Wednesday, August 6, 2014

नग्नता अपराध नहीं


       क्या  एक निर्वस्त्र तस्वीर इस कदर विवादित और तकलीफदेह हो सकती है? नागपुर की एक अदालत में आमिर के पोस्टर के खिलाफ याचिका दायर हो गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि पोस्टर अश्लील है और यौन हिंसा को बढ़ावा देता है। एक बिना कपड़ों की देह पर €क्या  शोर मचाना। देह नहीं उसका रवैया, आंखें, बॉडी लैंग्वेज तय करती हैं अपराध की तीव्रता। लखनऊ के मोहनलाल गंज क्षेत्र में सामूहिक दुष्कर्म की शिकार दो बच्चों की मां कृष्णा की नग्न देह में भला क्या  अपराध छिपा हो सकता है? वह तो फेंक दी गई थी, दुष्कर्म के बाद। अपराध का भाव जिनके भीतर था उन्होंने एक कपड़ा भी नहीं डाला उस देह पर।

      आमिर खान की फिल्म  पीके के पोस्टर के बहाने हमारी उस मानसिकता की पोल खुल गई है, जो नग्नता को देखकर हायतौबा मचाने लगती है। अपराध वो है, जब एक स्त्री को निर्वस्त्र कर गांव में घुमाया जाता है, एक खौफ पैदा किया जाता है कि संभल जाओ अगर जो मर्यादा लांघी, हम तु्हारा भी यही हश्र करेंगे। हम उघाड़ेपन को लेकर बेहद अजीब समाज हैं। छोटे कपड़े पहने विदेशी सैलानियों का हम सड़क पर चलना मुश्किल कर देते हैं। अपराधबोध इतना ज़्यादा है कि कोई लड़की सड़क पर स्कूटर से गिर भी जाती है तो वह अपना पहला ध्यान कपड़ों पर देती है, बजाय इसके कि उसे कितनी गंभीर चोट आई है। मुंबई के  महाविद्यालय में विद्यार्धियों के लिए न्यूड मॉडल (http://likhdala.blogspot.in/2010/03/nude-pose.html)  बनी एक माँ को अपना प्रोफेशन  छुपाना पड़ता है ताकि मोहल्ले के लोग उसे अपमानित न करें। मोहनलाल गंज की कृष्णा की नग्न देह सबको दिखी, उस पर हुआ भीषण अपराध नहीं जो आज भी अपने गुनहगारों को तलाश रहा है । अपराध की ऐसी क्रूरता देख हमारी रूह नहीं कांपती, लेकिन बिना कपड़ों के देख कांप जाती है। 

           खूब तकलीफ हुई है पुरुषों को उस पोस्टर से। फेसबुक, वाट्सएप प्रतिक्रियाओं से भरे पड़े हैं। किसी ने उन्हें नग्नमेव जयते लिखा तो किसी ने कहा कि लड़कियों को चाहिए कि हेल्पलाइन में फोन कर शिकायत दर्ज कराएं। इससे अपराध में इजाफा होगा। सच कहा जाए तो अपराध इससे नहीं बढ़ेंगे, अपराध बढ़ेंगे इस देहयष्टि के अनैतिक, अमर्यादित आचरण से। आदिवासी क्षेत्रो में महिलाएं केवल एक वस्त्र ही अपने इर्द-गिर्द लपेटती हैं और पुरुष एक छोटी लंगोट धारण करते रहे हैं। वहां से तो कोई यौन हमलों की खबरें नहीं आती, बल्कि हम जरूर मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ के
आदिवासी क्षेत्रों में पहुंचकर झेंपने लगते हैं। यह हमारे भीतर का अपराध बोध है, जिसे हमने नकाबों से ढंक रखा है। यह नकाब की ग्रंथि कई बड़े अपराधों को जन्म दे रही है।
         

          एक कलाकार की पेंटिंग में भी हमें यही सब दिखाई देता है। न्यूड देखते ही हम भड़क उठते हैं। भारत के तमाम शहरों में बसे हम उनके गुफानुमा कला केंद्रों को जला डालते हैं, तहस-नहस कर देते हैं। उन पर मुकदमों का ऐसा वार करते हैं कि उन्हें किसी पराए देश में शरण लेनी पड़ती है और वहीं उनकी मौत हो जाती है। जिस कलाकार के चित्रों में भारत की मिट्टी और संस्कार रोशन होते थे हम उसे अंतिम व€त में देश की मिट्टी भी नसीब नहीं होने देते। उन्माद और पूर्वाग्रह अनैतिक करने से नहीं रोक पते। यह मानसिकता हमसे ऐसी ही भूल कराती है। इसका अंदाजा भी मुकदमेबाजों को नहीं होता कि वे देश के संघीय ढांचे को किस कदर नुकसान पहुंचा रहे हैं। यह कलाकार मकबूल फिदा हुसैन थे, जो सारी उम्र बिना किसी पद के भारत के ब्रांड एंबेसडर बने रहे, लेकिन जीवन के अंतिम बरसों में उन्हें देश छोडऩा पड़ा। किन्हीं रेखाओं, किन्हीं शब्दों , किन्हीं तस्वीरों पर ऐसी उत्तेजना , आक्रोश और आक्रामकता की दरकार नहीं है, दरकार वहां है, जहां आचरण ऐसा है। तस्लीमा नसरीन अपने देश से निष्कासित हैं। उनके लिखे पर बांग्लादेश के कट्टरपंथियों को एतराज है। उन्होंने उनके खिलाफ फतवा जारी कर रखा है। वे बरसों से भारत में शरण लिए हुए हैं। हाल ही उन्होंने भारत सरकार से गुहार की है कि उन्हें यहीं रहने दिया जाए। सलमान रश्दी भी दो साल पहले जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में शामिल नहीं हो सके थे, €क्योंकि कट्टरपंथी यहां भी हैं।अभिव्यक्ति के रास्ते तंग गलियों से होकर  नहीं गुजरने चाहिए।

8 comments:

Dilbag Virk said...

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 07-08-2014 को चर्चा मंच पर चर्चा - 1698 में दिया गया है
आभार

varsha said...

aapka shukriya dilbagji.

Hemant Sharma said...

bada tikha bahut ki kadwa par sach likha h....likhate rahe aapki hame jarurathai..

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

कड़वी दवा रोग को ठीक करती है।

मनोज कुमार said...

विचारोत्तेजक!

parmeshwari choudhary said...

बहुत सही लिखा आपने। यह हल्ला तो समझ से परे है। अश्लीलता भाव-भंगिमा में होती है ,शरीर में नहीं। कला में नग्नता मानवीय संवेदनाओं के देश-काल मुक्त चित्रण के लिए प्रयोग की जाती है।

varsha said...

aap sabka bahut shukriya...

parmeshwari ji aapne sahi likhaki अश्लीलता भाव-भंगिमा में होती है ,शरीर में नहीं। कला में नग्नता मानवीय संवेदनाओं के देश-काल मुक्त चित्रण के लिए प्रयोग की जाती है।

प्रदीप कांत said...

सवाल फिर वही है
मानसिकता का