Wednesday, December 23, 2015

तेरा ज़िक्र होगा अब इबादत की तरह...

original picture of mastani(1699 -1740 )



sanjay leela bhansali 's mastani
mastani mazar/samadhi in pune

मस्तानी कहने को मराठा साम्राज्य के पास बुंदेलखंड रियासत की ओर से नजराने में आई हो लेकिन उसने साबित किया कि वह उन बेजान सौगातों की तरह नहीं है। वह अपनी धड़कनों की मलिका थी। वह योद्धा थी, घुड़सवारी, तलवारबाजी जानती थी, बेहद खूबसूरत थी और संगीत उसकी रगों में था। हम जिस बुंदेलखंड को 'सौ डंडी एक बुंदेलखंडी' कहावत  से जानते हैं, उसी बुंदेलखंड की वह पैदाइश थी। बुंदेलखंड के राजपूत राजा छत्रसाल को मोहम्मद खान बंगश से खतरा था। उसका आक्रमण किसी भी क्षण उनके राज को तबाह कर सकता था।  गरुड़ दृष्टिवाले बाजीराव पेशवा यानी मराठा साम्राज्य से मिली ताकत से ही वे राज्य को बचा पाए। सौगात में झांसी, कलपी,सागर और 33 लाख सोने के सिक्के  दिए गए। मस्तानी भी पहुंची। मस्तानी-बाजीराव की कुरबत को मराठा राजघराना पचा नहीं पाया। मस्तानी राजपूत राजा और मुस्लिम मां रूहानी बाई की संतान थी। बाजीराव की शोहरत और वीरता उसे एक महायोद्धा में तब्दील करती जा रही थी लेकिन महल के गलियारे बाजीराव की पत्नी काशीबाई और मां राधाबाई के विरोध की चुगली करने लगे थे। काशीबाई मस्तानी को कभी कुबूल नहीं कर पाईं लेकिन अपने पति की मोहब्बत को चाहकर भी खारिज ना कर सकी।
पेशवाई मस्तानी-बाजीराव के बेटे को भी नहीं अपना पाती। वह उसे मुसलमान मानते हुए दूरी बनाए रखती है। रजवाड़ों के अजीब दस्तूर हैं जोधा-अकबर के पुत्र को मुगल सल्तनत का वारिस माना गया जबकि बाजीराव-मस्तानी की संतान को नहीं अपनाया गया। बाजीराव (बाजीराव 1700-1740) ने मस्तानी के लिए पुणे में मस्तानी महल का निर्माण कराया। मस्तानी और परिवार के द्वंद के बीच वह युद्ध लड़ता गया और चालीस बरस की उम्र में बुखार से चल बसा। मस्तानी इस दुख को सह ना सकी और उसने खुदकुशी कर ली। इतिहास की किताबों में यह स्पष्ट नहीं है कि मस्तानी ने जौहर किया। मस्तानी की कब्र आज भी पुणे से साठ किलोमीटर दूर एक गांव में है। हिंदू-मुस्लिम सभी वहां श्रद्धा से जाते हैं। हिंदू उसे समाधि और मुस्लिम मजार कहते हैं। इस जगह को संभालने वालों का कहना है कि जब मस्तानी और बाजीराव को एकदूसरे से कोई दिक्कत नहीं थी तो हम फर्क करने वाले कौन होते हैं।
बाजीराव-मस्तानी की संतान के बारे में कहा जाता है कि उसे काशीबाई ने पाला। उसका नाम कृष्णाराव भी था और शमशेर बहादुर भी। बाजीराव - मस्तानी अपने पुत्र को कृष्णा नाम के साथ ब्राह्मण संस्कार से बड़ा करना चाहते थे लेकिन ब्राह्मणों के विरोध के कारण बाजीराव तय करते हैं कि वह मुस्लिम मां का बेटा है इसलिए उसका नाम शमशेर बहादुर होगा।  बाद में वह बांदा का नवाब बनता है और पानीपत की तीसरी लड़ाई में अपने चचेरे भाईयों के साथ मारा जाता है। 

यह इतिहास है लेकिन  संजय लीला भंसाली ने इसे फिर जिंदा कर दिया है जिसका आधार नागदेव इनामदार का मराठी उपन्यास राव है। इनकी मोहब्बत फिर जिंदा हो उठी है और जिंदा हो चुका है मस्तानी का जुनून। तुझे याद कर लिया है आयत की तरह तेरा ज़िक्र होगा अब इबादत की तरह... मस्तानी के ये लफ्ज उसकी बाकी जिंदगी  का अक्स हैं। काशीबाई की भूमिका में प्रियंका चोपड़ा हैं और वे दीपिका के साथ हर दृश्य में बेहतर हैं। ुनृत्य में भी माहिर नजर आती हैं। दूसरी स्त्री के आगमन से पत्नी काशीबाई के दर्द को प्रियंका ने गहराई से जिया है। मराठी तेवर कमाल का पेश हुआ है। रणवीर सिंह ने भी मराठी एक्सेंट को खूब साधा है और पेशवाई को रूह में उतारा है। मोहब्बत और योद्धा का जुनून आंखों से जाहिर होता है। वे मल्हारी गीत में भी कमाल करते हैं। मस्तानी यानी दीपिका की यह लगातार तीसरी फिल्म है जो उन्हें बेहतरीन साबित करती है। पीकू , तमाशा के बाद बाजीराव-मस्तानी दीपिका को नए आयाम देती है। मराठा साम्राज्य के कालखंड का हर फे्रम मुकम्मल मालूम होता है। जयपुर फिल्म के कई दृश्यों का जोड़ीदार है। छत्रसाल का बुंदेलखंड हो या मराठाओं का पुणे फिल्म को सहारा जयपुर के जीवंत आमेर से ही मिलता है। फिल्म के कई दृश्य जयपुर में शूट हुए हैं।

Wednesday, December 16, 2015

आज 16 दिसंबर है

सामंजस्य उस घटना पर ही नहीं है जिसने पूरे देश को झकझोर दिया था। दिल्ली सरकार निर्भया के नाबालिग अपराधी का पुनर्वास करना चाहती है  और केंद्र  उसे कैद में रखना चाहता है। 

 आज 16 दिसंबर है, वो तारीख जिस रात निर्भया छह दरिंदों की हैवानियत का शिकार हुई थी। हर भारतवासी दहला हुआ था। दुष्कर्म जैसे अपराध के खिलाफ एक ज्वाला-सी धधक रही थी। ये वह समय था जब लगता था कि अब हर स्त्री का सम्मान सुरक्षित रहेगा। क्या स्त्री क्या पुरुष हरेक मोमबत्तियों की  लौ में इस कुत्सित प्रवृत्ति को जलते हुए देख रहा था। मानना था कि ऐसे अपराधों पर यहीं विराम लग जाना चाहिए। संभावना से भरपूर निर्भया फिजियो थेरेपिस्ट बनने वाली थी। वह माता-पिता के सपनों को साकार कर देना चाहती थी। दिल्ली में एक एअरपोर्ट श्रमिक की यह बेटी परिवार की उम्मीद थी लेकिन उस रात एक बस में उसके मित्र के सामने दरिंदों ने उसके साथ दुष्कर्म किया और उसे इस कदर घायल कर दिया कि तेरहवें दिन सिंगापुर में इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। यह हत्या थी जिसके बारे में उसके अपराधी ने कहा था कि अगर वह विरोध नहीं करती तो नहीं मरती।
    इस अपराध से जुड़े एक नाबालिग अपराधी के बारे में कहा जाता है कि उस दिन वहशीपन को नई धार देने वाला वही था। हमारा कानून कहता है कि नाबालिग को सुधरने का मौका दिया जाना चाहिए और वह वयस्क-सी सजा का हकदार नहीं है। केंद्र सरकार का मानना है कि यह अपराध इतना गंभीर है कि नाबालिग को सजामुक्त नहीं रखा जा सकता। वह ऐसा अपराधी है जो मुक्त रहकर या तो खुद अपराध करेगा या दूसरों को उकसाएगा। सरकार की ओर से न्यायालय में सुब्रमणियम स्वामी हैं और एक ऐसा बिल भी लोकसभा में पारित हो चुका है जहां नाबालिग अपराधी की अधिकतम आयु अठारह की बजाय सोलह करने की पेशकश है। यह बिल अभी राज्यसभा में पारित नहीं हुआ है। बहरहाल, बिल अगर पारित भी होता तब भी निर्भया के दोषी को सजा नहीं हो पाएगी। उच्च न्यायालय ने फैसला सुरक्षित रखा है।  वह 20 दिसंबर को छूट सकता है। दिल्ली सरकार उसे दस हजार रुपए सहायता राशि दे रही है ताकि वह सिलाई मशीन खरीद सके।
     निर्भया के पिता की स्पष्ट राय है कि उसे बख्शा नहीं जाना चाहिए क्योंकि ऐसे कई मामले लगातार प्रकाश में आ रहे हैं जहां किशोरों ने संगीन अपराध किए हैं। इसे बचाकर हम उन्हें प्रोत्साहित करेंगे कि वे अपराध करके भी बच निकल सकते हैं। मैं अपनी बेटी के साथ-साथ उस भविष्य के बारे में भी कहना चाह रहा हूं जहां बेटियां सुरक्षित हों।
    यह सच है कि समय के साथ वयस्क होने की उम्र भी घटती मालूम होती है। जब नन्हें बच्चे जो सकारात्मक दिशा में हैं वे ही इतनी उपलब्धियां हासिल कर रहे हैं तो जाहिर है नकारात्मक दिशा में जाने वाले अपराधियों का ग्राफ भी बढ़ा है। अठारह में ब्याह, मतदान, लाइसेंस, बैंक खाते का स्वामित्व देने वाला समाज/कानून अब सोलह में बालिग करार देने की तैयारी कर रहा है। यह फैसला बहस का आधार बनाता है। इसे सब पर लागू किया जा सकता है या अपराध की प्रकृति को देखकर निर्णय किया जाना चाहिए। मासूमियत की उम्र छीनने के लिए कौन जिम्मेदार है। बच्चे  क्यों जल्दी बड़े हो रहे हैं? क्यों निश्छलता गायब हो रही है?
    हम इंटरनेट, टीवी, सिनेमा, बढ़ती प्रतिस्पर्धा, सबको दोष दे सकते हैं लेकिन हमें खुद से पूछना होगा कि हमने किसी काम को बिना अपेक्षा के करना कब से छोड़ दिया है? हम अपने हर निवेश के बदले केवल पाना ही चाहते हैं। बच्चे को स्कूल में दाखिल कराया है तो वह वहां बेस्ट हो, वह डांस सीख रहा है तो वहां भी। वह कोचिंग जा रहा है तो आईआईटी या मेडिकल में ही चयनित हो। जब हमने हर कोशिश में उससे कामयाब होने की ही अपेक्षा की तो उसने भी मासूमियत छोड़ दी। वह वक्त से पहले बड़ा हो गया। हम परिणाम चाहने वाला समाज बन गए हैं। टारगेट ओरिएंटेड समाज।
   ये बातें नाबालिग अपराधी से कोई ताल्लुक नहीं रखती लेकिन मासूमियत छीनने वाले हम ही हैं। हम चाहकर भी इसे लौटा नहीं सकते अलबत्ता जहां ये आज भी कायम हैं वे स्थान या समाज हमारे शोध का विषय जरूर हो सकते हैं। कोई पहाड़ी क्षेत्र या सुदूर आदिवासी इलाका जहां मानव इतना मशीनी नहीं हुआ है। कुदरत से उसका ताल्लुक कायम है। उसके बच्चों के हाथ वे गैजेट्स नहीं हैं  जो चुंबकीय तरंगों से परिचालित हैं । उसका सूर्य, जंगल और रोशनी से रिश्ता कायम है। अठारह से सोलह पर आने के लिए हम ही जिम्मेदार हैं। चौदह पर ना लुढ़क जाएं इसके प्रयास करने होंगे।

रुख से जो यूं चली गई मासूमियत
कैसे रूबरू होंगे तेरे-मेरे ये जज़्बात 

ps: pak story आज  ही के दिन एक साल पहले पाकिस्तान के पेशावर में स्कूल के बच्चों पर आतंकवादियों ने हमला किया था।  १५० मासूम इस हमले में मार दिए गए थे।

Thursday, November 26, 2015

ब्याह के इस मौसम मे

 शादी, ब्याह इस दिव्य संबंध को चाहे जिस नाम से पुकारा जाए जब दो जिंदगियां साथ चलने का फैसला करती हैं तो कुदरत दुआ देती ही मालूम होती है। शहनाई की मंगल ध्वनि इसी दुआ की संगीतमय अभिव्यक्ति है। ब्याह की तमाम परंपराएं, फेरे, वचन, आहुति, मंत्र ऐसे दिव्य वातावरण का आगाज करते हैं कि ब्याह को बरसों-बरस जी चुका जोड़ा भी नई ताजगी का अनुभव करता है। सच है कि हम विवाह संस्था और कुटुंब का हिमायती समाज हंै। हम किसी भी कीमत पर इस संस्था को बचाए रखना चाहते हैं। शादी में ईमानदारी बुनियादी जरूरत है लेकिन हम इस नींव के खिसकने के बाद भी शादी को बचाए रखने में यकीन रखते हैं। आखिर क्या वजह है इसकी?
हमारी अदालतें, हमारा समाज सब शादी को बचाए रखने में यकीन रखते हैं क्योंकि तमाम मतभेदों के बावजूद सुबह झगड़ते पति-पत्नी शाम को फिर एक हो जाते हैं। यह स्पेस इस रिश्ते में हमेशा बना रहता है। कई जोड़े तलाक की सीमारेखा को छूने के बाद इस कदर एक होते हैं कि मालूम ही नहीं होता कि विच्छेद शब्द उन्हें छूकर भी गुजरा था। सवाल यह उठता है कि हमारे पुरखों ने एकनिष्ठ होने की अवधारणा के साथ विवाह संस्था को स्थापित किया था तो आज क्यों ये विघटित होती दीख रही है। अलगाव के अनेक मामले पारिवारिक अदालतों की देहरी चढ़े बैठे हैं और पुलिस थाने दहेज के सामान से भरे हुए हैं। यही कारण है कि अब शादी के साथ ही पति-पत्नी को अपनी प्रॉपर्टी स्पष्ट करनी होगी । ये दस्तावेज शादी के बाद के विवाद से बचाएंगे।
 क्या एकनिष्ठ होने की सोच में कोई घुन लगा है या फिर परिवार की अनावश्यक दखलअंदाजी रिश्तों को टिकने नहीं दे रही है? मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने पांच हजार साल पहले जब एक पत्नी की अवधारणा को रखा तो केवल एक जोशीला फैसला भर नहीं था बल्कि एक जीवन पद्धति थी जबकि उनके पिता दशरथ की चार पत्नियां थीं। एकनिष्ठ होने में सुकून है। सात जन्मों की शांति है।
बहरहाल, रिश्तों की सिसकियां, टूटन, बिखराव के बीच समाज में ब्याह के कायम रहने के ही उदाहरण मौजूद हैं। तलाक लगभग अस्वीकार्य । अब भी तलाक लेने वालों को सम्मानित निगाहों का इंतजार है। हम नहीं स्वीकार पाए हैं कि दो शख्स साथ-साथ चले लेकिन जब नहीं चल पाए तो उन्होंने राहें बांट लीं। स्वस्थ समाज में इसकी स्वीकार्यता होनी चाहिए। विवाह संस्था श्रेष्ठ है इसका पालन करते हुए दो मन जिंदगी भर घुटते रहें, इस सोच में बदलाव आना चाहिए।
 ब्याह की तमाम परंपराएं सर माथे लेकिन शोशेबाजी, दिखावा यहां अपने पूरे तामझाम के साथ मौजूद है। दहेज विवाह की अनिवार्य बुराई में से एक है। बारातियों का सड़क रोकना, आतिशबाजी, भोजन की बर्बादी, कब इस पवित्र बंधन का अपवित्र सा हिस्सा बन गए, हमें पता ही नहीं चला। एक घोड़ी दूल्हे को बैठाने के लिए किस तरह दौड़ती और पिसती है, बारात को रोशनी दिखाने वाले कंधे किस कदर कमजोर और फटेहाल हैं, भीड़  भरे इन सामाजिक समारोहों में सफाई व्यवस्था किस कदर खाई में होती ये सब हम नहीं देखते। लकदक बारात के ये स्याह रंग हमें नजर नहीं आते। क्या ये ब्याह समारोह सादगी और शालीनता के शामियाने तले नहीं हो सकते? आशीर्वाद समारोह में दूल्हा-दुल्हन क्यों मेहमानों को ना पहचान कर भी नकली मुस्कान ओढ़े रखते हैं? क्या ये हमारे अति आत्मीय प्रियजनों के साथ संपन्न नहीं हो सकता?
आखिर में एक बात जो बरखा दत्त के टीवी शो वी द पीपल में नजर आई। कल्पना सरोज दलित व्यवसाई हैं जिनका मानना था कि आर्थिक संपन्नता के बाद भी समाज के रवैये में कोई खास बदलाव उन्होंने महसूस नहीं किया है। उन्होंने बताया कि उनकी बेटी ने ब्राह्मण से शादी की है। जब उनसे पूछा गया कि क्या उस परिवार ने आपके आर्थिक रुतबे को देख अपने बेटे की शादी की है, कल्पना ने कहा कि दामाद आशीष देशपांडे स्वयं यहां आए हैं आप खुद पूछ लीजिए। आशीष का जवाब था, मुझे वह पसंद थी और मैं मानता हूं कि पूंजी-वूंजी नहीं बल्कि प्रेम ही है जो समाज में बराबरी के बीज बो सकता है। वो कोई भी होती मैं शादी करता। कल्पना सरोज ने भी माना कि बेटी का ससुराल पक्ष कोई भेदभाव नहीं बरतता। शादी दो दिलों का ही मेल है इस परम सत्य के अलावा बाकी सब झूठ है।

Thursday, October 29, 2015

छंद की तरह गूंजते तुम


दो जिंदगियों के बीच ऐसा कौनसा गठजोड़ है जो ताउम्र उन्हें एक रखता है। अरसा पहले यही सोच थी कि कहीं भी चले जाओ पति-पत्नी अक्सर जूझते हुए ही नजर आते हैं। जोधपुर में पैंतीस साल के दांंपत्य के बावजूद उम्रदराज जोड़े को लड़ते-झगड़ते देखना हैरत में डाल देता था। आखिर इतने बरस बीत गए लेकिन इनके मतभेद उतने ही ताजादम क्यों हैं। वे छोटी-छोटी बातों पर उलझते रहते। जयपुर में एक और जोड़े को करीब से देखने का मौका मिला। उनमें गजब का मतैक्य इस बात को लेकर था कि इन मुद्दों पर हम एक दूसरे को बिलकुल नहीं टोकेंगे। तुम तुम्हारे हिसाब से और मैं मेरे हिसाब से। अलवर के एक जोड़े को देखकर लगता था कि पत्नी कुछ कहती भी नहीं हैं और पति समझ लेते हैं। पति-पत्नी आंखों ही आंखों में पूरी बात कर लेते। कभी उन्हें तेज संवाद करते नहीं सुना।
    इन सभी सूरतों में जो सीधे नुमाया नहीं था वह था प्रेम। वह भाव कि हम दोनों को एक ही रहना है। साथ देना है एक दूसरे का। एक दूसरे को इस रिश्ते में इतना खुलापन देना है कि एक का भी दम ना घुटे। जो पति-पत्नी कहते हैं कि हममें कभी झगड़ा नहीं हुआ वे झूठ कहते हैं। जिस दांपत्य में बहस नहीं, विचारों की अभिव्यक्ति नहीं वह रिश्ता एक तरफा है। अधूरा है। वहां घुटन होगी क्योंकि एक बस केवल दूसरे की आज्ञा शिरोधार्य कर रहा है। उसके पास अपनी बात कहने का साहस नहीं या फिर उसे सुना नहीं जा रहा है। पत्नी वक्त पर चाय, धुले कपड़े और भोजन परोस दे यह दांपत्य नहीं। इसमें कोई नयापन नहीं। यह लीक पर चलना होगा। लीक पर गाडिय़ां चलती हैं, भेड़ें चलती हैं। रिश्ते में नवोन्मेश, ऊर्जा, उत्साह का संचार इन लीकों पर चलने से नहीं होगा।
बरसों-बरस इसी ढर्रे को जीते हुए एक दूसरे की आदत हो जाती है। आदत तब टूटती है जब दोनों में से कोई एक विदा लेता है। हम अक्सर उस पत्नी की चिंता करते हैं जिसका सोलह शाृंगार अब छूट चुका है, मांगलिक कार्यों में उसकी उपस्थिति अब अपेक्षित नहीं है। लेकिन अकेले उस पति का जीवन भी आसान नहीं जिसका साथी विदा ले चुका है। वह अकेला केवल उस सुबह के इंतजार में रहता है जो पार्क में उसके मित्रों के आने से गुलजार होती है। उस सुबह के बाद जो शाम आती है उसमें वह खुलकर आंसू बहाना चाहता है लेकिन इसकी इजाजत नहीं है। कवि अशोक वाजपेयी लिखते हैं
तुम चले जाओगे
पर मेरे पास
रह जाएगी
प्रार्थना की तरह पवित्र
और अदम्य
तुम्हारी उपस्थिति
छंद की तरह गूंजता
तुम्हारे पास होने का अहसास।
तुम चले जाओगे
और थोड़ा सा यहीं रह जाओगे!
जब ये रिश्ता इतना मधुर और मीठा है तो इसे हर हाल में क्यों ना संजोया जाए। दुनिया में शायद ही कोई रिश्ता इतने करीब का हो। दो अंजान कब जान बनकर एकदूसरे के होते चले जाते हैं इसका कोई गणित किसी के पास नहीं है। यहां गणित नाकाम है जो कामयाब है वह है एक दूसरे को महसूस करने का भाव। जो जोड़े एकदूसरे से झगड़ते हैं उनमें भी यही भाव प्रबल है। यूं कौन किसी पर कान धरता है और प्रतिक्रिया देता है। इस इजहार में केवल प्रेम है। जीवन का ऐसा शाृंगार जो गर्म मौसम की वजह से आई ऊब को ऊर्जा से लबरेज करता है। 

Wednesday, October 21, 2015

लौटाने वालों के हक़ में

सब अपने-अपने तर्क गढ़ रहे हैं।  शशि थरूर कहते हैं रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने अंग्रेजों का नाइटहुड  सम्मान था कोई साहित्य का नोबेल नहीं।  राजस्थान के आईदान सिंह भाटी लिखते हैं जिस साहित्य अकादमी ने मेरी राजस्थानी भाषा को मान्यता दी, उसे लौटाने का कदम कोई कैसे उठा सकता है। सबके अपने तर्क हैं लेकिन विरोध के विरोध में शायद कोई नहीं



लेखक अपने अवार्ड्स लौटा रहे हैं। वह सम्मान, जिसे पाकर उन्हें अपना जीवन सार्थक लगा होगा उसे वे लौटा रहे हैं। क्यों लौटा रहे हैं? क्या मिल जाएगा उन्हें? शायद आत्मरक्षा। यह सुरक्षा के  लिए उठाया गया कदम है। उन्होंने देखा कि कन्नड़ साहित्यकार कलबुर्गी गोलियों से शूट कर दिए जाते हैं। पानसरे  और दाभोलकर की भी हत्या कर दी जाती है। किसी के लिए किसी की विचारधारा को सहन नहीं कर पाने की संकीर्ण मानसिकता इस कदर सिर उठाती है कि कभी भीड़ तो कभी हथियारबंद समूह व्यक्ति को मार डालते हैं। या तो मरने के लिए तैयार हो जाओ या फिर अपना रक्षाबल खुद खड़ा करो। लेखकों ने यही किया है उन्होंने प्रतीकात्मक विरोध खड़ा किया है। लोकतंत्र में इससे शांतिप्रिय और कुछ नहीं हो सकता।  नाइटहुड सम्मान लौटाकर ही रवींद्रनाथ टेगौर ने अंग्रेजों के जलियावाला बाग हत्याकांड का विरोध किया था। 
क्या कहा, ये राजनीति है? ये लोग उस समय क्यों नहीं सामने आए जब पश्चिम बंगाल सरकार ने तसलीमा नसरीन  की किताब पर प्रतिबंध लगाते हुए उन्हें अपने राज्य से बाहर चले जाने के  आदेश दिए थे।सलमान रश्दी की किताब द सैटेनिक वर्सेज पर तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने प्रतिबंध लगाया था। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में भी उन्हें शामिल होने नहीं दिया गया। मकबूल फिदा हुसैन को दुनिया बतौर भारतीय पेंटर जानती है, लेकिन उन्हें अपने प्राण कतर नामक मुल्क में त्यागने पड़े। हम गुस्से में कहते हैं कि यह स्वनिर्वासन उन्होंने खुद को दिया था, लेकिन आताताइयों के डर से सुरक्षा कवच तो लेना ही पड़ता है। तसलीमा कहती हैं यह चयनित विरोध है। आप केवल एक तरह के कट्टरपंथ का विरोध करते हैं। दूसरे और तीसरे पक्ष की ओर नहीं देखते। उनका कट्टरपंथ क्यों जायज माना जाता है? बहरहाल तसलीमा को जवाब देना चाहिए कि जब बीस साल पहले बांगलादेश में रहते हुए उन्होंने हिंदुओं पर मुसलमानों के जुल्म पर आधारित लज्जा लिखी थी वह क्या था?      सोमवार को ऑस्ट्रेलियाई मूल के जोड़े को बेंगलूरु में इसलिए प्रताडि़त किया गया कि उनके पैर में जो टैटू था वह एक समूह विशेष को देवी मां जैसा लगा। इस विराट और वैभवशाली संस्कृति की पैरवी करने  ये कौन लोग इन दिनों निकले हुए हैं। कौन हैं जो ये कह रहे हैं कि यहां लिखा है कि ये खाने पर इन्हें मार दो। खुर्शीद कसूरी पाकिस्तानी हैं, जो इनकी किताब का मुंबई में विमोचन करवा रहे हैं उनके मुंह पर कालिख पोत दो। कालिख पुते चेहरे के साथ सुधींद्र कुलकर्णी कहते हैं- ये मेरा नहीं मेरी शर्ट पर लगे इस तिरंगे का अपमान है जिसे भी काला कर दिया गया है। कौन इजाजत देता है इन्हें कि  क्रिकेट मैच के लिए जिम्मेदार लोगों के कैबिन में जबरन घुसकर हंगामा करो। यह किस दौर में पहुंच रहे हैं हम। पाकिस्तान से मैच नहीं कराने हैं, ना हो। सरकार फैसला करेगी लेकिन  यहां तो कोई और ही फैसले पर आमादा है।
कल को हमें अपने पड़ोसी का चेहरा पसंद नहीं है तो हम खुद ही हिसाब करने लगेंगे। सभ्यता हमें हर हाल में हद में रहने की ताकीद करती है। यही कानून और व्यवस्था संभालने वालों के भी प्रयास होते हैं, लेकिन बात-बात में लोग और भीड़ कानून हाथ में लेने लगेंगे, तो भरोसा किस पर होगा। फिलहाल यहीं भरोसा टूट रहा है। बेशक लेखक समूह अपनी बरसों की इस पूंजी को लौटाकर खुश नहीं होगा लेकिन उसके पास चारा नहीं है। उसे आश्वासन चाहिए। प्रजातांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार से आश्वासन। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के मुखिया से आश्वासन। उस मजबूत सरकार से मजबूत वादा जिसे भारतीयों ने चुना है। विकास की राह में दौड़ते हुए यह भटकाव किसी को भी तकलीफदेह लगेगा। यह संघर्ष खत्म होना चाहिए। इस लौटाने पर उनका यह कहना कि ये लेखक दूसरे दलों के मोहरे हैं, अशोभनीय है। संवादहीनता की इस परिस्थिति को बदलना चाहिए। संवाद का पुल बनना ही चाहिए। जो बात भारत-पाकिस्तान के संदर्भ में लागू होती है वह हालात देश में क्यों बनने चाहिए? कौन जिम्मेदार होगा इसके लिए?

Wednesday, October 14, 2015

न मनाएं no bra day लेकिन ....


पिछले कई महीनों से खुशबू में प्रकाशन के लिए एक आलेख रखा है। आलेख अंदर पहने जाने वाले वस्त्र को लेकर है कि इसकी खरीदारी में क्या सावधानी बरती जाए कि यह स्वास्थ्य को कम नुकसान पहुंचाए। हर सप्ताह यह लेख हमारी टीम चुनती और फिर संकोच के साथ इसे रोक दिया जाता। सच है कि यह महिलाओं की ही पत्रिका है और यहां ब्रा के बारे में प्रकाशन से संकोच की क्या जरूरत  है। सच यह भी है कि हम इस बारे में सबके सामने ज्यादा बातचीत नहीं करतें और इन्हें सुखाया भी छिपाकर ही जाता है। कोशिश यह हो कि खराब सेहत को ना छिपाया जाए।
सवाल यह भी है कि  किसी भी मसले पर जागृति बढ़ाने वाले कदमों पर रोक क्यों? इस पर वैसे ही बातचीत होनी चाहिए जैसे हम सर्वाइकल कैंसर या किसी भी अन्य कैंसर के बारे में बात करते हैं। कल तेरह अक्टूबर को 'नो ब्रा डे' मनाया गया। इस अंग को अतिरिक्त कसकर रखने से कोशिकाओं की गतिशीलता प्रभावित होती है जिनसे गांठें बनती हैं और ये सख्त होकर कैंसर का कारण बनती हैं। कसी हुई ब्रा के कारण बीच के हिस्से में पसीने की वजह से संक्रमण भी हो सकता है और यह त्वचा के कैंसर में बदल सकता है।
एक टीवी चैनल ने भले ही इस दिन को लेकर एक फूहड़ कार्यक्रम पेश किया हो लेकिन फेसबुक पर इसे लेकर महिलाओं ने खूब संवेदनशील पोस्ट साझा की हैं। स्वर्ण कांता लिखती हैं, ये अभियान इसलिए नहीं है कि ब्रा मत पहनो बल्कि इसका उद्देश्य ब्रेस्ट कैंसर के प्रति जागरुकता पैदा करना है। यह देश का तेजी से बढऩे वाला घातक रोग बनता जा रहा है। पश्चिमी देशों में ये जागरुकता पहले ही आ गई। यहां तो शालीनता के नाम पर क्या ना झेलना पड़ जाए। शबनम खान लिखती हैं, ब्रा रेग्युलर पहनने से ब्लड सर्कुलेशन रुकता है जो सेहत के लिए अच्छा नहीं है। डे मनाने या ना मनाने पर अलग बहस हो सकती है लेकिन चुस्त कपड़े पहनने के कुछ नुकसान प्राणघातक भी हैं।
हॉलीवुड एक्ट्रेस जूलिया रॉबर्ट्स कहती हैं, घर मेरे लिए वह जगह है जो मुझे ब्रा से आजादी देता है। सच है यह आजादी का ही एहसास है जब आप इस सामान्य से अंग को किन्हीं और निगाहों से ना देखकर अपनी निगाहों से देखते हैं। फैशन के इस दौर में हर उम्र की लड़की-स्त्री अपने शरीर को किन्हीं और के मानदंडों पर खरा उतारने पर आमादा है। कद से लेकर कदम तक के मानक तय हैं। चमड़ी को उजला करने पर पहले ही बाजार उतारु है क्योंकि गोरा रंग ही सौंदर्य का पैमाना है। हम खुद क्यों नहीं हो सकते हमारे सौंदर्य का पैमाना। शो बिज की मॉडल्स, डांसर्स को फॉलो करने के लिए किशोरियां किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। किसी पार्टी या शादी समारोह के लिए नए स्टाइल्स और डिजाइन्स चुनने में कोई बुराई नहीं है लेकिन स्टाइल वैसा हो जैसा उस फिल्म में उस एक्टर का था, सचमुच हैरान करता है। बुटीक्स, ब्यूटी पार्लर्स, जिम लड़कियों को मॉडल्स जैसे कपड़े, खूबसूरती और बॉडी देने के लिए दिन-रात जुटे हुए हैं। यहां  से पैसा जनरेट होता है। कोई बेहतर स्वास्थ्य देने का दावा या पैरवी नहीं करता। ये नई जीवन शैली सिर्फ और सिर्फ खराब स्वास्थ्य की ओर प्रवृत्त कर रही है।
भारत में सर्वाधिक स्तन कैंसर के मामले हैं। सर्वाइकल कैंसर का भी बड़ा कारण माहवारी यानी मेंस्ट्रुएशन सायकल के दौरान संक्रमित कपड़ों और वर्जित वस्तुओं का इस्तेमाल है। यहां तक की कागज, मिट्टी का भी इस्तेमाल होता है। मणिपुर की उर्मिला चोम को बचपन में पॉलिएस्टर का कपड़ा इस्तेमाल करना पड़ता था जो इतना सख्त हो जाता था कि उनकी दोनों जांघें छिल जाती थीं। उर्मिला आज पूरे देश में एक बड़ा अभियान छेड़ चुकी हैं। वे कहती हैं, माहवारी का रक्त कोई अपवित्र चीज नहीं है। चुप्पी तोडि़ए। खेत, खलिहान, रसोई को यह अपवित्र कैसे कर सकता है जो नई संतान को जन्म देने का कारण है।
'नो ब्रा डे'  एक शुरुआत हो सकती है खुद को निर्धारित मानदंडों से मुक्त करने की। शरीर के अन्य अंगों की तरह ये भी सामान्य अंग है। सौंदर्य कलाकृतियों में ढले जिस्म जिंदा नहीं होते। उन्हें सांचे में ढला या किसी की निजी स्मृतियों का सुंदर ख्वाब बने रहने दीजिए। आप क्यों मोम की गुडिय़ा बनने की दिशा में चली जा रही हैं। आपकी तो धड़कनें हैं, उन्हें महसूस कीजिए।

Thursday, October 8, 2015

क्यों झांकना किसी की रसोई में


हमारे खान-पान की शैली को आप क्या कहेंगे? कहां से विकसित होती है? शायद आदत। खाना-पीना एक आदत ही तो है। जो बचपन से हमें खिलाया जाता है वही हमारी आदत बन जाता है। मेरी मित्र के घर प्याज-लहसुन बिलकुल नहीं खाया जाता तो उसने नहीं खाया। यहां तक कि उसकी गंध से ही उसकी हालत खराब हो जाती। वह वहां बैठ ही नहीं पाती जहां लहसुन का तड़का लगता। वक्त बीता शादी ऐसी जगह हो गई जहां लहसुन के बगैर कोई सब्जी नहीं पकती। पहले-पहल वह अपनी सब्जी अलग बनाती लेकिन इन दिनों मुस्कुरा कर कहती है -"अब तो आदत पड़ गई है, ऐसी आदत की अब टमाटर के झोल वाली सब्जी खाई ही नहीं जाती।" बहरहाल इसका उलट होना भी उतनी ही सहजता के साथ स्वीकारा जा सकता है।
                एक ओर मेरी मित्र की माताजी हैं चिकन इस कदर बनातीं कि उसके यहां खाने का इंतजार हर मित्र को होता। इस बार सभी दोस्त काफी अरसे बाद मिले और आंटी के हाथ का चिकन खाने की इच्छा जाहिर की। मित्र ने कहा भूल जाओ, चिकन-विकन।  खाना-पकाना तो दूर मां अब उस जगह खाना भी नहीं  खातीं जहाँ  ये सब पकता है। उनकी रसोई में अब कोई एक अंडा भी नहीं उबाल सकता। एक बांग्ला परिवार में हम सब खाने पर आमंत्रित थे। साथ में चलने वाले को कोई तकलीफ नहीं थी कि वो भी ब्राह्मण है। जब वहां सुना कि ये तो मछली को बड़े चाव से खाने वालों में सेे हैं तो उनका वहां पानी पीना भी मुश्किल हो गया। जयपुर के ही भारद्वाज अंकल जब कई साल पहले अमेरिका गए तो परेशान हो गए। सब कुछ ठीक था लेकिन खाने में मांस की बहुतायत ने उन्हें बहुत तकलीफ दी। क्या खाएं और क्या छोड़ें? भारत लौटे तो बच्चों के लिए घर में ही ऐसा इंतजाम किया कि वे नॉनवेज खाने की आदत विकसित कर लें। उन्हें डर था कि मेरी तरह मेरे बच्चे इस दुविधा से ना गुजरें। जब खानपान का मसला या उसकी इक्वेशन इस कदर समानुपाती है तो फिर उसे लेकर क्या बहस करना। ये बातचीत का मुद्दा तो हो सकता है लेकिन राष्ट्रव्यापी बहस या प्रतिबंध का मुद्दा कैसे बन सकता है? खाना आपकी आदत, आपके भौगोलिक क्षेत्र वहां की उपज से आपके संस्कारों में आता है। अब गोवा में मछली, नारियल बहुतायत में है तो वही आपकी भोजन की थाली में होगा ना कि वह जो हमारे राजस्थान में खाया जाता है।
थोड़ा सा विषय से भटकने की  की इजाजत। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने सन 1943 में बैंकॉक रेडियो से एक भाषण दिया था। वे अंग्रेजों के भारत पर कब्जे की रणनीति पर रोशनी डाल रहे थे। उन्होंने कहा -"अंग्रेजों ने कभी भी देश के सब लोगों से एक साथ संघर्ष नहीं किया। बंगाल में मीरजाफर को अपने पक्ष में कर सिराजुद्दौला को हरा दिया जो वहां का आखिरी राजा साबित हुआ।  बाद में इन्हीं अंग्रेजों ने दक्षिण में टीपू सुल्तान पर हमला किया। इस बार भी कोई आगे नहीं आया। ना मध्य भारत से मराठा ना उत्तर से सिख। अगर यहां भी हम एकजुट हो जाते तो अंग्रेजों को हराना संभव हो जाता। अंग्रेज एक-एक भाग पर हमला करते और जीतते जाते। भारतीय इतिहास के इस पीड़ादायक अध्याय से हमें यह सबक मिला है कि बिना एकता के हम अपने शत्रु के सामने न तो खड़े हो सकते हैं और न आजादी पा सकते हैं। आजादी मिल भी जाए अगर तो बिना एकजुटता से उसकी रखवाली नहीं कर सकते।"
नेताजी ने यह भाषण गांधी जी की 75 वीं सालगिरह पर दिया था। एक को हिंसा और दूसरे को अहिंसा का पुजारी बताने वालों को जानकर हैरानी होगी कि इसी भाषण में नेताजी ने बापू को इतना सराहा और कहा कि बापू ही वह शख्स थे जिन्होंने 1857 की क्रांति के विफल संघर्ष के बाद उपजे लंबे शून्य को अपने होने से भरा। गांधी ने देशवासी को आत्मसम्मान लौटाया। देश के लिए सम्मान का जज्बा जगाया।    
खानपान पर लौटते हैं। क्या इतने बड़े देश का सम्मान और एकता खानपान के मुद्दे पर भंग करने की साजिश होगी? क्या यह एक बेहद निजी मसला नहीं है। मुल्क की बड़ी चुनौतियों को छोड़ अब हम इस पर उलझेंगे कि तेरी रसोई में क्या पक रहा है ??


हम ये क्या कर रहे हैं महज़ इस अफवाह पर  कि इनकी रसोई में ये पका था हम जान ले रहे हैं।

Thursday, October 1, 2015

मनु ने क्या लिखा बापू के बारे में

 कल बापू की 147वीं सालगिरह मनाई जाएगी। बापू हमारे जीवन में इस कदर रचे-बसे हैं कि यूं तो हमारा हर काम उन्हीं पर जाकर खत्म और शुरू होता है। वे हमारी मुद्रा यानी नोटो पर हैं। हमारे अस्पताल के नाम उन्हीं पर हैं। चौराहे, चौराहों की मूर्तियां, रास्ते, सब गांधीमय हैं।हैं फिर भी नहीं हैं । जीवन में भी दो तरह के लोग मिलते हैं। समर्पित गांधीवादी और दूसरे घोर गांधी विरोधी। इस कदर विरोधी कि लगता है गोड़से को फांसी जरूर दे दी गई लेकिन गोड़सेवाद पूरी ताकत से जिंदा है। बापू के जाने के 67 साल बाद भी लगता है कि हम उन्हें समझ ही नहीं पाए। कोई उनके नाम पर झाड़ू उठा लेता है तो कोई खादी का हवाला देने लगता है। बापू को हमने अपनी सुविधानुसार टुकड़ों में बांट दिया है। कुछ बातें जो बापू के व्यक्तित्व को रेखांकित करती हैं वह मनु गांधी की डायरी में मिलती हैं। मनु और आभा ये दोनों अंतिम समय में भी बापू के साथ थीं जब उन्हें गोली मारी गई। मनु लिखती हैं एक दिन रात साढ़े दस बजे बापू ने मुझे जगाया और कहा, 'मेरा वह पेंसिल का टुकड़ा ले आओ तो'। मैं घबरा गई और सोचा कि इस समय बापू पेंसिल के टुकड़े का क्या करेंगे। चूंकि बापू की पेंसिल बहुत छोटी हो गई थी कल रात ही मैंने उसे नई पेंसिल से बदल दिया था। अब मैंने याद रखकर तो टुकड़ा रखा नहीं था। सवा बज गए ढूंढ़ते हुए। वह नहीं मिला। बापू भीतर आए और पूछा- 'क्यों नहीं मिली'? मैंने कहा बापू कहीं रखकर भूल गई हूं। 'ठीक है सो जाओ सवेरे ढूंढ लेना'। बापू ने कहा। लेकिन मनु की आंखों में नींद कहां। एक ही चीज रह गई थी बापू का बगल झोला। उसी मेंं से वह टपक पड़ी। तड़के सुबह प्रार्थना के वक्त तीन बजे जब यह पेंसिल बापू को दी तो उन्होंने कहा ठीक है, मिल गई तो अब रख दो। अभी जरूरत नहीं है। मनु को बहुत गुस्सा आया। रातभर खुद भी नहीं सोए मुझे भी परेशान किया। अब नहीं चाहिए का क्या मतलब लेकिन इस बार संभालकर रख ली।
मनु एक ओर वाकया लिखती हैं। प्रार्थना के बाद इलाहाबाद से पति-पत्नी बापू के पास रहने आए। तुम दोनों को हरिजन बस्ती में जाकर बच्चों की पढ़ाई-सफाई का काम हाथ में लेना चाहिए। मनुष्य को काम ढूंढ ही लेना चाहिए। ऐसे समय काम के बिना एक मिनट भी बैठना पाप है। काम की कमी नहीं यहां तो आदमी की कमी है। कहते हुए बापू ने दोनों को जरूरी काम से जोड़ दिया। तीसरा वाकया सामूहिक सूत कताई दौरान हुआ। सूत कातकर जब बापू अंदर गए दो भाई अंग्रेजी में बात कर रहे थे। वे बोले, हमारा कितना बड़ा दुर्भाग्य है दो सगे भाई अंग्रेजी में बोलते हैं। एक तो कहते हैं कि मुझे विचार अंग्रेजी में ही सूझते हैं। हम अंग्रेजी के गुलाम हो गए हैं और यह गुलामी हमने खुद मोल ली है। अंग्रेजी बोलना हमारी महत्वाकांक्षा रहती है हम कितना समय बिगाड़ते हैं इस भाषा के लिए। हम बिना भूल किए अंग्रेजी बोलते हैं और कोई अंग्रेज इस पर हमारी पीठ ठोक दे तो हम फूलकर कुप्पा हो जाते हैं। हिसाब लगाएं कि जो समय हमने अंग्रेजी सीखने में लगाया, उतना यदि देश सेवा को दें तो कितना बदलाव आएगा।
एक और बात जो बापू ने अपने भाषण में कही थी। अपनी भलाई न छोड़ें। आप सबने रामायण,महाभारत पढ़ी है। ना पढ़ी हो तो इसे पढऩे की मैं सिफारिश करता हूं। इन्हें धार्मिक पुस्तकें तो इसलिए बनाया है कि हम सब उन्हें पढ़ें। हमारे पूर्वज यह मानते थे कि धर्म के नाम पर हम कुछ भी कर सकते हैं। उस समय उन्हें यह कल्पना भी नहीं रही होगी कि इसी धर्म के नाम पर हम भाईयों के गले भी काट सकते हैं। महाभारत में जो बातें हैं केवल हिंदुओं के लिए नहीं है। युद्ध करने से किसी का भला नहीं हुआ। ना कौरवों को शांति मिली ना पांडवों को। ये छोटी-छोटी बातें बापू के बड़े व्यक्तित्व की झलक देती हैं। ये कहती हैं कि वे भी एक साधारण इंसान ही थे। ये और बात है कि आइंस्टीन ने कहा था कि आने वाली पीढिय़ों को यकीन करना मुश्किल होगा कि हाड़-मांस का ऐसा इंसान भी धरती पर हुआ था। उस पेंसिल को बापू नहीं भूले थे। करीब महीने भर बाद उन्होंने रात को मनु को याद दिलाया कि मुझे वह छोटी सी पेंसिल दो जो मैंने तुम्हें पटना में दी थी। मनु को पता था, झट से ला दी।
ऐसे ही थे बापू। उन्होंने मनु से कहा अब तुम परीक्षा में पास हुई हो। जानती हो हमारा देश कितना गरीब है। हजारों गरीब बालकों को पेंसिल का एक टुकड़ा भी लिखने को नहीं मिलता। हमें क्या अधिकार है कि इसे बेकार समझकर फेंक दें। सवाल बहुत ही साधारण से हैं-  क्या इतने बरसों बाद हर भारतवासी को शिक्षा नसीब हुई है? क्या उसका पेट भरा हुआ है? क्या पेट भरने वाला अन्नदाता सुखी है? इंडिया को डिजिटल होना चाहिए लेकिन इंडियावासी का पेट भी भरा होना चाहिए और हाथ में छोटी पेंसिल होनी ही चाहिए। बड़े लोगों को इसके लिए भी दुनिया के बड़े मंचों पर माथा जोडऩा चाहिए।

Thursday, September 24, 2015

दुनिया की पहली स्मार्ट सिटी मुअन जो दड़ो


 चलते हैं अपनी जड़ों की ओर। कहीं दूर नहीं जाना बस पास ही है राजस्थान से लगा हुआ सिंध। वहीं है मुअन जो दड़ो यानी मुर्दों का टीला। सिंधी भाषा में मुअन यानी मरे हुए और दड़ा यानी टीला। कोई क्या दावा करेगा स्मार्ट सिटी बनाने का! हमारे पुरखे तो पांच हजार साल पहले ही सुनियोजित नागर व्यवस्था को जी चुके हैं।



को जी चुके हैं।


  सिंध कभी दूर नहीं था हमसे। ना राजस्थानियों से ना उन सिंधियों के दिलों से जो विभाजन के बाद पाकिस्तान छोड़कर हिंदुस्तान आ गए थे। पश्चिमी राजस्थान पड़ोस के सिंध से बहुत कुछ साझा करता है। पहनावा, घरों की बनावट, खानपान, ब्याह-शादी के रस्म-ओ-रिवाज और इनमें गाए जाने वाले लाडे। लाडे यानी वे गीत जो शादी से एक माह पहले ही गाए जाते थे। सिंधी घरों में आज भी गाए जाते हैं। सिंधी स्त्रियों की वेशभूषा में भी चटख रंग का कढ़ाईदार घाघरा और कांच की जरदोजी वाली कुर्ती शामिल है। गहने लाख और चांदी के। दादाजी अकसर इस पहनावे का जिक्र करते थे और उसे 'पड़ो-कोटी' कहते थे। पुरखों के सिंध से आने के कारण मुअन जो दड़ो और हड़प्पा नाम से हमेशा ही लगाव रहा। यहां-वहां से मिली जानकारियों ने हमेशा एक 'कनेक्ट-सा'बनाए रखा लेकिन हाल ही जब पत्रकार ओम थानवी  की किताब मुअन जो दड़ो पढऩे में आई तो लगा जैसे एक स्वप्निल यात्रा को जी लिया हो। विश्व पर्यटन दिवस पर दुनिया की इस ऐतिहासिक धरोहर की शब्द यात्रा।

कहां है मुअन जो दड़ो

सिंध (अब पाकिस्तान)में है कराची और कराची से 440 किमी दूर लाड़काणा में है मुअन जो दड़ो।  यहां सिंधी जुबां में एक कहावत प्रचलित है 'हुजैई नाणो तो घुम लाड़काणो' यानी पैसा है, दम है तो लाड़काणा घूमो। विभाजन के बाद जब सिंधी पूरे देश में रोजगार की आस में बस गए तब वे एकदूसरे से कैसे परिचय प्राप्त करते थे यह जानना रोचक होगा। मेरे दादाजी नवाबशाह जिले के कंड्यारे से आए थे। वे बातचीत में या ब्याह का रिश्ता जोडऩे से पहले यही पूछते कि आप सिंध में कहां के हैं। कोई कहता लाड़काणा, कोई जेकमाबाद कोई हैदराबाद और फिर रिश्तों के तार इस आधार पर जुड़ते कि किसके मन में किस क्षेत्र की कैसी पहचान है। लाड़काणा से अट्ठाइस किलोमीटर दूर है यह ऐतिहासिक सभ्यता जिसे यूनेस्को ने संरक्षित घोषित किया हुआ है। वह सभ्यता जिसने दुनिया के सामने भारत को अति प्राचीन और सभ्य समाज के दावे को प्रमाणित कर दिया। ऐसा वैज्ञानिक आधार कि जब यूरोप के लोग जानवरों की खाल ओढ़ा करते और अमेरिका आदिम जातियों का इलाका था सिंधु घाटी के लोग बहुत विकसित समाज बनकर जी रहे थे। यह तबाह कै से हुआ बाढ़ से या सूखे से यह अब भी पूरी तरह मालूम नहीं

पांच हजार साल पहले की स्मार्ट सिटी

सिंधु नदी के किनारे पनपी यह दुनिया की पहली नागर सभ्यता थी। आसुदा और बेहद करीने की। खेती विकसित थी और बाशिंदे दूर-दूर तक व्यवसाय के लिए जाते थे। व्यापार आज भी सिंधियों की विशेषता बना हुआ है। सिंधी दुनिया के हर कोने में अपने पुख्ता व्यवसाय के साथ मिलेंगे। इतने विनम्र कि कोई अपशब्द भी कह दे तो पलट के वे ऐसा नहीं करते। व्यापार का यही मूल मंत्र भी है शायद। घाटी के लोग माप-तौल जानते थे। वह साक्षर सभ्यता थी। लिपी थी लेकिन वह बूझी नहीं जा सकी है। मुअन जो दड़ो और हड़प्पा में तांबे का उपयोग होता था। लौह युग बाद का है। हड़प्पा के अवशेष ज्यादा नहीं मिलत।े रेल लाइन बिछाने के दौरान ये विकास की भेंट चढ़ गए। खुदाई से पहले ही ईंट चोरों ने खोद डाला।

पक्की ईंटों का मुअन जो दड़ो

यह घाटी की राजधानी रहा होगा। दो सौ हेक्टेयर के इस क्षेत्र की आबादी कोई पचासी हजार। उस समय का महानगर टीलों पर बसा था। ये टीले बनाए गए थे। ईंटों से ऊंचे किए गए टीले ताकि सिंधु नदी का पानी वहां तक आ जाए तो शहर डूब में ना आए। आजकल बांध बनाकर शहर डुबोए जाते हैं। मध्यप्रदेश में हरसूद ऐसा शहर था जिसे विकास के नाम पर डुबो दिया गया। मुअन जो दड़ो के खंडहर इतने तो आबाद हैं कि इनकी गलियों में घूमा जा सकता है। सामान तो संग्रहालयों की शोभा बढ़ा रहा है लेकिन शहर को कोई कहां ले जा सकता है। सबसे ऊंचे चबूतरे पर बौद्ध स्तूप है। यह सभ्यता के बिखरने के बाद एक ध्वस्त टीले पर बनाया गया था। लगभग ढाई हजार साल पहले। पश्चिम में प्रशासनिक इमारतें, सभा भवन, ज्ञानशाला और कोठार हैं। एक आनुष्ठानिक स्नानागार भी है जो बेहतर हालात में है। सड़कें सीधी हैं या फिर आड़ी। एक तरफ उच्च वर्ग की बस्ती है तो दूसरी ओर कामगारों की। पक्की ईंटे इस सभ्यता की सबसे बड़ी खासियत है। शहर की मुख्य सड़क बहुत लंबी है। अब खाली आधा मील बची है। दो बैलगाडिय़ां एक साथ गुजर सकती हंै। सड़क के दोनों ओर घर हैं। कोई घर सड़क पर नहीं खुलता। प्रवेश अंदर गलियों से है। चंडीगढ़ भी ऐसा ही शहर है। हर घर में एक बाथरूम है। बंद, पक्की नालियां सड़क के दोनों ओर हैं जिनका संबंध स्नानघर से है। पानी की निकासी का श्रेष्ठ बंदोबस्त। हर घर में कुंआ है। कुंए का प्राचीन प्रमाण इसी सभ्यता सेें मिलता है।

कौन सी थी फसलें

यह खेतीहर और पशुपालक सभ्यता थी लेकिन घोड़े का उल्लेख नहीं मिलता है। पत्थर और तांबा खूब था। इन्हीं के उपकरण खेती में काम आते थे। मिस्र और सुमेर की सभ्यता में लकड़ी और चकमक का इस्तेमाल होता था। कपास, गेंहू, जौ सरसों और  चने की फसल के सबूत मिलेे हैं। बाजरा, ज्वार, रागी भी होती थी। फलों में खरबूजा, खजूर, अंगूर और बेर। यहां दुनिया का सबसे पुराना सूती कपड़े का टुकड़ा भी मिला है। खुदाई में तांबे, कांसे और सोने की सुईयां भी मिली है। इस महान संस्कृति का सौंदर्य बोध अद्भुद था। यह धर्मपोषित या राजपोषित ना होकर समाज पोषित था।

नर्तकी और नरेश

यह एक कांसे की प्रतिमा है जो साढ़े दस सेंटीमीटर लंबी है। इसे 1926 में खोजा गया। इस प्रतिमा के बारे में अंग्रेज पुरातत्वविद मार्टिमर बीलर कहते हैं 'यह मेरी पसंदीदा मूर्ति है। यह पंद्रह साल की एक लड़की है जिसका आत्मविश्वास बस देखते ही बनता है। दूसरी मूर्ति नरेश की है हालांकि ऐसे कोई प्रमाण नहीं कि किसी राजा ने मुअन जो दड़ो पर राज किया था। यह साढ़े सत्रह सेंटीमीटर की है। बाल पीछे की तरफ कंघे से किए गए हैं। मूंछ नहीं लेकिन दाढ़ी है। दोनों मूर्ति की आंखें बंद हैं। शैली बुद्ध और महावीर की मूर्तियों में मिलती है। जागते हुए भी थोड़ा खो जाना और खोकर भी थोड़ा जागे रहना।

Monday, September 14, 2015

हिंदी मेरी जां

हिंदी दिवस से दो दिन पहले कोई इरादा नहीं है कि हिंदी ही बोलने पर जोर
दिया जाए या फिर अंग्रेजी की आलोचना की जाए। हिंदी बेहद काबिल और घोर
वैज्ञानिक भाषा है जो खुद को समय के साथ कहीं भी ले चलने में सक्षम है। क
से लेकर ड तक बोलकर देखिए तालू के एक खास हिस्से पर ही जोर होगा। च से ण
तक जीभ हल्के-हल्के ऊपरी दांतों के नीचे से सरकती जाएगी और व्यंजन बदलते
जाएंगे। ट से न तक के अक्षर तालू के अगले हिस्से से जीभ लगने पर उच्चारित
होते हैं। सभी व्यंजनों के जोड़े ऐसे ही विभक्त हैं।
हिंदी इतनी उदार है कि उसने हर दौर में नए शब्दों और मुहावरों को शामिल
किया। अरबी से तारीख और औरत ले लिया तो फारसी से आदमी आबादी, बाग, चश्मा
और चाकू। तुर्की से तोप और लाश, पोर्चूगीज से पादरी, कमरा, पलटन और
अंग्रेजी के तो अनगिनत शब्दों ने हिंदी से भाईचारा बना लिया है। डॉक्टर,
पैंसिल, कोर्ट, बैंक, होटल, स्टेशन को कौन अंग्रेजी शब्द मानता है।
अंग्रेजी हमारी हुई, हम कब अंग्रेजी के हुए।
हिंदी भाषा पर इतने फक्र की वजह, बेवजह नहीं है। हाल ही जब अंग्रेजी में
पढ़ी-लिखी अपने मित्रों और परिचितों में हिंदी की ओर लौटने की जो
व्यग्रता दिखी वह विस्मय से भर देने वाली थी। कविता एक बेहतरीन ब्लॉगर
हैं। नॉर्थ ईस्ट की शायद ही कोई परंपरा या त्योहार होता होगा जो कविता की
कलम से छूटा हो। देश-विदेश में उसके कई पाठक हैं। अंग्रेजी में लिखा जा
रहा उसका यह ब्लॉग बहुत लोकप्रिय है। अचानक वह ब्लॉग से यह कहकर नाता
तोडऩा चाहती है कि उसे कुछ तलाश है। वह हिंदी में बात करना चाहती हैं।
हिंदी लिखना चाहती हैं। हिंदी फिल्मी गीतों और पहाड़ की लोकधुनों पर
नाचना चाहती हैं। अपने नन्हे बच्चों को बताना चाहती हैं कि उसकी मां की
जड़ें कहां हैं। अपने पति से पूछती हैं, क्यों यह मध्यवय का संकट तो
नहीं। उनके पति हंसकर कहते हैं, तुम बहुत प्यारी हो। यह बात उसे और
प्रेरित करती है कि अबकी बार वह उत्तर के पहाड़ों पर अपने बच्चों सहित
जाएगी। एक और प्रोफेसर हैं जिनकी अंग्रेजी ने उन्हें बेहतरीन मुकाम
दिलाया है लेकिन वे भी चुपके से कभी बच्चन तो कभी सर्वेश्वर दयाल
सक्सेना, पड़ोसी देश की सारा शगुफ्ता और परवीन शाकिर को गुनती रहती हैं।
उन्हें हिंदी में रस आता है। इतना कि वे खुद कविताएं करने लगती हैं।
अंग्रेजी ने उन्हें सब कुछ दिया है लेकिन उनकी मूल पहचान कहीं गुम कर दी
है। हिंदी, हिंदीयत और हिंदुस्तानी होने का सुख छीन लिया है। ये दोनों
अपने मर्ज को पहचान गई हैं। लेकिन हममें से कई अब भी लगे हुए हैं उस दौड़
में जिसका नतीजा हमारा सुकून छीन लेगा। अंग्रेजी माध्यमों के इन स्कूलों
में पढऩे वाले बच्चे इस भाषा को सीखने में इतनी मेहनत करते हैं कि अगर यह
सब उनकी अपनी भाषा में हो तो वे आसमां छू लें। अभी उन्हें पचास फीसदी इस
भाषा को देना पड़ता है। केले को बनाना, कद्दू को पंपकिन बोलते-बोलते ये
बच्चे खिचड़ी का भी अनुवाद ढूंढने लगते हैं। कोई पूछे उनसे कि गुलजार जब
लिखते हैं -
बारिश आती है तो मेरे शहर को कुछ हो जाता है/टीन की छत, तिर्पाल का
छज्जा, पीपल,पत्ते पर्नाला सब बहने लगते हैं/तंग गली में जाते-जाते साइकल
का पहिया पानी की कुल्लियां करता है......
अब भला कोई बताए तिर्पाल , पीपल और कुल्लियों का अनुवाद क्या होगा।
अंग्रेजी जाने क्या दे रही है लेकिन हमसे हमारी पहचान जरूर अलग कर रही है
और कुछ समझदार लोग इसे वक्त रहते पहचान लेते हैं लेकिन कई अवसाद से घिरने
लगते हैं। यह ऐसा अवसाद है जो किसी मनोचिकित्सक की पकड़ में नहीं आता
जबकि हमने पूरी जनरेशन को इसकी चपेट में लाने का कार्यक्रम बना दिया है।
हिंदी महज भाषा नहीं हमारी जड़ है। जड़ में मट्ठा  तो नहीं ही पडऩा चाहिए।

Wednesday, September 9, 2015

दर्द का यूं दवा बनना

अलविदा अलान पिता अब्दुल्लाह बच्चे को अंतिम विदाई देते हुए।  तस्वीर रायटर

हम में से लगभग सभी ने नीली शर्ट और लाल शॉर्ट्स  पहने उस बच्चे की तस्वीर देखी होगी जो टर्की के समंदर किनारे औंधा पड़ा है। टर्की के तटीय सुरक्षाकर्मी ने जब पिछले बुधवार उसे  उठाया तो उसके दिल ने यही कहा कि काश धड़कनें चल रही हों लेकिन वह मृत था।
तीन साल का अलान कुर्दी अपने बड़े भाई गालिब, मां रिहाना और पिता अब्दुल्लाह के साथ बरास्ता ग्रीस, कनाडा जाकर बस जाना चाहता था। उसके मुल्क सीरिया में इस्लामिक स्टेट के आतंकियों ने कहर मचा रखा है। इस कहर से बचने के लिए उसके पिता ने समुद्री स्मगलरों को चार हजार यूरो (एक यूरो लगभग ७५ रुपए) दिए। वह एक रबर बोट थी जिसमें पर्याप्त लाइफ जैकेट्स नहीं थे। रात के तीन बजे यह सफर शुरू हुआ। पता चला कि लहरें कभी-कभी पंद्रह फुट ऊंची भी हो जाती हैं। नाव पलट गई। माता-पिता ने दोनों बच्चों का सिर पानी से ऊपर रखने की भरपूर कोशिश की। अलान ने पापा से कहा 'पापा आप मेरा हाथ पकडऩा, मैं आपका पकडूंगा तो छूट जाएगा।' पकड़ नहीं बनी अलान छूट गया और अब्दुल्लाह का पूरा परिवार जल समाधि में लीन हो गया। 
 अलान की मासूमियत क्यों किनारे आ लगी? उसे क्यों समंदर में पनाह लेनी पड़ी? इस दर्द भरे सच ने पूरी दुनिया को झकझोरा है। ऐसी अनेक दुर्घटनाएं सीरिया छोड़कर यूरोप में शरण पाने की आस में जा रहे परिवारों के साथ घट रही हैं । यूरोपीय देशों की सीमा बंद करने की नीतियों ने ऐसे खतरनाक रास्तों को जन्म दे दिया है। जान बचाने के लिए लोग इन देशों में शरण लेना चाहते हैं और इसके लिए वे समुद्री दलालों को मुंहमांगी कीमत देने को मजबूर हैं। पूरे परिवार से बिछुडऩे के बाद अब अब्दुल्लाह किसी देश की शरण नहीं चाहते। वे कहते हैं- अब दुनिया के सारे देश भी मुझे पनाह  दें तो भी नहीं चाहिए, जो कीमती था वह चला गया है। व्यथित अब्दुल्लाह किनारे जाकर लोगों से इल्तिजा कर रहे हैं  कि यूं  सीमा पार मत करो, खतरा है। 
राहत की बात ये है कि अब यूरोपीय मुल्कों ने अपनी सरहद शरणार्थियों के लिए खोलने की पहल की है। लाखों लोग इस आंतरिक युद्ध का शिकार हैं लेकिन यह अलान की निर्जीव देह थी जिसने इन मुल्कों की मृत सोच में प्राण फूंके हैं। ऐसा क्यों है कि हर कहीं दो व्यक्ति, दो परिवार, दो मजहब, दो मुल्क , दो विचार एक-दूसरे के कट्टर दुश्मन हैं? क्या शांति के बीज बोने का पारिवारिक संस्कार खत्म हो रहा है। दुनिया के हालात तो यही बता रहे हैं। यह सुखद संयोग है कि ऐसेे माहौल में बोध गया को दुनिया की आध्यात्मिक राजधानी बनाने का विचार भारत सरकार की ओर से आया है। बोध गया वही जगह है जहां गौतम बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था। वे बुद्ध जिन्होंने सांसारिक दुखों पर विजय पाने के लिए परिवार से मोह छोड़ा था और दुनिया को त्याग और अहिंसा के मार्ग पर अग्रसर किया था। बेशक बुद्ध, महावीर और गांधी की भारत भूमि दुनिया के लिए एक मिसाल है जहां शरण चाहने वालों का हमेशा स्वागत हुआ। हम ऐसे ही हैं, मानवतावादी। पाकिस्तान, बांग्लादेश, तिब्बत, अफगानिस्तान से करोड़ों शरणार्थी भारत आकर रह रहे हैं। इस संख्या बल ने भारत का नुकसान ही किया है लेकिन यह दुनिया एक परिवार है, के भारतीय संस्कार यहां हावी रहे। तिब्बत के दलाई लामा और बांग्लादेश की तस्लीमा नसरीन का भारत में रहना किसी एक राजनीति सोच का नतीजा नहीं, भारतीय संस्कार है।
शांति के  इस संदेश को हमारे पूर्व राष्ट्रपति और शिक्षक एपीजे कलाम ने भी खूब ताकत बख्शी। वे तो बच्चों के बीच पहुंचकर अक्सर उनसे एक कविता दोहराने के लिए कहते थे कि यदि दिल में सुंदर चरित्र बसता है तो घर में सौहार्द्र होता है और जो घर में सौहा
र्द्र होता है तो देश व्यवस्थित होता है और जब देश व्यवस्थित होता है तो दुनिया में शांति स्थापित होती है।
जाहिर है दो को एक होने की प्रेरणा के बीज घर से ही बोए जाने चाहिए। असद भोपाली का एक बहुत प्यारा गीत है दो दिल धड़क रहे हैं और आवाज एक है, नग्मे जुदा-जुदा हैं  मगर साज एक है... जब ये दो यूं एक होंगे तब ही रोशनी से रूबरू हो सकेंगे। अलान जैसे मासूम बच्चे की जिंदगी सख्त बड़ों ने छीनी है। ये बड़े जो उदार होते, मानवता पर ऐसी तोहमत न लगती। इस बच्चे की तस्वीर भले ही दर्द भर देती हो लेकिन यही दवा बनकर भी सामने आई है। सरहद की हद से मानवता बड़ी है।

Wednesday, August 26, 2015

सानदार, जबरजस्त, जिंदाबाद,

सानदार, जबरजस्त, जिंदाबाद,  केतन मेहता की हालिया रिलीज मांझी का नायक दशरथ मांंझी जब ये तीन शब्द बोलता है तो उस पूरे मंजर में जान पड़ जाती है फिर चाहे हालात कितने भी बदतर, वाहियात और मुर्दानगी वाले क्यों ना हों। हालात और व्यवस्था के खिलाफ लडऩे वाला मांझी खुद इस कदर तकलीफों का मारा है कि देखने वाले को घनघोर निराशा होती है और जब फिल्म में यही सब गरीबी और अभाव की पृष्ठभूमि में हो तो कम अज कम भारतीय दर्शक उस फिल्म को सिनेमा हॉल तक देखने नहीं जाता। उसके लिए फिल्म के मायने मसाला मनोरंजन से है। मांझी कुव्यवस्थाओं के बीच से रास्ता निकालने की कोशिश है, जो आखिर में मोहब्बत के शाहकार ताजमहल से भी बड़ी पैरवी मोहब्बत के लिए कर जाती है। अपनी बीवी फगुनिया को याद करने वाला दशरथ  मोहब्बत का मसीहा मालूम होता है। दिलों को जोडऩेवाला दशरथ सब बराबर सब बराबर गाता है लेकिन जात-पांत की गहरी खाई में फंसे देश में होते कई प्रयास भी इस खाई को नहीं पाट पाते।
      दशरथ मांझी की पत्नी फगुनिया का पैर उस समय पहाड़ से फिसल जाता है जब वह पति के लिए रोटी ला रही होती है। गेहलोर गांव (बिहार में गया के समीप) एक ऐसा गांव है जिसके भीतर और बाहर के रास्ते को पहाड़ रोके बैठा है। गर्भवती पत्नी फगुनिया बच सकती थी यदि वजीरगंज के अस्पताल जाने के लिए ये पहाड़ उसका रास्ता ना रोकता। मांझी की जिंदगी का फिर एक ही लक्ष्य हो जाता है। पहाड़ तोड़कर रास्ता बनाना। वह हथौड़ी और छेनी से  इस महायुद्ध को जीतता है। 'जब तक तोड़ेंगे नहीं, तब तक छोडेंग़े नहीं।
फिल्म में एक पत्रकार दशरथ मांझी से कहता है बहुत हो गयी 'दल्लागिरी' लेकिन खुद का अखबार निकालना बहुत मुश्किल काम है तब दशरथ कहते हैं पहाड़ तोड़ने से भी ज़्यादा मुश्किल है क्या  पहाड़ को चुनौती देते हुए मांझी के सफर में कई उतार-चढ़ाव आते हैं। भ्रष्टाचारी रास्ता बनाने के नाम पर आए पैसे ही खा जाते हैं। पहाड़ को संरक्षित बताते हुए मांझी पर मुकदमा हो जाता है लेकिन धुन के पक्के मांझी 22 साल तक पहाड़ चीरते हुए 110 मीटर लंबा और नौ मीटर चौड़ा रास्ता उसमें से बना देते हैं।  अफसोस कि मांझी के गुजरने के चार साल बाद यानी 2011 तक भी पक्की सड़क नहीं बन पाती है। 17 अगस्त को इस नायक की पुण्यतिथि थी।
    मांझी को अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह में भी सराहना मिली है। कहने वाले कह सकते हैं कि भारत की ऐसी गरीबी को हमेशा ही विदेश में सराहना मिला करती है। सत्यजीत रॉय की पाथेर पांचाली को भी खूब सराहा गया था। यह भारत की हकीकत है और निर्देशक केतन मेहता ने इस हकीकत को परदे पर साकार कर दिया है। इससे पहले फिल्म्स डिवीजन ने भी द मैन हू मूव द माउंटेन के नाम से एक डॉक्यूमेंट्री दशरथ मांझी पर बनाई है। बिहार सरकार ने पद्मश्री की सिफारिश भी मांझी के लिए की और जब मौत हुई तो पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया। आमिर खान ने भी अपने कार्यक्रम सत्यमेव जयते में मांझी के बेटे और बहू बसंतिया को बुलाया था। बसंतिया को तब इलाज की सख्त जरूरत थी। कार्यक्रम के दौरान वादा किया गया था कि बसंतिया का इलाज कराया जाएगा लेकिन एक साल पहले उसका भी देहांत हो गया। फगुनिया हो या बसंतिया, इलाज का इन तक ना पहुंचना पहाड़ बनकर ही रोड़े अटकाता है। बसंतिया के समय पहाड़ में से रास्ता बन चुका था लेकिन व्यवस्था के रास्ते अब भी बंद है।
     एक टीवी चैनल की रिपोर्टर कैमरे पर दशरथ का गेहलोर गांव दिखा रही थीं। घर और हालात वही 1960 के समय के थे जब दशरथ जवान थे। गांव के घरों में अब तक शौचालय नहीं है। व्यवस्था के रास्तों को यहां तक पहुंचने में बहुत समय लग रहा है। केतन मेहता बेहद प्रतिभाशाली निर्देशक हैं। उनकी मिर्च मसाला स्मिता पाटिल और नसीरुद्दीन शाह के अभिनय को नई ऊंचाई पर ले गई। एक लंपट सूबेदार को गांव की औरतें मिर्च के जरिए जो संदेश देती हैं वह क्रांति अपने आप में अनूठी थी। गुजराती पृष्ठभूमि में बनी मिर्च मसाला के  लिए स्मिता पाटिल को श्रेष्ठ अभिनयके लिए चुनिंदा पच्चीस फिल्मों में रखा गया है। केतन स्वयं गुजरात (नवसारी) में जन्मे हैं। इस बार उन्होंने दशरथ मांझी में प्राण फूंके हैं। मांझी को जीवंत किया है नवाजुद्दीन सिद्दिकी ने। अपनी नस-नस से वे वही नजर आते हैं। जिंदा तो फगुनिया (राधिका आप्टे) भी हो गई है। काश अब हमारा सिस्टम भी जिंदा हो जाए।

Wednesday, July 29, 2015

महाभारत में कौन है चाचा कलाम को प्रिय


 मेरी पीढ़ी ने महात्मा गांधी को नहीं देखा, शास्त्री को नहीं देखा केवल सुना था कि उनके एक आह्वान पर देश उस दिशा में चल देता था। जिन्हें देखा वे थे डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम। उनकी बात मानने का मन करता था। उनसे वादे करने का जी चाहता था। उनके साथ शपथ लेने को दिल करता था। इस साल जब जनवरी माह में जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में पधारे तो वहां का जर्रा-जर्रा कलाम-कलाम पुकार रहा था। सारे रास्ते वहीँ जा रहे थे जहाँ वे बोलने वाले थे।  हजारों बच्चों ने उनके साथ शपथ ली कि वे जिसे भी वोट देंगे उससे पहले उसके काम की गणना करेंगे। उन्होंने वहां मौजूद सबसे दोहराने के लिए कहा कि यदि दिल में सुंदर चरित्र बसता है तो घर में सौहार्द्र होता है और जो घर में साौहाद्र्र होता है तो देश व्यवस्थित होता है और जब देश व्यवस्थित होता है तो दुनिया में शांति स्थापित होती है।
  लेकिन हमने ये क्या किया देश के सबसे कर्मठ व्यक्ति के देह त्यागते ही स्कूलों में छुट्टी घोषित कर दी। सोमवार रात ही बच्चों के स्कू ल से मोबाइल पर मैसेज आ गया कि पूर्व राष्ट्रपति के दुखद निधन पर स्कूल में अगले दिन अवकाश रहेगा और परीक्षा उसके अगले दिन होगी जबकि बच्चों के कलाम चाचा कहते थे कि मेरी मृत्यु पर अवकाश घोषित मत करना। अगर तुम मुझसे प्यार करते हो तो एक दिन ज्यादा काम करना। हमारे विद्यालयों ने जाहिर कर दिया है कि वेे केवल शख्स का सम्मान करते हैं शख्सियत का नहीं।
       जयपुर में  'विजन २०-२०'  के बारे में बात करते हुए उन्होंने पूछा - ''बच्चो क्या तुम बता सकते हो कि महाभारत का मेरा प्रिय पात्र कौनसा है? बच्चों ने कहा अर्जुन फिर युधिष्ठिर फिर भीम...कलाम चाचा नो-नो कहते गए और फिर बोले विदुर क्योंकि वे निर्भय, निष्पक्ष और निर्लिप्त थे। उन्होंने बच्चों से बुलवाया कि अगर हर भारतीय एक बेहतर नागरिक होगा तो दुनिया को एक अरब बेहतर नागरिक मिलेंगे। उन्होंने जोर दिया कि शिक्षा अगर रोजगारोन्मुख होगी तो 2020  तक हर भारतीय के पास काम होगा।
   कलाम साहब की रुखसती से हर आंख नम और सर सजदे में है। जैसे हर एक को तलाश है एक ऐसे कंधे कि जहां आंखें बरस सकें। वैसे ऐसा प्रस्थान किसी का भी ख्वाब हो सकता है। यह महादेशभक्त का महाप्रयाण है। जिंदगी भर जिस काम को लक्ष्य मानकर पूरा करने में लगे रहे उसी के साथ इस लिविंग प्लानेट यानी  पृथ्वी को अलविदा कहा। यह क्या कम है कि अपने महाप्रयाण से उन्होंने आतंकवादियों की गोलियों की भयावह गूंज को कम कर दिया। सुबह से भारत जिस दहशत को जी रहा था, देर शाम इस पर कलाम साहब का नजरिया छाने लगा। आतंक हार गया। देशभक्ति, मानवता की जीत हुई। आखों की नमी में शहादत के रंग इंद्रधनुष की तरह नजर आने लगे। बरगद-सी सोच ऐसा ही आभा-मंडल रचती है। हैरान हो सकते हैं कि कोई इतनों का इतना प्रिय कैसे हो सकता है। इतने सादा अंदाज में रहने वाली असाधारण आत्मा को कोटि-कोटि प्रणाम।

Wednesday, July 22, 2015

मंटो से विजयेंद्र तक हम

मंटो ने  बंटवारे का जो दर्द कहानी टोबाटेक सिंह में लिखा वह खुशवंत सिंह के उपन्यास ट्रेन  टू पाकिस्तान से अलग था। ये दर्द इन दोनों ने जिया था।  आज के लेखक वी. विजयेंद्र प्रसाद हैं  और वे बजरंगी भाईजान रचते हैं। यह आज के समय की ज़रूरत है।

हमारे बच्चे भारत के साथ जिस एक और मुल्क का नाम लेते हुए बड़े होते हैं वह है पाकिस्तान। अखबार की सुर्खियां पढ़ते हुए, टीवी पर बहस देखते हुए उन्हें समझ में आ जाता है कि यह दुश्मन मुल्क केवल हमारे देश का अमन-चैन बर्बाद करने के लिए बना है। यह एक ऐसा देश है जिसकी ओर हमारी तमाम मिसाइलों का रुख होना चाहिए। हमारे जन्नत से खूबसूरत कश्मीर में इन्होंने ही तबाही मचा रखी है और सरहद पर ये आए दिन गोलीबारी करते रहते हैं। बच्चे ये भी जानते हैं कि क्रिकेट के मैदान में हमें पाकिस्तान को हराकर जितनी खुशी मिलती है उतनी इंग्लैंड को परास्त कर नहीं मिलती। उन्होंने हिंदुस्तान के एथलीट मिल्खा सिंह की ओलंपिक्स में हार के लिए बंटवारे को जिम्मेदार ठहराने वाली फिल्म भाग मिल्खा भाग देखी और पसंद की है। उनके जेहन में पाकिस्तान के लिए नफरत है। उतनी नहीं जितनी बंटवारे के आसपास जन्मी पीढ़ी की है, पर है। जिन्होंने अपना सबकुछ छोड़ दो मुल्क को यात्रा सआदत हसन मंटो की कहानियां पसंद करने वाले जरूर खुद की जहनियत टोबा टेकसिंह कहानी के उस पागल बिशन सिंह जैसी मानते हैं जो विभाजन को कभी कुबूल नहीं कर पाया।
   एक दूसरी हकीकत  में मंटो (बंटवारे के समय वे पाकिस्तान चले गए थे) लिखते हैं, अदालतें मुझे अश्लील लेखक की हैसियत से जानती है। सरकार मुझे कभी कम्युनिस्ट कहती है कभी देश का सबसे बड़ा अदीब। कभी मेरे लिए रोजगार के दरवाजे बंद किए जाते हैं और कभी खोले जाते हैं। कभी मुझे गैर जरूरी इंसान बताकर मकान से बाहर कर दिया जाता है और कभी मौज में आकर, यह कह दिया जाता है कि नहीं तुम मकान के अंदर रह सकते हो। मैं पहले सोचता था, अब भी सोचता हूं कि इस देश में, जिसे दुनिया का सबसे बड़ा इस्लामी राज्य कहा जाता है मेरी क्या जगह है और मेरी क्या जरूरत है। खैर, ऐसी दुविधा में दोनों तरफ कई लोग रहे लेकिन आम पाकिस्तानी और हिंदुस्तानी एकदूसरे से नफरत करते हुए ही बड़े हुए हैं। इस नफरत को भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने जरूर अमन की आशा नामक बस चलाकर कम करने की कोशिश की थी। उन्हें उधर के लोग भी अमन पसंद इंसान के रूप में याद करते हैं। कुछ समय पहले लाहौर से एक युवा पत्रकार सहर मिर्जा जयपुर आईं थीं। यही सोचा था कि पत्रकार हैं देश-दुनिया के हालात के बारे में बात होगी लेकिन हैरानी हुई कि सहर की हर बात में केवल दोनों मुल्कों के लिए अमन की बातें थीं। उनकी दादी का ताल्लुक जयपुर से था और बंटवारे के दौरान उनके हिंदू पड़ोसियों ने उनकी खूब मदद की थी। वे पाकिस्तान में अपनी दादी और हिंदुस्तान के किस्से सुन-सुनकर बड़ी हुई हैं। इस मुल्क के लिए सहर के दिल में बेपनाह मुहब्बत नजर आती है।
बहरहाल, एक और कोशिश वी. विजयेंद्र प्रसाद की लिखी बजरंगी भाईजान है। एक गूंगी बच्ची सरहद पार कर हिंदुस्तान आ जाती है और बजरंगी उसे जान पर खेलकर पाकिस्तान छोडऩे जाता है। वहां उसकी मदद चांद नवाब (आप यू ट्यूब पर इनका एक असल वीडियो देख चुके होंगे जिसमें एक ट्रेन के बाजू से वे ईद की रिपोर्टिंग कर रहे हैं) और मौलवीजी करते हैं। बजरंगी भाईजान कहती है कि दोनों मुल्कों के लोग एकदूसरे से इतना बैर-भाव नहीं रखते जितना कि सियासत और उसका निजाम। आखिर में जब बच्ची बजरंगी को मामा और जयश्री राम कहते हुए विदा करती है तो हॉल में सिसकियों की आवाज सुनाई देती है। बतौर एक्टर सलमान इस बार पीके यानी आमिर की राह पर दिखे हैं। हीरानी-चौपड़ा टाइप सिनेमा की पगडंडी चौड़ी हो रही है और फोकट की हीरोगिरी देखने वाले दर्शक कम। एक दृश्य में बच्ची नॉनवेज खाने के लिए पड़ोस के मुस्लिम परिवार की गोद में दिखाई देती है। वाकई बच्चे अपने मनपसंद भोजन के लिए ऐसे ही दौड़ जाते हैं। बहरहाल, सच्चा सुंदर सिनेमा ही हमें अपील करता है।
बंटवारे के अड़सठ साल पहले लिखी कहानी टोबा टेकसिंह के नायक बिशन सिंह इसलिए पागल हो जाता है कि उसे समझ ही नहीं आता कि टोबा टेक सिंह (जहां का वह और उसकी जमीन है) हिंदुस्तान में है या पाकिस्तान में और जब उसे पता चलता है कि टोबा टेकसिंह पाकिस्तान में ही रह गया है और हिंदुस्तानी पागलों को अब सरहद पार भेजा जा रहा है, वह वहीं सरहद पर ही मर जाता है। आज की कहानी बजरंगी भाईजान का नायक बच्ची को पाकिस्तान में उसके खोए हुए शहर में सकुशल पहुंचाने जाता है। दोनों देश एकदूसरे का वजूद स्वीकार चुके हैं। सियासत भी स्वीकार ले तो अरबों-खरबों का बजट मुल्क की तरक्की में लगेगा। वैसे उस दौर को याद करने के लिए टोबा टेक सिंह पर भी एक फिल्म केतन मेहता बना रहे हैं। पंकज कपूर पागल बिशन सिंह के किरदार में होंगे।

Wednesday, July 15, 2015

क्यों कोई स्त्री नहीं बनती FTII की अध्यक्ष

  गजेंद्र चौहान विवाद को छोड़कर किसी महिला को एफटीआईआई का अध्यक्ष बना देना चाहिए जो आज तक नहीं बनी। कई हैं जो इस पद के काबिल हैं। युधिष्ठिर ने कभी नहीं सोचा होगा कि उनके नाम पर यूं महाभारत छिड़ेगी। कौरव-पांडव यूं बंट जाएंगे। जाहिर है जो उनके पक्ष में होगा वो उन्हें पांडव लगेगा और उनका विरोधी कौरव। उनके लिहाज से कौरवों की संख्या दिन ब दिन बढ़ती जा रही है। दरअसल, फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट््यूट जो पुणे में है उनके सभी पूर्व अध्यक्षों का प्रोफाइल बेहद गंभीर और शानदार रहा है। आरके लक्ष्मण (1970-1980) श्याम बेनेगल 1981-83) मृणाल सेन (1984-86) अडूर गोपालकृष्णन 1987-89) महेश भट्ट (1995-97) गिरीश कर्नाड (1999-2001) और यूआर अनंतमूर्ति (2008 -2011  )  जैसे दिग्गजों  के आगे गजेंद्र चौहान का कद छोटा मालूम होता है। एक समय विनोद खन्ना भी अध्यक्ष रहे। बेशक टीवी धारावाहिक रामायण में वे पांडवों के सबसे बड़े भाई युधिष्ठिर की भूमिका में थे लेकिन मुंबई फिल्म उद्योग को यह नाकाफी लग रहा है। वे रहे होंगे युधिष्ठिर की भूमिका में लोकप्रिय लेकिन इंस्टीट्यूट को चलाने के लिए यह काफी नहीं है। ऐसा कहते हुए इंडस्ट्री के महत्वपूर्ण लोग इकट्ठे होकर विरोध करने लगे हैं।
जिस शख्स के उत्तराधिकारी गजेंद्र बने हैं वे सईद अख्तर मिर्जा हैं। फिल्म और टेलीविजन के बेहतरीन पटकथा लेखक और निर्देशक। हममें से कुछ को दूरदर्शन पर प्रसारित धारावाहिक नुक्कड़, और उसके किरदार आज भी याद होंगे। खोपड़ी शराबी, गणपत पुलिसवाला, धनसुख भिखारी को  शायद ही कोई भूला हो। इस धारावाहिक को उन्होंने ही बनाया था। मिर्जा के खाते में अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है, सलीम लंगड़े पर मत रो, मोहन जोशी हाजिर हो और नसीम जैसी बेहतरीन फिल्में हैं। पुणे का यह संस्थान है ही फिल्म और टीवी का मिला-जुला रूप। मिर्जा इस लिहाज से सही चुनाव थे जबकि चौहान की पृष्ठभूमि इसकी तस्दीक नहीं करती। हो सकता है कि चौहान सोच रहे हैं कि सरकार ही फैसला ले और सरकार इस उम्मीद में कि चौहान पीछे हट जाएं। वैसे  इस नियुक्ति को चुनौती देते हुए विद्यार्थी और कलाकार तो सड़क पर आ गए हैं।
संस्थान 1960 में बना है। यह पुणे के प्रभात स्टूडियो के एक हिस्से में था। फिल्मों की पढ़ाई 1961 से शुरू हुई। तब इसके मुखिया प्रिंसिपल होते थे। 1961  तक निर्देशक सिनेमेटोग्राफर जगत मुरारी इसके प्रिंसिपल रहे। १९७१ में टीवी विभाग को दिल्ली से लाकर इसमें जोड़ दिया गया।1974  से ये भारत सरकार के सूचना मंत्रालय के अधीन आया। शुरुआती दो अध्यक्ष ब्यूरोक्रेट्स रहे हैं जो मंत्रालय के सचिव थे। जाहिर है संस्थान का शानदार इतिहास रहा है और दायित्व बड़े। अध्यक्ष को तेरह सदस्यीय परिषद के चुनाव कराने पड़ते हैं। एकेडमिक कोर्सेस की जिम्मेदारी भी अध्यक्ष की होती है। संस्थान के निदेशक का चयन भी अध्यक्ष ही करता है। पुणे ने जया बच्चन, नसीरुद्दीन शाह, स्मिता पाटिल, विधु विनोद चौपड़ा, राजकुमार हीरानी, शबाना आजमी, ओम पुरी, सतीश शाह जैसे बेहतरीन कलाकार उद्योग को दिए हैं।
कमाल ये है कि संस्थान के अध्यक्षों की लंबी फेहरिस्त में एक भी महिला शामिल नहीं है। जबकि भारतीय सिनेमा और टेलिविजन से स्त्री को निकाल दिया जाए तो वह लकवाग्रस्त ही नजर आएगा। चौहान से बड़ी विडंबना यह है कि अब तक किसी भी स्त्री को इस काबिल नहीं समझा गया जबकि केंद्रीय फिल्म सेंसर बोर्ड में जरूर लीला सैमसन, शर्मिला टैगोर जैसे नाम रहे हैं। चौहान को हटाने की बजाय किसी महिला अध्यक्ष को लाने की बात होनी चाहिए। सई परांजपे, कल्पना लाजमी, मीरा नायर, शबाना आजमी जैसे नामों पर विचार हो सकता है। इनका सिनेमा इनके व्यक्तित्व को बयां करता है। बॉलीवुड मेल डॉमिनेटेड सोसायटी हो सकता है लेकिन पुणे का संस्थान नहीं। भारत सरकार का चयन भी नहीं।

Wednesday, July 8, 2015

दुष्कर्मी को ही पति बना देने वाले वैवाहिक दुष्कर्म को कैसे मानेंगे अपराध


जब हम दुष्कर्मी को ही पति बना देने का मानस रखते हैं तो हम शादी के बाद वैवाहिक दुष्कर्म को कैसे अपराध ठहरा सकते हैं। 

रसिक मोहन को साची पसंद थी। वो उसका खूब पीछा करता। छेडऩे की हद तक। फोन, मैसेजेस रसिक मोहन ने कोई जरिया नहीं छोड़ा था साची को परेशान करने का। साची कई बार उसे लताड़ चुकी थी, झिड़क चुकी थी लेकिन रसिक मोहन हरकतों से बाज नहीं आया। चूंकि साची की जरा भी रुचि रसिक मोहन में नहीं थी, उसने सारी बात अपनी मां को बताई। साची की मां कुछ सोचती इससे पहले एक प्रतिष्ठित जरिए से साची के लिए रिश्ता आया। यह रसिक मोहन की तरफ से था। मां-बेटी दोनों हैरान-परेशान थे लेकिन पिता की राय थी कि परिवार अपनी बिरादरी का है, आर्थिक हैसियत भी अच्छी है, हमें इसे मंजूर कर लेना चाहिए। मां चाहकर भी ये नहीं कह पाई कि यह लड़का साची को काफी समय से परेशान कर रहा है और यह साची को नापसंद है। शादी हो गई और रसिक मोहन ने बड़े गर्व से साची को बताया कि उसे बहुत अच्छा लगा जब साची ने उसके प्रणय निवेदन को ठुकरा दिया था। साची ने समझ लिया था कि यह रसिक मोहन का लड़कियों की शुचिता परखने का उपक्रम था। हालंांंकि अब साची उस बात को ज्यादा तूल  नहीं देना चाहती क्योंकि वह उसका पति है।
हमारे यहां रिश्ते ऐसे ही तय होते हैं। शादी का पैगाम आते ही हम तमाम हरकतों को नजरअंदाज करते हैं। हम वो समाज हैं जो लड़का-लड़की को साथ देखकर ही उन्हें शादी के बंधन में बांधने की जुगत में लग जाते हैं। यहां तक कि दुष्कर्म कर चुके लड़के से भी यही उम्मीद रहती है कि जैसे-तैसे इन दोनों का ब्याह हो जाए तो कलंक से मुक्ति मिले। कलंक उस अपराधी लड़के पर नहीं निर्दोष लड़की पर लगता है। तभी तो अलवर जिले के झाड़ोली गांव की किशोरी रविवार को सूखे कुएं में कूद गई क्योंकि लड़का उसके साथ दुष्कर्म करना चाहता था। निर्भया से लेकर इस किशोरी तक हर कोई खुद की अस्मत को जान से ज्यादा कीमती मानती है। इतिहास राजघरानों की महिलाओं के जौहर का भी साक्षी है। वे आग को गले लगाना बेहतर समझती हैं। पंजाब में आजादी की लड़ाई में कुएं में कूद जाने वाली माताओं और बहनों को कोई कैसे भूल सकता है। जब इतिहास ऐसी घटनाओं से भरा पड़ा है फिर कैसे हम ेदुष्कर्मी के साथ लड़की की शादी कराने पर उतारू हो जाते हैं। दुष्कर्म सबसे बड़ा अपराध है और उसी अपराधी को पति बनाकर हम लड़की को सबसे बड़ी सजा भुगतने पर मजबूर कर देते हैं।
तमिलनाड़ु के कुड्डालोर जिले में महिला कोर्ट ने वी मोहन नामक शख्स को एक नाबालिग से दुष्कर्म का दोषी पाया। किशोरी गर्भवती हो गई और उसने बच्ची को जन्म दिया। महिला कोर्ट ने वी मोहन पर दो लाख का जुर्माना और सात साल की सजा सुनाई। फैसले के खिलाफ मद्रास हाईकोर्ट में अपील दायर की गई। हाईकोर्ट ने ना केवल जमानत मंजूर की बल्कि पीडि़त और आरोपी में शादी का बेहूदा सुझाव भी दे डाला। यहीं सबसे अहम भूमिका निभाते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले बुधवार एक फैसले में कहा कि दुष्कर्म के मामलों में मध्यस्थता की कोई जगह नहीं। कोई भी समझौता अपराध की गंभीरता को कम नहीं कर सकता। कोर्ट ने चेतावनी दी है कि कानूनी प्रावधान से कम सजा देना पीडि़त के खिलाफ संवेदनहीनता दर्शाना होगा। महिला के खिलाफ होने वाले अपराधों में 'जीरो टॉलरेंस' की नीति अपनाई जानी चाहिए।
बेशक सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले से ना केवल स्त्री मन की अनुगूंज परिलक्षित होती है बल्कि यह उस सामाजिक सोच को भी कड़ी फटकार है जो इन मामलों में ऐसी ही सोच की पैरवी करता नजर आता है। मध्यस्थता कई मसलों में होती है लेकिन यह अपराध इस काबिल नहीं। यह स्त्री की गरिमा पर गहरी चोट है। शायद इसी सामाजिक सोच का नतीजा है कि दुष्कर्म की घटनाएं रुकने का नाम नहीं लेती। इसे गंभीर और घृणित अपराध मानने से समाज बचता आया है। हम जिसे रावण कहते हैं वह भी ऐसा अपराधी नहीं था। सीता से निवेदन ही किया था रावण ने।
एक अपराधी को पति का दर्जा दिलाकर हम क्या साबित करना चाहते हैं। ब्याह कोई एहसान है जो अपराधी लड़की पर करेगा। दुष्कर्म एक स्त्री की आत्मा को तार-तार करता है। जब हम दुष्कर्मी को ही पति बना देने का मानस रखते हैं तो हम शादी के बाद वैवाहिक दुष्कर्म को कैसे अपराध ठहरा सकते हैं। तभी तो जब इस कानून की बात आती है तो हमारे नेता भारत की सांस्कृतिक विरासत का हवाला देने लगते हैं। तहमीना दुर्रानी ने अपने उपन्यास कुफ्र (जो एक स्त्री की असल कहानी है) में उस स्त्री की पीड़ा का मार्मिक चित्रण किया है जिसका पति सिर्फ देह से बात करता है। वह इस अपराध बोध (जबकि वह अपराधी भी नहीं) से मुक्त होने के लिए घंटों शावर के नीचे आंसू बहाती है। बेशक सर्वोच्च न्यायालय की यह बात स्त्री अस्मिता की राह में मील का पत्थर साबित होगी। इसके बाद आया एक और फैसला भी इसकी अगली कड़ी मालूम होता है। एक अविवाहित महिला भी अपने बच्चे की कानूनन संरक्षक हो सकती है। पिता की सहमती जरूरी नहीं। बहरहाल परिवार अब बराबरी से और आपसी प्रेम से चलेंगे। एकतरफा समर्पण से नहीं।

Wednesday, July 1, 2015

छोड़ गईं छुट्टियां

 छुट्टियां साथ छोड़ गई हैं बच्चे फिर स्कूल जा रहे हैं। वो बेफिक्री, वो मस्ती घर में छूट गई है। उनकी चीजों का जो पसारा घर के कमरों में फैला रहता था वह अब अलमारी में दुबका दिया जाएगा। वे फिर एक कसी हुई जिंदगी के पीछे कर दिए जाएंगे। जुलाई की पहली तारीख को घर लौटे बच्चों से जब भी पूछा कि क्या मैम ने आपसे आपकी छुट्टियों के बारे में बात की, बच्चों का जवाब ना होता। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि बच्चे जो अपने नाना-नानी के यहां या किसी दूसरे शहर या किसी पहाड़ पर गए हैं, उनसे उनके अनुभव साझा किए जाएं। उनसे पूछा जाए कि उन्होंने क्या महसूस किया। पूरी कक्षा के लिए ये यात्रा संस्मरण किसी बड़ी किताब को सुनाने वाले होंगे। बच्चे बोलने-सुनने की कला में प्रवीण होंगे। किसी बच्चे ने अगर किसी नए खेल या कला को सीखा है वह भी मैम को मालूम होगा। किसी कार्यक्रम या आयोजन में मैम उनकी प्रतिभा को शामिल कर सकती हैं। पहले दिन स्कूल से घर लौटे बच्चों से अगर किसी भी कक्षा में ऐसी सृजनशील बातचीत हुई है तो मान लीजिएगा कि वह स्कूल केवल प्रतिस्पर्धा के लिए घोड़े तैयार नहीं कर रहा है बल्कि उसका मकसद बच्चों के संपूर्ण विकास से है। बहुत अच्छे लगे इटली के वे शिक्षक जिन्होंने बच्चों को होमवर्क में सूर्योदय, पहाड़, चांदनी , समंदर को निहारने के   लिए कहा है। पढऩे के लिए कहा है और नकारात्मक परिस्थितियों से बचने की सलाह दी है।
    एक शिकायत उन माता-पिताओं से भी है जिन्होंने इन छुट्टियों में   टीवी, मोबाइल और कम्प्यूटर के स्क्रीन बच्चों के हवाले कर दिए हैं। वॉट्स एप पर अजीब-अजीब चुटकुले, फिल्मी पोस्टर, वीडियोज, बेतुकी शायरी पढ़कर वे खूब व्यस्त हो रहे हैं। आईटी सेक्टर से जुड़े कई बड़े नाम अपने बच्चों को इस जुनून से हमेशा दूर रखने की हिमायत करते हैं। वे कहते हैं हमने तय कर रखा है कि बच्चे तकनीक का कितना इस्तेमाल करेंगे। एपल के फाउंडर स्टीव जॉब्स ने भी ऐसा ही किया था। माइक्रोसॉफ्ट के मैनेजर ने तो बच्चों के लिए गैजेट्स टीवी के इस्तेमाल पर बैन लगा रखा है। आठ से तेरह साल के बच्चों के इंटरनेट पर सक्रिय रहने की तादाद 73 फीसदी बताई जाती है। ये सेहत, सोच, विकास में सबसे बड़ी बाधा है। तकनीक प्रेमी देश के बड़े नेता जब अपनी बात में अक्सर इन तकनीकी जरियों का गुणगान करते हैं तो वे स्वत: ही बड़े वर्ग को इस तरफ मुडऩे के लिए प्रेरित कर देते हैं। उनकी कोशिश होनी चाहिए कि बच्चों के माता-पिता को सचेत करें  कि केवल तकनीक आखिरी सच नहीं है।
     तकनीकी शिक्षा का ट्रेंड अलग दिशा में चल पड़ा है। पड़ोस की ईशा ग्यारहवीं कक्षा में ही स्कूल छोड़कर कोटा रवाना हो गई है। वह वहां दो साल आईआईटी की तैयारी करेगी। अपना नामचीन स्कूल छोड़कर वह किसी साधारण स्कूल से ग्यारहवीं-बारहवीं कक्षा की परीक्षा पास कर लेगी और अपना सारा समय इंजीनियरिंग
प्रवेश परीक्षाओं में लगा देगी। जब दसवीं के बाद स्कूल कोई मायने नहीं रखते फिर ये ड्रामा क्योंं?   सालों से शिक्षा प्रणाली में ये सेंध लग चुकी है लेकिन कोई बदलाव नहीं। ये प्रतिस्पर्धा को अतिरिक्त  होड़ से जोडऩे वाली कोचिंग क्लासेस माता-पिता की इच्छाओं का प्रतिफल है या व्यावसायिकता का?     
     इस होड़ से निकली जनरेशन अब सामने आ चुकी है। अधिकांश बहुत इंटेलिजेंट लेकिन हिसाबी  हैं। उन्हें हर चीज का दाम चाहिए। वे घर-परिवार से दूर खूब कमा रहे हैं। उनके पास समय नहीं। कभी-कभी तो खुद के लिए भी नहीं। संवादहीनता के हालात रिश्तों को तोड़ रहे हैं। चूंकि कुदरत से कोई कनेक्ट नहीं है इसलिए उसकी तरह निस्वार्थ देना उनकी फितरत भी नहीं। उसकी तरह अपना खजाना लुटाने का साहस  बचा ही नहीं है। इंसान की कीमत उसकी चीजों के ब्रांड तय करते हैं। महंगी गाडिय़ों और मोबाइल की कोई सीमा-रेखा कभी नहीं खींची जा सकेगी। हमें समझना होगा हमारा सच क्या है। पंच तत्वों से बना हमारा शरीर कुदरत के साथ चलने में ही सार्थक है। नकली वातावरण में यह सर्वाइव नहीं कर सकेगा। समाज और नैतिकता इंसान को जीने की ताकत देते हैं। काश किशोर होते बच्चों के अभिभावक और स्कू ल ये फैसला कर सकें कि तकनीक के साथ इंसानियत, नैतिकता भी जीवन का हिस्सा रहें।  यह सत्र शुभ हो।

Tuesday, June 30, 2015

घर टूट रहे हैं


वह पिता है। उम्र कोई तीस-बत्तीस साल। दो साल की बेटी के उस पिता की आंख में आंसू थे। जाने कैसा दुखद संयोग था कि वह फादर्स डे के दिन ही रो रहा था जबकि उसे पता ही नहीं था कि आज फादर्स डे है क्योंकि वह पिछले पांच दिन से परेशान था। उसकी पत्नी बेटी को लेकर मायके चली गई थी और अब लौटना नहीं चाहती थी। सासू मां से झगड़ा हुआ और वह चल दी। कह दिया कि अब मुझे लेने आने की जरूरत नहीं मैं आप लोगों के साथ नहीं रह सकती। बहू के इस रवैये से खिन्न परिवार दो साल की पोती को नहीं भूल पा रहा हंै और उसे याद करते ही सबकी आवाज रूंधने लगती हैं।
    अकसर हम कहानी के उस छोर पर होते हैं जहां बहू होती है। वह ससुराल में रहते हुए आपबीती सुना रही होती है जिसमें उसके सपनों के टूटने और कष्टों का ब्योरा होता है। इस बार ससुराल पक्ष था। उसकी शिकायत थी कि बहू को साफ-सफाई की समझ नहीं है। उसे बच्ची को पालना नहीं आता है। वह कभी हंसती भी नहीं है। जब-तब अगले मोहल्ले में अपने मायके जाना चाहती है। सुबह दस बजे से रात आठ बजे तक नौकरी करती है। घर का काम भी करती है तो टालते हुए। बेटा कहता है कई बार मैंने उससे कहा कि जॉब बदल ले। छह बजे तक घर आजा लेकिन नहीं मानती। कुछ दिन पहले मायके जाने की बात को लेक र सास-बहू में बहस हुई। बहस हाथापाई तक पहुंची और बहू मना करने के बावजूद मायके चली गई और अब नहीं आना चाहती।  परिवार नन्हीं पोती की याद में कुम्हला रहा है और बच्ची के पिता को लगता है कि कानून कचहरी ऐसी है कि मैं अपनी बेटी को कभी नहीं मिल पाऊंगा। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि बच्ची मुझे मिल जाए। मैं तो उसे भी साथ ही रखना चाहता हूं लेकिन बच्ची के बिना मेरा सब कुछ खत्म सा लगता है।
यह कहानी अभी एकतरफा है। बहू की बात यहां नहीं है लेकिन बिना बहू की बात सुने ही ऐसा क्यों लगता है कि यह परिवार बहू से केवल उम्मीद और अपेक्षा के घेरे में जी रहा है। क्यों इसे बहू के सपनों का खयाल नहीं है। एक छोटे से घर और कम आमदनी वाले परिवार में उसके सपनों से जो घुटने टिकवाए गए उसके बारे में क्यों नहीं सोचा जाता। यह तब है जब बेटे का व्यवसाय अच्छी हालत में नहीं है। बहू की मांग है कि वह पति के साथ अकेले रह सकती है लेकिन परिवार के साथ गुजारा संभव नहीं।
 बहू लाने वाले किसी भी परिवार से कुछ सवाल तो इस 21वीं सदी में पूछे ही जा सकते हैं कि एक कामकाजी बहू सर पे पल्लू रखकर और कहीं-कहीं तो घूंघट लेकर पूरे घर का झाडू़ पोंछा, बर्तन, खाना कैसे कर सकती है। प्रेमवश वह कुछ दिन बना भी ले तो भी वह उस पर अतिरिक्त बोझ ही होगा। अपेक्षाओं के इस क्रम में अब भी कई परिवार ऐसे हैं जहां बहू को घर के बड़ों के सामने बैठकर टीवी देखने की इजाजत भी नहीं। शायद ऐसे ही हालात में पलायन का बीज पल्लवित होता है। लड़की सवाल करती है कि मेरी शादी किसी शख्स से हुई है या परिवार की अपेक्षाओं से। लड़का दो पाटों के बीच पिसता चला जाता है। वह मां का दुलारा है और पत्नी कुछ अरमानों के साथ आई है। इस लाड़ और अरमान के द्वंद में लड़का कई बार अरमान को कुचलने लगता है। यहीं लड़की फिर सख्त फैसले लेने पर आमादा होती है। कहने वाले फिर कहते हैं कि दहेज की धारा का दुरुपयोग होता है।
जाहिर है परिवारों को बदलना होगा। एक परिवार ने बहू की पगथलियों के प्रवेश के साथ ही ऐलान कर दिया कि तुम हमारी बेटी हो। ससुर ने कहा मैं तुम्हारा पिता हूं मेरे सामने ना घूंघट की जरूरत है ना सर ढंकने की। तुम्हें जो पसंद हो जो अच्छा लगे वह पकाओ, हमसे पूछने की कोई जरूरत नहीं। इन लफ्जों ने नई बहू के कानों में मिश्री-सी घोल दी। वह खूब मुस्कुरा रही थी। विदाई के बाद नम हुई आंखों में मुस्कान खिली थी। वह खुश थी। उसके नए जीवन में खुशियों की नींव पड़ चुकी थी। जाहिर है तब ये बातें फैमिली कोर्ट की देहरी नहीं चढेंग़ी। बड़ों के बड़प्पन से ही हमारी यह पारिवारिक व्यवस्था चलेगी। वे संस्कारों और अपेक्षाओं की पूरी गठरी बहू के सिर पर नहीं रख सकते। ये बोझ साझा करना होगा। बहुत मुश्किल काम नहीं है यह।

Wednesday, May 13, 2015

अच्छे लगे पीकू के बाबा





पीकू कब्ज की चर्चा पर बनी ऐसी फिल्म है कि अच्छे-अच्छों की सोच में जमा बरसों बरस का पाखाना साफ कर सकती है। मुख्य किरदार पीकू भले ही पिता की मां बनकर तीमारदारी करने वाली बेटी हो, लेकिन जब पिता बेटी के लिव इन या वर्जिनिटी पर सहजता से चर्चा करता है तो फिल्म बहुत ही व्यापक कैनवस ले लेती है। पीकू के पिता अपनी मृत पत्नी को खूब शिद्दत से याद करते हैं, लेकिन इस भाव के साथ कि उसने अपनी सारी जिंदगी मेरे लिए खाना पकाने और मेरी दूसरी जरूरतें पूरी करने में समर्पित कर दी। वह काबिल महिलाओं के यूं अपनी जिंदगी होम कर देने को लो आईक्यू वाली कहते हैं। उन्हें आश्चर्य है कि रानी लक्ष्मी बाई, सरोजिनी नायडू और एनी बेसेंट के देश में ये कैसा समय आया है जो पढ़ी-लिखी स्त्रियां अपने जीवन को एक स्टुपिड रुटीन में तब्दील कर देने पर आमादा हैं।
पीकू उनकी पढ़ी-लिखी आत्मनिर्भर बेटी है और वे बिल्कुल नहीं चाहते कि ब्याह-शादी के नाम पर उनकी बेटी भी ऐसी ही शोषित जिंदगी जीने के लिए मजबूर हो जाए। कथा यहीं नहीं रुकती, वह पीकू की चाची के उस भाव में भी अभिव्यक्त होती है कि अगर एक दिन उनकी शादी देर से होती तो वह अपना इम्तिहान दे पातीं। एक पारंपरिक बांग्ला परिवार में आधुनिक सोच के बावजूद कुछ ऐेसे पैबंद दिखाए गए हैं जो कई समाजों का पूरा-पूरा सच है। पति के आसपास पूरी जिंदगी समेट देने वाली ये स्त्रियां जब अपने लिए जागती हैं तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। जीवन की अपनी रफ्तार है वह अवसर देने के बाद रुकता नहीं है। हमारा साहस इंटेलीजेंस उस समय बड़ी भूमिका अदा करता है।
बांग्ला परिवार की इस सोच को झुंपा लाहिरी का उपन्यास 'द लो लैंड'  बेहतर अभिव्यक्त करता है। पारंपरिक बांग्ला परिवार जब अमेरिका जाकर बसते हैं तो धीमे-धीमे कैसे उनके बच्चे इन खोलों से निकलकर अपने वजूद के लिए संघर्ष करते हैं। स्कूल, कॉलेज, रिश्ते, विवाह इन सबमें वे एक जबरदस्त बदलाव को आत्मसात करते हैं लेकिन उनकी जड़ें कभी उनके लिए मजबूती का आधार बनती हैं तो कहीं जकड़ भी लेती  हैं। भारतीय समाज आज ऐसे ही द्वंद से गुजर रहा है।

Wednesday, May 6, 2015

माँ पर नहीं लिखी जा सकती कविता



मां के प्रेम और समर्पण को यहां लिखा कोई शब्द हूबहू बयां नहीं कर सकता। मां वह है जो अपनी जान देकर भी अपने दिल को बच्चे में धड़कते देखना चाहती है। इसे हिंदी फिल्म हार्टलेस में पूरी संवेदना के साथ दिखाया गया है। वह खुद को खत्म कर अपना दिल बीमार बेटे में लगवाती है। मां  बच्चे से अगर कुछ चाहती है तो वह है उसकी सलामती उसकी सेहत। मालवा के कवि चंद्रकांत देवताले सही लिखते हैं कि मैं नहीं लिख सकता मां पर कविता


क्योंकि मां ने केवल मटर, मूंगफली के नहीं अपनी आत्मा, आग और पानी के छिलके उतारे हैं मेरे लिए। वाकई मां शब्द-शिल्पियों के लिए चुनौती है। संकट शब्दों का है, साहित्यकारों का है। मां तो निर्बाध नदी की तरह अपना सब कुछ अपने बच्चों पर वारती है, कुर्बान करती है, न्यौछावर करती है।               
बदलते वक्त में मां की भूमिका भी बदली है। अब तक भारतीय समाज में एक लड़की की तरबियत ऐसी ही की जाती थी कि वह शादी के बाद ससुराल में सबकी सेवा करते हुए अपने बच्चों का लालन-पालन करे। उसकी समूची टे्रनिंग ऐसी होती थी कि वह एक बेहतरीन बीवी, बहू और मां साबित हो। काम पर जाने वाले पुरुषों के तमाम हितों का खयाल रखना उसका दायित्व था। वह श्रेष्ठ भोजन और श्रेष्ठ सेवा अपनों को परोसती थी। इस भूमिका में उसकी आर्थिक निर्भरता कायम थी। समर्पण का भाव इस कदर कि वह गृहस्थी में खुद को खत्म कर देने की हद तक लगी रहती।
मैं एक स्त्री को जानती थी। नाम रावी था। रावी की जिंदगी का एक ही लक्ष्य था, परिवार। वह कुर्बानी की हद तक सबके लिए काम करती। पति की प्रिय सब्जियों को बनाने में उसे इतना सुख मिलता कि वह देर शाम भी खुद सब्जी चुनकर मंडी से लाती। बचे वक्त  को भी जाया नहीं होने देती। पति के कारोबार में हाथ बंटाती। बच्चे मां के  इसी समर्पण के साथ आगे की कक्षाओं में जाते हुए किशोर हो रहे थे। कब वे सांस की तकलीफ की शिकार हुई कोई समझ नहीं पाया। अपने समर्पण में उन्होंने किसी को ऐसे संकेत नहीं दिए। लेकिन गिरती सेहत चुगली कर रही थी। एक दिन वे नहीं रहीं। चालीस से भी कम उम्र की रावी इस दुनिया को अलविदा कह चुकी थी। उस मां की अर्थी उठती देख हर आंख नम थी लेकिन स्त्रियों की आंखों में शिकायत थी कि रावी बच सकती थी, बशर्ते उसकी कद्र की जाती। क्या स्त्री केवल इसलिए अपनी सेहत के प्रति लापरवाह होती है क्योंकि उसे लगता है कि खामखां धन खर्च होगा। वह धन जो वह नहीं कमाती और उसे बताया जाता है कि वह बड़ी मुश्किलों से कमाया जाता है।
बदलाव यह है कि अब नई मध्यमवर्गीय पीढ़ी में लड़कियां खूब पढ़-लिख रही हैं और करिअर उनकी प्राथमिकता में है। जो आदर्श गुण लड़कियों को बड़ा करते हुए घुट्टी में पिलाए जाते थे उनमें सबसे पहले अब करिअर है। आर्थिक आत्मनिर्भरता माता-पिता ने बेटियों के एजेंडे में शामिल कर ली है। एक मित्र के दादाजी कहा करते थे अच्छी रोटी भले ना बेल सको अच्छी पढ़ाई जरूर करना। शायद ऐसे ही बुजुर्गों की सोच ने लड़कियों में भी खूब पढऩे का साहस भरा होगा। ऐसे ही बुजुर्गों ने कथित अच्छे रिश्ते भी यह कहकर ठुकराए होंगे कि लड़की इस समय पढ़ रही है। अभी उसकी शादी नहीं करनी है।
ऐसी पढ़ी-लिखी नौकरीपेशा लड़कियां अब मां बन चुकी हैं। क्या वे कमजोर मां हैं? क्या वे अपराधबोध से  ग्रस्त हैं कि अपने बच्चों को पूरा समय नहीं दे पा रही हैं? क्या उनके बच्चे नाराज हैं? क्या वे जॉब के प्रति लापरवाह हैं? क्या अब का समाज उन्हें संदेह की निगाह से देखता है?  ऐसे कई सवाल हो सकते हैं लेकिन इनका जवाब ना ही है। आज की 'कॅरिअरिस्टिक मॉमÓ हर मोर्चे को फतह करने में लगी है। उसने अपनी शक्ति को इतना बढ़ा लिया है कि हैरानी होती है।
यह भी खामखयाली है कि करिअर की चाहत में लड़कियां शादी नहीं कर रहीं, बच्चे नहीं पैदा कर रही। सब कुछ हो रहा है लेकिन थोड़ा देर से। वह सूझ-बूझ से अपनी जिंदगी  साध रही हैं। ये उसके अच्छे दिन कहे जा सकते हैं। उसमें इतनी समझ भी है कि परिवार के लिए कुछ समय का ब्रेक लेकर फिर काम पर लौटे। बेशक वह रस्सी पर चलती उस नटनी की तरह है जो हर तरह से संतुलन साधने की जुगत में है। आज की पाती इन्हीं हुनरमंद और हैरतअंगेज मां के नाम है। सच है इन पर भी नहीं लिखी जा सकती कविता। इन्हें सिर्फ सलाम किया जा सकता है। हेप्पी मदर्स डे।

Wednesday, April 22, 2015

तुम तो पढ़ी-लिखी काबिल थीं


काबिल डॉक्टर की खुदकुशी से पहले लिखी गई चिट्ठी समाज से भी कई सारे सवाल करती है 
कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसका नाम क्या है और वह किस शहर की है। फर्क पड़ता है तो उसके खत से जो उसने खुदकुशी से पहले अपने फेसबुक अकाउंट पर समाज को संबोधित करते हुए लिखा है। फर्क पड़ता है इस बात से कि वह पढ़ी-लिखी काबिल एनेस्थेटिस्ट युवा थी। फर्क पड़ता है कि जिस कॅरिअर को हासिल करने के लिए उसने कड़ी मेहनत की होगी उसने उसे एक  पल में मिटा दिया। वह व्यक्ति उसका पति था। पति-पत्नी दोनों डॉक्टर। हैरानी होती है कि चिकित्सक होते हुए भी वह अपने शारीरिक रुझान को समझ नहीं पाया। अठारह अप्रेल के खतनुमा फेसबुक स्टेटस में उसने लिखा है कि उसका पति समलैंगिक था। शादी के पांच सालों में दोनों के  बीच कोई संबंध नहीं बना और जब वह पति के समलैंगिक संबंधों को भांप गई तो पति ने उसे प्रताड़ित  करना शुरू कर दिया।
युवती का खत महसूस कराता है कि वह अपने पति से बहुत प्रेम करती थी उसका यह व्यहार उसके बरदाश्त से बाहर हो रहा था। वह लिखती है कि मैं सिर्फ उसका साथ चाहती थी अगर कोई समस्या भी है तो हम मिलकर सुलझा सकते थे, लेकिन मैं ऐसा कर पाने में नाकाम रही।  मैंने कहीं कोई संबंध नहीं बनाए। इसकी भी तसदीक कराई जा सकती है। मुझे उम्मीद थी कि एक दिन सब ठीक हो जाएगा। अफसोस ऐसा नहीं हुआ।
युवती ने दिल्ली की एक होटल में कमरा बुक कराया और कलाई की नस काट लीं। माता-पिता को अपनी तकलीफ के बारे में बताया लेकिन जब तक माता-पिता उस तक पहुंच पाते एक पढ़ी-लिखी समझदार लड़की का जीवन खत्म हो चुका था। कुछ पाठकों के खयाल में तुरंत यह बात आ सकती है कि इसीलिए तो हम कहते हैं कि समलैंगिकता गलत और असामान्य है, समाज को इसे हतोत्साहित करना चाहिए। जबकि विशेषज्ञों की राय में यह असामान्य नहीं है। व्यक्ति कुदरती ऐसा हो सकता है। समाज की यही धारणा है कि इनकी शादी होने के बाद सब सामान्य हो जाता है। ये अपने रूझान को भूल जाते हैं। वे तो नहीं भूलते, लेकिन भूल समाज से हो जाती है और नतीजा इस युवती के अंत की तरह सामने आता है।
लड़की ने खत में लिखा है कि भावनात्मक रूप से वह इतनी आहत हुई कि उसका सांस लेना मुश्किल हो गया।वह लिखती है तुम शैतान हो जिसने मेरी सारी खुशियां छीन ली। अजीब दास्तां यह भी है कि पढ़ी-लिखी आत्मनिर्भर महिलाओं में असुरक्षा और आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ रही है। सुनंदा पुष्कर भी ऐसे  ही मृत मिली थीं। एक बड़े नेता की बहू भी।  युवती के खत का यह हिस्सा गौर करने लायक है, 'यदि हमारे समाज में कोई भी उसकी तरह है तो प्लीज खुद को बचाने के लिए उसकी शादी किसी लड़की से मत करना। ऐसा करके आप लड़की की भावनाओं के साथ तो खेल ही रहे हैं उसके परिवार और उसकी जिंदगी से भी खिलवाड़ कर रहे हैं।
युवती के खत का यह हिस्सा उस समाज को जगानेवाला होना चाहिए जो मानता है कि शादी कई मुसिबतों का इलाज है। एक युवती जो शादी से प्रेम, निष्ठा और अपनत्व चाहती थी वह उसे नहीं मिला। वह खुद को इस पवित्र रिश्ते की भेंट चढ़ा गई जो कभी बना ही नहीं था। आज भले ही युवती के  इस खत को ढाई हजार लोग शेयर कर चुके हों लेकिन जिंदा रहते हुए उसके दर्द को कोई महसूस ना कर सका। 

   एक और बात जाहिर होती है कि हम महिलाएं कितनी भी आत्मनिर्भर क्यों न हो जाएं, रिश्तों को हम जान से भी ज्यादा अहमियत देती हैं। संवेदनाओं का ऐसा ज्वार हमारे भीतर होता है जो अपनी जान तक ले डालने को मजबूर कर देता है। रोते माता-पिता, भाई, बहन की शक्ल एक बार भी आंखों में नहीं आती। लड़कियों को अपनी जरूरत इससे आगे भी देखनी होगी। एक काबिल युवती का यूं जाना हमसे भावनात्मक रूप से और मजबूत होने की अपेक्षा करता है।

Saturday, April 18, 2015

मार्गरीटा चखने से पहले

मार्गरीटा चखने से पहले कुछ लिखा था दोस्तों
एक फिल्म ने रिलीज से पहले ही अखबार, टीवी चैनल्स, सोशल मीडिया को बाध्य कर दिया है कि वह इस मुद्दे पर सोचे और बात करे। मुद्दा सेरिब्रल पल्सी नामक बीमारी से जुड़ा है, जिसमें मरीज के  दिमाग का वह हिस्सा चोटग्रस्त या कमजोर होता है जो संतुलन और गति को बनाए रखता है। मसल्स सख्त हो जाती हैं। मरीज बोलने, करवट लेने में तकलीफ महसूस करता है और कभी-कभी इसका असर आंखों पर भी देखा जा सकता है। प्रति एक हजार पर 2.1 ब"ो सेरिब्रल पल्सी का शिकार होते हैं।
एक और बहस साथ में चलती है कि विकलांग और अपंग को फिजिकली डिसएबल्ड ना कहा जाए इन्हें डिफरेंटली एबल्ड कहा जाए यानी इनमेेंं ऐसी असमर्थता है, तो कई ऐसे गुण भी हैं जो इन्हें समर्थ बनाते हैं। बेशक लेकिन हमारा सारा जोर एबल्ड या समर्थ बनाने की ओर ही क्यों है? इतने सक्षम बनो कि जीवन की रफ्तार से कदम मिला सको। हम आम बच्चों  को तो इस रफ्तार में धकेल ही रहे हैं इन बच्चों  को जिन्हें कुदरत ने कुछ अलग नेमत देकर भेजा है वे भी इसी दौड़ में शामिल कर लिए हैं। कुदरत ने ऐसे बच्चों  को बड़ा ही सुंदर दिल बख्शा होता है। ये हरेक से बहुत प्यार से मिलते हैं। इनकी नजरों में कोई खाका नहीं होता। ना अहंकार, ना ईगो, ना झूठी शान, ना शेखी। ये केवल प्यार भरा दिल लिए चलते हैं। हम इस दिल को तो नहीं समझते, लेकिन हमदर्दी जताते हुए उन्हें पानी का पूछते हुए आंखों में अतिरिक्त दया भाव जरूर ले आते हैं जिसकी शायद इन्हें जरूरत ही नहीं। उन्होंने उस संवाद की अपेक्षा है जो समभाव पर हो, सामान्य हो।
फिल्म जिसने इस मुद्दे पर बातचीत के लिए सबको विवश किया है वह है मार्गरीटा विद ए स्ट्रॉ। निर्देशक शोनाली बोस की फिल्म इसी हफ्ते रिलीज होगी। शोनाली की बहन मालिनी सेरिब्रल पल्सी से पीडि़त रही हैं। वे उसके साथ आम भाई-बहनों जैसी ही बड़ी हो रही होती है, लेकिन तकलीफ तब आती है जब वे बाहर निकलती हैं। समाज मालिनी को अलग नजरिए से देखता है। साथ बड़ी होती हुई शोनाली चौंकती है कि मालिनी उससे कहीं Óयादा रोमांटिक है और वह लड़कों के बारे में बात करती है। वह उस सुख को महसूस करना चाहती है, जिसे हमारा समाज शादी के बाद महसूस करने की इजाजत देता है। फिल्म में मां-बेटी का रिश्ता रेवती और कल्की कोचलिन ने निभाया है। किरदार जैसा बोल सके इसके लिए कल्की ने मुंह में कंचे भरे। मां जिसने अब तक  बेटी को सामान्य तरीके से पाला है और जहां जरूरत पड़ी है वह उसके लिए लड़ी भी हैं, वह मार्गरीटा के ऐसा कहते ही सहम जाती है। वह चाहती है कि मार्गरीटा ऐसा ना सोचे। वह उसे सुरक्षित रखना चाहती है क्योंकि लड़की के संदर्भ में ऐसी विकलांगता एक नहीं कई तकलीफों का झुंड बनकर सामने आती है।
मार्गरीटा की मां जैसी सोच ही हम सबकी है। हम तो यूं  भी  इस मुद्दे पर बात करना नहीं चाहते फिर ऐसे बच्चों  के लिए तो बिलकुल भी नहीं। हमें तो अब भी लगता  है कि यह किसी जन्म के पाप या बुरे कर्मों का नतीजा है। दुखद है कि समाज के बड़े हिस्से में अब भी बीमारियों की वजह किसी जन्म में किए गए पाप हैं। हम मान लेते हैं कि कोई पाप हमने चक्की में डाले हैं और जो आटा आया है वह खराब है। सवाल यह उठता है कि इस कथित खराब आटे को हम आपसी संबंधों के बारे में सजग करे या नहीं। ऐसे ब"ाों से जब यह सवाल किया जाता है तो वे इधर-उधर देखने लगते हैं या फिर जीभ निकालकर ऐसे जाहिर करते हैं जैसे यह तो आपने बुरी बात कर दी क्योंकि यही हम उनमें भरते हैं। मार्गरीटा यह हिम्मत  इसलिए कर पाती है क्योंकि उसकी अन्य इ'छाओं को दबाया नहीं गया था।
ऐसे ब"ाों के माता-पिता भाई-बहनों की दिक्कत समझ में आती है कि वे अपने काम के लिए ही आत्मनिर्भर नहीं तो शादी-संबंध की जिम्मेदारी कैसे लेंगे। वे दुविधा में ही रहते हैं और ऐसे बच्चों  पूरी जिंदगी अकेलेपन के साथ। लेकिन कोलकाता के जीजा और बापा ने इस दुविधा को तोड़ा है। जीजा इस बीमारी से ग्रस्त है और बापा सामान्य। बापा और जीजा के बीच यह लगाव उस समय हुआ जब वे उसे हाथ पकड़कर सड़क पार करा रहे थे। बापा कहते हैं वह बिलकुल सामान्य है लेकिन मैं उसे लेकर किसी ढाबे पर नहीं जा सकता, थड़ी पर चाय नहीं पी सकता।
विकलांगता कोई असाधारण बात नहीं है। उनकी सभी साधारण इ'छाएं पूरी होनी चाहिए। हम भले ही बंद समाज हैं, लेकिन इनके लिए हमें खुलना होगा। इन्हें सुर्ख रंग की लिपस्टिक अ'छी लगती है तो लगाने दीजिए। आमजन की दया को हाशिए पर रखिए और दुआओं को मुख्य धारा में लाइए। इनके बड़े दिलों में झांकिए। ये जीवन के प्रति आपका नजरिया बदलने की ताकत रखते हैं। उन माताओं को सौ-सौ सलाम, जो इन बच्चों के लिए अपनी सोच को तो आसमान जैसा विशाल बना देती हैं लेकिन जिंदगी को इन्हीं के आसपास समेट देती हैं।

Wednesday, April 15, 2015

ये लाडली न रीझती है न रिझाती


अक्सर हम टीवी विज्ञापनों का जिक्र इसी हवाले से करते हैं कि ये आज भी स्त्री की छवि को एक प्रोडक्ट की तरह ही इस्तेमाल करते हैं। बेचना चाहे शेविंग क्रीम या कच्छे-बनियान हो, स्त्री इस अंदाज में प्रस्तुत की जाती है जैसे दूसरे पक्ष पर रीझने और रिझाने के अलावा उसकी कोई भूमिका ही नहीं। वक्त बदला है और स्त्री की बदलती हुई छवि को विज्ञापन की दुनिया ने भी स्वीकारना सीखा है। थिएटर तो हमेशा से ही प्रगतिशील रहा है। फिल्में भी यदा-कदा अपनी मौजूदगी का एहसास करा देती हैं लेकिन चंद सेकंड्स की इन विज्ञापन फिल्मों का बदलना बड़ा बदलाव है। एक ऋण देने वाली बैंक के विज्ञापन पर गौर कीजिए। तेज बारिश में एक बेटी अपनी बुजुर्ग मां को अस्पताल ले जाने के लिए ऑटो वालों की मिन्नतें करती है लेकिन कोई नहीं चलता। कुछ दिनों बाद यही लड़की फिर एक ऑटो वाले को रोकती है कि भैया एमजी रोड चलोगे? ऑटो वाला मुस्कुराते हुए कहता है-'हां'

क्वीन के लिए डायना हेडन ने लाड़ली अवार्ड  लिया 

  मेरे  कॉलम खुशबू की पाती को भी मिला लाडली नेशनल अवार्ड 
lataji ki aur se in search of lata ke lekhak harish bhimani ne award liya. lataji ne apne sandesh mein kaha ki sab unhen lata didi kahte hain,ab shayad lata ladli kahenge to mujhe bahut khushi hogi.


। जवाब में लड़की इतराते हुए कहती है-'तो जाओ'। ... और वह फक्र से अपनी कार की ओर मुड़ जाती है।
एक और विज्ञापन पुरुषों के कपड़ा ब्रांड का है। अपने नन्हेे बच्चे को छोड़कर मां काम पर जा रही है। बच्चे से बिछडऩे का गम उसकी आंखों में है लेकिन उन्हीं आंखों में एक संतोष भी है क्योंकि दरवाजे पर उसके कामकाजी पति बच्चे को गोद में लिए आश्वस्त करते हैं कि तुम जाओ। मैं हूं इसकी देखभाल के लिए। यह एक ऐसे पति का चित्रण है जो अपने अभिभावकीय दायित्व तो निभा ही रहा है पत्नी की कामकाजी प्रतिबद्धता को भी समझ रहा है।
बहरहाल, यह उस समाज में है जहां स्त्री का कामकाजी होना तब ही स्वीकार्य है जब उसे धन की जरूरत हो। आम धारणा यही है कि जब पति अच्छा खासा कमाता है तो फिर पत्नी को बाहर निकलने की क्या मजबूरी। वाकई ये विज्ञापन बंधे-बंधाए ढर्रे को तोड़ते हैं। एक और एड कलाई घड़ी का हैे। लड़की गहरे प्रेम के बावजूद रिश्ता इसलिए नहीं स्वीकार कर पाती क्योंकि उसके होने वाले पति को शादी के बाद उसका बाहर जाकर काम करना पसंद नहीं। वह शादी से इंकार कर देती है। कुछ सालों बाद जब वे मिलते हैं तब भी लड़का वही सवाल करता है और वह कहती है तुम कभी नहीं बदलोगे। ऐसे ही कुछ विज्ञापनों को सम्मानित करने की शाम थी वह जब लाडली मीडिया एंड एडवरटाइजिंग अवॉर्ड ने मुंबई में पिछले सप्ताह इनके क्रिएटर्स को सराहा। युवा टीम के ये युवा आइडियाज नए हैं। अब लड़की केवल किसी की सोच के प्रतिरूप में नहीं ढल रही, अपनी सोच और वजूद को सामने रख रही है। ध्यान रहे कि कोई भी टीवी धारावाहिक चाहकर भी सम्मानित नहीं किया जा सका।
इसी कड़ी में फिल्म क्वीन भी पुरस्कृत हुई। क्वीन एक ऐसी लड़की की कहानी है जो एन वक्त पर विवाह से नकार दी जाती है। अकेले हनीमून पर  पेरिस यात्रा के लिए निकली रानी खुद की नई पहचान गढ़ती है। यात्रा उसे इतना साहस देती है कि अबकी बार वह खुद इस रिश्ते को छोड़कर आगे बढ़ जाती है। एक लड़की को समझना होगा कि कई सारी ज्यादातियां तो उसके साथ केवल इसलिए होती हैं क्योंकि वह उन्हें स्वीकारती चली जाती है। वह जाने क्यों इसे अपनी नियति मानने लगती है जो कि उसके एक फैसले भर से बदल सकती है।
इसी समारोह में लता मंगेशकर को लाडली वॉइस ऑव द सेंचुरी अवॉर्ड से नवाजा गया। हरीश भिमानी ने उनकी ओर से सम्मान ग्रहण किया। लता ने अपने संदेश में कहा कि वे अपने पिता दीनानाथ की बेहद लाड़ली रही हैं। सारा देश उन्हें लता दीदी कहता है। अब इस सम्मान के बाद शायद लता लाड़ली कहे। दानिश रजा की कहानी का जिक्र इसलिए जरूरी है, क्योंकि उन्होंने हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के उस सच का खुलासा किया जहां स्त्री की कीमत पशुओं से भी कम है। 'चीपर देन कैटल' नाम से  प्रकाशित यह स्टोरी समाज में स्त्री के हालात बयां करती है। छत्तीसगढ़ की प्रियंका कौशल की स्टोरी भी उन युवतियों के हक में उठी आवाज है जो मानव तस्करी के लिए जिम्मेदार बड़े गिरोहों का मोहरा बन जाती है। अशिक्षा, गरीबी और एक स्त्री का स्त्री होना ऐसे भयावह दलदल में धकेलता है जहां से इंसाफ और फिर पुनर्वास की कोई उम्मीद नहीं दिखाई पड़ती। उपमिता वाजपेयी के अभियान तेज़ाब के खिलाफ को बेस्ट कम्पैन मन गया।मणिपुर की उर्मिला माहवारी के मिथ को तोड़ते हुए बेस्ट सोशल मीडिया कम्पैन का अवार्ड लेती हैं तो डॉ स्वाति तिवारी भोपाल गैस त्रासदी पर लिखी किताब सवाल आज भी ज़िंदा हैं के लिए.  मिनती को Best news reporting - TWO GUTSY WOMEN BREAK GLASS CEILING के लिए। ऐसे ही अवॉर्ड्स  की श्रृंखला  में सम्मानित खुशबू के पाठकों के लिए लिखा जाने वाला यह कॉलम भी है। यह डेली न्यूज़ अखबार की पत्रिका में हर सप्ताह प्रकाशित होता है। खुशबू की पाती को बेस्ट कॉलम, प्रिंट का राष्ट्रीय लाडली मीडिया अवॉर्ड मिला है। यह खुशबू के पाठकों का सम्मान है।