Thursday, July 31, 2014

बिना विचारे लक्ष्मण


फिजा में भीनी महक है। त्योहारों की मिठास और जीवन का उल्लास घुला हुआ है। मनभावन सावन में तरुणी का सिंजारा आ चुका  है। लहरिये का रंग खूब सुन्दर है कावडि़यों के जयकारों की भी गूंज   है। ईद की सिवइयों का जायका भी होठों पर है, जो पूरे तीस दिन के रोजे और इबादत के बाद नसीब हुआ है। बारिश की बूंदों ने हर शै को बरकत भर दी है। ये बूंदे हैं ही इतनी पवित्र कि रूखे मन और सूखे ठूंठ में भी प्राण फूंकने का माद्दा रखती है। एेसे माहौल में कोई बेतुकी बात नहीं होनी चाहिए खासकर इन मीडिया चैनलों की तरह तो बिल्कुल नहीं जो केवल चीखने-चिल्लाने को बहस का नाम दे बैठे हैं। बहस में हर पक्ष को सुना जाता है । धैर्य और समन्वय का परिचय देते हुए सुंदर नतीजे पर पहुंचा जा सकता है, लेकिन शायद सुंदर नतीजों को टीआरपी नहीं मिलती तभी जी टीवी पर एक वक्ता दूसरे को   'टुच्चा' संबोधित कर रहे थे। वे कह रहे थे आप टुच्चे हैं। चले जाइए इस देश से। ये एंकर महाशय जो अर्णव गोस्वामी की हिंदी नकल हैं, उन्होंने पहले तो पूरा वार्तालाप हो जाने दिया फिर कह दिया कि चैनल इस तरह की शब्दावली से इत्तेफाक नहीं रखता।

           जिन दो मुद्दों ने सोचने पर विवश किया वह है महाराष्ट्र विधानसभा कैंटीन के केटर्रर के मुंह में रोटी ठूंसना और सानिया मिर्जा को पाकिस्तान की बहू करार देना। लॉन टेनिस प्लेयर सानिया की लोकप्रियता का यह आलम रहा कि साइना नेहवाल को अपना नाम याद रखवाने के लिए कुछ ज्यादा ही मेहनत करनी पड़ी, क्योंकि लोग उन्हें भी आदतन सानिया ही कह डालते थे। शटलर सनसनी को टेनिस सनसनी से खेल में तो नहीं नाम में काफी चुनौतियां मिलीं। वैसे, सानिया पाकिस्तान की बहू हैं यह सच्चाई है, लेकिन वे हिंदुस्तानी हैं, यह भी सच्चाई है। सानिया ने जब पाकिस्तानी क्रिकेटर शोएब मलिक  से शादी की थी तो सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर विरोधी संदेशों की कतार लग गई थी। आम हिंदुस्तानी को जाने क्यों बहुत अजीब महसूस हो रहा था लेकिन सानिया ने ना अपना खेल छोड़ा और ना अपना देश। उनका पासपोर्ट अब भी भारतीय है। वे सफाई देते हुए रो पड़ीं थीं। कई लोगों ने बतौर जीवन साथी विदेशी को चुना है। शशि कपूर की पत्नी जेनिफर कैंडल ब्रिटिश थीं। कथक नर्तकी शोभना नारायण ने ऑस्ट्रियन राजदूत से शादी की। देविका रानी के पेंटर पति स्वेतोस्लाव रोरिख रूसी थे, पूर्व राष्ट्रपति के. आर. नारायणन की पत्नी  बर्मा की थीं। फारूख अब्दुल्लाह ब्रिटेन के दामाद हैं। एक्ट्रेस रीना रे ने मोहसिन खान को चुना .  फिर ये सानिया मिर्जा को लेकर भाजपा के  तेलंगाना विधायक लक्ष्मण साहब ने तेलंगाना से एतराज क्यों किया? शायद यही सियासी  रवायत है  जो कभी नहीं बदलती।  अगर शक उनकी काबिलियत पर होता या इस बात पर कि आखिर एक करोड़ रुपया इस मद में खर्च करने की क्या जरूरत है, तब भी मुद्दे पर गौर किया जा सकता था। नई सरकार ने भले ही पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को अपने शपथ समारोह के लिए न्यौता दिया या वे  अगले महीने फिर लाहौर में भी मिल रहे हों इसके बावजूद पाकिस्तान को मुद्दा बनाकर पार्टी यह भूलती हुई मालूम होती है कि वे अब विपक्ष में नहीं सरकार में हैं। सरकार में रहते हुए कई मुद्दे उस तरफ से थोड़े अलग नजर आते हैं। वैसे सवाल ये जरूर उठना चाहिए कि ब्रांड एम्बेसडर को एक करोड़ रुपए तक देने की क्या जरूरत आन पड़ी। वे आंध्र प्रदेश की बेटी हैं तो यूं भी ब्रांड तेलंगाना को चमका सकती थीं।
शिद्दत से महसूस होता है कि अभी हमें विकास की बात नहीं करनी चाहिए अभी तो जाति, धर्म, लिंग के झगड़ों से ही नहीं उबरे हैं। विकास को क्यों जबरदस्ती गले लगाने पर तुल गए हैं। ये विकास भी एेसा नटखट बालक है कि जहां ये सब बातें हो जाती हैं, उछलकर दूर भाग जाता है। शिवसेना के सांसद ने बिना विचारे केटर्रर के मुंह में रोटी ठूंस दी। वह रोजे से था। रोजे का इस कदर एहतराम है कि रोजेदार के सामने पानी पीना भी गुनाह है। हम सब अपने दफ्तरों में यह गुनाह आए दिन करते हैं। कभी यह जानने की जहमत नहीं उठाते कि एक माह के रोजों में उसकी समय-सारिणी कैसे बदलती है। दस्तूर के चलते सिवइयों का जिक्र जरूर गाहे-बगाहे कर बैठते हैं। हम नहीं झांकना चाहते उसकी दुनिया में। इसके विपरीत कुछ वरिष्ठ होते हैं, जो ध्यान रखते हैं कि अफ्तार का समय है और इस वक्त यदि वह काम की  मसरूफियत में उलझा हुआ है तो अफ्तार कराना  अपना फर्ज मानते हैं। बहरहाल  कहा जा रहा है कि संसद राजन विचार को  मालूम नहीं था कि कर्मचारी का रोज़ा है जो भी हो यह व्यवहार एक सत्ता के मद में डूबे  एक सांसद का था।  विचार पर पहले ही पुलिस में आठ मामले विचाराधीन हैं।  

   सावन के व्रत और रोजों की जुगलबंदी हमें सोचने का मौका देती है लेकिन हम इस वक्त की नब्ज को नहीं पकड़ पाते। हमारे विधायक  सांसद सकारात्मक भूमिका से परे मालूम होते हैं। राजन विचारे हो या के लक्ष्मण ये बिना विचारे ही लक्ष्मण रेखा लांघते रहे हैं।  

Wednesday, July 23, 2014

चीर हरने पर हुई थी महाभारत

द्वापर युग में भी कृष्णा (द्रौपदी) का सम्मान दांव पर लगा
था। कौरवों ने सरे दरबार कृष्णा का चीरहरण किया, लेकिन वहां उसे बचाने के लिए द्रौपदी के आराध्य,सखा कृष्ण आ गए। दु:शासन के हाथ जवाब दे गए, लेकिन कृष्ण के हाथ से चीर कम नहीं हुआ। यह कलियुग है। यहां कोई कृष्ण नहीं आया। दु:शासन तो कामयाब हुआ ही दरबारियों ने भी तन पर कपड़ा रखना जरूरी नहीं समझा

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लखनऊ की मोहनलालगंज तहसील में सत्रह जुलाई को घटी यह घटना दिल्ली की निर्भया से भी जघन्य और भयावह मालूम होती है। सोलह दिसंबर 2012  को छह दरिंदे जब निर्भया को दुष्कर्म के बाद सर्दी की
रात में फेंक गए थे तब उसकी सांस बाकी थी। उसके साथ उसका मित्र था, जो उन दरिंदों को पहचानता था, निर्भया के नग्न शरीर को ढंक दिया गया था और किसी ने उसकी निर्वस्त्र तस्वीर चारों ओर नहीं फैलाई थी।
लखनऊ की बत्तीस  वर्षीय स्वाभिमानी, गर्विता (कृष्णा) अपने साथ हुए इस भयावह हादसे को बताने के लिए जीवित नहीं है । उसकी तस्वीरों को वाट्स एप पर वायरल की तरह फैलाने के अपराध में उत्तरप्रदेश सरकार ने छह पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया। इसलिए नहीं कि उन्होंने जांच में कोई कोताही की थी, बल्कि इसलिए कि हे मूर्खों! अपराध पर परदा डाल देते, €यों उसे पूरी दुनिया में फैलाया और हम पर कार्रवाई करने की मजबूरी आन पड़ी। यह वार कृष्णा (काल्पनिक नाम) की केवल देह पर नहीं था, यह उसके स्वाभिमान को भी कुचलने का प्रयास था। बेहद संघर्षशील इस महिला को सबक सिखाने के लिए रचा गया अपराध था।

        एेसे हिंसक Žब्योरे  दर्ज करनेमें रूह चलनी हो आती  है कि एक महिला के नाजुक अंग पर हथियार से वार किए गए। उसकी मौत शरीर पर किए गए घावों से अत्यधिक र€तस्राव की वजह से हुई। स्कूल के पास बने हैंडपंप पर वह घिसटते हुए पानी की तलाश में पहुंची थी, लेकिन इससे पहले कि पानी की बूंद नसीब होती कृष्णा का दम टूट गया। द्वापर युग में भी कृष्णा (द्रौपदी) का सम्मान दांव पर लगा था। कौरवों ने सरे दरबार कृष्णा का चीरहरण किया, लेकिन वहां उसे बचाने के लिए द्रौपदी के आराध्य, सखा कृष्ण आ गए। दु:शासन के हाथ जवाब दे गए, लेकिन कृष्ण के हाथ से चीर कम नहीं हुआ। अस्मिता के लिए महाभारत रची गयी।  यह कलियुग हैयहां कोई कृष्ण नहीं आया। दु:शासन तो कामयाब हुआ ही दरबारियों ने भी तन पर कपड़ा रखना जरूरी नहीं समझा। यह कृष्णा के साथ कई-कई बार हुआ दुष्कर्म है। सरकार कहानी गढ़ रही है। एक अपराधी को पकड़ लाए हैं। अपराधी खुद भी फर्जी, उसकी पहचान भी फर्जी जिसे पकड़ा है, वह खुद तो रामसेवक यादव है, लेकिन वह राजीव नाम से कृष्णा को फोन करता था। सरकारी नुमांइदी कहतीहैं  कि वह हेलमेट लगाए था, इसलिए कृष्णा उसे पहचान नहीं पाई और राजीव समझकर बाइक पर बैठ गई। उत्तर  प्रदेश पुलिस के मुताबिक आरोपी यादव कृष्णा पर बुरी निगाह रखता था और जहां कृष्णा रहती है, वहीं पास ही एक साइट पर सि€योरिटी गार्ड था। पुलिस जिसने पहले सामूहिक दुष्कर्म की बात कही थी, अब रामसेवक को केंद्र में रखकर नई कहानी ले आई है।
                    खुद्दार कृष्णा, जो अपने पति की मौत के बाद अपनी बेटी और बेटे को पाल रही थी, उसकी हत्या ने इस समाज के उस नजरिए को भी उजागर किया है, जो वह अकेली स्त्री के लिए रखता है। इस नजरिए के
हिसाब से अकेली स्त्री का अपने दम पर बच्चों को पालना एक गैरजरूरी प्रयास है, लेकिन कृष्णा की बारह वर्षीय बेटी बातचीत में बताती है कि वह संस्कारों से पाली जा रही बच्ची है। कृष्णा के पिता शिक्षक हैं, जिनकी
आंखें भी यही कहती हैं कि उनकी बेटी के जीवन में बेहिसाब संघर्ष बिंधा था। पति को किडनी की तकलीफ थी और वह संजय गांधी इंस्टीट्यूट ऑव मेडिकल साइंस में  कार्यरत था। कृष्णा अपनी एक किडनी देकर भी उसे नहीं बचा सकी थी । उसके बाद कृष्णा को पति की जगह काम मिला। एक किडनी के साथ दो बच्चों को कृष्णा पूरी ईमानदारी और मेहनत से बड़ा कर रही थी, लेकिन कानून व्यवस्था के लिहाज से बदहाल प्रदेश ने उसकी
देह और मान दोनों को जमींदोज कर दिया।
                      लखनऊ में कृष्णा, जयपुर में 23 साल की इवेंट मैनेजर रमनजोत(जिसे उसका  परिचित लैपटॉपके वायर से गला घोंटकर मार देता है) और बेंगलूरु में छह वर्षीय बच्ची के साथ स्कू ल में हुआ दुष्कर्म। जिन पर यकीन हो, वे ही कातिल बनकर सामने आ रहे हैं। देश के सब प्रदेशों की राजधानियां एक जैसी लग रही हैं। इन सबकी पुलिस एक जैसी है, लेकिन अगर सरकारी प्रतिबद्धता भी एक जैसी होगी तो इस खाज को कोढ़ होने में व€त नहीं लगेगा। सरकारों को धृतराष्ट्र बनने से रुकना चाहिए। धृतराष्ट्र की तो आंखें नहीं थीं, ये आंखें होते हुए भी अंधे बने बैठे हैं। लानत है इन अंधे बयानवीरों पर।

Thursday, July 17, 2014

माहौल में ठंडक बातों में उमस

shobha dey and her daughter...          image mahesh acharya
jaipur women... image  rakesh joshi

जयपुर में शनिवार की वह दोपहर उमस से भरी हुई थी लेकिन एक सुंदर होटल का एक सुंदर हिस्सा महिला अतिथियों से गुलजार था। माहौल में कोई भारीपन नहीं था, बल्कि इंतजार था लेखिका शोभा डे का। इंतजार खत्म हुआ, शोभा डे अपनी बेटी के साथ दाखिल हुईं। इस स्वागत के बारे में शोभा ने बाद में खुद ही कहा कि मैं दुनियाभर में घूमी हूं, लेकिन एेसा शानदार स्वागत मेरा कहींं नहीं हुआ। वैसे यदि पता न हो कि यहां शोभा डे एक व्याख्यान देने आई हैं, जिसका विषय बैंड-बाजा और कन्फ्यूजन है, तो यही लगता है कि आप किसी बॉलीवुड की अवॉर्ड सैरेमनी नाइट में बैठे हैं  और सामने से अभी कोई साड़ी के फॉल सा दिल मैच किया रे ... गाते हुए धमक जाएगा। बहरहाल, सुरभि माहेश्वरी और फिक्की फ्लो की
जयपुर चैप्टर की अध्यक्ष अपरा कुच्छल ने प्रभावी एंकरिंग के साथ शोभा डे को मौजूद अतिथियों से रू-ब-रू कराया।
दरअसल बैंड-बाजा-कन्फ्यूजन विषय से ही स्पष्ट है कि भारत सदी के नहीं, बल्कि सदियों के भीषण बदलाव से गुजर रहा है। शादी की पारंपरिक मान्यताएं नए सिरे से गढ़ी जा रही हैं, दायरे बढ़ गए हैं, पंख खुल गए हैं। वर्जनाएं टूट रही हैं और वर्जिनिटी कोई बड़ा मुद्दा नहीं रह गया है। उम्मीद थी कि मिस डे विषय पर पहले तो कन्फ्यूजन को सामने रखेंगी और फिर किसी एेसी दिशा की ओर इशारा करेंगी जिससे समाज में व्याप्त इस दुविधा से उबरा जा सके। उन्होंने इंदिरा नूई के हाल ही के इंटरव्यू और इरा त्रिवेदी की किताब इंडिया-फॉलिंग इन लव के साथ बॉलीवुड की फिल्मों का भी जिक्र किया। उनका कहना था कि इंदिरा नूई जब अपनी मां को अपने सीईओ बन जाने की खुशखबरी सुनाना चाहती थीं तो उनकी मां ने कहा जाओ पहले बच्ची के लिए दूध लेकर आओ और अपने सीईओ का ताज गैराज में रखकर आओ। क्या वाकई अगर कोई बेटा मां को एेसी खबर सुनाता तो मां का यही रवैया होता। शायद नहीं। यह सबके लिए एक उत्सव का समय होता। फिर व्याख्यान के अगले हिस्से में ही वे यह भी कहती हैं कि पश्चाताप पुरुष के जीवन में भी होते हैं उन्हें भी चौदह साल बाद  समीक्षा करनी पडे़ तो कई चीजें उनकी भी छूटती हैं, दूर होती हैं।
सारी दुनिया की महिलाओं के दिलों को पेप्सिको सीईओ नूई के इस इंटरव्यू ने अगर छुआ है तो इसलिए कि वे सभी यह मानती हैं कि  वे जहां भी जिस किसी मुकाम पर हैं अपना सौ फीसदी नहींं पा सकतीं। कुछ हासिल करती हैं तो कुछ छूटता है। वे बेहतरीन करना चाहती हैं लेकिन फिर भी कभी उनका काम, तो कभी उनका मां का दायित्व तो कभी पत्नी धर्म प्रभावित होता है। एेसा उनकी जैविक संरचना की वजह से होता है। वे मां बनती हैं  दायित्वों के साथ
। शरीर और मन से बेहद संवेदनशील स्त्री केवल चाहने से एेसी नहीं है। यह खूबी उसे कुदरत ने बख्शी है। वह एेसी ना हो तो सृष्टि के चक्र में बाधा होगी।
कन्फ्यूजन केवल बैंड-बाजे का नहीं बैंड बाजे के बाद काम और परिवार में से किसे प्राथमिकता देनी है उसका भी है। मिस डे ने विश्वास जताया कि सदियों से भारतीय स्त्री समय प्रबंधन को साधती आई है और उसे उसकी प्राथमिकताएं पता हैं। फिक्की फ्लो के जयपुर चैप्टर का मकसद यदि महिला सदस्यों की मौजूदगी में एक कार्यक्रम करवाकर अखबार में कवरेज पाना था तो वह उसमें कामयाब रहा है। लेकिन जिस बडे़ कन्फ्यूजन से महिलाएं इन दिनों रू-ब-रू हैं उसका केई हल कम-आज-कम शोभा भा डे के पास तो नहीं था शायद  यह आर्थिक आजादी की कीमत है जो उसे देनी है।
           सर्वथा अजीबोगरीब जुनून पर नॉवल लिखने वाली और व्याख्यान में हम्पटी शर्मा ...और रांझणा का जिक्र करने वाली मिस डे के उद्बोधन में कमी सी मालूम हुई। हकीकत बहुत अलग है। कई कन्फ्यूजन सर उठा रहे हैं। दिल्ली-बदायूं की घटनाएं और इन पर आने वाले बयान सबकी पोल खोल रहे हैं कि कन्फ्यूजन जख्म बनकर फैल गया है। यह कैंसर से कम नहीं। शोभा डे का यह सतही व्याख्यान दिशा देनेवाला नहीं मालूम हुआ, यह किसी बॉलीवुड मसाला फिल्म -सा होकर ही रह गया था
सितारा होटलों में सितारों के साथ ऐसे कार्यक्रमों से कौन जाग्रत होता है यह  फिक्की से पूछने का मन करता  है मिस डे की एक बात जरूर गौर करने लायक रही  कि अरुण जेटली के इस बजट ने महिला सुरक्षा के लिए 50  करोड़ रुपए रखे हैं और सरदार पटेल की मूर्ति के लिए 200  करोड़। ये आंकड़ा पोल खोलता है कमजोर इच्छाशक्ति की। बॉलीवुड-टॉलीवुड तो हर शुक्रवार को अपना बॉक्स ऑफिस गिनते हैं। इनके कोई सामाजिक सरोकार अब नहीं रहे। जिनके हैं भी तो मिस डे की बातों में वे नहीं ही थे।

Wednesday, July 9, 2014

तनु शर्मा के हक़ में


बाईस जून 2014 से पहले तनु शर्मा इंडिया टीवी में एंकर थीं। इस दिन उन्होंने चैनल के दफ्तर के आगे खुदकुशी करने की कोशिश की। वे चूहे मारने की दवा को पी गईं थी लेकिन तुरंत चिकित्सा मिल जाने से बचा ली गईं। तनु ने एेसा करने से पहले चैनल के दो वरिष्ठों (जिनमें एक महिला हैं) के बारे में अपने फेसबुक
स्टेटस पर लिखा कि बहुत मजबूत हूं मैं, सारी जिंदगी मेहनत की, स्ट्रगल किया, हर परेशानी से पार पाकर यहां तक पहुंची। चैनल ने मेरे साथ जो किया वो भयानक सपने से कम नहीं। मैं आपको कभी माफ नहीं करूंगी। अफसोस रहेगा मरने के बाद भी कि मैंने यह चैनल जॉइन किया और एेसे लोगों के साथ काम किया, जो विश्वासघात करते हैं, षड्यंत्र करते हैं। मैं बहादुर हो होकर थक चुकी हूं। बाय।
तनु का कहना है कि सीनियर एडिटर्स  हमेशा जलील करते रहे। उनके कपडे़, हेअर स्टाइल पर तो टिप्पणियाँ
होती ही थी, यह भी कहा जाता कि  आप बिल्कुल भी ग्लैमरस नहीं। आपकी आवाज भी ठीक नहीं, जबकि
मैं कई कार्यक्रमों में अपनी आवाज दे रही थी। वे कहती हैं, अगर आवाज इतनी ही खराब थी तो मुझे वॉइस
ओवर के लिए €यों लिया जाता? तनु का आरोप है कि उससे उ्मीद की जाती थी कि वह तमाम राजनीतिक
हस्तियों और कार्पोरेट घरानों से मुलाकात कर उनकी अनुचित मांगें भी पूरी करें। प्रकारांतर से यह भी
समझाया गया कि यह कोई नई और बड़ी बात नहीं।
       चैनल का अपना जवाब है कि तनु उनके साथ चार महीने पहले जुड़ी थीं और इस दौरान उनका काम बिल्कुल भी संतोषजनक नहीं था। उनकी वजह से दो बार चैनल को शर्मिंदा होना पड़ा। पहली बार तो वे गंभीर खबर को प्रस्तुत करते हुए हंस रही थीं और दूसरी बार वे स्टूडियो ड्यूटी पर रहते हुए कैफेटेरिया में चली गईं जहां उन्होंने अपना फोन साइलेंट मोड पर छोड़ दिया। चैनल को बे्रकिंग न्यूज ग्राफि€स
के सहारे चलानी पड़ी। दोनों बार उन्हें चेतावनी दी गई। अब जब उन्होंने एसएमएस पर नौकरी छोडऩे के बारे में लिखा तो उसे मंजूर कर लिया गया। गौरतलब है कि चैनल के साथ तीन
महीने का कॉन्ट्रे€ट था।
    इन आरोप-प्रत्यारोप के बीच एक बात साफ है कि ढोल-नगाड़ों के साथ खबरें सुनाने और दिखाने वाले इन चैनलों के संचालक और कर्मचारियों के बीच हालात गरिमापूर्ण और शालीन तो नहीं हैं। चैनल्स में काम कर रहे और छोड़ चुके तमाम मित्रों की राय में स्थितियां सामान्य नहीं हैं। वे कहते हैं अगर अध्ययन किया जाए तो बीच में ही काम छोड़ देने वाली लड़कियों की तादाद बहुत ज्यादा है। कई बार लगता है कि हम न्यूज एंकर नहीं, आइटम गर्ल्स हैं। माना कि प्रेजेंटेबल होना इस मीडिया की जरूरत है, लेकिन जब यह अपेक्षा सीमा पार करने लगे तो सब कुछ असहनीय हो जाता है।
        गौरतलब है कि तनु की खुदकुशी की कोशिश को किसी भी चैनल ने कोई तवज्जो नहीं दी मानो कोई छिपा समझौता हो, जबकि यही चैनल तरुण तेजपाल प्रकरण में खूब सक्रिय रहे थे। इन चैनल्स ने प्रीति-नैस की झड़प को भी खूब दिखाया, लेकिन तनु के लिए बोलने वाला कोई नहीं। यही घटना किसी और संस्थान की होती तो भी €या चुह्रश्वपी का यही समझौता कारगर होता? चकित करता है कि जो मीडिया एेसे ही अन्य मामलों में बढ़-चढ़कर पहल करता है, इस मामले में खुद का बचाव बड़े ही पारंपरिक तरीके से करता है। बीबीसी को चैनल ने कहा कि यह गैर-ज्मिेदाराना पत्रकारिता है। €या एेसा नहीं हो सकता था कि चैनल तनु पर सिलसिलेवार इल्जाम लगाने के बजाय केवल इतना कहता कि हम इस मुद्दे को गंभीरता से लेकर स्वयं इसकी जांच करेंगे। आरोपों के जिस तरह जवाब दिए गए हैं वे वैसे ही हैं जैसे किसी भी आम आरोपी के होते हैं। यहां चैनल नई भूमिका अख्तियार कर सकता था। आईबीएन-7 के मैनेजिंग एडिटर
विनय तिवारी का कहना है कि टीवी न्यूज चैनलों में नेतृत्व की भूमिका निभा रहे लोग उन जगहों को सामंती
विचारधारा के तहत अपनी जागीर की तरह चला रहे हैं। वरिष्ठ पत्रकार पामेला फिलीपोज के मुताबिक बदसलूकी होती है, लेकिन भारत में खुद पत्रकार ही मुद्दे को उठाने से डरते हैं। यही चुह्रश्वपी मीडियाकर्मी और मीडिया कंपनियों के असमान रिश्तों को दर्शाती है। बहरहाल, इस मामले में दोनों पक्षों की ओर से एफआईआर दर्ज है, लेकिन जिनसे उ्मीद की जाती है उन्होंने आपसी सहमति से मुद्दे को सुंदर कालीन के नीचे सरका दिया है।सहमतियों से भरी इस चुप्पी  के बीच कई सवाल सर उठा-उठा कर झांकरहे हैं।
खामोशी के मायने सब खैरियत नहीं है
चेहरे जो मुस्कुरा रहे हैं वे भी खुश नहीं हैं