Wednesday, November 26, 2014

पट्टी पढ़ते हुए

कवर स्टोरी के लिए बाबाओं की भूमिका और समाज के हालात को लेकर विचार-विमर्श चल ही रहा था कि शिक्षा मंत्री स्मृति ईरानी की एेसी तस्वीर सामने आ गई जिसमें वे ज्योतिषाचार्य से पूछ रही हैं कि उनका अपना भविष्य क्या है? बेशक ज्योतिष एक गणना है और कुछ लोग इस गणित को जानते हैं ।  मंगलगृह पर सफलतापूर्वक यान पहुंचाने वाले देश के कर्णधार अगर ग्रहों को यूं पढ़वाने में यकीन रखते हैं तो समझा जा सकता है कि क्यूं देश का बड़ा हिस्सा बाबाओं की चपेट में है।
                एक दूर के रिश्ते की बुजुर्ग हैं। एक समय में वे बड़ी-पापड़ बनाकर ठीक-ठाक व्यवसाय कर लेती थीं। पिछले बीस सालों से बाबाजी की संगत में हैं। कामकाज छोड़ दिया, वहीं सेवा करती हैं, सत्संग में आती-जाती हैं। उठते-बैठते उन्हीं का नाम लेती हैं और खुश हैं। हैरत की बात है कि बाबा ने उन्हें कौनसी युक्ति दी है कि वे सब कुछ भूलकर उन्हीं को जपती हैं और उनके दर्शन को शहर-शहर जाना नहीं छोड़ती। उद्यम अब उनसे होता नहीं लेकिन बाबा की आस्था उनसे सब कुछ करवा लेती है।
                    मिलन की मां उसके हकलेपन से बहुत चिंतित थी। उन्हें लगता था कि कैसे भी हो उनके बच्चे की जुबां साफ हो जाए। एक दिन एक झोलाधारी ने द्वार पर दस्तक दी। उसने यकीन दिलाया कि उसके पास ऐसी जड़ी-बूटियां हैं जो मिलन की हकलाहट को दूर कर सकती है। मिलन की मां के जेहन में ऐसे कई चमत्कारी किस्से दर्ज थे। वे कोई अपढ़ नहीं थीं, बारहवीं पास थीं। मन के भीतर से आती 'नाÓ को धकेलकर उन्होंने झोलाधारी बाबा को अहाते में बुला लिया। उसने हल्दी, हींग,तेल गरम पानी जैसी कुछ चीजें तो भीतर से मंगवाई और कुछ सूखी और टेढ़ी-मेढ़ी चीजों को पीसकर पाउडर बनाया। फिर कहने लगा इसमें एक जरूरी चीज पड़ती है जो बहुत महंगी है। मिलिंद की मां ने पूछा- वह क्या? सोने की भस्म। बाबा  ने मिलिंद की मां की आंखों में देखते हुए कहा- आठ सौ रुपए लगेंगे। एक घंटे से इस औषधि निर्माण प्रक्रिया में लगी मिलिंद की मां को अचानक सारी मेहनत व्यर्थ मालूम हुई। आठ सौ रुपए नहीं थे उनके पास। बाबा  ने पूछा कितना है घर में? थोड़ा मैं अपनी ओर से मिला दूंगा। तुम्हारा बच्चा बहुत प्यारा है। सौ-सौ रुपए के पांच नोट वह भीतर से ले आई। मां के भीतर एक भरी पूरी उम्मीद रोशन हो रही थी। सुबह-शाम दो बार पिलाने का नुस्खा  देकर बाबा गायब हो चुका था। दवा तो नियमित पिलाई, लेकिन मिलन का हकलापन किसी नियम सा ही जारी रहा। पांच सौ रुपए ठगाने की बात वह आज तक अपने पति को भी नहीं बता पाई हैं।
       ये ठगी बदस्तूर जारी है। आपके दुखों को हर लेने के लिए ये ठग हर रूप में, हर कहीं मौजूद हैं। आप यह समझ ही नहीं पाते कि आप गलत जगह दस्तक दे रहे हैं। आपके भीतर मौजूद भय, असुरक्षा और भविष्य की खुशियों के जवाब इनकी चाबी से नहीं खुलने वाले। ऐसा भ्रम ये जरूर देते हैं। पढ़ा-लिखा होना मायने नहीं रखता, मायने रखता है कि आप किस कदर डरे हुए हैं। तब  सलाह देने वाले आपको घेर ही लेंगे। दुख से घिरे इंसान को पहली सलाह दी जा जाती है कि सत्संग में जाया करो। दिल बहल जाएगा। अपने जैसे दुखियारों से मिलकर बेशक दर्द हल्का होता है लेकिन श्रेय ले जाते हैं ये बाबा। इनके सिंहासन भव्य और और भव्य होते जाते हैं। सोचना हमें है। हम कैसे अपनी खुशियों की चमक को इन भव्य सिंहासनों से जोड़ लेते हैं। इनके नहाए हुए दूध से बनी खीर को प्रसाद मानकर खाने वालों के लिए यह कह देने से कि आस्था अंधी है, बात पूरी नहीं होती। खुदी को बुलंद करना होगा। अपने भय के इलाज, टोटकों से निकालने होंगे। मुकद्दर की मरम्मत करनेवाले ये कोई नहीं होते।  कोई शनिवार लोहे के लिए बुरा नहीं होता।कोई बृहस्पतिवार  बालों की दशा नहीं बिगड़ता जो हम उस दिन बल नहीं धोते।   बुरे होते हैं हमारे शक , हमारे अंध विश्वास।  मंत्री महोदया को भी समझना होगा कि किस्मत तो उन की भी होती है जिनके हाथ नहीं होते। स्वच्छता अभियान के साथ देश से आस्था के इन ठेकेदारों की सफाई भी जरूरी है। ये यूं ही किसी को पट्टी नहीं पढ़ा सकते और जो पढ़ रहे हैं वे कमजोर और असुरक्षित हैं। हमारे देश की मंत्री भी।

Wednesday, November 19, 2014

नसबंदी नहीं नब्ज़बंदी

ये बेदान बाई  हैं  जिनकी बेटी की बिलासपुर के नसबंदी शिविर में नब्ज़ बंद हो गयी।  अब इस बच्ची की माँ जैसी देखभाल कौन करेगा। ।तस्वीर  AP

 बिलासपुर के नसबंदी शिविर में  पंद्रह युवा माओं की  जान चली गयी।  हादसे के  भी छत्तीसगढ़ सरकार की  नीयत तह तक पहुंचने की नहीं लगती, जांच की जिम्मेदारी एकल न्याय आयोग को दी गई है। न्यायाधीश अनीता झा सेवानिवृत्ति के बाद छत्तीसगढ़ वाणिज्यिक कर अभिकरण में अध्यक्ष पद के लिए पहले ही आवेदन कर चुकी हैं। जिस आदिवासी लड़की मीना खलखा को माओवादी बताकर पुलिस ने हत्या कर दी थी उस मामले की जांच भी इन्हं हीे सौंपी गई थी। रिपोर्ट तीन महीने में आनी थी आज तक नहीं आई।

पिछले साल भारत में चालीस लाख नसबंदी ऑपरेशन हुए और इन्हें कराने वाली 97 फीसदी महिलाएं थीं यानी केवल तीन फीसदी पुरुषों को अपने परिवार की चिंता थी। यह छोटा सा आंकड़ा भारत के उस पारिवारिक संस्कृति की पोल भी खोलता है कि यह अगर जीवित है तो उसका 97 प्रतिशत श्रेय स्त्री को ही जाता है। वही बच्चों का लालन-पालन भी करती है तो वही अपने शरीर में एेसी व्यवस्था भी कराती है कि पति को कोई कष्ट ना हो। वही अपनी सखी परिचित से सलाह-मश्विरा कर एेसे उपाय अपनाती है कि चल इस बार तो नसबंदी करा ही लेते हैं नहीं तो फिर एक बच्चा आ जाएगा। सब जानते हैं कि पुरुष नसबंदी अधिक आसान है
यहां बात टीवी विज्ञापन में दिखाए जाने वाले हंसते-मुस्कुराते अमीर परिवारों की नहीं हो रही है। ये बात उन महिलाओं की है जो बच्चा जनने के लिए भी सरकारी अस्पतालों पर आश्रित है तो बच्चों का आगमन रोकने के लिए भी ।  दोनों ही हालात में मौत की आशंका भी उसी से जुड़ी है। सरकारी अस्पताल साधन और सुविधा संपन्न  नहीं हैं, यही तथ्य है।
             जनसंख्या विस्फोट भारत की सबसे बड़ी समस्या है जो समूचे विकास को लील जाती है। सरकारों ने इस संकट को जाना है और विस्फोटक अंदाज में ही हल के प्रयास किए हैं। लक्ष्य है कि 2026 तक भारत में प्रति महिला बच्चा जनने की दर 2.1 हो जाए जबकि चीन ने तो वर्तमान दर ही 1.55 कर ली है। अभी  भारत में ये 2.55 है। बिलासपुर में उस दिन एक चिकित्सक ने पांच घंटों में 83 महिलाओं की नसबंदी की। जाहिर है डॉक्टर्स पर नसबंदियों का दबाव है लेकिन यह दबाव गरीब, असाक्षर और कुपोषित स्त्री पर ही चलता है। तस्वीर देखिए, छत्तीसगढ़ की स्त्रियों की। हरेक कम उम्र की कमजोर, युवा मां है।
चालीस लाख के आंकड़ों की भयावह सच्चाई है कि ये नसबंदियां बस कर दी जाती हैं। वैसे ही जैसे नगर निगम उन आवारा पशुओं की कर डालता है ताकि संख्या और ना बढ़े। हमारी सरकार और उनकी व्यवस्था भी स्त्री को इससे ज्यादा इज्जत नहीं बख्शती। ऐसा कहर तो आपातकाल में भी नहीं मचा था जब संजय गांधी ने जबरदस्ती नसबंदी अभियान चलाया था।
सरकारी चिकित्सा तंत्र ये मानते रहे हैं कि इन महिलाओं में कहां इतनी जागरुकता है जो वे कुछ महसूस कर सकें।  संक्रमण ना होने के किसी भी मानदंड पर ये तरीके खरे नहीं उतरते। ऑपरेशन कक्ष, औजार, मरीज के कपड़े सब संक्रमण के लिए खुले हैं। ऊपर से दवाईयां भी नकली। मौत का पूरा इंतजाम यहां होता है। जिंदा रहते भी हैं तो यह मरीज की अपनी प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्युनिटी है। शिविरों का सच इतना ही खौफनाक है। आंखों के शिविर मरीजों की रोशनी से खिलवाड़ कर जाते हैं लेकिन बिलासपुर ट्रेजेडी पंद्रह युवा मातााओं की जान से खेल गई है।
छत्तीसगढ़ सरकार की नीयत  तह तक पहुंचने की नहीं लगती, यह और चिंता की बात है। यह परिवार नियोजन कार्यक्रम के हित में भी नहीं होगा। क्या कोई सरकार इतनी पारदर्शी नहीं हो सकती कि कहे कि हम दोष और दोषी को सार्वजनिक करेंगे। शायद ऐसा करने पर सरकार स्वयं कटघरे में होगी। एक नहीं कई स्तरों पर तभी तो जांच की जिम्मेदारी एकल न्याय आयोग को दी गई है। न्यायाधीश अनीता झा सेवानिवृत्ति के बाद छत्तीसगढ़ वाणिज्यिक कर अभिकरण में अध्यक्ष पद के लिए पहले ही आवेदन कर चुकी हैं। जिस आदिवासी लड़की मीना खलखा को माओवादी बताकर पुलिस ने हत्या कर दी थी उस मामले की जांच भी इन्हं हीे सौंपी गई थी। रिपोर्ट तीन महीने में आनी थी आज तक नहीं आई। जब नतीजे ऐसे ही दरगुजर किए जाते रहेंगे तो मान के चलना चाहिए कि सरकारें स्त्री और उसकी सेहत दोनों के लिए संवेदनहीन है।