Saturday, April 18, 2015

मार्गरीटा चखने से पहले

मार्गरीटा चखने से पहले कुछ लिखा था दोस्तों
एक फिल्म ने रिलीज से पहले ही अखबार, टीवी चैनल्स, सोशल मीडिया को बाध्य कर दिया है कि वह इस मुद्दे पर सोचे और बात करे। मुद्दा सेरिब्रल पल्सी नामक बीमारी से जुड़ा है, जिसमें मरीज के  दिमाग का वह हिस्सा चोटग्रस्त या कमजोर होता है जो संतुलन और गति को बनाए रखता है। मसल्स सख्त हो जाती हैं। मरीज बोलने, करवट लेने में तकलीफ महसूस करता है और कभी-कभी इसका असर आंखों पर भी देखा जा सकता है। प्रति एक हजार पर 2.1 ब"ो सेरिब्रल पल्सी का शिकार होते हैं।
एक और बहस साथ में चलती है कि विकलांग और अपंग को फिजिकली डिसएबल्ड ना कहा जाए इन्हें डिफरेंटली एबल्ड कहा जाए यानी इनमेेंं ऐसी असमर्थता है, तो कई ऐसे गुण भी हैं जो इन्हें समर्थ बनाते हैं। बेशक लेकिन हमारा सारा जोर एबल्ड या समर्थ बनाने की ओर ही क्यों है? इतने सक्षम बनो कि जीवन की रफ्तार से कदम मिला सको। हम आम बच्चों  को तो इस रफ्तार में धकेल ही रहे हैं इन बच्चों  को जिन्हें कुदरत ने कुछ अलग नेमत देकर भेजा है वे भी इसी दौड़ में शामिल कर लिए हैं। कुदरत ने ऐसे बच्चों  को बड़ा ही सुंदर दिल बख्शा होता है। ये हरेक से बहुत प्यार से मिलते हैं। इनकी नजरों में कोई खाका नहीं होता। ना अहंकार, ना ईगो, ना झूठी शान, ना शेखी। ये केवल प्यार भरा दिल लिए चलते हैं। हम इस दिल को तो नहीं समझते, लेकिन हमदर्दी जताते हुए उन्हें पानी का पूछते हुए आंखों में अतिरिक्त दया भाव जरूर ले आते हैं जिसकी शायद इन्हें जरूरत ही नहीं। उन्होंने उस संवाद की अपेक्षा है जो समभाव पर हो, सामान्य हो।
फिल्म जिसने इस मुद्दे पर बातचीत के लिए सबको विवश किया है वह है मार्गरीटा विद ए स्ट्रॉ। निर्देशक शोनाली बोस की फिल्म इसी हफ्ते रिलीज होगी। शोनाली की बहन मालिनी सेरिब्रल पल्सी से पीडि़त रही हैं। वे उसके साथ आम भाई-बहनों जैसी ही बड़ी हो रही होती है, लेकिन तकलीफ तब आती है जब वे बाहर निकलती हैं। समाज मालिनी को अलग नजरिए से देखता है। साथ बड़ी होती हुई शोनाली चौंकती है कि मालिनी उससे कहीं Óयादा रोमांटिक है और वह लड़कों के बारे में बात करती है। वह उस सुख को महसूस करना चाहती है, जिसे हमारा समाज शादी के बाद महसूस करने की इजाजत देता है। फिल्म में मां-बेटी का रिश्ता रेवती और कल्की कोचलिन ने निभाया है। किरदार जैसा बोल सके इसके लिए कल्की ने मुंह में कंचे भरे। मां जिसने अब तक  बेटी को सामान्य तरीके से पाला है और जहां जरूरत पड़ी है वह उसके लिए लड़ी भी हैं, वह मार्गरीटा के ऐसा कहते ही सहम जाती है। वह चाहती है कि मार्गरीटा ऐसा ना सोचे। वह उसे सुरक्षित रखना चाहती है क्योंकि लड़की के संदर्भ में ऐसी विकलांगता एक नहीं कई तकलीफों का झुंड बनकर सामने आती है।
मार्गरीटा की मां जैसी सोच ही हम सबकी है। हम तो यूं  भी  इस मुद्दे पर बात करना नहीं चाहते फिर ऐसे बच्चों  के लिए तो बिलकुल भी नहीं। हमें तो अब भी लगता  है कि यह किसी जन्म के पाप या बुरे कर्मों का नतीजा है। दुखद है कि समाज के बड़े हिस्से में अब भी बीमारियों की वजह किसी जन्म में किए गए पाप हैं। हम मान लेते हैं कि कोई पाप हमने चक्की में डाले हैं और जो आटा आया है वह खराब है। सवाल यह उठता है कि इस कथित खराब आटे को हम आपसी संबंधों के बारे में सजग करे या नहीं। ऐसे ब"ाों से जब यह सवाल किया जाता है तो वे इधर-उधर देखने लगते हैं या फिर जीभ निकालकर ऐसे जाहिर करते हैं जैसे यह तो आपने बुरी बात कर दी क्योंकि यही हम उनमें भरते हैं। मार्गरीटा यह हिम्मत  इसलिए कर पाती है क्योंकि उसकी अन्य इ'छाओं को दबाया नहीं गया था।
ऐसे ब"ाों के माता-पिता भाई-बहनों की दिक्कत समझ में आती है कि वे अपने काम के लिए ही आत्मनिर्भर नहीं तो शादी-संबंध की जिम्मेदारी कैसे लेंगे। वे दुविधा में ही रहते हैं और ऐसे बच्चों  पूरी जिंदगी अकेलेपन के साथ। लेकिन कोलकाता के जीजा और बापा ने इस दुविधा को तोड़ा है। जीजा इस बीमारी से ग्रस्त है और बापा सामान्य। बापा और जीजा के बीच यह लगाव उस समय हुआ जब वे उसे हाथ पकड़कर सड़क पार करा रहे थे। बापा कहते हैं वह बिलकुल सामान्य है लेकिन मैं उसे लेकर किसी ढाबे पर नहीं जा सकता, थड़ी पर चाय नहीं पी सकता।
विकलांगता कोई असाधारण बात नहीं है। उनकी सभी साधारण इ'छाएं पूरी होनी चाहिए। हम भले ही बंद समाज हैं, लेकिन इनके लिए हमें खुलना होगा। इन्हें सुर्ख रंग की लिपस्टिक अ'छी लगती है तो लगाने दीजिए। आमजन की दया को हाशिए पर रखिए और दुआओं को मुख्य धारा में लाइए। इनके बड़े दिलों में झांकिए। ये जीवन के प्रति आपका नजरिया बदलने की ताकत रखते हैं। उन माताओं को सौ-सौ सलाम, जो इन बच्चों के लिए अपनी सोच को तो आसमान जैसा विशाल बना देती हैं लेकिन जिंदगी को इन्हीं के आसपास समेट देती हैं।

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