Wednesday, April 23, 2014

टोपी तिलक सब लीनी


टोपी हो या तिलक  इसे  ना कहने
वालों के  लिए एक  ही खयाल सामने
आता है कि  ये या तो हिंदुस्तान की
तहजीब से वाकिफ नहीं या फिर
अपने पुरखों को नहीं मानते। ये उन
लोगों का  अपमान है जो अपने
मजहब का  पालन करते हुए भी सर
पर हाथ रखकर तिलक  स्वीकार
करते हैं, टोपी पहनते हैं, बिंदी धारण
करते हैं। हमारी एक  साथी थीं

अभी दूसरे शहर हैं । भरापूरा कुनबा
था उनका । दफ्तर बिंदी लगाकर
आती थीं।   कभी किसी ने एतराज
नहीं किया। कई साहित्यकार,
लेखक , कलाकार स्वागत में तिलक
स्वीकार करते हैं। दीप प्रज्ज्वलित
 
करते हैं। मूर्तिपूजक न होने के बावजूद ईश्वर की मूर्तियां हाथ जोड़कर ग्रहण करते हैं। तो क्या वे धर्मद्रोही हो गए, क्या ऐसा करने से इनकी
आस्था घट गई या वे उस मजहब के
नहीं रहे, जहां वे पैदा हुए हैं। बनारस
के  गंगा
घाट पर बने मंदिर के  अहाते में
बिस्मिल्लाह खां साहब का शहनाई
वादन तो जैसे 
कुफ़्र (पाप) हो गया।
अस्वीकार एक  तरह की  फिरकापरस्ती
ही है फिर चाहे वह किसी भी
ओर से हो। यह अमीर खुसरो,
तुलसी, गुरुनानक की  रवायत का
अपमान है। अमीर खुसरो ने लिखा
है
अपनी छवि बनाई के  मैं पी के पास गई
जब छवि देखी पीहू की  तो अपनी भूल गई
छाप तिलक  सब छीनी रे मौसे
नैना मिलाई के ...
दो तहजीबों के  साए में पले
(मां राजपूत थीं) खुसरो पर ख्वाजा
निजामुद्दीन औलिया की  कृपा थी।
एटा में जन्मे खुसरो संस्कृत,
अरबी, फारसी समेत अनेक भारतीय
भाषाओं में पारंगत थे। वे कवि तो थे
ही हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में भी
उन्हें महारत हासिल थी जबकि
इस्लाम में गाना-बजाना धर्म संगत
नहीं। गोस्वामी तुलसीदास को
मानस लिखने की  प्रेरणा कृष्ण भक्त
अब्दुर्रहीम खानखाना से मिली।

तुलसीदास रात को  मस्जिद में ही
सोते थे। अवध के  नवाब वाजिद
अली शाह के दरबार में तेरह दिन
का  रासलीला उत्सव कृष्ण को  याद
करके  होता था। आजाद हिंद फौज
के  कप्तान आबिद हसन ने 1942 में
जय हिंद का  नारा बुलंद किया।
से में जमीयत उलेमा ए हिंद
के  चीफ यह कहते हैं कि उन्हें टोपी
पहनने की  जरूरत नहीं है।  वे कहते हैं ठीक
वैसे ही जैसे मैं तिलक  नहीं लगा
सकता उन्हें भी धार्मिक चिन्ह लेने
की जरूरत नहीं है। देश के बडे़
तबके  को  इस बयान में भले ही भारी
सुगंध का  आभास हुआ हो जबकि
टोपी-तिलक  कोई ताल्लुक
मजहब से साबित नहीं किया जा
सकता। टोपी, तिलक
  में उलझाकर
रखने वाले ये लोग देश को  पीछे ले
जा रहे हैं। उनमें तेरहवीं सदी की
आधुनिकता भी नहीं।
दक्षिण के  उस हिस्से की  स्त्रियों
का क्या  कीजिएगा जहाँ स्त्रियां  बिंदी लगाती
हैं और मंगलसूत्र भी पहनती हैं। फिर तो
 दोष उनका  भी है जो सलवार
कमीज पहन रहे हैं  और उनका  भी
जो साड़ी पहनते हैं । उनका  भी जो
गैर मजहबी होकर ताजिए की
परिक्रमा करते
  है और उनका  भी
जो दरगाह पर चादर चढ़ाते
  है। ये
परंपराएं मजहबी नहीं हैं फिर भी
हैं। हो जाइए सख्त और रोक
दीजिए सबको । ये मिट्टी के  तौर-तरीके
 हैं जो संग-संग रहते हुए हम
सबने अपना लिए हैं।
मुस्लिम टोपी, हिंदू तिलक , में
एक  ऐसी विभाजक  रेखा की
साजिश नजर आती है जो तहजीब
पर करारा तमाचा है। ये तो वे लोग
हैं, जिन्हें योग क र रहे मजहबी को
देखकर भी तकलीफ होती होगी।
योग, ध्यान ऐ
सी संपन्न भारतीय
साधनाएं हैं  जिनकी  पूरी दुनिया
मुरीद है। इस सीमित सोच पर
हैरानी तो होती है उससे भी ज्यादा
हैरानी तब होती है जब इस बयान के
स्वागत में बयान आते हैं। सियासी
संतुलन बनाने की  इस फूहड़
कोशिश में किसी भी सच्चे
हिंदुस्तानी को  यकीन नहीं होगा। ये
वो लोग हैं जिन्होंने युगों-युगों से
माला फेरी है लेकिन मन की  माला
का  एक भी मनका  नहीं फेर पाए हैं।
संत
कबीर  ने ही कहा है
माला फेरत जुग भया,
फिरा ना मन का फेर
कर का  मनका  डार दे,
मन का  मनका  फेर
इन दिनों हर चैनल ने वोटों
की बहस पर कार्यक्रम बनाए हैं। ये
इस धर्म का , ये इस जाति का । ये
चुनाव के समय ही €क्यों  याद आते हैं
इन्हें। ये फितनों की  याद दिलाते हैं।
इन दिनों सद्भाव पर ना के  बराबर
रपटे हैं । सब गिनने को आतुर हैं।
कोई  जख्म तो कोई  सर। यह
लोकतंत्र का  तकाजा नहीं है। यह
अलगाव की कोशिश है। खुसरो ने
शायद इन्हीं लम्हों के  लिए लिखा था
बहुत कठिन है डगर पनघट की
कै से भर लाऊं मधवा से मटकी ।

Tuesday, April 15, 2014

देह की मंडी में बिक गयी लक्ष्मी




जयपुर में गुरुवार की  वह दोपहर काफी अलग थी। संतरी लिबास में खिली हुई महिलाओं का यूं मिलना अक्सर नहीं ही होता था। वे सब एक  फिल्म देखने के  लिए आमंत्रित की  गई थीं। प्रवीणलता संस्थान यह फिल्म इन महिलाओं को  दिखाने की  ख्वाहिश रखता था, जो काम-काजी हैं, ऊंचे पदों पर हैं और जो दृश्य बदलने की  ताकत रखती हैं। लक्ष्मी यही नाम था फिल्म का । फिल्म के  शुरू होने से पहले जो जुबां चहक  रही थीं , चेहरे दमक  रहे थे, वे फिल्म शुरू होते-होते खामोश और मायूस होते गए। सन्नाटा यकायक  कभी सिसकियों में तो कभी कराह में बदल उठता था। घटता पर्दे पर था टीस दर्शक के भीतर उठती थी।
 

मानव तस्करी से जुड़ी है कथा
लक्ष्मी एक चौदह साल की लड़की  है। बेहद खूबसूरत और प्यारी जिसे उसका  पिता तीस हजार रुपए में बेच देता है। कसाईनुमा चिन्ना इन लड़कियों को  भेड़-बकरियों की  तरह भरकर देह की  मंडियों तक  पहुंचाता है। रेड्डी सबसे छोटी लक्ष्मी को  यह कहकर चुन लेता है कि  यह तो सबसे छोटी है फिर उसी लड़की  को घर में रखकर उसके  साथ दुष्कर्म करता है। जबरदस्ती के  बाद पानी में घुलता रक्त सिनेमा हॉल में मौजूद कई युवतियों को  विचलित कर देता है। इसके  बाद लक्ष्मी रेड्डी के  कोठे पर भेज दी जाती है जिसे बेसहारा अनाथ लड़कियों की  सेवा के  नाम पर बतौर गर्ल्स  हॉस्टल चलाया जाता है। छोटी बच्ची के लिए पुरुष ग्राहक  खूब दाम चुकाते हैं। वह बच्ची इस घिनौनी दुनिया से कई बार भागने की कोशिश करती है लेकिन चिन्ना उसे हर बार पकड़ लाता है। बेरहमी से पिटती लक्ष्मी पर कोई रहम नहीं खाता, उसे उस दिन और ज्यादा ग्राहक लेने पड़ते हैं। बूढ़े के  फॉर्म हाउस पर नाचते हुए मौका देखकर लक्ष्मी फिर दीवार फांदने का प्रयास ·रती है लेकिन अब की  बार चिन्ना बेरहमी के साथ उसके  पैर पर कीलों वाला डंडा घुसा देता है। पीड़ा से भरी लक्ष्मी की  फिर वही सजा कि  इस हाल में भी वह ग्राहक लेगी।
 

लक्ष्मी चाहती है सजा दिलवाना
ज्योति( शेफाली छाया ) को  लक्ष्मी के  इस हाल पर खूब रहम आता है और वह चिन्ना से इस हाल में ग्राहक  ना लेने की  इल्तजा करती हैं। ज्योति स्वयं एक  बेटी की  मां है जो नर्क  में रहते हुए भी अपनी बेटी को  इंजीनियर बना रही है। उसकी  बेटी को  यही मालूम है कि मां एक दफ्तर में काम करती है। हॉस्टल में उमा नामक  एक्टिविस्ट का  नियमित आना-जाना है जो देह व्यापार में लिप्त महिलाओं को  सुरक्षा और साफ-सफाई की  सामग्री देने आती है, वह लक्ष्मी से भी मिलती है। एक  और सामाजिक कार्यकर्ता कैमरा लेकर लक्ष्मी के  पास ग्राहक बनकर आता है। वह बीमार और घायल लक्ष्मी पर हो रही ज्यादती को  रिकॉर्ड करता है। इस बीच हॉस्टल पर छापा पड़ता है, रेड्डी और चिन्ना गिरफ्तार क र लिए जाते हैं। पीटा एक्ट के तहत लड़कियां पुनर्वास केंद्र में लाई जाती हैं। वे वहां सिलाई-टोकरी बुनने का प्रशिक्षण लेती हैं। लेकिन कुछ ही दिनों में चिन्ना-रेड्डी छूट जाते हैं और कोठा फिर आबाद हो जाता है। लड़कि यां लौट जाती हैं कि   यह काम उनसे नहीं होता। लक्ष्मी नहीं लौटती। वह सजा दिलाना चाहती है।
 

लक्ष्मी को  मिलता है न्याय
तमाम उतार-चढ़ावों के  बाद लक्ष्मी को  न्याय मिलता है। रेड्डी का  डॉक्टर साबित करता है कि  उसके  पेशेंट को एड्स है और उसी ने लक्ष्मी से बलात्कार किया है। रेड्डी के  कहने पर ही लक्ष्मी को  इंजेक्शन दिए गए कि  लड़की  जल्दी बड़ी हो जाए। चिकित्सक का यह बयान मील का  आखिरी पत्थर साबित होता है। लक्ष्मी आंध्रप्रदेश की  पहली लड़की  है जिसे इममोरल ट्रैफिक (प्रिवेंशन) एक्ट-पीटा के  तहत २०१२ में न्याय मिला है। सच तो यह है कि कायदे-कानून के बावजूद यह सिलसिला रुकता नहीं। समाज इसे अपराध नहीं मान पाता। इसे सदियों पुराना पेशा बताकर महिमामंडित और किया जाता है।
किस्से कहानियों में सुनते आए हैं कि  बड़ी कायदे की  तवायफ थी, कमाल का  मुजरा करती थी या फलां तवायफ के  गले में ईश्वर का वास था। उफ, कला को  सराहने का  ये क्या सलीका  हुआ?
 

घृणा से भर देता है चिन्ना
फिल्म देखने वाले को  लक्ष्मी के  आसपास की  दुनिया से घिन हो आती है। चिन्ना के  भद्दे जोक्स-भाषा इस पेशे की  भयावहता को  खूब अभिव्यक्त करते हैं। चिन्ना के  कई संवाद पिघले सीसे की  तरह कानों में पड़ते हैं। चिन्ना का  किरदार फिल्म के  लेखक-निर्देशक  नागेश कुकुनूर ने अदा किया है। वे किरदार में यूं  जा बैठे हैं कि  देखनेवाला नफरत से भर उठता है। नागेश निर्मम निर्देश· हैं, उन्होंने हालात को  जस का  तस दिखाया है। यही वजह है कि  फिल्म अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सराहना और सम्मान पा रही है। कई लड़कियां इन दृश्यों को  बर्दाश्त नहीं कर  सकीं   और हॉल छोड़·र चली गईं। आयोजकों  को  भला-बुरा कहते हुए कि  आपने ये दिखाने के  लिए हमें बुलाया था। वैसे नागेश काम  हिंसा के  साथ इसे प्रदर्शित कर  सकते  तो प्रदर्शित तो ज़रूर होती लेकिन अपना असर कुछ काम पैदा करती 


  मंटो की याद

दरअसल, हमारा समाज ऐसा ही है। एक  तबका  दूसरे तबके की  तकलीफों से बिल्कुल अंजान है या फिर समझते हुए भी उसकी  अनदेखी करना चाहता है। वह अपने चारों ओर खिली हुई सुंदर दुनिया की  कल्पना में ही जीना चाहता है। चिन्ना जब कहता है कि मेरा तन रहा है... कौन तैयार है.. देह मंडी में स्त्री के केवल एक मांस पिंड होने की  पुष्टि करता है। एक दृश्य में लक्ष्मी घायल और बीमार होने के बावजूद यंत्रवत इसलिए कपडे़ खोलने लगती है कि उसे लगता है की  ग्राहक आया है। यह महान कथाकार सआदत हसन मंटो की  कहानी खोल दो की  याद दिलाता है जिसमें बंटवारे के बाद नायिका  शैतानों के  हत्थे चढ़ जाती है जहां उसकी  देह सिर्फ इस्तेमाल की  हुई वस्तु बनकर रह जाती है। मंटो पर गुलाम भारत में मुकदमे चले थे और आजाद भारत में नागेश की यह फिल्म प्रदर्शन से पहले ही प्रतिबंधित हो गई है।