Wednesday, July 8, 2015

दुष्कर्मी को ही पति बना देने वाले वैवाहिक दुष्कर्म को कैसे मानेंगे अपराध


जब हम दुष्कर्मी को ही पति बना देने का मानस रखते हैं तो हम शादी के बाद वैवाहिक दुष्कर्म को कैसे अपराध ठहरा सकते हैं। 

रसिक मोहन को साची पसंद थी। वो उसका खूब पीछा करता। छेडऩे की हद तक। फोन, मैसेजेस रसिक मोहन ने कोई जरिया नहीं छोड़ा था साची को परेशान करने का। साची कई बार उसे लताड़ चुकी थी, झिड़क चुकी थी लेकिन रसिक मोहन हरकतों से बाज नहीं आया। चूंकि साची की जरा भी रुचि रसिक मोहन में नहीं थी, उसने सारी बात अपनी मां को बताई। साची की मां कुछ सोचती इससे पहले एक प्रतिष्ठित जरिए से साची के लिए रिश्ता आया। यह रसिक मोहन की तरफ से था। मां-बेटी दोनों हैरान-परेशान थे लेकिन पिता की राय थी कि परिवार अपनी बिरादरी का है, आर्थिक हैसियत भी अच्छी है, हमें इसे मंजूर कर लेना चाहिए। मां चाहकर भी ये नहीं कह पाई कि यह लड़का साची को काफी समय से परेशान कर रहा है और यह साची को नापसंद है। शादी हो गई और रसिक मोहन ने बड़े गर्व से साची को बताया कि उसे बहुत अच्छा लगा जब साची ने उसके प्रणय निवेदन को ठुकरा दिया था। साची ने समझ लिया था कि यह रसिक मोहन का लड़कियों की शुचिता परखने का उपक्रम था। हालंांंकि अब साची उस बात को ज्यादा तूल  नहीं देना चाहती क्योंकि वह उसका पति है।
हमारे यहां रिश्ते ऐसे ही तय होते हैं। शादी का पैगाम आते ही हम तमाम हरकतों को नजरअंदाज करते हैं। हम वो समाज हैं जो लड़का-लड़की को साथ देखकर ही उन्हें शादी के बंधन में बांधने की जुगत में लग जाते हैं। यहां तक कि दुष्कर्म कर चुके लड़के से भी यही उम्मीद रहती है कि जैसे-तैसे इन दोनों का ब्याह हो जाए तो कलंक से मुक्ति मिले। कलंक उस अपराधी लड़के पर नहीं निर्दोष लड़की पर लगता है। तभी तो अलवर जिले के झाड़ोली गांव की किशोरी रविवार को सूखे कुएं में कूद गई क्योंकि लड़का उसके साथ दुष्कर्म करना चाहता था। निर्भया से लेकर इस किशोरी तक हर कोई खुद की अस्मत को जान से ज्यादा कीमती मानती है। इतिहास राजघरानों की महिलाओं के जौहर का भी साक्षी है। वे आग को गले लगाना बेहतर समझती हैं। पंजाब में आजादी की लड़ाई में कुएं में कूद जाने वाली माताओं और बहनों को कोई कैसे भूल सकता है। जब इतिहास ऐसी घटनाओं से भरा पड़ा है फिर कैसे हम ेदुष्कर्मी के साथ लड़की की शादी कराने पर उतारू हो जाते हैं। दुष्कर्म सबसे बड़ा अपराध है और उसी अपराधी को पति बनाकर हम लड़की को सबसे बड़ी सजा भुगतने पर मजबूर कर देते हैं।
तमिलनाड़ु के कुड्डालोर जिले में महिला कोर्ट ने वी मोहन नामक शख्स को एक नाबालिग से दुष्कर्म का दोषी पाया। किशोरी गर्भवती हो गई और उसने बच्ची को जन्म दिया। महिला कोर्ट ने वी मोहन पर दो लाख का जुर्माना और सात साल की सजा सुनाई। फैसले के खिलाफ मद्रास हाईकोर्ट में अपील दायर की गई। हाईकोर्ट ने ना केवल जमानत मंजूर की बल्कि पीडि़त और आरोपी में शादी का बेहूदा सुझाव भी दे डाला। यहीं सबसे अहम भूमिका निभाते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले बुधवार एक फैसले में कहा कि दुष्कर्म के मामलों में मध्यस्थता की कोई जगह नहीं। कोई भी समझौता अपराध की गंभीरता को कम नहीं कर सकता। कोर्ट ने चेतावनी दी है कि कानूनी प्रावधान से कम सजा देना पीडि़त के खिलाफ संवेदनहीनता दर्शाना होगा। महिला के खिलाफ होने वाले अपराधों में 'जीरो टॉलरेंस' की नीति अपनाई जानी चाहिए।
बेशक सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले से ना केवल स्त्री मन की अनुगूंज परिलक्षित होती है बल्कि यह उस सामाजिक सोच को भी कड़ी फटकार है जो इन मामलों में ऐसी ही सोच की पैरवी करता नजर आता है। मध्यस्थता कई मसलों में होती है लेकिन यह अपराध इस काबिल नहीं। यह स्त्री की गरिमा पर गहरी चोट है। शायद इसी सामाजिक सोच का नतीजा है कि दुष्कर्म की घटनाएं रुकने का नाम नहीं लेती। इसे गंभीर और घृणित अपराध मानने से समाज बचता आया है। हम जिसे रावण कहते हैं वह भी ऐसा अपराधी नहीं था। सीता से निवेदन ही किया था रावण ने।
एक अपराधी को पति का दर्जा दिलाकर हम क्या साबित करना चाहते हैं। ब्याह कोई एहसान है जो अपराधी लड़की पर करेगा। दुष्कर्म एक स्त्री की आत्मा को तार-तार करता है। जब हम दुष्कर्मी को ही पति बना देने का मानस रखते हैं तो हम शादी के बाद वैवाहिक दुष्कर्म को कैसे अपराध ठहरा सकते हैं। तभी तो जब इस कानून की बात आती है तो हमारे नेता भारत की सांस्कृतिक विरासत का हवाला देने लगते हैं। तहमीना दुर्रानी ने अपने उपन्यास कुफ्र (जो एक स्त्री की असल कहानी है) में उस स्त्री की पीड़ा का मार्मिक चित्रण किया है जिसका पति सिर्फ देह से बात करता है। वह इस अपराध बोध (जबकि वह अपराधी भी नहीं) से मुक्त होने के लिए घंटों शावर के नीचे आंसू बहाती है। बेशक सर्वोच्च न्यायालय की यह बात स्त्री अस्मिता की राह में मील का पत्थर साबित होगी। इसके बाद आया एक और फैसला भी इसकी अगली कड़ी मालूम होता है। एक अविवाहित महिला भी अपने बच्चे की कानूनन संरक्षक हो सकती है। पिता की सहमती जरूरी नहीं। बहरहाल परिवार अब बराबरी से और आपसी प्रेम से चलेंगे। एकतरफा समर्पण से नहीं।

3 comments:

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, दरोगा, जज से बड़ा - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

Kavita Rawat said...

दुष्कर्मी को किसी ही हालत में जमानत नहीं मिलनी चाहिए उसे कठोर दंड जितनी जल्दी मिले इसी से दूसरे ख़राब नियत रखने वालों को भी सबक मिलेगा... एक तो जमानत पर छूट जाना ऊपर से न्यायालय के निर्णय में देरी.. इसी का फायदा वह डरा धमकाकर जीना हराम कर ऐसा माहौल बना लेता है की बहुत सारे लोग मजबूर हो जाते हैं ... सुप्रीम कोर्ट का अविवाहित महिला भी अपने बच्चे की कानूनन संरक्षक हो सकती है का निर्णय निश्चित ही अच्छी पहल साबित होगी ...
सार्थक चिंतन प्रस्तुति हेतु आभार!

varsha said...

kavitaji shukriya ...achhi bat ye bhi hui hai ki madaras highcout ne dushkarmi aur pidita ke samjhoute wala faisla wapas le liya hai
thanks blog billetin.