Tuesday, June 30, 2015

घर टूट रहे हैं


वह पिता है। उम्र कोई तीस-बत्तीस साल। दो साल की बेटी के उस पिता की आंख में आंसू थे। जाने कैसा दुखद संयोग था कि वह फादर्स डे के दिन ही रो रहा था जबकि उसे पता ही नहीं था कि आज फादर्स डे है क्योंकि वह पिछले पांच दिन से परेशान था। उसकी पत्नी बेटी को लेकर मायके चली गई थी और अब लौटना नहीं चाहती थी। सासू मां से झगड़ा हुआ और वह चल दी। कह दिया कि अब मुझे लेने आने की जरूरत नहीं मैं आप लोगों के साथ नहीं रह सकती। बहू के इस रवैये से खिन्न परिवार दो साल की पोती को नहीं भूल पा रहा हंै और उसे याद करते ही सबकी आवाज रूंधने लगती हैं।
    अकसर हम कहानी के उस छोर पर होते हैं जहां बहू होती है। वह ससुराल में रहते हुए आपबीती सुना रही होती है जिसमें उसके सपनों के टूटने और कष्टों का ब्योरा होता है। इस बार ससुराल पक्ष था। उसकी शिकायत थी कि बहू को साफ-सफाई की समझ नहीं है। उसे बच्ची को पालना नहीं आता है। वह कभी हंसती भी नहीं है। जब-तब अगले मोहल्ले में अपने मायके जाना चाहती है। सुबह दस बजे से रात आठ बजे तक नौकरी करती है। घर का काम भी करती है तो टालते हुए। बेटा कहता है कई बार मैंने उससे कहा कि जॉब बदल ले। छह बजे तक घर आजा लेकिन नहीं मानती। कुछ दिन पहले मायके जाने की बात को लेक र सास-बहू में बहस हुई। बहस हाथापाई तक पहुंची और बहू मना करने के बावजूद मायके चली गई और अब नहीं आना चाहती।  परिवार नन्हीं पोती की याद में कुम्हला रहा है और बच्ची के पिता को लगता है कि कानून कचहरी ऐसी है कि मैं अपनी बेटी को कभी नहीं मिल पाऊंगा। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि बच्ची मुझे मिल जाए। मैं तो उसे भी साथ ही रखना चाहता हूं लेकिन बच्ची के बिना मेरा सब कुछ खत्म सा लगता है।
यह कहानी अभी एकतरफा है। बहू की बात यहां नहीं है लेकिन बिना बहू की बात सुने ही ऐसा क्यों लगता है कि यह परिवार बहू से केवल उम्मीद और अपेक्षा के घेरे में जी रहा है। क्यों इसे बहू के सपनों का खयाल नहीं है। एक छोटे से घर और कम आमदनी वाले परिवार में उसके सपनों से जो घुटने टिकवाए गए उसके बारे में क्यों नहीं सोचा जाता। यह तब है जब बेटे का व्यवसाय अच्छी हालत में नहीं है। बहू की मांग है कि वह पति के साथ अकेले रह सकती है लेकिन परिवार के साथ गुजारा संभव नहीं।
 बहू लाने वाले किसी भी परिवार से कुछ सवाल तो इस 21वीं सदी में पूछे ही जा सकते हैं कि एक कामकाजी बहू सर पे पल्लू रखकर और कहीं-कहीं तो घूंघट लेकर पूरे घर का झाडू़ पोंछा, बर्तन, खाना कैसे कर सकती है। प्रेमवश वह कुछ दिन बना भी ले तो भी वह उस पर अतिरिक्त बोझ ही होगा। अपेक्षाओं के इस क्रम में अब भी कई परिवार ऐसे हैं जहां बहू को घर के बड़ों के सामने बैठकर टीवी देखने की इजाजत भी नहीं। शायद ऐसे ही हालात में पलायन का बीज पल्लवित होता है। लड़की सवाल करती है कि मेरी शादी किसी शख्स से हुई है या परिवार की अपेक्षाओं से। लड़का दो पाटों के बीच पिसता चला जाता है। वह मां का दुलारा है और पत्नी कुछ अरमानों के साथ आई है। इस लाड़ और अरमान के द्वंद में लड़का कई बार अरमान को कुचलने लगता है। यहीं लड़की फिर सख्त फैसले लेने पर आमादा होती है। कहने वाले फिर कहते हैं कि दहेज की धारा का दुरुपयोग होता है।
जाहिर है परिवारों को बदलना होगा। एक परिवार ने बहू की पगथलियों के प्रवेश के साथ ही ऐलान कर दिया कि तुम हमारी बेटी हो। ससुर ने कहा मैं तुम्हारा पिता हूं मेरे सामने ना घूंघट की जरूरत है ना सर ढंकने की। तुम्हें जो पसंद हो जो अच्छा लगे वह पकाओ, हमसे पूछने की कोई जरूरत नहीं। इन लफ्जों ने नई बहू के कानों में मिश्री-सी घोल दी। वह खूब मुस्कुरा रही थी। विदाई के बाद नम हुई आंखों में मुस्कान खिली थी। वह खुश थी। उसके नए जीवन में खुशियों की नींव पड़ चुकी थी। जाहिर है तब ये बातें फैमिली कोर्ट की देहरी नहीं चढेंग़ी। बड़ों के बड़प्पन से ही हमारी यह पारिवारिक व्यवस्था चलेगी। वे संस्कारों और अपेक्षाओं की पूरी गठरी बहू के सिर पर नहीं रख सकते। ये बोझ साझा करना होगा। बहुत मुश्किल काम नहीं है यह।

2 comments:

Kavita Rawat said...
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Kavita Rawat said...

बहु को बेटी मानने वालों की तादात अभी भी उँगलियों में हैं, जो बहुत ही दुखदायी स्थिति हैं ...इतनी सी बात अभी भी बहुत से लोगों के भेजे में नहीं बैठती की यही वे बहु को बेटी समझेगे तो सभी खुश रह पायेगे ...
बहुत बढ़िया चिंतनशील प्रस्तुति