Wednesday, October 15, 2014

एक हिन्दू एक मुसलमान

महात्मा गांधी को भले ही नोबेल शांति पुरस्कार ना प्रदान किया गया हो, लेकिन जिन्हें दिया गया है, वे उन्हीं के पदचिह्नों पर चले हैं। पुरस्कार उन हजारों हजार सामाजिक कार्यकर्ताओं को स्पंदित कर गया है, जो देश  दुनिया के हालात बदलने की ख्वाहिश रखते हैं।  कैलाश ही क्यों, मदर टेरेसा कुष्ठ रोगियों के घाव सहलाती हैं, सुंदरलाल बहुगुणा पेड़ों से चिपककर चिपको आंदोलन चला देते हैं। मेधा पाटकर गांवों को डूब से बचाने के लिए नर्मदा बचाओ आंदोलन खड़ा कर देती हैं। बाबा आमटे मध्य प्रदेश के बड़वानी में नर्मदा किनारे रोगियों की सेवा करते हुए ही प्राण त्याग देते हैं। पर्यावरणविद् अनुपम मिश्र को राजस्थान सरकार पानी पर कार्यशाला के दौरान सितारा होटल में ठहराना चाहती है लेकिन वे गेस्ट हाउस में सादा कमरा ही चुनते हैं। इन बेहद सादा तबीयत लोगों के पास अपने लक्ष्य हैं जो इन्हें स्पंदित रखते हैं। महात्मा गांधी को भले ही नोबेल शांति पुरस्कार ना प्रदान किया गया हो, लेकिन जिन्हें दिया गया है, वे उन्हीं के पदचिह्नों पर चले हैं। पुरस्कार उन हजारों हजार सामाजिक कार्यकर्ताओं को स्पंदित कर गया है, जो देश  दुनिया के हालात बदलने की ख्वाहिश रखते हैं। 
 'मैं पिछले ४० सालों से मंदिर या मस्जिद नहीं गया हूं। मैं मंदिर में पूजा नहीं करता, मैं बच्चें की पूजा करता हूं। उन्हें उनकी आजादी और बचपन लौटाता हूं। ये भगवान के असली चेहरे हैं और ये ही मेरी ताकत।'
 यह कहना है बचपन बचाओ आंदोलन के संस्थापक और नोबेल शांति पुरस्कार के लिए चयनित कैलाश सत्यार्थी का। बच्चे हमें भी दिखते हैं चौराहों पर भीख मांगते हुए, ढाबों पर काम करते हुए, कारखानों में बंधुआ मजदूरी करते हुए और कभी अपनी मां के आंचल से चिपके इतने कमजोर कि उनकी मां आते-जाते राहगीरों को कह सके कि मेरा बेटा भूखा और बीमार है इसकी दवाई के पैसे दे दो। अमूमन हर दिन एेसे मंजर हमारी आंखों के सामने होते हैं, लेकिन हम में से कितनों के दिलों में यह खयाल मंजर छूटने के बाद भी पीछा करता है और यदि पीछा करता भी है तो कितने इन बच्चों से जुड़कर उनके हालात जानने की कोशिश करते हैं? ये कोई और ही माटी के बने होते हैं जिनका दिल पसीजता है और वे इन्हें बचाने के लिए बचपन बचाओ जैसा आंदोलन खड़ा कर देते हैं। कैलाश सत्यार्थी जैसे लोग अपने इस काम को पूजा भाव की तरह करते हैं। कैलाश ही क्यों, मदर टेरेसा कुष्ठ रोगियों के घाव सहलाती हैं, सुंदरलाल बहुगुणा पेड़ों से चिपककर चिपको आंदोलन चला देते हैं। मेधा पाटकर गांवों को डूब से बचाने के लिए नर्मदा बचाओ आंदोलन खड़ा कर देती हैं। बाबा आमटे मध्य प्रदेश के बड़वानी में नर्मदा किनारे रोगियों की सेवा करते हुए ही प्राण त्याग देते हैं। पर्यावरणविद् अनुपम मिश्र को राजस्थान सरकार पानी पर कार्यशाला के दौरान सितारा होटल में ठहराना चाहती है लेकिन वे गेस्ट हाउस में सादा कमरा ही चुनते हैं। इन बेहद सादा तबीयत लोगों के पास अपने लक्ष्य हैं जो इन्हें स्पंदित रखते हैं। वे दस से पांच की चक्करघिन्नी में केवल अपने और परिवार के लिए नहीं हैं। इनके परिवार और सरोकार बड़े हैं। कैलाश सत्यार्थी को भी अक्सर स्कूल जाते हुए जूते गांठने वाले का बच्चा मिलता था जो स्कूल नहीं जाता था। उन्होंने अपने शिक्षक से सवाल किया कि वह क्यों नहीं स्कूल आ सकता ? संतोषजनक जवाब नहीं मिला तो वो बच्चे के पिता के पास गए और बोले ये स्कूल क्यों नहीं आता? उस पिता का कहना था कि हम गरीब लोग हैं हमें यही सब करना है।
      सवालों के संतोषजनक जवाब जब नहीं मिलते हैं, तब ही व्यक्ति असली खोज में लगता है। अधिकांश लोग मानते हैं 
कि जब तक गरीबी खत्म नहीं होगी तब तक बाल श्रम समाप्त नहीं होगा, लेकिन सत्यार्थी मानते हैं कि जब तक बाल मजदूरी समाप्त नहीं होगी तब तक गरीबी खत्म नहीं होगी। बाल मजदूरी असाक्षरता को बढ़ावा देती है और असाक्षरता गरीबी को। दरअसल, यह कभी ना खत्म होने वाला चक्र है। कई बार बच्चों को, मां-बाप की तुलना में आसानी से काम मिलता है। वे कम मजदूरी में काम करते हैं हर अत्याचार सहते हैं। एक दिल दहलाने वाली सच्चाई यह भी कि बाजार में इन गरीब बच्चों की कीमत जानवरों से भी कम है। ये गाय, भैंंस से भी कम कीमत में बेच दिए जाते हैं। बच्चों से जुड़ा कारोबार इस कदर भयावह है कि देश को कई नौजवानों और आंदोलनों की जरूरत है।
    कुछ सुधीजनों का मानना है कि ये नोबेल तो पश्चिमी देशों की साजिश है। दुनिया के दो बडे़ युद्ध इन्हीं की सरजमीं पर हुए हैं अब लक्ष्य एशिया का ये दक्षिणी हिस्सा है अन्यथा एक हिंदू और एक मुसलमान कहने की आवश्यकता नोबेल समिति को नहीं पडऩी चाहिए थी। हैरानी होती है कि पिछले सात दशकों से ये मौका दुनिया को दिया किसने? कौन नफरत की आग को  जलाकर अपनी रोटियां सेंक रहा है? क्यों हमने आज भी एेसे मुद्दे जिंदा रखे हैं जो विकास की रफ्तार में अपना वजूद ही खो चुके हैं? जब   हमने विभाजन को जिंदा रखा हुआ है तो दुनिया कैसे भूलेगी। सरहद अब भी खून की प्यासी बनी हुई है
। जवान शहीद हो रहे हैं। पाकिस्तान यूएन में दस्तक देकर मुंह की खाता है। दो मुल्क अपने मुद्दे नहीं सुलझा सकते और अकसर लड़ते हैं तो कोई उन्हें अमन का पैगाम देने वाला क्यों मानेगा।  शांति पुरस्कार का साझा होना सुखद संयोग है। एक बच्ची मलाला, जिसने लड़कियों के पढ़ाई के हक को सारी दुनिया में गुंजाया और दूसरे जिसने इसी बचपन को संवारने के लिए आंदोलन चलाया। दो मुल्क मिल-जुलकर अपने हितों की बात करें तो कोई समिति फिर ये नहीं कहेगी।  बेशक ऐसा सुनना अच्छा नहीं  लगता।  

1 comment:

Pradeep Beedawat said...

deedi aapko bhi laadli media award ke liye badhai.