Wednesday, March 11, 2015

बैन का बैंड

 ये बैन संस्कृति कुछ ज्यादा ही लोकप्रिय हो गई है देश में। सलमान रश्दी लिखित शैतान की आयतें,(द सैटेनिक वर्सेस) नहीं पढ़ सकते क्योंकि बैन है। तस्लीमा की पुस्तक लज्जा से रूबरू होना है, बैन है। वेंडी डॉनिगर (द हिंदूज) ने हिंदुत्व पर ठीक से नहीं लिखा, बैन है। द रेड साड़ी, सोनिया गांधी पर लिखी जेविअर मोरो की किताब पढऩी है, बैन है। फिल्म किस्सा कुर्सी का बैन है क्योंकि इसमें आपातकाल का मजाक उड़ाया गया है। गुजरात में फना बैन है। ग्रीन पीस की प्रिया पिल्लई की लंदन यात्रा बैन है।

कुछ देर के लिए आंखें बंद कर फर्ज किया कि मैं निर्भया हूं और मेरे मरने के बाद एक डॉक्युमेंट्री बनती है जिसमें मेरा अपराधी कह रहा है कि लड़कियों को रात में लड़के के साथ घर से नहीं निकलना चाहिए। कपड़ों का खयाल रखना चाहिए। हम उसे सबक सिखाना चाहते थे। यकीन मानिए मैं पसीने से नहा गई, हलक सूख गया कि मेरे साथ निर्भया जैसा घटा है लेकिन मुझे अपराधी ड्राइवर मुकेश की बातों पर कोई अचरज नहीं हुआ। यह सोच कोई नई नहीं है। बचपन से ही लड़कियों से  यही तो कहा जाता है। आज भी जब बचपन के बाद युवावस्था की दहलीज भी पार होने को है, लगता है कहीं कोई हिस्सा उजागर तो नहीं है। इसे पहन लेना किसी को खटकेगा तो नहीं। आपका पहनना-ओढऩा ही आपके अच्छे या बुरे होने का सबूत है। मेरी एक पड़ोसन अपनी पड़ोसन को केवल इसलिए पूरे अंक दे रही थीं क्योंकि उन्होंने उसे कभी बिना बाजू के कपड़ों में नहीं देखा। जी पड़ोसन, हम स्त्रियां भी ऐसी ही सोच की शिकार हंै।
    अब यहां डॉक्युमेंट्री मेकर लेस्ली उडविन क्या करें जिनके जेहन में कपड़ों, मित्रों, घुमक्कड़ी को लेकर ऐसा कोई खाका ही नहीं। लेस्ली ने ही इंडियाज डॉटर नाम से यह वृत्तचित्र बनाया है जिसे दिखाने पर बैन लगा दिया गया है। ये बैन संस्कृति कुछ ज्यादा ही लोकप्रिय हो गई है देश में। सलमान रश्दी लिखित शैतान की आयतें,(द सैटेनिक वर्सेस) नहीं पढ़ सकते क्योंकि बैन है। तस्लीमा की पुस्तक लज्जा से रूबरू होना है, बैन है। वेंडी डॉनिगर (द हिंदूज) ने हिंदुत्व पर ठीक से नहीं लिखा, बैन है। द रेड साड़ी, सोनिया गांधी पर लिखी जेविअर मोरो की किताब पढऩी है, बैन है। फिल्म किस्सा कुर्सी का बैन है क्योंकि इसमें आपातकाल का मजाक उड़ाया गया है। गुजरात में फना बैन है। ग्रीन पीस की प्रिया पिल्लई की लंदन यात्रा बैन है। कोई समूह, कोई दल, कोई संस्था दबाव बना देती है और हम बैन लगा देते हैं। ये बैरी बैन है या बैंड जो गाहे-बगाहे बजता ही रहता है। प्रजातांत्रिक देश के ये क्या मायने हुए कि जब जिसके जी में आता है बैन प्रपोज कर देता है। सही कहा है निर्देशक ने कि बैन से भारत की छवि धूमिल होगी।
      हैरत होती है कि अंग्रेजी का एक चैनल रात को चीखता है कि कोई विदेशी चैनल कैसे हमारे देश की इतनी अवमानना कर सकता है। वे अपने मुल्क में ऐसा करके दिखाएं, अगले  दिन राज्य सभा में गृहमंत्री घोषणा कर देते हैं कि यह डॉक्युमेंट्री प्रसारित नहीं होगी। उन्होंने कहा कि कैसे जेल के अधिकारियों ने एक सजायाफ्ता कैदी से मिलने की इजाजत दी। यह अपराधों का महिमामंडन है। सांसद अनु आगा और जावेद अख्तर ने राज्य सभा में विरोध किया लेकिन ज्यादातर उनके साथ नहीं थे। जया भादुड़ी कह रही थीं कि आखिर कब इन अपराधियों को फांसी दी जाएगी। वाकई खामी अगर हमारे सिस्टम में है तो जांच-पड़ताल उसकी होनी चाहिए एक डॉक्युमेंट्री को बैन करके उसे क्यों प्रचारित किया गया। अब तो उसे ढूंढ-ढूंढकर इंटरनेट पर देखा जा रहा है।
   डॉक्युमेंट्री छोडि़ए हम तो फिल्म मेकर सत्यजीत रे(पाथेर पांचाली)से लेकर डेनी बॉयल (स्लमडॉग मिलेनियर) पर ये इल्जाम लगाते आएं हैं  कि इन्होंने भारत की गरीबी बेची। ये गरीबी दिखाकर अवॉर्ड लेते हैं। दोनों ही फिल्मों को ऑस्कर मिले हैं। दोष उस गरीबी का है या उस गरीबी को पाले रखने वाले तंत्र का? यह पचास साल पहले भी वैसा ही था जैसा आज है। दिखाई है डेनी ने मुंबई के धारावी की गरीबी क्योंकि यह है। दुष्कर्म जैसे कृत्य भी हैं और दुष्कर्मियों के समर्थन में दिए जाने वाले नेताओं के बयान भी हैं लेकिन वे बैन नहीं होते। ये अपराध हमारे देश की हकीकत हैं। आंकड़े इस कदर बढ़े हुए हैं कि विदेशी स्त्रियां भी शिकार हो रही हैं। दिल्ली में स्विट्जरलैंड की महिला के साथ टैक्सी में और जयपुर में जापानी स्त्री के साथ।
   बेशक हम घाव का इलाज करना चाहते हैं लेकिन घाव के लिए जो वाइरस जिम्मेदार है उससे मुंह मोड़े हुए हैं। जानकर भी अनजान। बैन ऐसा ही इलाज है। संयुक्त अरब अमीरात में परिचित की बेटी पढ़ाई कर रही है। आश्चर्य हुआ कि बेटी को पढऩे के लिए वहां भेजा , उनका जवाब था यहां तो बच्ची के घर से निकलते ही हमारी धड़कनें बढऩे लगती हैं। वहां वह दो साल से है लेकिन मैं निश्चिंत हूं। कोई आंख उठाकर भी नहीं देखता। डर ही इतना है अपराधियों में। 

ps : फिल्म में निर्भया का नाम लिया गया है. उसके माता-पिता को इस पर कोई एतराज़ नहीं।  वह  भारत की बेटी थी  जो गाँव से आकर अपने ख्वाब को पूरा करने जा रही थी भारत की राजधानी में.

4 comments:

Dilbag Virk said...

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 12-03-2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 1915 में दिया जाएगा
धन्यवाद

Madan Saxena said...


सुंदर भावनायें और शब्द भी ...बेह्तरीन अभिव्यक्ति ...!!शुभकामनायें.

Vinay Singh said...

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