Wednesday, July 1, 2015

छोड़ गईं छुट्टियां

 छुट्टियां साथ छोड़ गई हैं बच्चे फिर स्कूल जा रहे हैं। वो बेफिक्री, वो मस्ती घर में छूट गई है। उनकी चीजों का जो पसारा घर के कमरों में फैला रहता था वह अब अलमारी में दुबका दिया जाएगा। वे फिर एक कसी हुई जिंदगी के पीछे कर दिए जाएंगे। जुलाई की पहली तारीख को घर लौटे बच्चों से जब भी पूछा कि क्या मैम ने आपसे आपकी छुट्टियों के बारे में बात की, बच्चों का जवाब ना होता। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि बच्चे जो अपने नाना-नानी के यहां या किसी दूसरे शहर या किसी पहाड़ पर गए हैं, उनसे उनके अनुभव साझा किए जाएं। उनसे पूछा जाए कि उन्होंने क्या महसूस किया। पूरी कक्षा के लिए ये यात्रा संस्मरण किसी बड़ी किताब को सुनाने वाले होंगे। बच्चे बोलने-सुनने की कला में प्रवीण होंगे। किसी बच्चे ने अगर किसी नए खेल या कला को सीखा है वह भी मैम को मालूम होगा। किसी कार्यक्रम या आयोजन में मैम उनकी प्रतिभा को शामिल कर सकती हैं। पहले दिन स्कूल से घर लौटे बच्चों से अगर किसी भी कक्षा में ऐसी सृजनशील बातचीत हुई है तो मान लीजिएगा कि वह स्कूल केवल प्रतिस्पर्धा के लिए घोड़े तैयार नहीं कर रहा है बल्कि उसका मकसद बच्चों के संपूर्ण विकास से है। बहुत अच्छे लगे इटली के वे शिक्षक जिन्होंने बच्चों को होमवर्क में सूर्योदय, पहाड़, चांदनी , समंदर को निहारने के   लिए कहा है। पढऩे के लिए कहा है और नकारात्मक परिस्थितियों से बचने की सलाह दी है।
    एक शिकायत उन माता-पिताओं से भी है जिन्होंने इन छुट्टियों में   टीवी, मोबाइल और कम्प्यूटर के स्क्रीन बच्चों के हवाले कर दिए हैं। वॉट्स एप पर अजीब-अजीब चुटकुले, फिल्मी पोस्टर, वीडियोज, बेतुकी शायरी पढ़कर वे खूब व्यस्त हो रहे हैं। आईटी सेक्टर से जुड़े कई बड़े नाम अपने बच्चों को इस जुनून से हमेशा दूर रखने की हिमायत करते हैं। वे कहते हैं हमने तय कर रखा है कि बच्चे तकनीक का कितना इस्तेमाल करेंगे। एपल के फाउंडर स्टीव जॉब्स ने भी ऐसा ही किया था। माइक्रोसॉफ्ट के मैनेजर ने तो बच्चों के लिए गैजेट्स टीवी के इस्तेमाल पर बैन लगा रखा है। आठ से तेरह साल के बच्चों के इंटरनेट पर सक्रिय रहने की तादाद 73 फीसदी बताई जाती है। ये सेहत, सोच, विकास में सबसे बड़ी बाधा है। तकनीक प्रेमी देश के बड़े नेता जब अपनी बात में अक्सर इन तकनीकी जरियों का गुणगान करते हैं तो वे स्वत: ही बड़े वर्ग को इस तरफ मुडऩे के लिए प्रेरित कर देते हैं। उनकी कोशिश होनी चाहिए कि बच्चों के माता-पिता को सचेत करें  कि केवल तकनीक आखिरी सच नहीं है।
     तकनीकी शिक्षा का ट्रेंड अलग दिशा में चल पड़ा है। पड़ोस की ईशा ग्यारहवीं कक्षा में ही स्कूल छोड़कर कोटा रवाना हो गई है। वह वहां दो साल आईआईटी की तैयारी करेगी। अपना नामचीन स्कूल छोड़कर वह किसी साधारण स्कूल से ग्यारहवीं-बारहवीं कक्षा की परीक्षा पास कर लेगी और अपना सारा समय इंजीनियरिंग
प्रवेश परीक्षाओं में लगा देगी। जब दसवीं के बाद स्कूल कोई मायने नहीं रखते फिर ये ड्रामा क्योंं?   सालों से शिक्षा प्रणाली में ये सेंध लग चुकी है लेकिन कोई बदलाव नहीं। ये प्रतिस्पर्धा को अतिरिक्त  होड़ से जोडऩे वाली कोचिंग क्लासेस माता-पिता की इच्छाओं का प्रतिफल है या व्यावसायिकता का?     
     इस होड़ से निकली जनरेशन अब सामने आ चुकी है। अधिकांश बहुत इंटेलिजेंट लेकिन हिसाबी  हैं। उन्हें हर चीज का दाम चाहिए। वे घर-परिवार से दूर खूब कमा रहे हैं। उनके पास समय नहीं। कभी-कभी तो खुद के लिए भी नहीं। संवादहीनता के हालात रिश्तों को तोड़ रहे हैं। चूंकि कुदरत से कोई कनेक्ट नहीं है इसलिए उसकी तरह निस्वार्थ देना उनकी फितरत भी नहीं। उसकी तरह अपना खजाना लुटाने का साहस  बचा ही नहीं है। इंसान की कीमत उसकी चीजों के ब्रांड तय करते हैं। महंगी गाडिय़ों और मोबाइल की कोई सीमा-रेखा कभी नहीं खींची जा सकेगी। हमें समझना होगा हमारा सच क्या है। पंच तत्वों से बना हमारा शरीर कुदरत के साथ चलने में ही सार्थक है। नकली वातावरण में यह सर्वाइव नहीं कर सकेगा। समाज और नैतिकता इंसान को जीने की ताकत देते हैं। काश किशोर होते बच्चों के अभिभावक और स्कू ल ये फैसला कर सकें कि तकनीक के साथ इंसानियत, नैतिकता भी जीवन का हिस्सा रहें।  यह सत्र शुभ हो।

7 comments:

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, मुसकुराते रहिए और स्वस्थ रहिए - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

Dilbag Virk said...

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 2 - 06 - 2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2024 में दिया जाएगा
धन्यवाद

सुशील कुमार जोशी said...

शुभ होने के लिये शुभकामनाऐं ।

varsha said...

blog bulletin aur dilbag ji aapka bahut shukriya.
susheel ji aapka dhanywad.

सु-मन (Suman Kapoor) said...

शुभकामनायें

रश्मि शर्मा said...

आपने बहुत अच्‍छी बात कही...शायद सारे अभि‍भावक भी इस बात को समझते हैं, पर बच्‍चों को इसके लि‍ए समझा नहीं पाते। कड़ा रूख अपनाना होगा।

varsha said...

rashmiji yahi dikkat hai ki ham sab samjhte hain fir bhi jane kiske bahae bahe ja rahe hain.
dhanywad sumanji