Wednesday, August 27, 2014

लव जी हद

लव जी हद, सिंधी भाषा में  इसके मायने हुए प्रेम की हद तय करना और कुछ लोग इस काम में इन दिनों बढ़ -चढ़कर लगे हुए हैं। सोमवार की शाम  times now के एंकर अर्णव गोस्वामी ने एक बहस में भाजपा प्रवक्ता से तीन बार पूछा कि 'लव जिहाद'  क्या है फैक्ट या फिक्शन तो उन्होंने तीनों बार बहुत कुछ कहा लेकिन एक बार भी स्पष्ट जवाब नहीं दिया



'लव जिहाद' और 'प्रेम युद्ध' इन दो शब्द युग्मों से इन दिनों  खूब पाला पड़ रहा है। प्रेम, मोहब्बत, लव ये अपने आप में मुकम्मल शब्द हैं इनके साथ जब कुछ और जुड़ता है तो तय मानिए मामला संदिग्ध है। इरफाना पढ़ी-लिखी समझदार लड़की है। लिखने का शौक उन्हें अखबार के कार्यालय तक ले गया। वहीं बेहद काबिल लेखक वसंत से उनकी मुलाकात हुई। मुलाकातें  क्या होती दुनिया के तमाम मुद्दों पर दो व्यक्ति विचारों की एेसी रेल बनाते कि वक्त का पता ही नहींं चलता। दोनों को लगा कि हम साथ रहने के लिए ही बने हैं। वसंत ने कहा न तुम्हें अपना धर्म बदलने की जरूरत है, न मुझे। क्या हम शादी कर सकते हैं? लड़की बोली ये तो मुश्किल है। काज़ी दो मुसलमान का निकाह कराते हैं और पंडित दो हिंदुओं की शादी। हमारी शादी कैसे हो सकती है? वसंत ने लड़की की आंखों झांकते हुए कहा कि भारतीय संविधान हमें यह हक देता है। अगर बालिग हैं तो विशेष विवाह अधिनियम के तहत दो अलग-अलग धर्मों या विश्वास को मानने वाले शादी कर सकते हैं। इरफाना की गहरी आंखों में अब चमक थी, दोनों की शादी हो गई।
फर्ज कीजिए, अब इसी कहानी में इरफाना का परिवार और समाज एक हो जाता है और इरफाना की इस शादी को मंजूरी न देकर लड़के पर तमाम इलजाम लगाकर उसे धोखेबाज बताता है और मानने लगता है कि यह समाज विशेष दूसरे समाज की लड़कियों को धोखे से बहका रहा है और हमें लड़कियों को इससे बचाना है तब? वह इस निहायत निजी मसले को बेहद व्यापक बनाकर प्रेम युद्ध का नाम दे देता तो ? खुशकिस्मती से एेसा कुछ नहीं हुआ।
एक और कहानी सुनिए। कविता एक निजी स्कूल में पढ़ाती हैं। उसी स्कूल के दफ्तर में इम्तियाज भी कार्यरत हैं । कविता की एक बार स्कूटी पंक्चर हो गई। इम्तियाज ने मदद के लिए हाथ बढ़ाया। गर्मियों में कविता स्कूल में ही बेहोश हो गई। साथी शिक्षिका के साथ इम्तियाज अस्पताल तक उसे लेकर गया। एेसी कुछ घटनाओं से कविता के दिल में इम्तियाज की खास जगह बन गई थी। इम्तियाज को शायद कविता पहले से ही पसंद थी। एक दिन इम्तियाज ने शादी का प्रस्ताव यह कहते हुए रखा कि क्या तुम्हारा परिवार हमारी शादी को मंजूरी देगा। कविता ने शादी का प्रस्ताव सुनकर इम्तियाज से मिलना-जुलना बंद कर दिया। स्कूल में वह उसकी तरफ देखती भी नहीं, लेकिन इन दूरियों से प्रेम कब मिटा है? कविता ने कहा कि मेरे घरवाले कभी इस शादी के लिए रजामंद नहीं होंगे। मैं शादी करना चाहती हूं लेकिन...। इस लेकिन को दोनों की आंखों से निकले आंसुओं ने बहा दिया। कविता ने इम्तियाज से निकाह कर लिया था। यह लव मैरिज थी इन दोनों के लिए, लेकिन कविता की बिरादरी की ओर से लव जिहाद बनकर निकली। उन्हें इम्तियाज में एक एेसा अपराधी नजर आया, जो चुन-चुनकर लड़कियों को कबूतर की तरह दाना डालता है और उनका धर्म-परिवर्तन कराता है। स्कूल पर भी एेसा दबाव बना कि उन्होंने इम्तियाज को नौकरी से निकाल दिया। दोनों के बीच बेहद प्रेम था, लेकिन हकीकत के हथौड़ों से पहले दरकने और फिर टूटने लगा। कविता के परिवार को पहले एक दल का और फिर एक पार्टी का समर्थन मिल गया। लव जिहाद का नारा चल पड़ा और कुछ बेहद निजी कहानियों ने बड़ा रूप ले लिया। यहां तक कहा गया कि इनके मदरसों में इन्हें यही शिक्षा दी जाती है कि दूसरी लड़कियों का धर्म परिवर्तन कराओ।
काश, इस कहानी में किसी एेसे सांस्कृतिक संगठन की भूमिका सामने आती जो यह यह आश्वस्त करता कि इस तरह के ध्रुवीकरण से कुछ हासिल नहीं होने वाला नहींं है। 'लव जेहाद' और 'प्रेम युद्ध' के समर्थकों के आगे सच्चाई बयां करता कि धर्म छोड़िए अलग जाति  अलग समाज में शादी करने वाले ही मौत की नींद सुला दिए जाते हैं। आज पूरे देश की पुलिस के आगे सबसे बड़ी चुनौती इसी तरह की शादियां हैं।
        और ये कौन लोग हैं शिक्षा के मुकद्दस मंदिरों और मदरसों के बारे में यह कह रहे हैं कि वहीँ इस  लव जिहाद की शिक्षा दी जाती है। ये आवाजें उत्तर की ओर से क्यों आ रही हैं जहां चुनाव होने हैं। यहां विकास किसी ओर रंग के चोले में क्यों दिख रहा है। पंडित मुकेश भारद्वाज एेसे शख्स हैं, जिन्होंने कुछ बरसों तक अपने मित्रों के आग्रह पर सीकर में मदरसों की  जिम्मेदारी संभाली है। उनसे सहज सवाल था कि आप क्या मदरसों में बच्चों को एेसी शिक्षा देते हैं। चालीस सेकेंड का वह पॉज हैरानी भरा था और फिर जवाब था, बिल्कुल नहीं। तालीम के इन केंद्रों में जब अबोध बच्चे आपके सामने बैठे होते हैं तो शिक्षक बहुत बड़ी जिम्मेदारी महसूस करता है। मैं तो उस भरोसे को याद करता हूं जो मेरे मुस्लिम मित्रों ने मुझ पर किया। इल्जाम तो कोई भी लगा सकता है कि क्या शिक्षा के उन शिशु मंदिरों में यह शिक्षा दी जाती है कि वे लोग बुरे हैं, मारकाट मचाते हैं, उनका साथ मत दो तो क्या हम मान लेंगे?

Thursday, August 21, 2014

केवल पूछने से काम नहीं चलेगा


बेशक, लाल किले की प्राचीर से दिया गया वह भाषण बिना पढ़े, बिना अटके, बिना बुलेट प्रुफ के धाराप्रवाह दिया गया था। बंधेज का लाल-हरा साफा इस भाषण को अतिरिक्त गरिमा प्रदान कर रहा था। जोधपुर के त्रिपोलिया बाजार से ऐसे छह साफे मंगवाए गए थे जिनमें से एक को चुना गया। साथ ही एक कलाकार भी दिल्ली भेजा गया जो साफा बांधने की कला में माहिर था। साफे से जहां राजस्थान का गौरव जगजाहिर था, वहीं राजस्थान का प्रतिनिधित्व सरकार में ना के बराबर होना भी एक बड़ा सवाल। खैर, प्रधानमंत्री के इस भाषण को स्तंभकार 
शोभा डे ने सिंघम की दहाड़ का नाम दिया, जिसमें सब कुछ हिन्दी फिल्मों की तरह लाउड-सा था। संवाद, एक्शन, प्रेम सभी कुछ जरूरत से ज्यादा। किसी ने कहा लगातार बढ़ते दुष्कर्मों के सन्दर्भ में यह राजनैतिक प्रतिबद्धता  का मामला न होकर  सोशल इंजीनियरिंग का पार्ट था, जिसमें प्रधानमंत्री समाज के बदलने की बात कर रहे थे, जबकि अपने चुनावी भाषणों में उन्होंने देश के तमाम हालात के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराया था। उन्होंने दावा किया था कि एक सशक्त सरकार और व्यक्ति के आते ही सबकुछ बदल जाएगा।
प्रधान सेवक (उन्होंने खुद को यही नाम दिया है) ने कहा कि अभिभावक बेटों से भी यह सवाल करें, कि वह कहां था, किसके साथ था, क्यों गया था? जो दुष्कर्म करते है, वे भी तो किसी न किसी के बेटे है। सच है लड़कों पर सख्ती होनी चाहिए। लेकिन क्या समस्या इतने भर से हल हो सकती है। बरसों-बरस तक इस देश में निम्न जातियों का शोषण होता रहा लेकिन क्या महज सामाजिक संदेशों से इन जातियों का उत्थान संभव था। गांधीजी के अथक प्रयास जरूर नई चेतना का संचार कर रहे थे लेकिन बराबरी के मौके ना दिए बिना हालात उतने नहीं बदले जा सकते थे, जितने आज बदले 
हैं । जहां तक दुष्कर्म की बात है, जब तक कानून सख्त कार्रवाई  की वकालत नहीं करेगा ये गुनाह बढ़ते रहेंगे। इतवार को ही उत्तरप्रदेश के फैजाबाद में फिर एक लड़की को दुष्कर्म के बाद सड़क पर फेंक दिया गया। दिल्ली की निर्भया, लखनऊ   की   कृष्णा के बाद ,एक और जघन्य हादसा। 

 स्त्री सिर्फ इस्तेमाल की जाने वाली वस्तु है, यह सोच केवल इतने से नहीं बदलेगी कि मां  अपने बेटे से पूछ ले कि तू कहां था? यह एक कारण हो सकता है, एकमात्र नहीं।
दुष्कर्म, हत्या, भ्रूण हत्या, दहेज हत्या जैसी समस्याओं के लिए क्या किसी सख्त कानून की जरूरत नहीं है? समाज तो अपने हिसाब से चलता है। राजे-रजवाड़ों के दौर में भी चलता था, लेकिन प्रजातंत्र का कर्त्तव्य 
 है कि कायदे से नहीं चलने वाले को दण्डित किया जाए। जिस देश में हर चौबीस घंटे में 93 दुष्कर्म होते हों , वहां केवल सोशल इंजीनियरिंग से काम नहीं चलेगा। एक सख्त संदेश भी जाना चाहिए कि यह 'गुड गवर्नेंस' अपराधियों को बिल्कुल बरदाश्त नहीं करेगी। वादे के साथ इरादा भी हो। 
भ्रू हत्या की बात भी प्रधानमंत्री ने कही। उन्होंने कहा हमारा माथा शर्म से झुक जाता है, जब समाज में ऐसी घटनाएं होती हैं। सच है जब लड़कियों को इज्जत नहीं मिलेगी, कभी दुष्कर्म, कभी दहेज के नाम पर उनकी मौत होती रहेगी तो कौन माता-पिता लड़कियां पैदा करने का साहस करेंगे। प्रति हजार पुरुषों पर 940 स्त्रियों का होना केवल भ्रूण हत्या का नतीजा नहीं है, बल्कि हत्या, दुष्कर्म के बाद हत्या, आत्महत्या और खराब स्वास्थ्य सेवाओं से भी जुड़ा है। ग्रामीण इलाकों में प्रसव मृत्यु दर आज भी सर्वाधिक है। स्त्री वंश चलाने का जरिया भर है। उसका स्वास्थ्य अब भी दोयम  है।
एक महिला के जीवन में बहुत संघर्ष बिंधा है। अगर राष्ट्रमंडलीय खेलों के 64 में से 29 पदक उनके खाते में हैं तो ये उनके अतिरिक्त प्रयास हैं , उसे हर तरह से कानूनन संरक्षण मिलना चाहिए तभी वह दुनिया में भारत का परचम लहरा सकेगी। कब तक वह ऐसी अमानवीय परिस्थितियों से जूझती रहेगी जिसे विकसित दुनिया कब का छोड़ आगे बढ़ गई है। सख्त राजनैतिक प्रतिबद्धता का जिक्र जरूर प्रधान सेवक के मुख से होना चाहिए था, आखिर वे राष्ट्राध्यक्ष हैं।

Wednesday, August 13, 2014

क्यों दें मेहनत की कमाई इस निकम्मे सिस्टम को

पंद्रह अगस्त को हमारे आजाद देश के  67 साल पूरे होने वाले हैं। हम सब इस आजादी का खूब एहतराम करते हैं, अपने पुरखों के त्याग को याद करते हैं, अपने शहीदों के आगे सिर झुकाते हैं, लेकिन एक सवाल अकसर जेहन में उठता है कि क्या ऐसे ही भारत के लिए जिंदा लोगों ने अपना सब-कुछ कुर्बान किया था? क्या हम सही दिशा में हैं? जवाब तो नहीं आता, लेकिन एक छटपटाहट सामने आती है। यह अंतहीन बेचैनी कभी-कभी गुस्से और दुख को ऐसा पसरा देती है कि लगता है कि ये वो सुबह तो नहीं। मेरे शहर जयपुर  में बीते एक पखवाड़े की तीन घटनाएं आपकी नजर-
                गांधी नगर स्थित पोस्ट ऑफिस में शुक्रवार सुबह साढ़े ग्यारह का वक्त। 'भाई साहब राखी पोस्ट करनी हैं, अजमेर। पहुंच तो जाएगी ना दो दिन में!' मेरा सहज सवाल था। 'सोमवार को पहुंचेगी।'डाक बाबू ने असहज-सा उत्तर दिया 'लेकिन विभाग तो दावा करता है कि स्पीड पोस्ट चौबीस घंटे में पहुंचाता है, फिर यह तो एक ही स्टेट का मामला है।' मैंने कहा। 'आप तो कुरिअर कर दो मैडम वो ही अच्छा  है।'डाककर्मी ने लिफाफा लौटाते हुए कहा। वाकई प्राइवेट कुरिअर से राखी अगले ही दिन अजमेर पहुंच गई।
          दूसरी घटना जेडीए सर्कल से ताल्लुक रखती है। सुबह का वक्त। गांधी सर्कल से आती हुई गाडिय़ों में से आखिरी गाड़ी को ट्रैफिकमैन प्रताप सिंह ने रोक दिया। सिग्नल देखा, जो पीले से लाल हो चुका था। माफी चाहती हूं मैं गलती पर हूं। इस माफी का प्रताप सिंह जी पर कोई असर नहीं पड़ा। वे इतनी बद्तहजीबी से पेश आए जिसकी आम महिला कल्पना भी नहीं कर सकती। चाबी लेकर लाइसेंस मांगकर वे कुछ लिखने लगे। कहा सौ रुपए दो। रूपए लेकर अचानक कहा, जाओ-जाओ, रसीद बाद में आपको मिल जाएगी। उल्टे बीस रुपए मुझे अपनी जेब से भरने पड़ेंगे। दंड भरना उचित था लेकिन वह व्यवहार अनुचित। बाद में  रसीद भी नहीं मिली।
          

               करीब पंद्रह दिन पहले भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) की साइट पर एक रिक्वेस्ट डाली। इंटरनेट के लिए। तमाम ब्योरे के साथ। तीसरे दिन एक मैसेज आता है कि अतुल माथुर आपकी रिक्वेस्ट को पूरा करेंगे। अतुल फोन पर कहते हैं, ये बताइए कि आपके क्षेत्र में बीएसएनएल का लैंड लाइन कनेक्शन है। यदि नहीं तो  कनेक्शन नहीं मिल सकता। 'कोई दूसरा विकल्प' -मैंने पूछा। 'नहीं और कोई नहीं' उनका टका-सा जवाब था।  तीन-चार बार  फोन करने के बावजूद कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला । इससे  ठीक विपरीत एक प्राइवेट कंपनी ने 24 घंटे में इंटरनेट सेवाएं उपलब्ध करवा दी।
               

             बेशक ये बहुत छोटी बातें नज़र आती हैं लेकिन यहीं से सरकार चलानेवालों की मंशा भी नज़र आती है। कहाँ बदलते हैं मेरे जैसे आम भारतीय के दिन ? सरकारें तो कई आईं लेकिन हमारे दिन नहीं आते। 
आपको हैरानी नहीं होती,  गुस्सा भी नहीं आता, आप आदी  हैं, अपने ही देश की अपनी ही सरकारी मशीनरी को इस तरह काम करता हुआ देखकर। ऐसे तीन नहीं सैकड़ों उदाहरण हैं। ये मशीनरी क्यों नहीं है आम आदमी के साथ? ढाई साल पहले राशनकार्ड के आवेदन लिए गए थे, आज तक बनकर नहीं आए हैं। जब ये सरकारी तंत्र हमारे किसी काम का ही नहीं, तो क्यों हम इनसे लाइसेंस, मूल निवास प्रमाण पत्र, राशन कार्ड या कोई भी सरकारी दस्तावेज बनवाएं? जब सरकार से बेहतर विकल्प जनता के सामने खुद सरकार ही मुहैया कराए है तो ये क्यों नाम मात्र को चल रहे हैं? जनता की मेहनत की कमाई क्यों इस निकम्मे सिस्टम पर खर्च होती है। क्यों कोई उस यातायात व्यवस्था पर भरोसा करे, जहां अपराधी जान और वाहन को क्षति पहुंचाकर बेखौफ बच निकलता है और बेगुनाह चपेट में आ जाता है। तंत्र तभी सार्थक लगते हैं, जब दंडित गुनहगार हो।

Wednesday, August 6, 2014

नग्नता अपराध नहीं


       क्या  एक निर्वस्त्र तस्वीर इस कदर विवादित और तकलीफदेह हो सकती है? नागपुर की एक अदालत में आमिर के पोस्टर के खिलाफ याचिका दायर हो गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि पोस्टर अश्लील है और यौन हिंसा को बढ़ावा देता है। एक बिना कपड़ों की देह पर €क्या  शोर मचाना। देह नहीं उसका रवैया, आंखें, बॉडी लैंग्वेज तय करती हैं अपराध की तीव्रता। लखनऊ के मोहनलाल गंज क्षेत्र में सामूहिक दुष्कर्म की शिकार दो बच्चों की मां कृष्णा की नग्न देह में भला क्या  अपराध छिपा हो सकता है? वह तो फेंक दी गई थी, दुष्कर्म के बाद। अपराध का भाव जिनके भीतर था उन्होंने एक कपड़ा भी नहीं डाला उस देह पर।

      आमिर खान की फिल्म  पीके के पोस्टर के बहाने हमारी उस मानसिकता की पोल खुल गई है, जो नग्नता को देखकर हायतौबा मचाने लगती है। अपराध वो है, जब एक स्त्री को निर्वस्त्र कर गांव में घुमाया जाता है, एक खौफ पैदा किया जाता है कि संभल जाओ अगर जो मर्यादा लांघी, हम तु्हारा भी यही हश्र करेंगे। हम उघाड़ेपन को लेकर बेहद अजीब समाज हैं। छोटे कपड़े पहने विदेशी सैलानियों का हम सड़क पर चलना मुश्किल कर देते हैं। अपराधबोध इतना ज़्यादा है कि कोई लड़की सड़क पर स्कूटर से गिर भी जाती है तो वह अपना पहला ध्यान कपड़ों पर देती है, बजाय इसके कि उसे कितनी गंभीर चोट आई है। मुंबई के  महाविद्यालय में विद्यार्धियों के लिए न्यूड मॉडल (http://likhdala.blogspot.in/2010/03/nude-pose.html)  बनी एक माँ को अपना प्रोफेशन  छुपाना पड़ता है ताकि मोहल्ले के लोग उसे अपमानित न करें। मोहनलाल गंज की कृष्णा की नग्न देह सबको दिखी, उस पर हुआ भीषण अपराध नहीं जो आज भी अपने गुनहगारों को तलाश रहा है । अपराध की ऐसी क्रूरता देख हमारी रूह नहीं कांपती, लेकिन बिना कपड़ों के देख कांप जाती है। 

           खूब तकलीफ हुई है पुरुषों को उस पोस्टर से। फेसबुक, वाट्सएप प्रतिक्रियाओं से भरे पड़े हैं। किसी ने उन्हें नग्नमेव जयते लिखा तो किसी ने कहा कि लड़कियों को चाहिए कि हेल्पलाइन में फोन कर शिकायत दर्ज कराएं। इससे अपराध में इजाफा होगा। सच कहा जाए तो अपराध इससे नहीं बढ़ेंगे, अपराध बढ़ेंगे इस देहयष्टि के अनैतिक, अमर्यादित आचरण से। आदिवासी क्षेत्रो में महिलाएं केवल एक वस्त्र ही अपने इर्द-गिर्द लपेटती हैं और पुरुष एक छोटी लंगोट धारण करते रहे हैं। वहां से तो कोई यौन हमलों की खबरें नहीं आती, बल्कि हम जरूर मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ के
आदिवासी क्षेत्रों में पहुंचकर झेंपने लगते हैं। यह हमारे भीतर का अपराध बोध है, जिसे हमने नकाबों से ढंक रखा है। यह नकाब की ग्रंथि कई बड़े अपराधों को जन्म दे रही है।
         

          एक कलाकार की पेंटिंग में भी हमें यही सब दिखाई देता है। न्यूड देखते ही हम भड़क उठते हैं। भारत के तमाम शहरों में बसे हम उनके गुफानुमा कला केंद्रों को जला डालते हैं, तहस-नहस कर देते हैं। उन पर मुकदमों का ऐसा वार करते हैं कि उन्हें किसी पराए देश में शरण लेनी पड़ती है और वहीं उनकी मौत हो जाती है। जिस कलाकार के चित्रों में भारत की मिट्टी और संस्कार रोशन होते थे हम उसे अंतिम व€त में देश की मिट्टी भी नसीब नहीं होने देते। उन्माद और पूर्वाग्रह अनैतिक करने से नहीं रोक पते। यह मानसिकता हमसे ऐसी ही भूल कराती है। इसका अंदाजा भी मुकदमेबाजों को नहीं होता कि वे देश के संघीय ढांचे को किस कदर नुकसान पहुंचा रहे हैं। यह कलाकार मकबूल फिदा हुसैन थे, जो सारी उम्र बिना किसी पद के भारत के ब्रांड एंबेसडर बने रहे, लेकिन जीवन के अंतिम बरसों में उन्हें देश छोडऩा पड़ा। किन्हीं रेखाओं, किन्हीं शब्दों , किन्हीं तस्वीरों पर ऐसी उत्तेजना , आक्रोश और आक्रामकता की दरकार नहीं है, दरकार वहां है, जहां आचरण ऐसा है। तस्लीमा नसरीन अपने देश से निष्कासित हैं। उनके लिखे पर बांग्लादेश के कट्टरपंथियों को एतराज है। उन्होंने उनके खिलाफ फतवा जारी कर रखा है। वे बरसों से भारत में शरण लिए हुए हैं। हाल ही उन्होंने भारत सरकार से गुहार की है कि उन्हें यहीं रहने दिया जाए। सलमान रश्दी भी दो साल पहले जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में शामिल नहीं हो सके थे, €क्योंकि कट्टरपंथी यहां भी हैं।अभिव्यक्ति के रास्ते तंग गलियों से होकर  नहीं गुजरने चाहिए।