Thursday, September 18, 2014

कोई क्यों बहाए एशियाड के लिए पसीना

पिंकी प्रमाणिक याद हैं आपको? पश्चिम बंगाल की एथलीट पिंकी जिसने 2006 के दोहा एशियाड में 4 गुणा 100 रिले टीम में भारत को स्वर्ण पदक दिलाया था। अफसोस कि ये पिंकी अब इस नाते से अपनी पहचान नहीं रखती। वे उस आरोप से पहचानी जाती हैं जिसे उनकी साथी अनामिका आचार्य ने लगाया था। अनामिका ने कहा था कि पिंकी स्त्री नहीं पुरुष हैं और उन्होंने उसके साथ दुष्कर्म किया। जून 2012 में लगे आरोप के बाद पिंकी गिरफ्तार हो गईं। उन्हें लिंग परीक्षण के लिए एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल ले जाया जाता रहा। मर्द पुलिस कभी उनके कंधों पर हाथ धरती तो कभी उन्हें तंज के साथ छेड़ती। और तो और मेडिकल मुआयनों के दौरान उनका एमएमएस भी पुलिस ने लीक कर दिया। एक स्त्री के लिए यह बहुत ही भयावह अनुभव रहा होगा। बहरहाल  एक बहुत अच्छी खबर यह है कि बीते सप्ताह कोलकाता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश सुब्रत तालुकदार ने पिंकी को यह कहते हुए बाइज्जत बरी कर दिया है कि वे स्त्री हैं और दुष्कर्म के इलजाम का कोई आधार नहीं है।
       पिंकी को न्याय पाने में पूरे दो बरस लगे इस बीच यह एशियाई पदक विजेता एथलीट कई त्रासदियों से गुजरीं। जेल में उसे मर्दों की सेल में रखने की कोशिश हुई। जुलाई 2012 में लिखी इसी खुशबू की पाती में पिंकी के लिए बेहद अफसोस व्यक्त किया गया था। पाती में लिखा था कि जल्दी ही पुलिस और अस्पताल मिलकर परिणाम दे देंगे लेकिन यह इतना आसान नहीं था। एक लाइन की पुख्ता खबर किसी को नहीं हुई कि पिंकी का जेंडर क्या है। दो मिनट ठहरकर विचार कीजिए कि जिसने पूरी जिंदगी खुद को स्त्री माना हो और वैसी ही पहचान रखी हो उसे यकायक आप कैसे बदल सकते हैं। वह कैसे प्रस्तुत हो सकती है इस बदले हुए व्यवहार को झेलने के लिए। अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन के जर्नल में हाल ही प्रकाशित शोध में एक बात स्पष्ट है कि किसी का लिंग निर्धारित करना आसान नहीं है। यह मुश्किल है, महंगा है और कई बार सही भी नहीं होता है। हार्मोन और शरीर के अंगों का विकास स्त्री-पुरुष में बहुत ज्यादा अंतर नहीं रखता। दोनों के शरीर में यह मामूली अंतर पर भी हो सकता है यानी एक स्त्री में कई बार मेल हार्मोन ज्यादा हो सकते हैं और कई बार एक पुरुष में फीमेल हार्मोन।
        सवाल यह उठता है कि अब क्या उस महिला पर कार्रवाई होगी जिसने पिंकी पर ये इलजाम लगाए। अनामिका पिंकी की पड़ोसन थी जो अपने पति से अनबन के बाद एक बच्चे को लेकर पिंकी के घर रहने आ गई थी। कुछ दिन सब ठीक चला फिर पिंकी के उसे घर छोड़कर जाने के लिए  कहते ही बात बिगड़ गई। अनामिका ने इलजाम लगाया कि पिंकी पुरुष हैं जिसने उनके साथ दुष्कर्म किया और एशियाड में जीता स्वर्ण पदक भी झूठा है। क्या इस झूठे इलजाम के बाद अनामिका पर कार्रवाई होगी? क्या दुष्कर्म का इलजाम एक गैर-जमानती और गंभीर सजा वाला आरोप है इसलिए यह एक हथियार की तरह इस्तेमाल होता है, खासकर तब जब रिश्ते में अनबन हो गई हो। बेशक, यह सब गहरी तफ्तीश से जुडे़ मसले हैं, जिनमें कई बार काफी वक्त लग जाता है। इस दौरान यह खयाल जरूर आना चाहिए कि बंदा निर्दोष तो बाद में सिद्ध होता है लेकिन उसके दोषी होने की झूठी कहानियां पहले ही स्थापित हो जाती हैं। पिंकी की बहादुरी को सलाम है कि उन्होंने भारतीय कानून में आस्था रखते हुए अपना पक्ष रखा। पिंकी कहती हैं मुझे पूरा भरोसा था कि सच की जीत होगी। बेशक,  पिंकी जीत गई लेकिन भीतर कुछ हारा हुआ-सा, कुछ दरका हुआ-सा महसूस होता है कि हम अपने विजेताओं के साथ कैसा सुलूक करते हैं? 
        आज जिस एशियाड में पदक के लिए सानिया मिर्जा अपनी रैंकिंग से समझौता करने के लिए तैयार हैं उसकी हमने क्या कद्र की? उन्होंने वल्र्ड रैकिंग के अपने नौ सो अंक कुरबान कर एशियाड को तवज्जो दी ताकि देश के खाते में मेडल जोड़ सकें। उसी एशियाड में स्वर्ण पदक विजेता पिंकी प्रमाणिक को हमने किस कदर अपमानित और शर्मिंदा किया। बावजूद ये खिलाड़ी केवल और केवल तिरंगे के लिए अपना खून-पसीना एक करते हैं। एक ही लक्ष्य होता है इनका देश के लिए पदक जीतना। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि इन्हें अपमानित करने से पहले जांच पक्की और पूरी हो।



Wednesday, September 10, 2014

हिंदी मेरी जान मेरी कोम मेरा मान


हिंदी दिवस पर काम करते हुए मेरी कॉम देख ली जाये तो फिर जो लिखा जाता है वही आपकी नज़र 


जहां उत्तर पूर्व की बॉक्सर मेरी कोम पर हिंदी में फिल्म बनकर पूरे देश में उन्हें सम्मान दिला सकती है, जहां प्रधानमंत्री बच्चों की पाठशाला में अंग्रेजी सवालों का जवाब भी हिंदी में देते हों, जहां के दिग्गज खिलाड़ी  (सुनील गावस्कर, राहुल द्रविड़, सौरव गांगुली) जो केवल अंग्रेजी में ही शब्दों की जुगाली किया करते थे, वे भी अब हिंदी में धड़ाधड़ क्रिकेट टिप्पणियां कर रहे हों, वहां हिंदी को लेकर चिंता की क्या बात हो सकती है? हर तरफ हिंदी का ही जलवा तो है। और तो और, पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान से भी खिलाड़ी खूब हिंदी बोलते नजर आ रहे हैं। वसीम अकरम, शोएब अख्तर, रमीज राजा सब हिंदी के ही रथ पर सवार हैं। विज्ञापन दुनिया के बड़े-बड़े कॉपी राइटर इन दिनों हिंदी में पंच लाइन ढूंढते फिर रहे हैं।
           पंच की बात चली है तो फिल्म मेरी कोम के जरिए एेसा कथा सत्य बाहर आया है कि हम सब उन्हें और भी जानने के लिए उत्सुक हो गए हैं, जिनके शब्दकोष में डर नाम का शब्द ही नहीं। अपनी ख्वाहिश के लिए जो पूरे समय पूरी बहादुरी के साथ खड़ी हैं । अभाव और आर्थिक बदहाली के बावजूद आंखों में लक्ष्य बसा है, वही लक्ष्य जिसने पूरी दुनिया में भारत का नाम रोशन किया है।
पांच बार की वर्ल्ड  चैंपियन मेरी  कोम मणिपुर से आती हैं। उत्तर-पूर्व के सात राज्यों में से एक मणिपुर। उग्रवाद के चलते विकास की राह में अब भी पिछड़ा हुआ। इरोम शर्मिला इसी संघर्ष को खत्म करने के लिए चौदह सालों से अन्न-जल त्यागे बैठी हैं। इरोम का संघर्ष मणिपुर के उन हालात को बदलने का संघर्ष है, जिसका मेरी कोम जैसे लोग शिकार हो जाते हैं। मेरी के ससुर की हत्या इसी उग्रवाद से हुई है।
         मेरी कोम की कहानी उनके पति ओनलर के बिना अधूरी है। ओनलर का एेसा त्याग और समर्पण रहा है, जो आमतौर पर अपने पति के लिए भारतीय स्त्री का होता है। वे ऊंचाई पर कॅरिअर छोड़ देती हैं अपने पति और बच्चों के लिए। यहां इस भूमिका में मेरी कोम के पति हैं। एेसा करने का हौसला सिर्फ प्यार ही देता है तभी तो ओनलर कहते हैं, मेरी को केवल मैं ही संभाल सकता था इसलिए मैंने उसके साथ शादी की। ओनलर एक मां की तरह बच्चे संभालते हैं, जब मेरी विश्व बॉक्सिंग चैम्पियनशिप में हिस्सा लेती हैं। वह फुटबॉल छोड़ देते हैं ताकि मैरी बॉक्सिंग जारी रख सकें, फिल्म का एक संवाद बहुत अच्छा है, जब कोच कहते हैं मां बनने के बाद स्त्री की ताकत दोगुनी हो जाती है, तुम्हें चैंपियन बनने से कोई नहीं रोक सकता। 
फिल्म अच्छी है क्योंकि हरे खेत हैं,  मणिपुरी हिंदी जैसी ज़ुबां है, तेरी मैं बालाएं लूं.. जैसी मीठी लोरी है , परिदृश्य में अस्थिर मणिपुर है।मैरी की सफलता एक बार दुनिया की चैंपियन बनने में नहीं है, बल्कि वे पांच बार विजेता रही हैं। 2012 के ओलंपिक में भले ही कांस्य मिला हो, लेकिन 2016 के लिए गोल्ड जीतने का माद्दा रखती हैं।
         दरअसल, मैरी की कहानी उन महिलाओं के लिए बहुत अच्छा उत्तर है, जो मान बैठती हैं  कि शादी और बच्चों ने उनका कॅरिअर खत्म कर दिया है। खत्म कुछ भी नहीं होता, यदि आपमें साहस बचा है। यह बहुत थोड़े समय का ही अवकाश होता है जो आपकी दृढ़ इच्छाशक्ति के कारण बाधा नहीं बनता। काम के प्रति लगन आपको फिर स्थापित कर सकती है। इस बीच एेसा कई बार लग सकता है कि मेरी प्रतिभा, मेरा काम अब बीते समय की बात हो गई, लेकिन एेसा होता नहीं है। हुनर हर हाल में मंजिल तलाश लेता है।
                     फिल्म भले ही मेरी कोम के विश्व चैंपियनशिप जीतने के साथ खत्म हो जाती है, लेकिन 31 साल की मैरी इन दिनों मणिपुर में बॉक्सिंग अकादमी चला रही हैं। इसमें कोई  भी दाखिला ले सकता है, बशर्ते उसमें बॉक्सिंग सीखने का जुनून हो। पैसे की कमी यहां रोड़ा नहीं बनती, जबकि मेरी ने बहुत अभाव में  बॉक्सिंग की शुरुआत की थी। मैरी वो स्त्री है, जो  आंखों में ख्वाब लिए चलती है, बिना रुके, डरे बस चलती ही जाती हैं। दरअसल, यही आज के समय की भी मांग है। थोपे हुए फैसले मत लो। अपने मन को मान देना सीखो। जो फैसले आपके चेहरे पर मुस्कुराहट लाएंं, उनके लिए कभी अपराधबोध मत पालो। दरअसल, मेरी कोम जैसी स्त्रियां पूरी स्त्री कौम के लिए प्रेरणा का समंदर रचती हैं। फिल्म के अंत में जब राष्ट्रगान बजता है तो दर्शक स्वत:स्फूर्त खड़े हो जाते हैं, यह राष्ट्र गौरव से मेरी के जुड़ जाने का नतीजा है। हिंदी भी हमारा राष्ट्र गौरव है, इसे जानने के लिए खूब फ़क्र  कीजिए, अंग्रेजी न जानने की फिक्र मत कीजिए, वह हमारी नहीं है।

Friday, September 5, 2014

आधे घंटे का आसमां

ये आधे घंटे का आसमां 
कोई जादुई करिश्मा-सा था 
एक ऐसा रंगमंच 
जहाँ ज़िन्दगी खेली जा रही थी।  

साँझ के इस अनुपम टुकड़े से 
आँखें तब तक जुडी रहीं 
जब तक वहां रौशनी मौजूद रही 
आखिरी कतरे तक 
काले बादलों के बीच 

कभी के अस्त हो चुके सूरज से 
सुनहरी रेखाएं
चमकीले बिंदु 
एक विराट खेल 
रच रहे थे 
ऐसा खेल जो कह रहा था
रोशन दिल ही शिनाख्त है 
ज़िन्दगी की।  

ज्यों ही आसमां गहराया 
रेखाओं  और बिन्दुओं  की 
लय-ताल टूटी 
निगाह भी छूटी 
हाँ केवल और केवल 
रौशनी ही शिनाख़्त  है ज़िन्दगी की 


आज के दिन यही पाठ  पढ़ाया कुदरत ने