Wednesday, April 15, 2015

ये लाडली न रीझती है न रिझाती


अक्सर हम टीवी विज्ञापनों का जिक्र इसी हवाले से करते हैं कि ये आज भी स्त्री की छवि को एक प्रोडक्ट की तरह ही इस्तेमाल करते हैं। बेचना चाहे शेविंग क्रीम या कच्छे-बनियान हो, स्त्री इस अंदाज में प्रस्तुत की जाती है जैसे दूसरे पक्ष पर रीझने और रिझाने के अलावा उसकी कोई भूमिका ही नहीं। वक्त बदला है और स्त्री की बदलती हुई छवि को विज्ञापन की दुनिया ने भी स्वीकारना सीखा है। थिएटर तो हमेशा से ही प्रगतिशील रहा है। फिल्में भी यदा-कदा अपनी मौजूदगी का एहसास करा देती हैं लेकिन चंद सेकंड्स की इन विज्ञापन फिल्मों का बदलना बड़ा बदलाव है। एक ऋण देने वाली बैंक के विज्ञापन पर गौर कीजिए। तेज बारिश में एक बेटी अपनी बुजुर्ग मां को अस्पताल ले जाने के लिए ऑटो वालों की मिन्नतें करती है लेकिन कोई नहीं चलता। कुछ दिनों बाद यही लड़की फिर एक ऑटो वाले को रोकती है कि भैया एमजी रोड चलोगे? ऑटो वाला मुस्कुराते हुए कहता है-'हां'

क्वीन के लिए डायना हेडन ने लाड़ली अवार्ड  लिया 

  मेरे  कॉलम खुशबू की पाती को भी मिला लाडली नेशनल अवार्ड 
lataji ki aur se in search of lata ke lekhak harish bhimani ne award liya. lataji ne apne sandesh mein kaha ki sab unhen lata didi kahte hain,ab shayad lata ladli kahenge to mujhe bahut khushi hogi.


। जवाब में लड़की इतराते हुए कहती है-'तो जाओ'। ... और वह फक्र से अपनी कार की ओर मुड़ जाती है।
एक और विज्ञापन पुरुषों के कपड़ा ब्रांड का है। अपने नन्हेे बच्चे को छोड़कर मां काम पर जा रही है। बच्चे से बिछडऩे का गम उसकी आंखों में है लेकिन उन्हीं आंखों में एक संतोष भी है क्योंकि दरवाजे पर उसके कामकाजी पति बच्चे को गोद में लिए आश्वस्त करते हैं कि तुम जाओ। मैं हूं इसकी देखभाल के लिए। यह एक ऐसे पति का चित्रण है जो अपने अभिभावकीय दायित्व तो निभा ही रहा है पत्नी की कामकाजी प्रतिबद्धता को भी समझ रहा है।
बहरहाल, यह उस समाज में है जहां स्त्री का कामकाजी होना तब ही स्वीकार्य है जब उसे धन की जरूरत हो। आम धारणा यही है कि जब पति अच्छा खासा कमाता है तो फिर पत्नी को बाहर निकलने की क्या मजबूरी। वाकई ये विज्ञापन बंधे-बंधाए ढर्रे को तोड़ते हैं। एक और एड कलाई घड़ी का हैे। लड़की गहरे प्रेम के बावजूद रिश्ता इसलिए नहीं स्वीकार कर पाती क्योंकि उसके होने वाले पति को शादी के बाद उसका बाहर जाकर काम करना पसंद नहीं। वह शादी से इंकार कर देती है। कुछ सालों बाद जब वे मिलते हैं तब भी लड़का वही सवाल करता है और वह कहती है तुम कभी नहीं बदलोगे। ऐसे ही कुछ विज्ञापनों को सम्मानित करने की शाम थी वह जब लाडली मीडिया एंड एडवरटाइजिंग अवॉर्ड ने मुंबई में पिछले सप्ताह इनके क्रिएटर्स को सराहा। युवा टीम के ये युवा आइडियाज नए हैं। अब लड़की केवल किसी की सोच के प्रतिरूप में नहीं ढल रही, अपनी सोच और वजूद को सामने रख रही है। ध्यान रहे कि कोई भी टीवी धारावाहिक चाहकर भी सम्मानित नहीं किया जा सका।
इसी कड़ी में फिल्म क्वीन भी पुरस्कृत हुई। क्वीन एक ऐसी लड़की की कहानी है जो एन वक्त पर विवाह से नकार दी जाती है। अकेले हनीमून पर  पेरिस यात्रा के लिए निकली रानी खुद की नई पहचान गढ़ती है। यात्रा उसे इतना साहस देती है कि अबकी बार वह खुद इस रिश्ते को छोड़कर आगे बढ़ जाती है। एक लड़की को समझना होगा कि कई सारी ज्यादातियां तो उसके साथ केवल इसलिए होती हैं क्योंकि वह उन्हें स्वीकारती चली जाती है। वह जाने क्यों इसे अपनी नियति मानने लगती है जो कि उसके एक फैसले भर से बदल सकती है।
इसी समारोह में लता मंगेशकर को लाडली वॉइस ऑव द सेंचुरी अवॉर्ड से नवाजा गया। हरीश भिमानी ने उनकी ओर से सम्मान ग्रहण किया। लता ने अपने संदेश में कहा कि वे अपने पिता दीनानाथ की बेहद लाड़ली रही हैं। सारा देश उन्हें लता दीदी कहता है। अब इस सम्मान के बाद शायद लता लाड़ली कहे। दानिश रजा की कहानी का जिक्र इसलिए जरूरी है, क्योंकि उन्होंने हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के उस सच का खुलासा किया जहां स्त्री की कीमत पशुओं से भी कम है। 'चीपर देन कैटल' नाम से  प्रकाशित यह स्टोरी समाज में स्त्री के हालात बयां करती है। छत्तीसगढ़ की प्रियंका कौशल की स्टोरी भी उन युवतियों के हक में उठी आवाज है जो मानव तस्करी के लिए जिम्मेदार बड़े गिरोहों का मोहरा बन जाती है। अशिक्षा, गरीबी और एक स्त्री का स्त्री होना ऐसे भयावह दलदल में धकेलता है जहां से इंसाफ और फिर पुनर्वास की कोई उम्मीद नहीं दिखाई पड़ती। उपमिता वाजपेयी के अभियान तेज़ाब के खिलाफ को बेस्ट कम्पैन मन गया।मणिपुर की उर्मिला माहवारी के मिथ को तोड़ते हुए बेस्ट सोशल मीडिया कम्पैन का अवार्ड लेती हैं तो डॉ स्वाति तिवारी भोपाल गैस त्रासदी पर लिखी किताब सवाल आज भी ज़िंदा हैं के लिए.  मिनती को Best news reporting - TWO GUTSY WOMEN BREAK GLASS CEILING के लिए। ऐसे ही अवॉर्ड्स  की श्रृंखला  में सम्मानित खुशबू के पाठकों के लिए लिखा जाने वाला यह कॉलम भी है। यह डेली न्यूज़ अखबार की पत्रिका में हर सप्ताह प्रकाशित होता है। खुशबू की पाती को बेस्ट कॉलम, प्रिंट का राष्ट्रीय लाडली मीडिया अवॉर्ड मिला है। यह खुशबू के पाठकों का सम्मान है।

3 comments:

वाणी गीत said...

मुबारक हो!!

प्रदीप कांत said...

विज्ञापन के बहाने एक अच्छा विश्लेषण

और ख़ुश्बू के लिये मुबारक

varsha said...

bahut shukriya vaniji aur pradeep ji