी खोले जाते हैं। कभी मुझे गैर जरूरी इंसान बताकर मकान से बाहर कर दिया जाता है और कभी मौज में आकर, यह कह दिया जाता है कि नहीं तुम मकान के अंदर रह सकते हो। मैं पहले सोचता था, अब भी सोचता हूं कि इस देश में, जिसे दुनिया का सबसे बड़ा इस्लामी राज्य कहा जाता है मेरी क्या जगह है और मेरी क्या जरूरत है। खैर, ऐसी दुविधा में दोनों तरफ कई लोग रहे लेकिन आम पाकिस्तानी और हिंदुस्तानी एकदूसरे से नफरत करते हुए ही बड़े हुए हैं। इस नफरत को भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने जरूर अमन की आशा नामक बस चलाकर कम करने की कोशिश की थी। उन्हें उधर के लोग भी अमन पसंद इंसान के रूप में याद करते हैं। कुछ समय पहले लाहौर से एक युवा पत्रकार सहर मिर्जा जयपुर आईं थीं। यही सोचा था कि पत्रकार हैं देश-दुनिया के हालात के बारे में बात होगी लेकिन हैरानी हुई कि सहर की हर बात में केवल दोनों मुल्कों के लिए अमन की बातें थीं। उनकी दादी का ताल्लुक जयपुर से था और बंटवारे के दौरान उनके हिंदू पड़ोसियों ने उनकी खूब मदद की थी। वे पाकिस्तान में अपनी दादी और हिंदुस्तान के किस्से सुन-सुनकर बड़ी हुई हैं। इस मुल्क के लिए सहर के दिल में बेपनाह मुहब्बत नजर आती है।
बहरहाल, एक और कोशिश वी. विजयेंद्र प्रसाद की लिखी बजरंगी भाईजान है। एक गूंगी बच्ची सरहद पार कर हिंदुस्तान आ जाती है और बजरंगी उसे जान पर खेलकर पाकिस्तान छोडऩे जाता है। वहां उसकी मदद चांद नवाब (आप यू ट्यूब पर इनका एक असल वीडियो देख चुके होंगे जिसमें एक ट्रेन के बाजू से वे ईद की रिपोर्टिंग कर रहे हैं) और मौलवीजी करते हैं। बजरंगी भाईजान कहती है कि दोनों मुल्कों के लोग एकदूसरे से इतना बैर-भाव नहीं रखते जितना कि सियासत और उसका निजाम। आखिर में जब बच्ची बजरंगी को मामा और जयश्री राम कहते हुए विदा करती है तो हॉल में सिसकियों की आवाज सुनाई देती है। बतौर एक्टर सलमान इस बार पीके यानी आमिर की राह पर दिखे हैं। हीरानी-चौपड़ा टाइप सिनेमा की पगडंडी चौड़ी हो रही है और फोकट की हीरोगिरी देखने वाले दर्शक कम। एक दृश्य में बच्ची नॉनवेज खाने के लिए पड़ोस के मुस्लिम परिवार की गोद में दिखाई देती है। वाकई बच्चे अपने मनपसंद भोजन के लिए ऐसे ही दौड़ जाते हैं। बहरहाल, सच्चा सुंदर सिनेमा ही हमें अपील करता है।
बंटवारे के अड़सठ साल पहले लिखी कहानी टोबा टेकसिंह के नायक बिशन सिंह इसलिए पागल हो जाता है कि उसे समझ ही नहीं आता कि टोबा टेक सिंह (जहां का वह और उसकी जमीन है) हिंदुस्तान में है या पाकिस्तान में और जब उसे पता चलता है कि टोबा टेकसिंह पाकिस्तान में ही रह गया है और हिंदुस्तानी पागलों को अब सरहद पार भेजा जा रहा है, वह वहीं सरहद पर ही मर जाता है। आज की कहानी बजरंगी भाईजान का नायक बच्ची को पाकिस्तान में उसके खोए हुए शहर में सकुशल पहुंचाने जाता है। दोनों देश एकदूसरे का वजूद स्वीकार चुके हैं। सियासत भी स्वीकार ले तो अरबों-खरबों का बजट मुल्क की तरक्की में लगेगा। वैसे उस दौर को याद करने के लिए टोबा टेक सिंह पर भी एक फिल्म केतन मेहता बना रहे हैं। पंकज कपूर पागल बिशन सिंह के किरदार में होंगे।

6 comments:

Dilbag Virk said...

आपकी इस प्रस्तुती का लिंक 23 - 07 - 2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2045 में दिया जाएगा
धन्यवाद

HARSHVARDHAN said...

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ब्लॉग बुलेटिन - राष्ट्रीय झण्डा अंगीकरण दिवस और जन्म दिवस मुकेश में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

Kavita Rawat said...

फिल्म में अच्छा सन्देश असरकारक होता है
बहुत बढ़िया प्रस्तुति

Madan Mohan Saxena said...

बहुत खूब! सुदर भाव,बहुत बढ़िया प्रस्तुति

shyam gupta said...

यह सच है कि राजनीति एवं देश की सामान्य जनता के व्यवहार में अंतर होता है -----बच्चियों के भावों और मनोभावों एवं उनके व्यवहारों पर देश समाज नहीं चलते ...सामान्यतया बच्चे एवं साथ में ही सामान्य जनता भी --गहन अर्थों व ज्ञान एवं दूरदर्शिता से बिहीन होती है वे सब केवल नज़दीकी लाभ ही देख पाते हैं |अतः ऐसे गहन विषयों पर इस प्रकार की भावना व संवेदनापूर्ण कथाओं का कोइ मूल्य नहीं होता ..हाँ उसमें सम्मिलित सभी अपना अपना लाभ उठा लेते हैं बस----

varsha said...

shyamji ye bachhe hi kal ke nagrik hain. inhin ki soch se desh chalega aur kyon siyasat deshwasiyon ki tarah na soche??