Wednesday, August 13, 2014

क्यों दें मेहनत की कमाई इस निकम्मे सिस्टम को

पंद्रह अगस्त को हमारे आजाद देश के  67 साल पूरे होने वाले हैं। हम सब इस आजादी का खूब एहतराम करते हैं, अपने पुरखों के त्याग को याद करते हैं, अपने शहीदों के आगे सिर झुकाते हैं, लेकिन एक सवाल अकसर जेहन में उठता है कि क्या ऐसे ही भारत के लिए जिंदा लोगों ने अपना सब-कुछ कुर्बान किया था? क्या हम सही दिशा में हैं? जवाब तो नहीं आता, लेकिन एक छटपटाहट सामने आती है। यह अंतहीन बेचैनी कभी-कभी गुस्से और दुख को ऐसा पसरा देती है कि लगता है कि ये वो सुबह तो नहीं। मेरे शहर जयपुर  में बीते एक पखवाड़े की तीन घटनाएं आपकी नजर-
                गांधी नगर स्थित पोस्ट ऑफिस में शुक्रवार सुबह साढ़े ग्यारह का वक्त। 'भाई साहब राखी पोस्ट करनी हैं, अजमेर। पहुंच तो जाएगी ना दो दिन में!' मेरा सहज सवाल था। 'सोमवार को पहुंचेगी।'डाक बाबू ने असहज-सा उत्तर दिया 'लेकिन विभाग तो दावा करता है कि स्पीड पोस्ट चौबीस घंटे में पहुंचाता है, फिर यह तो एक ही स्टेट का मामला है।' मैंने कहा। 'आप तो कुरिअर कर दो मैडम वो ही अच्छा  है।'डाककर्मी ने लिफाफा लौटाते हुए कहा। वाकई प्राइवेट कुरिअर से राखी अगले ही दिन अजमेर पहुंच गई।
          दूसरी घटना जेडीए सर्कल से ताल्लुक रखती है। सुबह का वक्त। गांधी सर्कल से आती हुई गाडिय़ों में से आखिरी गाड़ी को ट्रैफिकमैन प्रताप सिंह ने रोक दिया। सिग्नल देखा, जो पीले से लाल हो चुका था। माफी चाहती हूं मैं गलती पर हूं। इस माफी का प्रताप सिंह जी पर कोई असर नहीं पड़ा। वे इतनी बद्तहजीबी से पेश आए जिसकी आम महिला कल्पना भी नहीं कर सकती। चाबी लेकर लाइसेंस मांगकर वे कुछ लिखने लगे। कहा सौ रुपए दो। रूपए लेकर अचानक कहा, जाओ-जाओ, रसीद बाद में आपको मिल जाएगी। उल्टे बीस रुपए मुझे अपनी जेब से भरने पड़ेंगे। दंड भरना उचित था लेकिन वह व्यवहार अनुचित। बाद में  रसीद भी नहीं मिली।
          

               करीब पंद्रह दिन पहले भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) की साइट पर एक रिक्वेस्ट डाली। इंटरनेट के लिए। तमाम ब्योरे के साथ। तीसरे दिन एक मैसेज आता है कि अतुल माथुर आपकी रिक्वेस्ट को पूरा करेंगे। अतुल फोन पर कहते हैं, ये बताइए कि आपके क्षेत्र में बीएसएनएल का लैंड लाइन कनेक्शन है। यदि नहीं तो  कनेक्शन नहीं मिल सकता। 'कोई दूसरा विकल्प' -मैंने पूछा। 'नहीं और कोई नहीं' उनका टका-सा जवाब था।  तीन-चार बार  फोन करने के बावजूद कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला । इससे  ठीक विपरीत एक प्राइवेट कंपनी ने 24 घंटे में इंटरनेट सेवाएं उपलब्ध करवा दी।
               

             बेशक ये बहुत छोटी बातें नज़र आती हैं लेकिन यहीं से सरकार चलानेवालों की मंशा भी नज़र आती है। कहाँ बदलते हैं मेरे जैसे आम भारतीय के दिन ? सरकारें तो कई आईं लेकिन हमारे दिन नहीं आते। 
आपको हैरानी नहीं होती,  गुस्सा भी नहीं आता, आप आदी  हैं, अपने ही देश की अपनी ही सरकारी मशीनरी को इस तरह काम करता हुआ देखकर। ऐसे तीन नहीं सैकड़ों उदाहरण हैं। ये मशीनरी क्यों नहीं है आम आदमी के साथ? ढाई साल पहले राशनकार्ड के आवेदन लिए गए थे, आज तक बनकर नहीं आए हैं। जब ये सरकारी तंत्र हमारे किसी काम का ही नहीं, तो क्यों हम इनसे लाइसेंस, मूल निवास प्रमाण पत्र, राशन कार्ड या कोई भी सरकारी दस्तावेज बनवाएं? जब सरकार से बेहतर विकल्प जनता के सामने खुद सरकार ही मुहैया कराए है तो ये क्यों नाम मात्र को चल रहे हैं? जनता की मेहनत की कमाई क्यों इस निकम्मे सिस्टम पर खर्च होती है। क्यों कोई उस यातायात व्यवस्था पर भरोसा करे, जहां अपराधी जान और वाहन को क्षति पहुंचाकर बेखौफ बच निकलता है और बेगुनाह चपेट में आ जाता है। तंत्र तभी सार्थक लगते हैं, जब दंडित गुनहगार हो।

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