Thursday, June 26, 2014

अपराध की जात बताओ भैया


पिछले सप्ताह खुशबू की कवर स्टोरी गायत्री मांगे इंसाफ (http://dailynewsnetwork.epapr.in/290314/khushboo/18-06-2014#page/1/1 )
पर पाठको की खूब प्रतिक्रियाएं मिलीं। ज्यादातर गायत्री के हालात पर दुखी थे तो कुछ का यह भी मानना था कि ये सांसी जाति तो यूं भी आजीविका के लिए शराब और देह व्यापार के अपराध में लिप्त होती है। ये तो पुलिस रिकॉर्ड में भी ‘जरायम पेशा ’ के नाम से दर्ज होते हैं। जरायम फारसी भाषा का शब्द है जिसके मायने अपराध चोरी-डकैती को पेशा बनाने वाली बिरादरी से है। अंग्रेजों के शासनकाल में एेसी कई जातियों को जरायम पेशा समूह में रखा गया था। उनका मानना था कि इन जातियों के समूह के समूह अपराधिक गतिविधियों में लिप्त हैं और यही उनका पेशा है और इनके साथ कोई ढील नहीं बरती जाए।अंग्रेजों से आजाद हुए देश को 67 बरस हो चले हैं लेकिन हमारी पुलिस अब भी इस नजरिए से आजाद नहीं हो पाई है। पुलिस ऐसा ही मानती है और सरकार व समाज ने कभी इस दायित्व को नहीं समझा कि आखिर कब तक हम इन्हें यूंही संबोधित करते रहेंगे और एेसा ही बनाए रखेंगे। इन्हें मुख्यधारा में लाने के प्रयास ना के बराबर हैं। ये यूं ही अलग-थलग पडे¸ हैं।
एक अंग्रेजी अखबार में बीस जून को पहले पन्ने पर प्रकाशित इस खबर में पुलिस का रवैया देखें। अलवर के विराट नगर में एक 46 वर्षीय विधवा की सामूहिक दुष्कर्म के बाद हत्या हो जाती है। बेटियों की शादी हो चुकी हैं और एक बेटा मुंबई में है। पुलिस प्रारंभिक तहकीकात के बाद कहती है- ‘‘एेसा लगता है कि यह किसी संगठित गिरोह जैसे बावरिया और पारदी गैंग का काम है। जिन्होंने दरवाजा तोड़कर जघन्य वारदात को अंजाम दिया।’’ हैरानी होती है कि ये गिरोह इतने बरसों तक़ क्या पुलिस की ढाल बनने का ही काम करते रहे हैं? क्यों पारदी या कच्छा बनियान या कंजर नाम लेकर इन अपराधों पर हमेशा मुहर लगाई जाती है। क्यों ये समुदाय अब तक़ इस दलदल से ही नहीं निकल पाए? क्यों किसी भी सरकार ने इनके विकास का बीड़ा अब तक़ नहीं उठाया? हम बड़े बेफिक्र होकर कह डालते हैं क़ि बेड़िया, बांछड़ा इनका क्या, इनकी स्त्रियां तो यही काम करती हैं? गौरतलब है की मध्य प्रदेश के मन्दसौर, नीमच और राजस्थान के बांसवाड़ा, डूंगरपुर के सीमावर्ती क्षत्रों में यह जाती यही पेशा  अपनाए हुए हैं.  कैसे हम बरसों-बरस इन समुदायों को एेसे ही कटघरों में रखकर इन्हें आरोपों के दायरों में बांधते रहेंगे।
         गायत्री ने आवाज बुलंद की  है। उसे नहीं मंजूर खुद के  लिए एेसे शब्दों का  इस्तेमाल और काम। बचपन में घर छोड़ने की  भूल ने उसे देह व्यापार के दलदल में धकेल दिया। ईमानदारी से समीक्षा की  जाए तो उसका  कथित पति वीर सिंह सांसी भी उसी जरायम पेशा नजरिए का  शिकार है। जिसकी बुनियाद अंग्रेजी रियासत ने रखी थी।वह सामान्य जीवन शैली अपनाना चाहता है लेकिन नजरिया ऐसा होने नहीं देता। सांसी जाति को  भी अपराधी पेशों से जुड़ी जाति माना गया है। इनका  मूल सिंध के  शूद्र राजा और राजपूतों से जुड़ता है । तंग सोच और आधुनिक समाज से कदमताल ना मिला पाने की मजबूरियों ने कई विसंगतियों को  जन्म दिया है।
 एक अन्य मामला भीलवाड़ा का है जहां नौ साल की बच्ची की हत्या का आरोप पुलिस ने उसकी बहन और पिता पर लगाया है। पुलिस का मानना है कि ये कालबेलिया जाति से हैं और देह व्यापार इनका पेशा है। बड़ी बहन यही काम करती थी। अब हालात यह है कि इस बड़ी बहन से अपने हक में बयान उगलवाने के लिए पुलिस अमानवीयता पर उतर आई है। एेसा तब से चल रहा है जब पिता ने बकरियां चराने गई छोटी बेटी की लाश को लेने से मना कर दिया था। उसे किसी ने पत्थर से पीट-पीट कर मार डाला था। हालांकि बाद में लाश ले ली गई लेक़िन अब पुलिस इन्हें ही अपराधी करार देने पर तुली है। राजस्थान कालबेलिया जाती बरसों से इसी जरायम पेशा नजरीये की शिकार है। नतीजतन विकास में भी कौसों पीछे धकेल दी गयी।
पुलिस और समाज कैसे पूरी जाति को अपराध के सुपुर्द कर खुद को मुक्त पा सक़ते हैं। ये जातियां आज भी अभाव में जीने को अभिशप्त हैं। सदियों से इन पर अत्याचार ही हुए हैं और हम सब वही दोहरा रहे हैं। रोजगार का कोई विकल्प इनके सामने नहीं। यहां इन जातियों के अपराध करने की प्रवृत्ति का समर्थन नहीं बल्कि अब भी इन्हें इसी श्रेणी में रखकर कोई प्रयास ना होने का अफसोस है। इनकी शिकायतों पर कोई कार्रवाई और इनकी जरूरतों पर कोई सुनवाई नहीं होती। कोई सांसी, कोई पारदी, कोई कालबेलिया सामान्य जीवन शैली अपनाना भी चाहै लेकिन जरायम पेशा नजरिया ऐसा होने नहीं देता। ऐसे में कैसे कोई समाज अपराध से मुक्त हो सकता है। बेशक गरीबी और अभाव ही इन्हें अपराध की ओर धकेलते हैं। आखिर कब तक अपराध का ठीकरा इनके सिर फोड़कर हम खुद कॉ सभ्य समाज कहलाने क ढोंग करते रहेंगे?

Tuesday, June 17, 2014

और कितना तपोगे थार

 शून्य से पचास  डिग्री के बीच झूलते थार में इन दिनों मामला एकदम दूसरे छोर पर है।  जयपुर भी पचास को छूकर अब भारी उमस की चपेट में है  लेकिन थार की जुबां  उफ़ जैसे शब्दों के लिए नहीं है रंगीलो राजस्थान का कोई रंग फीका नहीं है। गर्मी से थर्राते थार का मानस जाने कैसे कूल बना रहता है लेकिन तुम और कितना तपोगे थार

 
सोमवार की  जेठ दोपहरी इस लिहाज से बहुत शानदार थी कि  चलती सड़क के  दोनों ओर से कुछ सेवाभावी युवा हाथ में शरबत और नीबू पानी लेकर आ खड़े हुए। तपती गर्मी में नीबू पानी एक ही सांस में भीतर उतर गया। इस राहत के  भीतर जाते ही एक दुआ-सी बाहर आई।  वाकई जयपुर में श्याम नगर से सिविल लाइंस तक  इन छोटे-छोटे तंबूओं से उस दिन सुकून और राहत बांटी जा रही थी । यह निर्जला एकादशी का  दिन था। माना जाता है की इस दिन सूखे कंठों  को  शीतल जल, शिकंजी  शरबत पिलाकर पुण्य अर्जित किया जाता है। कितना सुन्दर फलसफा कि  राहत पहुंचाओ पुण्य कमाओ। निर्जला एकादशी का  संदर्भ जानने के  लिए वैद्य हरिमोहन शर्मा जी को  फोन से दस्तक  दी। वैद्य जी ने बताया कई  कि संदर्भ महाभारत से जुड़ता है। पांडवों में भीम को  सर्वाधिक  भूख लगती थी। उनका  एक नाम वक्रोदर भी है। वक्र यानी भेड़िया। भेड़िए सी भूख वाला पेट। महीने के  दो और साल के  २४ एकादशी  व्रत भीम को  खूब भारी पड़ते। वे भीष्म पितामह के पास गए कि  पितामह मैं भूखा नहीं रह सकता। पितामह ने कृष्ण से राय लेने की  बात कही। कृष्ण ने भीम से कहा कि  ठी है भीम जो तुम जेठ के  महीने की  इस एकादशी को  निर्जल व्रत रोगे तो वही पुण्य मिलेगा जो 24 व्रत रने से मिलता है। तभी से निर्जला एकादशी  व्रत रने की  परंपरा चली  आ रही है। तप और ताप की  यह जुगलबंदी मनुष्य में असीम शक्ति जागृत रने के लिए ही बनाई गई थी।
     ए मित्र की  मां न केवल इस दिन व्रत रतीं, बल्कि जयपुर के  गलताजी जाकर सारे मंदिरों के  दर्शन भी करतीं और वहींं कुण्ड  में स्नान भी । शायद शरीर को  तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों से गुजारर ही मानव श्रेष्ठता की  दिशा में आगे बढ़ता है।
कहते हैं एेसी तपिश सौ सालों में भी नहीं महसूस की गई। लगता है जैसे पृथ्वी सूर्य से गले मिल गई है, लेकिन सच्चाई कुछ और है इन दिनों धरती सूर्य से सर्वाधिक दूरी पर है। सर्वाधिक  गर्म इलाका  तो केलिफोर्निया की  डेथ वैली है, जहां तापमान 58 डिग्री छू जाता है। दक्षिण अफ्रीका का टिम्ब
टू भी एेसा ही इलाका  है। यहां तापमान 56 डिग्री सेल्सियस हो जाता है। मकान नारियल के  तने कीचड़ और छप्पर से बनते हैं। इसके अलावा सभी गैर कुदरती चीजें तपाने कस  ही काम रती हैं। बेश हम भी ए प्रतिकूल परिस्थिति को  जी रहे हैं। गौर रेंगे तो पाएंगे कि  सुकून, शांति प्रकृति के रीब ही है। लोहे की  बंद गाड़ियां और बंद दड़बेनुमा मकान तबीयत को  नुसान पहुंचा रहे हैं। ए पेड़ की  छाया भी तापघात का  कारण नहीं बनती। मटके का  जल, मतीरे की  काश (फां) , नीबू-केरी की  खटास और पतली छाछ आपमें जीवन भर सकती है, जबकि  महंगे वाहनों के  फेल हुए वातानुकूलन मरीज को  लो बीपी का  शिकार बनाकर अस्पताल पहुंचा रहे हैं। हमारा समूचा दर्शन कुदरत से  एकाकार  में है और फिलहाल हम अपनी समूची ताकत उससे दूर जाने में लगा रहे हैं।
बहरहाल, हमारे ख्वाबों में इन दिनों बर्फीले इलाको की  सैर ही है। धरती का  सबसे ठंडा इलाका  अंटार्कटिका  में वोस्तोक स्टेशन है जहां तापमान माइनस 90 डिग्री तक चला जाता है। दुनिया की  90 फीसदी बर्फ यही होती है। बारिश बिल्कुल  नहीं होती। यह बर्फीला रेगिस्तान है  और हम
रेतीले  रेगिस्तान थार में हैं। गर्म रेतीला रेगिस्तान। ग्रामीण इस गर्मी को  कोसते नहीं, अपनी जीवटता बढ़ाते हैं। बाड़मेर, जैसलमेर के  बाशिंदों को  कभी त्राहिमाम करते नहीं देखा। वे कहते हैं, दिन और रात की तरह  मौसम का भी चक्र है।  सूरज की किरणें पृथ्वी को स्पंदित कर रही हैं। तमाम जीवाणु, कीटाणु इस मौसम में पनाह मांगने लगते हैं। इंसान का फर्ज केवल इतना है कि वे आसपास मौजूद पशु-पक्षियों की  उपेक्षा न करें । परिंदों के  लिए पानी  हर घर के  आसपास हो।  पशुओं के लिए मुश्किल  समय है लेकिन उनके  भोजन, पानी, का  हिस्सा निकालना हमारे संस्कारों में है। इस ऋतु चक्र में प्राणिमात्र पर दया इस पर अमल रके ही हम अपने पर्यावरण को  बचा सते हैं। एक  काम बाकी  है बारिश से पहले पौधे रोप देने हैं।