Thursday, July 31, 2014

बिना विचारे लक्ष्मण


फिजा में भीनी महक है। त्योहारों की मिठास और जीवन का उल्लास घुला हुआ है। मनभावन सावन में तरुणी का सिंजारा आ चुका  है। लहरिये का रंग खूब सुन्दर है कावडि़यों के जयकारों की भी गूंज   है। ईद की सिवइयों का जायका भी होठों पर है, जो पूरे तीस दिन के रोजे और इबादत के बाद नसीब हुआ है। बारिश की बूंदों ने हर शै को बरकत भर दी है। ये बूंदे हैं ही इतनी पवित्र कि रूखे मन और सूखे ठूंठ में भी प्राण फूंकने का माद्दा रखती है। एेसे माहौल में कोई बेतुकी बात नहीं होनी चाहिए खासकर इन मीडिया चैनलों की तरह तो बिल्कुल नहीं जो केवल चीखने-चिल्लाने को बहस का नाम दे बैठे हैं। बहस में हर पक्ष को सुना जाता है । धैर्य और समन्वय का परिचय देते हुए सुंदर नतीजे पर पहुंचा जा सकता है, लेकिन शायद सुंदर नतीजों को टीआरपी नहीं मिलती तभी जी टीवी पर एक वक्ता दूसरे को   'टुच्चा' संबोधित कर रहे थे। वे कह रहे थे आप टुच्चे हैं। चले जाइए इस देश से। ये एंकर महाशय जो अर्णव गोस्वामी की हिंदी नकल हैं, उन्होंने पहले तो पूरा वार्तालाप हो जाने दिया फिर कह दिया कि चैनल इस तरह की शब्दावली से इत्तेफाक नहीं रखता।

           जिन दो मुद्दों ने सोचने पर विवश किया वह है महाराष्ट्र विधानसभा कैंटीन के केटर्रर के मुंह में रोटी ठूंसना और सानिया मिर्जा को पाकिस्तान की बहू करार देना। लॉन टेनिस प्लेयर सानिया की लोकप्रियता का यह आलम रहा कि साइना नेहवाल को अपना नाम याद रखवाने के लिए कुछ ज्यादा ही मेहनत करनी पड़ी, क्योंकि लोग उन्हें भी आदतन सानिया ही कह डालते थे। शटलर सनसनी को टेनिस सनसनी से खेल में तो नहीं नाम में काफी चुनौतियां मिलीं। वैसे, सानिया पाकिस्तान की बहू हैं यह सच्चाई है, लेकिन वे हिंदुस्तानी हैं, यह भी सच्चाई है। सानिया ने जब पाकिस्तानी क्रिकेटर शोएब मलिक  से शादी की थी तो सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर विरोधी संदेशों की कतार लग गई थी। आम हिंदुस्तानी को जाने क्यों बहुत अजीब महसूस हो रहा था लेकिन सानिया ने ना अपना खेल छोड़ा और ना अपना देश। उनका पासपोर्ट अब भी भारतीय है। वे सफाई देते हुए रो पड़ीं थीं। कई लोगों ने बतौर जीवन साथी विदेशी को चुना है। शशि कपूर की पत्नी जेनिफर कैंडल ब्रिटिश थीं। कथक नर्तकी शोभना नारायण ने ऑस्ट्रियन राजदूत से शादी की। देविका रानी के पेंटर पति स्वेतोस्लाव रोरिख रूसी थे, पूर्व राष्ट्रपति के. आर. नारायणन की पत्नी  बर्मा की थीं। फारूख अब्दुल्लाह ब्रिटेन के दामाद हैं। एक्ट्रेस रीना रे ने मोहसिन खान को चुना .  फिर ये सानिया मिर्जा को लेकर भाजपा के  तेलंगाना विधायक लक्ष्मण साहब ने तेलंगाना से एतराज क्यों किया? शायद यही सियासी  रवायत है  जो कभी नहीं बदलती।  अगर शक उनकी काबिलियत पर होता या इस बात पर कि आखिर एक करोड़ रुपया इस मद में खर्च करने की क्या जरूरत है, तब भी मुद्दे पर गौर किया जा सकता था। नई सरकार ने भले ही पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को अपने शपथ समारोह के लिए न्यौता दिया या वे  अगले महीने फिर लाहौर में भी मिल रहे हों इसके बावजूद पाकिस्तान को मुद्दा बनाकर पार्टी यह भूलती हुई मालूम होती है कि वे अब विपक्ष में नहीं सरकार में हैं। सरकार में रहते हुए कई मुद्दे उस तरफ से थोड़े अलग नजर आते हैं। वैसे सवाल ये जरूर उठना चाहिए कि ब्रांड एम्बेसडर को एक करोड़ रुपए तक देने की क्या जरूरत आन पड़ी। वे आंध्र प्रदेश की बेटी हैं तो यूं भी ब्रांड तेलंगाना को चमका सकती थीं।
शिद्दत से महसूस होता है कि अभी हमें विकास की बात नहीं करनी चाहिए अभी तो जाति, धर्म, लिंग के झगड़ों से ही नहीं उबरे हैं। विकास को क्यों जबरदस्ती गले लगाने पर तुल गए हैं। ये विकास भी एेसा नटखट बालक है कि जहां ये सब बातें हो जाती हैं, उछलकर दूर भाग जाता है। शिवसेना के सांसद ने बिना विचारे केटर्रर के मुंह में रोटी ठूंस दी। वह रोजे से था। रोजे का इस कदर एहतराम है कि रोजेदार के सामने पानी पीना भी गुनाह है। हम सब अपने दफ्तरों में यह गुनाह आए दिन करते हैं। कभी यह जानने की जहमत नहीं उठाते कि एक माह के रोजों में उसकी समय-सारिणी कैसे बदलती है। दस्तूर के चलते सिवइयों का जिक्र जरूर गाहे-बगाहे कर बैठते हैं। हम नहीं झांकना चाहते उसकी दुनिया में। इसके विपरीत कुछ वरिष्ठ होते हैं, जो ध्यान रखते हैं कि अफ्तार का समय है और इस वक्त यदि वह काम की  मसरूफियत में उलझा हुआ है तो अफ्तार कराना  अपना फर्ज मानते हैं। बहरहाल  कहा जा रहा है कि संसद राजन विचार को  मालूम नहीं था कि कर्मचारी का रोज़ा है जो भी हो यह व्यवहार एक सत्ता के मद में डूबे  एक सांसद का था।  विचार पर पहले ही पुलिस में आठ मामले विचाराधीन हैं।  

   सावन के व्रत और रोजों की जुगलबंदी हमें सोचने का मौका देती है लेकिन हम इस वक्त की नब्ज को नहीं पकड़ पाते। हमारे विधायक  सांसद सकारात्मक भूमिका से परे मालूम होते हैं। राजन विचारे हो या के लक्ष्मण ये बिना विचारे ही लक्ष्मण रेखा लांघते रहे हैं।  

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