Wednesday, November 26, 2014

पट्टी पढ़ते हुए

कवर स्टोरी के लिए बाबाओं की भूमिका और समाज के हालात को लेकर विचार-विमर्श चल ही रहा था कि शिक्षा मंत्री स्मृति ईरानी की एेसी तस्वीर सामने आ गई जिसमें वे ज्योतिषाचार्य से पूछ रही हैं कि उनका अपना भविष्य क्या है? बेशक ज्योतिष एक गणना है और कुछ लोग इस गणित को जानते हैं ।  मंगलगृह पर सफलतापूर्वक यान पहुंचाने वाले देश के कर्णधार अगर ग्रहों को यूं पढ़वाने में यकीन रखते हैं तो समझा जा सकता है कि क्यूं देश का बड़ा हिस्सा बाबाओं की चपेट में है।
                एक दूर के रिश्ते की बुजुर्ग हैं। एक समय में वे बड़ी-पापड़ बनाकर ठीक-ठाक व्यवसाय कर लेती थीं। पिछले बीस सालों से बाबाजी की संगत में हैं। कामकाज छोड़ दिया, वहीं सेवा करती हैं, सत्संग में आती-जाती हैं। उठते-बैठते उन्हीं का नाम लेती हैं और खुश हैं। हैरत की बात है कि बाबा ने उन्हें कौनसी युक्ति दी है कि वे सब कुछ भूलकर उन्हीं को जपती हैं और उनके दर्शन को शहर-शहर जाना नहीं छोड़ती। उद्यम अब उनसे होता नहीं लेकिन बाबा की आस्था उनसे सब कुछ करवा लेती है।
                    मिलन की मां उसके हकलेपन से बहुत चिंतित थी। उन्हें लगता था कि कैसे भी हो उनके बच्चे की जुबां साफ हो जाए। एक दिन एक झोलाधारी ने द्वार पर दस्तक दी। उसने यकीन दिलाया कि उसके पास ऐसी जड़ी-बूटियां हैं जो मिलन की हकलाहट को दूर कर सकती है। मिलन की मां के जेहन में ऐसे कई चमत्कारी किस्से दर्ज थे। वे कोई अपढ़ नहीं थीं, बारहवीं पास थीं। मन के भीतर से आती 'नाÓ को धकेलकर उन्होंने झोलाधारी बाबा को अहाते में बुला लिया। उसने हल्दी, हींग,तेल गरम पानी जैसी कुछ चीजें तो भीतर से मंगवाई और कुछ सूखी और टेढ़ी-मेढ़ी चीजों को पीसकर पाउडर बनाया। फिर कहने लगा इसमें एक जरूरी चीज पड़ती है जो बहुत महंगी है। मिलिंद की मां ने पूछा- वह क्या? सोने की भस्म। बाबा  ने मिलिंद की मां की आंखों में देखते हुए कहा- आठ सौ रुपए लगेंगे। एक घंटे से इस औषधि निर्माण प्रक्रिया में लगी मिलिंद की मां को अचानक सारी मेहनत व्यर्थ मालूम हुई। आठ सौ रुपए नहीं थे उनके पास। बाबा  ने पूछा कितना है घर में? थोड़ा मैं अपनी ओर से मिला दूंगा। तुम्हारा बच्चा बहुत प्यारा है। सौ-सौ रुपए के पांच नोट वह भीतर से ले आई। मां के भीतर एक भरी पूरी उम्मीद रोशन हो रही थी। सुबह-शाम दो बार पिलाने का नुस्खा  देकर बाबा गायब हो चुका था। दवा तो नियमित पिलाई, लेकिन मिलन का हकलापन किसी नियम सा ही जारी रहा। पांच सौ रुपए ठगाने की बात वह आज तक अपने पति को भी नहीं बता पाई हैं।
       ये ठगी बदस्तूर जारी है। आपके दुखों को हर लेने के लिए ये ठग हर रूप में, हर कहीं मौजूद हैं। आप यह समझ ही नहीं पाते कि आप गलत जगह दस्तक दे रहे हैं। आपके भीतर मौजूद भय, असुरक्षा और भविष्य की खुशियों के जवाब इनकी चाबी से नहीं खुलने वाले। ऐसा भ्रम ये जरूर देते हैं। पढ़ा-लिखा होना मायने नहीं रखता, मायने रखता है कि आप किस कदर डरे हुए हैं। तब  सलाह देने वाले आपको घेर ही लेंगे। दुख से घिरे इंसान को पहली सलाह दी जा जाती है कि सत्संग में जाया करो। दिल बहल जाएगा। अपने जैसे दुखियारों से मिलकर बेशक दर्द हल्का होता है लेकिन श्रेय ले जाते हैं ये बाबा। इनके सिंहासन भव्य और और भव्य होते जाते हैं। सोचना हमें है। हम कैसे अपनी खुशियों की चमक को इन भव्य सिंहासनों से जोड़ लेते हैं। इनके नहाए हुए दूध से बनी खीर को प्रसाद मानकर खाने वालों के लिए यह कह देने से कि आस्था अंधी है, बात पूरी नहीं होती। खुदी को बुलंद करना होगा। अपने भय के इलाज, टोटकों से निकालने होंगे। मुकद्दर की मरम्मत करनेवाले ये कोई नहीं होते।  कोई शनिवार लोहे के लिए बुरा नहीं होता।कोई बृहस्पतिवार  बालों की दशा नहीं बिगड़ता जो हम उस दिन बल नहीं धोते।   बुरे होते हैं हमारे शक , हमारे अंध विश्वास।  मंत्री महोदया को भी समझना होगा कि किस्मत तो उन की भी होती है जिनके हाथ नहीं होते। स्वच्छता अभियान के साथ देश से आस्था के इन ठेकेदारों की सफाई भी जरूरी है। ये यूं ही किसी को पट्टी नहीं पढ़ा सकते और जो पढ़ रहे हैं वे कमजोर और असुरक्षित हैं। हमारे देश की मंत्री भी।

Wednesday, November 19, 2014

नसबंदी नहीं नब्ज़बंदी

ये बेदान बाई  हैं  जिनकी बेटी की बिलासपुर के नसबंदी शिविर में नब्ज़ बंद हो गयी।  अब इस बच्ची की माँ जैसी देखभाल कौन करेगा। ।तस्वीर  AP

 बिलासपुर के नसबंदी शिविर में  पंद्रह युवा माओं की  जान चली गयी।  हादसे के  भी छत्तीसगढ़ सरकार की  नीयत तह तक पहुंचने की नहीं लगती, जांच की जिम्मेदारी एकल न्याय आयोग को दी गई है। न्यायाधीश अनीता झा सेवानिवृत्ति के बाद छत्तीसगढ़ वाणिज्यिक कर अभिकरण में अध्यक्ष पद के लिए पहले ही आवेदन कर चुकी हैं। जिस आदिवासी लड़की मीना खलखा को माओवादी बताकर पुलिस ने हत्या कर दी थी उस मामले की जांच भी इन्हं हीे सौंपी गई थी। रिपोर्ट तीन महीने में आनी थी आज तक नहीं आई।

पिछले साल भारत में चालीस लाख नसबंदी ऑपरेशन हुए और इन्हें कराने वाली 97 फीसदी महिलाएं थीं यानी केवल तीन फीसदी पुरुषों को अपने परिवार की चिंता थी। यह छोटा सा आंकड़ा भारत के उस पारिवारिक संस्कृति की पोल भी खोलता है कि यह अगर जीवित है तो उसका 97 प्रतिशत श्रेय स्त्री को ही जाता है। वही बच्चों का लालन-पालन भी करती है तो वही अपने शरीर में एेसी व्यवस्था भी कराती है कि पति को कोई कष्ट ना हो। वही अपनी सखी परिचित से सलाह-मश्विरा कर एेसे उपाय अपनाती है कि चल इस बार तो नसबंदी करा ही लेते हैं नहीं तो फिर एक बच्चा आ जाएगा। सब जानते हैं कि पुरुष नसबंदी अधिक आसान है
यहां बात टीवी विज्ञापन में दिखाए जाने वाले हंसते-मुस्कुराते अमीर परिवारों की नहीं हो रही है। ये बात उन महिलाओं की है जो बच्चा जनने के लिए भी सरकारी अस्पतालों पर आश्रित है तो बच्चों का आगमन रोकने के लिए भी ।  दोनों ही हालात में मौत की आशंका भी उसी से जुड़ी है। सरकारी अस्पताल साधन और सुविधा संपन्न  नहीं हैं, यही तथ्य है।
             जनसंख्या विस्फोट भारत की सबसे बड़ी समस्या है जो समूचे विकास को लील जाती है। सरकारों ने इस संकट को जाना है और विस्फोटक अंदाज में ही हल के प्रयास किए हैं। लक्ष्य है कि 2026 तक भारत में प्रति महिला बच्चा जनने की दर 2.1 हो जाए जबकि चीन ने तो वर्तमान दर ही 1.55 कर ली है। अभी  भारत में ये 2.55 है। बिलासपुर में उस दिन एक चिकित्सक ने पांच घंटों में 83 महिलाओं की नसबंदी की। जाहिर है डॉक्टर्स पर नसबंदियों का दबाव है लेकिन यह दबाव गरीब, असाक्षर और कुपोषित स्त्री पर ही चलता है। तस्वीर देखिए, छत्तीसगढ़ की स्त्रियों की। हरेक कम उम्र की कमजोर, युवा मां है।
चालीस लाख के आंकड़ों की भयावह सच्चाई है कि ये नसबंदियां बस कर दी जाती हैं। वैसे ही जैसे नगर निगम उन आवारा पशुओं की कर डालता है ताकि संख्या और ना बढ़े। हमारी सरकार और उनकी व्यवस्था भी स्त्री को इससे ज्यादा इज्जत नहीं बख्शती। ऐसा कहर तो आपातकाल में भी नहीं मचा था जब संजय गांधी ने जबरदस्ती नसबंदी अभियान चलाया था।
सरकारी चिकित्सा तंत्र ये मानते रहे हैं कि इन महिलाओं में कहां इतनी जागरुकता है जो वे कुछ महसूस कर सकें।  संक्रमण ना होने के किसी भी मानदंड पर ये तरीके खरे नहीं उतरते। ऑपरेशन कक्ष, औजार, मरीज के कपड़े सब संक्रमण के लिए खुले हैं। ऊपर से दवाईयां भी नकली। मौत का पूरा इंतजाम यहां होता है। जिंदा रहते भी हैं तो यह मरीज की अपनी प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्युनिटी है। शिविरों का सच इतना ही खौफनाक है। आंखों के शिविर मरीजों की रोशनी से खिलवाड़ कर जाते हैं लेकिन बिलासपुर ट्रेजेडी पंद्रह युवा मातााओं की जान से खेल गई है।
छत्तीसगढ़ सरकार की नीयत  तह तक पहुंचने की नहीं लगती, यह और चिंता की बात है। यह परिवार नियोजन कार्यक्रम के हित में भी नहीं होगा। क्या कोई सरकार इतनी पारदर्शी नहीं हो सकती कि कहे कि हम दोष और दोषी को सार्वजनिक करेंगे। शायद ऐसा करने पर सरकार स्वयं कटघरे में होगी। एक नहीं कई स्तरों पर तभी तो जांच की जिम्मेदारी एकल न्याय आयोग को दी गई है। न्यायाधीश अनीता झा सेवानिवृत्ति के बाद छत्तीसगढ़ वाणिज्यिक कर अभिकरण में अध्यक्ष पद के लिए पहले ही आवेदन कर चुकी हैं। जिस आदिवासी लड़की मीना खलखा को माओवादी बताकर पुलिस ने हत्या कर दी थी उस मामले की जांच भी इन्हं हीे सौंपी गई थी। रिपोर्ट तीन महीने में आनी थी आज तक नहीं आई। जब नतीजे ऐसे ही दरगुजर किए जाते रहेंगे तो मान के चलना चाहिए कि सरकारें स्त्री और उसकी सेहत दोनों के लिए संवेदनहीन है।

Wednesday, October 15, 2014

एक हिन्दू एक मुसलमान

महात्मा गांधी को भले ही नोबेल शांति पुरस्कार ना प्रदान किया गया हो, लेकिन जिन्हें दिया गया है, वे उन्हीं के पदचिह्नों पर चले हैं। पुरस्कार उन हजारों हजार सामाजिक कार्यकर्ताओं को स्पंदित कर गया है, जो देश  दुनिया के हालात बदलने की ख्वाहिश रखते हैं।  कैलाश ही क्यों, मदर टेरेसा कुष्ठ रोगियों के घाव सहलाती हैं, सुंदरलाल बहुगुणा पेड़ों से चिपककर चिपको आंदोलन चला देते हैं। मेधा पाटकर गांवों को डूब से बचाने के लिए नर्मदा बचाओ आंदोलन खड़ा कर देती हैं। बाबा आमटे मध्य प्रदेश के बड़वानी में नर्मदा किनारे रोगियों की सेवा करते हुए ही प्राण त्याग देते हैं। पर्यावरणविद् अनुपम मिश्र को राजस्थान सरकार पानी पर कार्यशाला के दौरान सितारा होटल में ठहराना चाहती है लेकिन वे गेस्ट हाउस में सादा कमरा ही चुनते हैं। इन बेहद सादा तबीयत लोगों के पास अपने लक्ष्य हैं जो इन्हें स्पंदित रखते हैं। महात्मा गांधी को भले ही नोबेल शांति पुरस्कार ना प्रदान किया गया हो, लेकिन जिन्हें दिया गया है, वे उन्हीं के पदचिह्नों पर चले हैं। पुरस्कार उन हजारों हजार सामाजिक कार्यकर्ताओं को स्पंदित कर गया है, जो देश  दुनिया के हालात बदलने की ख्वाहिश रखते हैं। 
 'मैं पिछले ४० सालों से मंदिर या मस्जिद नहीं गया हूं। मैं मंदिर में पूजा नहीं करता, मैं बच्चें की पूजा करता हूं। उन्हें उनकी आजादी और बचपन लौटाता हूं। ये भगवान के असली चेहरे हैं और ये ही मेरी ताकत।'
 यह कहना है बचपन बचाओ आंदोलन के संस्थापक और नोबेल शांति पुरस्कार के लिए चयनित कैलाश सत्यार्थी का। बच्चे हमें भी दिखते हैं चौराहों पर भीख मांगते हुए, ढाबों पर काम करते हुए, कारखानों में बंधुआ मजदूरी करते हुए और कभी अपनी मां के आंचल से चिपके इतने कमजोर कि उनकी मां आते-जाते राहगीरों को कह सके कि मेरा बेटा भूखा और बीमार है इसकी दवाई के पैसे दे दो। अमूमन हर दिन एेसे मंजर हमारी आंखों के सामने होते हैं, लेकिन हम में से कितनों के दिलों में यह खयाल मंजर छूटने के बाद भी पीछा करता है और यदि पीछा करता भी है तो कितने इन बच्चों से जुड़कर उनके हालात जानने की कोशिश करते हैं? ये कोई और ही माटी के बने होते हैं जिनका दिल पसीजता है और वे इन्हें बचाने के लिए बचपन बचाओ जैसा आंदोलन खड़ा कर देते हैं। कैलाश सत्यार्थी जैसे लोग अपने इस काम को पूजा भाव की तरह करते हैं। कैलाश ही क्यों, मदर टेरेसा कुष्ठ रोगियों के घाव सहलाती हैं, सुंदरलाल बहुगुणा पेड़ों से चिपककर चिपको आंदोलन चला देते हैं। मेधा पाटकर गांवों को डूब से बचाने के लिए नर्मदा बचाओ आंदोलन खड़ा कर देती हैं। बाबा आमटे मध्य प्रदेश के बड़वानी में नर्मदा किनारे रोगियों की सेवा करते हुए ही प्राण त्याग देते हैं। पर्यावरणविद् अनुपम मिश्र को राजस्थान सरकार पानी पर कार्यशाला के दौरान सितारा होटल में ठहराना चाहती है लेकिन वे गेस्ट हाउस में सादा कमरा ही चुनते हैं। इन बेहद सादा तबीयत लोगों के पास अपने लक्ष्य हैं जो इन्हें स्पंदित रखते हैं। वे दस से पांच की चक्करघिन्नी में केवल अपने और परिवार के लिए नहीं हैं। इनके परिवार और सरोकार बड़े हैं। कैलाश सत्यार्थी को भी अक्सर स्कूल जाते हुए जूते गांठने वाले का बच्चा मिलता था जो स्कूल नहीं जाता था। उन्होंने अपने शिक्षक से सवाल किया कि वह क्यों नहीं स्कूल आ सकता ? संतोषजनक जवाब नहीं मिला तो वो बच्चे के पिता के पास गए और बोले ये स्कूल क्यों नहीं आता? उस पिता का कहना था कि हम गरीब लोग हैं हमें यही सब करना है।
      सवालों के संतोषजनक जवाब जब नहीं मिलते हैं, तब ही व्यक्ति असली खोज में लगता है। अधिकांश लोग मानते हैं 
कि जब तक गरीबी खत्म नहीं होगी तब तक बाल श्रम समाप्त नहीं होगा, लेकिन सत्यार्थी मानते हैं कि जब तक बाल मजदूरी समाप्त नहीं होगी तब तक गरीबी खत्म नहीं होगी। बाल मजदूरी असाक्षरता को बढ़ावा देती है और असाक्षरता गरीबी को। दरअसल, यह कभी ना खत्म होने वाला चक्र है। कई बार बच्चों को, मां-बाप की तुलना में आसानी से काम मिलता है। वे कम मजदूरी में काम करते हैं हर अत्याचार सहते हैं। एक दिल दहलाने वाली सच्चाई यह भी कि बाजार में इन गरीब बच्चों की कीमत जानवरों से भी कम है। ये गाय, भैंंस से भी कम कीमत में बेच दिए जाते हैं। बच्चों से जुड़ा कारोबार इस कदर भयावह है कि देश को कई नौजवानों और आंदोलनों की जरूरत है।
    कुछ सुधीजनों का मानना है कि ये नोबेल तो पश्चिमी देशों की साजिश है। दुनिया के दो बडे़ युद्ध इन्हीं की सरजमीं पर हुए हैं अब लक्ष्य एशिया का ये दक्षिणी हिस्सा है अन्यथा एक हिंदू और एक मुसलमान कहने की आवश्यकता नोबेल समिति को नहीं पडऩी चाहिए थी। हैरानी होती है कि पिछले सात दशकों से ये मौका दुनिया को दिया किसने? कौन नफरत की आग को  जलाकर अपनी रोटियां सेंक रहा है? क्यों हमने आज भी एेसे मुद्दे जिंदा रखे हैं जो विकास की रफ्तार में अपना वजूद ही खो चुके हैं? जब   हमने विभाजन को जिंदा रखा हुआ है तो दुनिया कैसे भूलेगी। सरहद अब भी खून की प्यासी बनी हुई है
। जवान शहीद हो रहे हैं। पाकिस्तान यूएन में दस्तक देकर मुंह की खाता है। दो मुल्क अपने मुद्दे नहीं सुलझा सकते और अकसर लड़ते हैं तो कोई उन्हें अमन का पैगाम देने वाला क्यों मानेगा।  शांति पुरस्कार का साझा होना सुखद संयोग है। एक बच्ची मलाला, जिसने लड़कियों के पढ़ाई के हक को सारी दुनिया में गुंजाया और दूसरे जिसने इसी बचपन को संवारने के लिए आंदोलन चलाया। दो मुल्क मिल-जुलकर अपने हितों की बात करें तो कोई समिति फिर ये नहीं कहेगी।  बेशक ऐसा सुनना अच्छा नहीं  लगता।  

Thursday, September 18, 2014

कोई क्यों बहाए एशियाड के लिए पसीना

पिंकी प्रमाणिक याद हैं आपको? पश्चिम बंगाल की एथलीट पिंकी जिसने 2006 के दोहा एशियाड में 4 गुणा 100 रिले टीम में भारत को स्वर्ण पदक दिलाया था। अफसोस कि ये पिंकी अब इस नाते से अपनी पहचान नहीं रखती। वे उस आरोप से पहचानी जाती हैं जिसे उनकी साथी अनामिका आचार्य ने लगाया था। अनामिका ने कहा था कि पिंकी स्त्री नहीं पुरुष हैं और उन्होंने उसके साथ दुष्कर्म किया। जून 2012 में लगे आरोप के बाद पिंकी गिरफ्तार हो गईं। उन्हें लिंग परीक्षण के लिए एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल ले जाया जाता रहा। मर्द पुलिस कभी उनके कंधों पर हाथ धरती तो कभी उन्हें तंज के साथ छेड़ती। और तो और मेडिकल मुआयनों के दौरान उनका एमएमएस भी पुलिस ने लीक कर दिया। एक स्त्री के लिए यह बहुत ही भयावह अनुभव रहा होगा। बहरहाल  एक बहुत अच्छी खबर यह है कि बीते सप्ताह कोलकाता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश सुब्रत तालुकदार ने पिंकी को यह कहते हुए बाइज्जत बरी कर दिया है कि वे स्त्री हैं और दुष्कर्म के इलजाम का कोई आधार नहीं है।
       पिंकी को न्याय पाने में पूरे दो बरस लगे इस बीच यह एशियाई पदक विजेता एथलीट कई त्रासदियों से गुजरीं। जेल में उसे मर्दों की सेल में रखने की कोशिश हुई। जुलाई 2012 में लिखी इसी खुशबू की पाती में पिंकी के लिए बेहद अफसोस व्यक्त किया गया था। पाती में लिखा था कि जल्दी ही पुलिस और अस्पताल मिलकर परिणाम दे देंगे लेकिन यह इतना आसान नहीं था। एक लाइन की पुख्ता खबर किसी को नहीं हुई कि पिंकी का जेंडर क्या है। दो मिनट ठहरकर विचार कीजिए कि जिसने पूरी जिंदगी खुद को स्त्री माना हो और वैसी ही पहचान रखी हो उसे यकायक आप कैसे बदल सकते हैं। वह कैसे प्रस्तुत हो सकती है इस बदले हुए व्यवहार को झेलने के लिए। अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन के जर्नल में हाल ही प्रकाशित शोध में एक बात स्पष्ट है कि किसी का लिंग निर्धारित करना आसान नहीं है। यह मुश्किल है, महंगा है और कई बार सही भी नहीं होता है। हार्मोन और शरीर के अंगों का विकास स्त्री-पुरुष में बहुत ज्यादा अंतर नहीं रखता। दोनों के शरीर में यह मामूली अंतर पर भी हो सकता है यानी एक स्त्री में कई बार मेल हार्मोन ज्यादा हो सकते हैं और कई बार एक पुरुष में फीमेल हार्मोन।
        सवाल यह उठता है कि अब क्या उस महिला पर कार्रवाई होगी जिसने पिंकी पर ये इलजाम लगाए। अनामिका पिंकी की पड़ोसन थी जो अपने पति से अनबन के बाद एक बच्चे को लेकर पिंकी के घर रहने आ गई थी। कुछ दिन सब ठीक चला फिर पिंकी के उसे घर छोड़कर जाने के लिए  कहते ही बात बिगड़ गई। अनामिका ने इलजाम लगाया कि पिंकी पुरुष हैं जिसने उनके साथ दुष्कर्म किया और एशियाड में जीता स्वर्ण पदक भी झूठा है। क्या इस झूठे इलजाम के बाद अनामिका पर कार्रवाई होगी? क्या दुष्कर्म का इलजाम एक गैर-जमानती और गंभीर सजा वाला आरोप है इसलिए यह एक हथियार की तरह इस्तेमाल होता है, खासकर तब जब रिश्ते में अनबन हो गई हो। बेशक, यह सब गहरी तफ्तीश से जुडे़ मसले हैं, जिनमें कई बार काफी वक्त लग जाता है। इस दौरान यह खयाल जरूर आना चाहिए कि बंदा निर्दोष तो बाद में सिद्ध होता है लेकिन उसके दोषी होने की झूठी कहानियां पहले ही स्थापित हो जाती हैं। पिंकी की बहादुरी को सलाम है कि उन्होंने भारतीय कानून में आस्था रखते हुए अपना पक्ष रखा। पिंकी कहती हैं मुझे पूरा भरोसा था कि सच की जीत होगी। बेशक,  पिंकी जीत गई लेकिन भीतर कुछ हारा हुआ-सा, कुछ दरका हुआ-सा महसूस होता है कि हम अपने विजेताओं के साथ कैसा सुलूक करते हैं? 
        आज जिस एशियाड में पदक के लिए सानिया मिर्जा अपनी रैंकिंग से समझौता करने के लिए तैयार हैं उसकी हमने क्या कद्र की? उन्होंने वल्र्ड रैकिंग के अपने नौ सो अंक कुरबान कर एशियाड को तवज्जो दी ताकि देश के खाते में मेडल जोड़ सकें। उसी एशियाड में स्वर्ण पदक विजेता पिंकी प्रमाणिक को हमने किस कदर अपमानित और शर्मिंदा किया। बावजूद ये खिलाड़ी केवल और केवल तिरंगे के लिए अपना खून-पसीना एक करते हैं। एक ही लक्ष्य होता है इनका देश के लिए पदक जीतना। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि इन्हें अपमानित करने से पहले जांच पक्की और पूरी हो।



Wednesday, September 10, 2014

हिंदी मेरी जान मेरी कोम मेरा मान


हिंदी दिवस पर काम करते हुए मेरी कॉम देख ली जाये तो फिर जो लिखा जाता है वही आपकी नज़र 


जहां उत्तर पूर्व की बॉक्सर मेरी कोम पर हिंदी में फिल्म बनकर पूरे देश में उन्हें सम्मान दिला सकती है, जहां प्रधानमंत्री बच्चों की पाठशाला में अंग्रेजी सवालों का जवाब भी हिंदी में देते हों, जहां के दिग्गज खिलाड़ी  (सुनील गावस्कर, राहुल द्रविड़, सौरव गांगुली) जो केवल अंग्रेजी में ही शब्दों की जुगाली किया करते थे, वे भी अब हिंदी में धड़ाधड़ क्रिकेट टिप्पणियां कर रहे हों, वहां हिंदी को लेकर चिंता की क्या बात हो सकती है? हर तरफ हिंदी का ही जलवा तो है। और तो और, पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान से भी खिलाड़ी खूब हिंदी बोलते नजर आ रहे हैं। वसीम अकरम, शोएब अख्तर, रमीज राजा सब हिंदी के ही रथ पर सवार हैं। विज्ञापन दुनिया के बड़े-बड़े कॉपी राइटर इन दिनों हिंदी में पंच लाइन ढूंढते फिर रहे हैं।
           पंच की बात चली है तो फिल्म मेरी कोम के जरिए एेसा कथा सत्य बाहर आया है कि हम सब उन्हें और भी जानने के लिए उत्सुक हो गए हैं, जिनके शब्दकोष में डर नाम का शब्द ही नहीं। अपनी ख्वाहिश के लिए जो पूरे समय पूरी बहादुरी के साथ खड़ी हैं । अभाव और आर्थिक बदहाली के बावजूद आंखों में लक्ष्य बसा है, वही लक्ष्य जिसने पूरी दुनिया में भारत का नाम रोशन किया है।
पांच बार की वर्ल्ड  चैंपियन मेरी  कोम मणिपुर से आती हैं। उत्तर-पूर्व के सात राज्यों में से एक मणिपुर। उग्रवाद के चलते विकास की राह में अब भी पिछड़ा हुआ। इरोम शर्मिला इसी संघर्ष को खत्म करने के लिए चौदह सालों से अन्न-जल त्यागे बैठी हैं। इरोम का संघर्ष मणिपुर के उन हालात को बदलने का संघर्ष है, जिसका मेरी कोम जैसे लोग शिकार हो जाते हैं। मेरी के ससुर की हत्या इसी उग्रवाद से हुई है।
         मेरी कोम की कहानी उनके पति ओनलर के बिना अधूरी है। ओनलर का एेसा त्याग और समर्पण रहा है, जो आमतौर पर अपने पति के लिए भारतीय स्त्री का होता है। वे ऊंचाई पर कॅरिअर छोड़ देती हैं अपने पति और बच्चों के लिए। यहां इस भूमिका में मेरी कोम के पति हैं। एेसा करने का हौसला सिर्फ प्यार ही देता है तभी तो ओनलर कहते हैं, मेरी को केवल मैं ही संभाल सकता था इसलिए मैंने उसके साथ शादी की। ओनलर एक मां की तरह बच्चे संभालते हैं, जब मेरी विश्व बॉक्सिंग चैम्पियनशिप में हिस्सा लेती हैं। वह फुटबॉल छोड़ देते हैं ताकि मैरी बॉक्सिंग जारी रख सकें, फिल्म का एक संवाद बहुत अच्छा है, जब कोच कहते हैं मां बनने के बाद स्त्री की ताकत दोगुनी हो जाती है, तुम्हें चैंपियन बनने से कोई नहीं रोक सकता। 
फिल्म अच्छी है क्योंकि हरे खेत हैं,  मणिपुरी हिंदी जैसी ज़ुबां है, तेरी मैं बालाएं लूं.. जैसी मीठी लोरी है , परिदृश्य में अस्थिर मणिपुर है।मैरी की सफलता एक बार दुनिया की चैंपियन बनने में नहीं है, बल्कि वे पांच बार विजेता रही हैं। 2012 के ओलंपिक में भले ही कांस्य मिला हो, लेकिन 2016 के लिए गोल्ड जीतने का माद्दा रखती हैं।
         दरअसल, मैरी की कहानी उन महिलाओं के लिए बहुत अच्छा उत्तर है, जो मान बैठती हैं  कि शादी और बच्चों ने उनका कॅरिअर खत्म कर दिया है। खत्म कुछ भी नहीं होता, यदि आपमें साहस बचा है। यह बहुत थोड़े समय का ही अवकाश होता है जो आपकी दृढ़ इच्छाशक्ति के कारण बाधा नहीं बनता। काम के प्रति लगन आपको फिर स्थापित कर सकती है। इस बीच एेसा कई बार लग सकता है कि मेरी प्रतिभा, मेरा काम अब बीते समय की बात हो गई, लेकिन एेसा होता नहीं है। हुनर हर हाल में मंजिल तलाश लेता है।
                     फिल्म भले ही मेरी कोम के विश्व चैंपियनशिप जीतने के साथ खत्म हो जाती है, लेकिन 31 साल की मैरी इन दिनों मणिपुर में बॉक्सिंग अकादमी चला रही हैं। इसमें कोई  भी दाखिला ले सकता है, बशर्ते उसमें बॉक्सिंग सीखने का जुनून हो। पैसे की कमी यहां रोड़ा नहीं बनती, जबकि मेरी ने बहुत अभाव में  बॉक्सिंग की शुरुआत की थी। मैरी वो स्त्री है, जो  आंखों में ख्वाब लिए चलती है, बिना रुके, डरे बस चलती ही जाती हैं। दरअसल, यही आज के समय की भी मांग है। थोपे हुए फैसले मत लो। अपने मन को मान देना सीखो। जो फैसले आपके चेहरे पर मुस्कुराहट लाएंं, उनके लिए कभी अपराधबोध मत पालो। दरअसल, मेरी कोम जैसी स्त्रियां पूरी स्त्री कौम के लिए प्रेरणा का समंदर रचती हैं। फिल्म के अंत में जब राष्ट्रगान बजता है तो दर्शक स्वत:स्फूर्त खड़े हो जाते हैं, यह राष्ट्र गौरव से मेरी के जुड़ जाने का नतीजा है। हिंदी भी हमारा राष्ट्र गौरव है, इसे जानने के लिए खूब फ़क्र  कीजिए, अंग्रेजी न जानने की फिक्र मत कीजिए, वह हमारी नहीं है।

Friday, September 5, 2014

आधे घंटे का आसमां

ये आधे घंटे का आसमां 
कोई जादुई करिश्मा-सा था 
एक ऐसा रंगमंच 
जहाँ ज़िन्दगी खेली जा रही थी।  

साँझ के इस अनुपम टुकड़े से 
आँखें तब तक जुडी रहीं 
जब तक वहां रौशनी मौजूद रही 
आखिरी कतरे तक 
काले बादलों के बीच 

कभी के अस्त हो चुके सूरज से 
सुनहरी रेखाएं
चमकीले बिंदु 
एक विराट खेल 
रच रहे थे 
ऐसा खेल जो कह रहा था
रोशन दिल ही शिनाख्त है 
ज़िन्दगी की।  

ज्यों ही आसमां गहराया 
रेखाओं  और बिन्दुओं  की 
लय-ताल टूटी 
निगाह भी छूटी 
हाँ केवल और केवल 
रौशनी ही शिनाख़्त  है ज़िन्दगी की 


आज के दिन यही पाठ  पढ़ाया कुदरत ने 

Wednesday, August 27, 2014

लव जी हद

लव जी हद, सिंधी भाषा में  इसके मायने हुए प्रेम की हद तय करना और कुछ लोग इस काम में इन दिनों बढ़ -चढ़कर लगे हुए हैं। सोमवार की शाम  times now के एंकर अर्णव गोस्वामी ने एक बहस में भाजपा प्रवक्ता से तीन बार पूछा कि 'लव जिहाद'  क्या है फैक्ट या फिक्शन तो उन्होंने तीनों बार बहुत कुछ कहा लेकिन एक बार भी स्पष्ट जवाब नहीं दिया



'लव जिहाद' और 'प्रेम युद्ध' इन दो शब्द युग्मों से इन दिनों  खूब पाला पड़ रहा है। प्रेम, मोहब्बत, लव ये अपने आप में मुकम्मल शब्द हैं इनके साथ जब कुछ और जुड़ता है तो तय मानिए मामला संदिग्ध है। इरफाना पढ़ी-लिखी समझदार लड़की है। लिखने का शौक उन्हें अखबार के कार्यालय तक ले गया। वहीं बेहद काबिल लेखक वसंत से उनकी मुलाकात हुई। मुलाकातें  क्या होती दुनिया के तमाम मुद्दों पर दो व्यक्ति विचारों की एेसी रेल बनाते कि वक्त का पता ही नहींं चलता। दोनों को लगा कि हम साथ रहने के लिए ही बने हैं। वसंत ने कहा न तुम्हें अपना धर्म बदलने की जरूरत है, न मुझे। क्या हम शादी कर सकते हैं? लड़की बोली ये तो मुश्किल है। काज़ी दो मुसलमान का निकाह कराते हैं और पंडित दो हिंदुओं की शादी। हमारी शादी कैसे हो सकती है? वसंत ने लड़की की आंखों झांकते हुए कहा कि भारतीय संविधान हमें यह हक देता है। अगर बालिग हैं तो विशेष विवाह अधिनियम के तहत दो अलग-अलग धर्मों या विश्वास को मानने वाले शादी कर सकते हैं। इरफाना की गहरी आंखों में अब चमक थी, दोनों की शादी हो गई।
फर्ज कीजिए, अब इसी कहानी में इरफाना का परिवार और समाज एक हो जाता है और इरफाना की इस शादी को मंजूरी न देकर लड़के पर तमाम इलजाम लगाकर उसे धोखेबाज बताता है और मानने लगता है कि यह समाज विशेष दूसरे समाज की लड़कियों को धोखे से बहका रहा है और हमें लड़कियों को इससे बचाना है तब? वह इस निहायत निजी मसले को बेहद व्यापक बनाकर प्रेम युद्ध का नाम दे देता तो ? खुशकिस्मती से एेसा कुछ नहीं हुआ।
एक और कहानी सुनिए। कविता एक निजी स्कूल में पढ़ाती हैं। उसी स्कूल के दफ्तर में इम्तियाज भी कार्यरत हैं । कविता की एक बार स्कूटी पंक्चर हो गई। इम्तियाज ने मदद के लिए हाथ बढ़ाया। गर्मियों में कविता स्कूल में ही बेहोश हो गई। साथी शिक्षिका के साथ इम्तियाज अस्पताल तक उसे लेकर गया। एेसी कुछ घटनाओं से कविता के दिल में इम्तियाज की खास जगह बन गई थी। इम्तियाज को शायद कविता पहले से ही पसंद थी। एक दिन इम्तियाज ने शादी का प्रस्ताव यह कहते हुए रखा कि क्या तुम्हारा परिवार हमारी शादी को मंजूरी देगा। कविता ने शादी का प्रस्ताव सुनकर इम्तियाज से मिलना-जुलना बंद कर दिया। स्कूल में वह उसकी तरफ देखती भी नहीं, लेकिन इन दूरियों से प्रेम कब मिटा है? कविता ने कहा कि मेरे घरवाले कभी इस शादी के लिए रजामंद नहीं होंगे। मैं शादी करना चाहती हूं लेकिन...। इस लेकिन को दोनों की आंखों से निकले आंसुओं ने बहा दिया। कविता ने इम्तियाज से निकाह कर लिया था। यह लव मैरिज थी इन दोनों के लिए, लेकिन कविता की बिरादरी की ओर से लव जिहाद बनकर निकली। उन्हें इम्तियाज में एक एेसा अपराधी नजर आया, जो चुन-चुनकर लड़कियों को कबूतर की तरह दाना डालता है और उनका धर्म-परिवर्तन कराता है। स्कूल पर भी एेसा दबाव बना कि उन्होंने इम्तियाज को नौकरी से निकाल दिया। दोनों के बीच बेहद प्रेम था, लेकिन हकीकत के हथौड़ों से पहले दरकने और फिर टूटने लगा। कविता के परिवार को पहले एक दल का और फिर एक पार्टी का समर्थन मिल गया। लव जिहाद का नारा चल पड़ा और कुछ बेहद निजी कहानियों ने बड़ा रूप ले लिया। यहां तक कहा गया कि इनके मदरसों में इन्हें यही शिक्षा दी जाती है कि दूसरी लड़कियों का धर्म परिवर्तन कराओ।
काश, इस कहानी में किसी एेसे सांस्कृतिक संगठन की भूमिका सामने आती जो यह यह आश्वस्त करता कि इस तरह के ध्रुवीकरण से कुछ हासिल नहीं होने वाला नहींं है। 'लव जेहाद' और 'प्रेम युद्ध' के समर्थकों के आगे सच्चाई बयां करता कि धर्म छोड़िए अलग जाति  अलग समाज में शादी करने वाले ही मौत की नींद सुला दिए जाते हैं। आज पूरे देश की पुलिस के आगे सबसे बड़ी चुनौती इसी तरह की शादियां हैं।
        और ये कौन लोग हैं शिक्षा के मुकद्दस मंदिरों और मदरसों के बारे में यह कह रहे हैं कि वहीँ इस  लव जिहाद की शिक्षा दी जाती है। ये आवाजें उत्तर की ओर से क्यों आ रही हैं जहां चुनाव होने हैं। यहां विकास किसी ओर रंग के चोले में क्यों दिख रहा है। पंडित मुकेश भारद्वाज एेसे शख्स हैं, जिन्होंने कुछ बरसों तक अपने मित्रों के आग्रह पर सीकर में मदरसों की  जिम्मेदारी संभाली है। उनसे सहज सवाल था कि आप क्या मदरसों में बच्चों को एेसी शिक्षा देते हैं। चालीस सेकेंड का वह पॉज हैरानी भरा था और फिर जवाब था, बिल्कुल नहीं। तालीम के इन केंद्रों में जब अबोध बच्चे आपके सामने बैठे होते हैं तो शिक्षक बहुत बड़ी जिम्मेदारी महसूस करता है। मैं तो उस भरोसे को याद करता हूं जो मेरे मुस्लिम मित्रों ने मुझ पर किया। इल्जाम तो कोई भी लगा सकता है कि क्या शिक्षा के उन शिशु मंदिरों में यह शिक्षा दी जाती है कि वे लोग बुरे हैं, मारकाट मचाते हैं, उनका साथ मत दो तो क्या हम मान लेंगे?

Thursday, August 21, 2014

केवल पूछने से काम नहीं चलेगा


बेशक, लाल किले की प्राचीर से दिया गया वह भाषण बिना पढ़े, बिना अटके, बिना बुलेट प्रुफ के धाराप्रवाह दिया गया था। बंधेज का लाल-हरा साफा इस भाषण को अतिरिक्त गरिमा प्रदान कर रहा था। जोधपुर के त्रिपोलिया बाजार से ऐसे छह साफे मंगवाए गए थे जिनमें से एक को चुना गया। साथ ही एक कलाकार भी दिल्ली भेजा गया जो साफा बांधने की कला में माहिर था। साफे से जहां राजस्थान का गौरव जगजाहिर था, वहीं राजस्थान का प्रतिनिधित्व सरकार में ना के बराबर होना भी एक बड़ा सवाल। खैर, प्रधानमंत्री के इस भाषण को स्तंभकार 
शोभा डे ने सिंघम की दहाड़ का नाम दिया, जिसमें सब कुछ हिन्दी फिल्मों की तरह लाउड-सा था। संवाद, एक्शन, प्रेम सभी कुछ जरूरत से ज्यादा। किसी ने कहा लगातार बढ़ते दुष्कर्मों के सन्दर्भ में यह राजनैतिक प्रतिबद्धता  का मामला न होकर  सोशल इंजीनियरिंग का पार्ट था, जिसमें प्रधानमंत्री समाज के बदलने की बात कर रहे थे, जबकि अपने चुनावी भाषणों में उन्होंने देश के तमाम हालात के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराया था। उन्होंने दावा किया था कि एक सशक्त सरकार और व्यक्ति के आते ही सबकुछ बदल जाएगा।
प्रधान सेवक (उन्होंने खुद को यही नाम दिया है) ने कहा कि अभिभावक बेटों से भी यह सवाल करें, कि वह कहां था, किसके साथ था, क्यों गया था? जो दुष्कर्म करते है, वे भी तो किसी न किसी के बेटे है। सच है लड़कों पर सख्ती होनी चाहिए। लेकिन क्या समस्या इतने भर से हल हो सकती है। बरसों-बरस तक इस देश में निम्न जातियों का शोषण होता रहा लेकिन क्या महज सामाजिक संदेशों से इन जातियों का उत्थान संभव था। गांधीजी के अथक प्रयास जरूर नई चेतना का संचार कर रहे थे लेकिन बराबरी के मौके ना दिए बिना हालात उतने नहीं बदले जा सकते थे, जितने आज बदले 
हैं । जहां तक दुष्कर्म की बात है, जब तक कानून सख्त कार्रवाई  की वकालत नहीं करेगा ये गुनाह बढ़ते रहेंगे। इतवार को ही उत्तरप्रदेश के फैजाबाद में फिर एक लड़की को दुष्कर्म के बाद सड़क पर फेंक दिया गया। दिल्ली की निर्भया, लखनऊ   की   कृष्णा के बाद ,एक और जघन्य हादसा। 

 स्त्री सिर्फ इस्तेमाल की जाने वाली वस्तु है, यह सोच केवल इतने से नहीं बदलेगी कि मां  अपने बेटे से पूछ ले कि तू कहां था? यह एक कारण हो सकता है, एकमात्र नहीं।
दुष्कर्म, हत्या, भ्रूण हत्या, दहेज हत्या जैसी समस्याओं के लिए क्या किसी सख्त कानून की जरूरत नहीं है? समाज तो अपने हिसाब से चलता है। राजे-रजवाड़ों के दौर में भी चलता था, लेकिन प्रजातंत्र का कर्त्तव्य 
 है कि कायदे से नहीं चलने वाले को दण्डित किया जाए। जिस देश में हर चौबीस घंटे में 93 दुष्कर्म होते हों , वहां केवल सोशल इंजीनियरिंग से काम नहीं चलेगा। एक सख्त संदेश भी जाना चाहिए कि यह 'गुड गवर्नेंस' अपराधियों को बिल्कुल बरदाश्त नहीं करेगी। वादे के साथ इरादा भी हो। 
भ्रू हत्या की बात भी प्रधानमंत्री ने कही। उन्होंने कहा हमारा माथा शर्म से झुक जाता है, जब समाज में ऐसी घटनाएं होती हैं। सच है जब लड़कियों को इज्जत नहीं मिलेगी, कभी दुष्कर्म, कभी दहेज के नाम पर उनकी मौत होती रहेगी तो कौन माता-पिता लड़कियां पैदा करने का साहस करेंगे। प्रति हजार पुरुषों पर 940 स्त्रियों का होना केवल भ्रूण हत्या का नतीजा नहीं है, बल्कि हत्या, दुष्कर्म के बाद हत्या, आत्महत्या और खराब स्वास्थ्य सेवाओं से भी जुड़ा है। ग्रामीण इलाकों में प्रसव मृत्यु दर आज भी सर्वाधिक है। स्त्री वंश चलाने का जरिया भर है। उसका स्वास्थ्य अब भी दोयम  है।
एक महिला के जीवन में बहुत संघर्ष बिंधा है। अगर राष्ट्रमंडलीय खेलों के 64 में से 29 पदक उनके खाते में हैं तो ये उनके अतिरिक्त प्रयास हैं , उसे हर तरह से कानूनन संरक्षण मिलना चाहिए तभी वह दुनिया में भारत का परचम लहरा सकेगी। कब तक वह ऐसी अमानवीय परिस्थितियों से जूझती रहेगी जिसे विकसित दुनिया कब का छोड़ आगे बढ़ गई है। सख्त राजनैतिक प्रतिबद्धता का जिक्र जरूर प्रधान सेवक के मुख से होना चाहिए था, आखिर वे राष्ट्राध्यक्ष हैं।

Wednesday, August 13, 2014

क्यों दें मेहनत की कमाई इस निकम्मे सिस्टम को

पंद्रह अगस्त को हमारे आजाद देश के  67 साल पूरे होने वाले हैं। हम सब इस आजादी का खूब एहतराम करते हैं, अपने पुरखों के त्याग को याद करते हैं, अपने शहीदों के आगे सिर झुकाते हैं, लेकिन एक सवाल अकसर जेहन में उठता है कि क्या ऐसे ही भारत के लिए जिंदा लोगों ने अपना सब-कुछ कुर्बान किया था? क्या हम सही दिशा में हैं? जवाब तो नहीं आता, लेकिन एक छटपटाहट सामने आती है। यह अंतहीन बेचैनी कभी-कभी गुस्से और दुख को ऐसा पसरा देती है कि लगता है कि ये वो सुबह तो नहीं। मेरे शहर जयपुर  में बीते एक पखवाड़े की तीन घटनाएं आपकी नजर-
                गांधी नगर स्थित पोस्ट ऑफिस में शुक्रवार सुबह साढ़े ग्यारह का वक्त। 'भाई साहब राखी पोस्ट करनी हैं, अजमेर। पहुंच तो जाएगी ना दो दिन में!' मेरा सहज सवाल था। 'सोमवार को पहुंचेगी।'डाक बाबू ने असहज-सा उत्तर दिया 'लेकिन विभाग तो दावा करता है कि स्पीड पोस्ट चौबीस घंटे में पहुंचाता है, फिर यह तो एक ही स्टेट का मामला है।' मैंने कहा। 'आप तो कुरिअर कर दो मैडम वो ही अच्छा  है।'डाककर्मी ने लिफाफा लौटाते हुए कहा। वाकई प्राइवेट कुरिअर से राखी अगले ही दिन अजमेर पहुंच गई।
          दूसरी घटना जेडीए सर्कल से ताल्लुक रखती है। सुबह का वक्त। गांधी सर्कल से आती हुई गाडिय़ों में से आखिरी गाड़ी को ट्रैफिकमैन प्रताप सिंह ने रोक दिया। सिग्नल देखा, जो पीले से लाल हो चुका था। माफी चाहती हूं मैं गलती पर हूं। इस माफी का प्रताप सिंह जी पर कोई असर नहीं पड़ा। वे इतनी बद्तहजीबी से पेश आए जिसकी आम महिला कल्पना भी नहीं कर सकती। चाबी लेकर लाइसेंस मांगकर वे कुछ लिखने लगे। कहा सौ रुपए दो। रूपए लेकर अचानक कहा, जाओ-जाओ, रसीद बाद में आपको मिल जाएगी। उल्टे बीस रुपए मुझे अपनी जेब से भरने पड़ेंगे। दंड भरना उचित था लेकिन वह व्यवहार अनुचित। बाद में  रसीद भी नहीं मिली।
          

               करीब पंद्रह दिन पहले भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) की साइट पर एक रिक्वेस्ट डाली। इंटरनेट के लिए। तमाम ब्योरे के साथ। तीसरे दिन एक मैसेज आता है कि अतुल माथुर आपकी रिक्वेस्ट को पूरा करेंगे। अतुल फोन पर कहते हैं, ये बताइए कि आपके क्षेत्र में बीएसएनएल का लैंड लाइन कनेक्शन है। यदि नहीं तो  कनेक्शन नहीं मिल सकता। 'कोई दूसरा विकल्प' -मैंने पूछा। 'नहीं और कोई नहीं' उनका टका-सा जवाब था।  तीन-चार बार  फोन करने के बावजूद कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला । इससे  ठीक विपरीत एक प्राइवेट कंपनी ने 24 घंटे में इंटरनेट सेवाएं उपलब्ध करवा दी।
               

             बेशक ये बहुत छोटी बातें नज़र आती हैं लेकिन यहीं से सरकार चलानेवालों की मंशा भी नज़र आती है। कहाँ बदलते हैं मेरे जैसे आम भारतीय के दिन ? सरकारें तो कई आईं लेकिन हमारे दिन नहीं आते। 
आपको हैरानी नहीं होती,  गुस्सा भी नहीं आता, आप आदी  हैं, अपने ही देश की अपनी ही सरकारी मशीनरी को इस तरह काम करता हुआ देखकर। ऐसे तीन नहीं सैकड़ों उदाहरण हैं। ये मशीनरी क्यों नहीं है आम आदमी के साथ? ढाई साल पहले राशनकार्ड के आवेदन लिए गए थे, आज तक बनकर नहीं आए हैं। जब ये सरकारी तंत्र हमारे किसी काम का ही नहीं, तो क्यों हम इनसे लाइसेंस, मूल निवास प्रमाण पत्र, राशन कार्ड या कोई भी सरकारी दस्तावेज बनवाएं? जब सरकार से बेहतर विकल्प जनता के सामने खुद सरकार ही मुहैया कराए है तो ये क्यों नाम मात्र को चल रहे हैं? जनता की मेहनत की कमाई क्यों इस निकम्मे सिस्टम पर खर्च होती है। क्यों कोई उस यातायात व्यवस्था पर भरोसा करे, जहां अपराधी जान और वाहन को क्षति पहुंचाकर बेखौफ बच निकलता है और बेगुनाह चपेट में आ जाता है। तंत्र तभी सार्थक लगते हैं, जब दंडित गुनहगार हो।

Wednesday, August 6, 2014

नग्नता अपराध नहीं


       क्या  एक निर्वस्त्र तस्वीर इस कदर विवादित और तकलीफदेह हो सकती है? नागपुर की एक अदालत में आमिर के पोस्टर के खिलाफ याचिका दायर हो गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि पोस्टर अश्लील है और यौन हिंसा को बढ़ावा देता है। एक बिना कपड़ों की देह पर €क्या  शोर मचाना। देह नहीं उसका रवैया, आंखें, बॉडी लैंग्वेज तय करती हैं अपराध की तीव्रता। लखनऊ के मोहनलाल गंज क्षेत्र में सामूहिक दुष्कर्म की शिकार दो बच्चों की मां कृष्णा की नग्न देह में भला क्या  अपराध छिपा हो सकता है? वह तो फेंक दी गई थी, दुष्कर्म के बाद। अपराध का भाव जिनके भीतर था उन्होंने एक कपड़ा भी नहीं डाला उस देह पर।

      आमिर खान की फिल्म  पीके के पोस्टर के बहाने हमारी उस मानसिकता की पोल खुल गई है, जो नग्नता को देखकर हायतौबा मचाने लगती है। अपराध वो है, जब एक स्त्री को निर्वस्त्र कर गांव में घुमाया जाता है, एक खौफ पैदा किया जाता है कि संभल जाओ अगर जो मर्यादा लांघी, हम तु्हारा भी यही हश्र करेंगे। हम उघाड़ेपन को लेकर बेहद अजीब समाज हैं। छोटे कपड़े पहने विदेशी सैलानियों का हम सड़क पर चलना मुश्किल कर देते हैं। अपराधबोध इतना ज़्यादा है कि कोई लड़की सड़क पर स्कूटर से गिर भी जाती है तो वह अपना पहला ध्यान कपड़ों पर देती है, बजाय इसके कि उसे कितनी गंभीर चोट आई है। मुंबई के  महाविद्यालय में विद्यार्धियों के लिए न्यूड मॉडल (http://likhdala.blogspot.in/2010/03/nude-pose.html)  बनी एक माँ को अपना प्रोफेशन  छुपाना पड़ता है ताकि मोहल्ले के लोग उसे अपमानित न करें। मोहनलाल गंज की कृष्णा की नग्न देह सबको दिखी, उस पर हुआ भीषण अपराध नहीं जो आज भी अपने गुनहगारों को तलाश रहा है । अपराध की ऐसी क्रूरता देख हमारी रूह नहीं कांपती, लेकिन बिना कपड़ों के देख कांप जाती है। 

           खूब तकलीफ हुई है पुरुषों को उस पोस्टर से। फेसबुक, वाट्सएप प्रतिक्रियाओं से भरे पड़े हैं। किसी ने उन्हें नग्नमेव जयते लिखा तो किसी ने कहा कि लड़कियों को चाहिए कि हेल्पलाइन में फोन कर शिकायत दर्ज कराएं। इससे अपराध में इजाफा होगा। सच कहा जाए तो अपराध इससे नहीं बढ़ेंगे, अपराध बढ़ेंगे इस देहयष्टि के अनैतिक, अमर्यादित आचरण से। आदिवासी क्षेत्रो में महिलाएं केवल एक वस्त्र ही अपने इर्द-गिर्द लपेटती हैं और पुरुष एक छोटी लंगोट धारण करते रहे हैं। वहां से तो कोई यौन हमलों की खबरें नहीं आती, बल्कि हम जरूर मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ के
आदिवासी क्षेत्रों में पहुंचकर झेंपने लगते हैं। यह हमारे भीतर का अपराध बोध है, जिसे हमने नकाबों से ढंक रखा है। यह नकाब की ग्रंथि कई बड़े अपराधों को जन्म दे रही है।
         

          एक कलाकार की पेंटिंग में भी हमें यही सब दिखाई देता है। न्यूड देखते ही हम भड़क उठते हैं। भारत के तमाम शहरों में बसे हम उनके गुफानुमा कला केंद्रों को जला डालते हैं, तहस-नहस कर देते हैं। उन पर मुकदमों का ऐसा वार करते हैं कि उन्हें किसी पराए देश में शरण लेनी पड़ती है और वहीं उनकी मौत हो जाती है। जिस कलाकार के चित्रों में भारत की मिट्टी और संस्कार रोशन होते थे हम उसे अंतिम व€त में देश की मिट्टी भी नसीब नहीं होने देते। उन्माद और पूर्वाग्रह अनैतिक करने से नहीं रोक पते। यह मानसिकता हमसे ऐसी ही भूल कराती है। इसका अंदाजा भी मुकदमेबाजों को नहीं होता कि वे देश के संघीय ढांचे को किस कदर नुकसान पहुंचा रहे हैं। यह कलाकार मकबूल फिदा हुसैन थे, जो सारी उम्र बिना किसी पद के भारत के ब्रांड एंबेसडर बने रहे, लेकिन जीवन के अंतिम बरसों में उन्हें देश छोडऩा पड़ा। किन्हीं रेखाओं, किन्हीं शब्दों , किन्हीं तस्वीरों पर ऐसी उत्तेजना , आक्रोश और आक्रामकता की दरकार नहीं है, दरकार वहां है, जहां आचरण ऐसा है। तस्लीमा नसरीन अपने देश से निष्कासित हैं। उनके लिखे पर बांग्लादेश के कट्टरपंथियों को एतराज है। उन्होंने उनके खिलाफ फतवा जारी कर रखा है। वे बरसों से भारत में शरण लिए हुए हैं। हाल ही उन्होंने भारत सरकार से गुहार की है कि उन्हें यहीं रहने दिया जाए। सलमान रश्दी भी दो साल पहले जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में शामिल नहीं हो सके थे, €क्योंकि कट्टरपंथी यहां भी हैं।अभिव्यक्ति के रास्ते तंग गलियों से होकर  नहीं गुजरने चाहिए।

Thursday, July 31, 2014

बिना विचारे लक्ष्मण


फिजा में भीनी महक है। त्योहारों की मिठास और जीवन का उल्लास घुला हुआ है। मनभावन सावन में तरुणी का सिंजारा आ चुका  है। लहरिये का रंग खूब सुन्दर है कावडि़यों के जयकारों की भी गूंज   है। ईद की सिवइयों का जायका भी होठों पर है, जो पूरे तीस दिन के रोजे और इबादत के बाद नसीब हुआ है। बारिश की बूंदों ने हर शै को बरकत भर दी है। ये बूंदे हैं ही इतनी पवित्र कि रूखे मन और सूखे ठूंठ में भी प्राण फूंकने का माद्दा रखती है। एेसे माहौल में कोई बेतुकी बात नहीं होनी चाहिए खासकर इन मीडिया चैनलों की तरह तो बिल्कुल नहीं जो केवल चीखने-चिल्लाने को बहस का नाम दे बैठे हैं। बहस में हर पक्ष को सुना जाता है । धैर्य और समन्वय का परिचय देते हुए सुंदर नतीजे पर पहुंचा जा सकता है, लेकिन शायद सुंदर नतीजों को टीआरपी नहीं मिलती तभी जी टीवी पर एक वक्ता दूसरे को   'टुच्चा' संबोधित कर रहे थे। वे कह रहे थे आप टुच्चे हैं। चले जाइए इस देश से। ये एंकर महाशय जो अर्णव गोस्वामी की हिंदी नकल हैं, उन्होंने पहले तो पूरा वार्तालाप हो जाने दिया फिर कह दिया कि चैनल इस तरह की शब्दावली से इत्तेफाक नहीं रखता।

           जिन दो मुद्दों ने सोचने पर विवश किया वह है महाराष्ट्र विधानसभा कैंटीन के केटर्रर के मुंह में रोटी ठूंसना और सानिया मिर्जा को पाकिस्तान की बहू करार देना। लॉन टेनिस प्लेयर सानिया की लोकप्रियता का यह आलम रहा कि साइना नेहवाल को अपना नाम याद रखवाने के लिए कुछ ज्यादा ही मेहनत करनी पड़ी, क्योंकि लोग उन्हें भी आदतन सानिया ही कह डालते थे। शटलर सनसनी को टेनिस सनसनी से खेल में तो नहीं नाम में काफी चुनौतियां मिलीं। वैसे, सानिया पाकिस्तान की बहू हैं यह सच्चाई है, लेकिन वे हिंदुस्तानी हैं, यह भी सच्चाई है। सानिया ने जब पाकिस्तानी क्रिकेटर शोएब मलिक  से शादी की थी तो सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर विरोधी संदेशों की कतार लग गई थी। आम हिंदुस्तानी को जाने क्यों बहुत अजीब महसूस हो रहा था लेकिन सानिया ने ना अपना खेल छोड़ा और ना अपना देश। उनका पासपोर्ट अब भी भारतीय है। वे सफाई देते हुए रो पड़ीं थीं। कई लोगों ने बतौर जीवन साथी विदेशी को चुना है। शशि कपूर की पत्नी जेनिफर कैंडल ब्रिटिश थीं। कथक नर्तकी शोभना नारायण ने ऑस्ट्रियन राजदूत से शादी की। देविका रानी के पेंटर पति स्वेतोस्लाव रोरिख रूसी थे, पूर्व राष्ट्रपति के. आर. नारायणन की पत्नी  बर्मा की थीं। फारूख अब्दुल्लाह ब्रिटेन के दामाद हैं। एक्ट्रेस रीना रे ने मोहसिन खान को चुना .  फिर ये सानिया मिर्जा को लेकर भाजपा के  तेलंगाना विधायक लक्ष्मण साहब ने तेलंगाना से एतराज क्यों किया? शायद यही सियासी  रवायत है  जो कभी नहीं बदलती।  अगर शक उनकी काबिलियत पर होता या इस बात पर कि आखिर एक करोड़ रुपया इस मद में खर्च करने की क्या जरूरत है, तब भी मुद्दे पर गौर किया जा सकता था। नई सरकार ने भले ही पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को अपने शपथ समारोह के लिए न्यौता दिया या वे  अगले महीने फिर लाहौर में भी मिल रहे हों इसके बावजूद पाकिस्तान को मुद्दा बनाकर पार्टी यह भूलती हुई मालूम होती है कि वे अब विपक्ष में नहीं सरकार में हैं। सरकार में रहते हुए कई मुद्दे उस तरफ से थोड़े अलग नजर आते हैं। वैसे सवाल ये जरूर उठना चाहिए कि ब्रांड एम्बेसडर को एक करोड़ रुपए तक देने की क्या जरूरत आन पड़ी। वे आंध्र प्रदेश की बेटी हैं तो यूं भी ब्रांड तेलंगाना को चमका सकती थीं।
शिद्दत से महसूस होता है कि अभी हमें विकास की बात नहीं करनी चाहिए अभी तो जाति, धर्म, लिंग के झगड़ों से ही नहीं उबरे हैं। विकास को क्यों जबरदस्ती गले लगाने पर तुल गए हैं। ये विकास भी एेसा नटखट बालक है कि जहां ये सब बातें हो जाती हैं, उछलकर दूर भाग जाता है। शिवसेना के सांसद ने बिना विचारे केटर्रर के मुंह में रोटी ठूंस दी। वह रोजे से था। रोजे का इस कदर एहतराम है कि रोजेदार के सामने पानी पीना भी गुनाह है। हम सब अपने दफ्तरों में यह गुनाह आए दिन करते हैं। कभी यह जानने की जहमत नहीं उठाते कि एक माह के रोजों में उसकी समय-सारिणी कैसे बदलती है। दस्तूर के चलते सिवइयों का जिक्र जरूर गाहे-बगाहे कर बैठते हैं। हम नहीं झांकना चाहते उसकी दुनिया में। इसके विपरीत कुछ वरिष्ठ होते हैं, जो ध्यान रखते हैं कि अफ्तार का समय है और इस वक्त यदि वह काम की  मसरूफियत में उलझा हुआ है तो अफ्तार कराना  अपना फर्ज मानते हैं। बहरहाल  कहा जा रहा है कि संसद राजन विचार को  मालूम नहीं था कि कर्मचारी का रोज़ा है जो भी हो यह व्यवहार एक सत्ता के मद में डूबे  एक सांसद का था।  विचार पर पहले ही पुलिस में आठ मामले विचाराधीन हैं।  

   सावन के व्रत और रोजों की जुगलबंदी हमें सोचने का मौका देती है लेकिन हम इस वक्त की नब्ज को नहीं पकड़ पाते। हमारे विधायक  सांसद सकारात्मक भूमिका से परे मालूम होते हैं। राजन विचारे हो या के लक्ष्मण ये बिना विचारे ही लक्ष्मण रेखा लांघते रहे हैं।  

Wednesday, July 23, 2014

चीर हरने पर हुई थी महाभारत

द्वापर युग में भी कृष्णा (द्रौपदी) का सम्मान दांव पर लगा
था। कौरवों ने सरे दरबार कृष्णा का चीरहरण किया, लेकिन वहां उसे बचाने के लिए द्रौपदी के आराध्य,सखा कृष्ण आ गए। दु:शासन के हाथ जवाब दे गए, लेकिन कृष्ण के हाथ से चीर कम नहीं हुआ। यह कलियुग है। यहां कोई कृष्ण नहीं आया। दु:शासन तो कामयाब हुआ ही दरबारियों ने भी तन पर कपड़ा रखना जरूरी नहीं समझा

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लखनऊ की मोहनलालगंज तहसील में सत्रह जुलाई को घटी यह घटना दिल्ली की निर्भया से भी जघन्य और भयावह मालूम होती है। सोलह दिसंबर 2012  को छह दरिंदे जब निर्भया को दुष्कर्म के बाद सर्दी की
रात में फेंक गए थे तब उसकी सांस बाकी थी। उसके साथ उसका मित्र था, जो उन दरिंदों को पहचानता था, निर्भया के नग्न शरीर को ढंक दिया गया था और किसी ने उसकी निर्वस्त्र तस्वीर चारों ओर नहीं फैलाई थी।
लखनऊ की बत्तीस  वर्षीय स्वाभिमानी, गर्विता (कृष्णा) अपने साथ हुए इस भयावह हादसे को बताने के लिए जीवित नहीं है । उसकी तस्वीरों को वाट्स एप पर वायरल की तरह फैलाने के अपराध में उत्तरप्रदेश सरकार ने छह पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया। इसलिए नहीं कि उन्होंने जांच में कोई कोताही की थी, बल्कि इसलिए कि हे मूर्खों! अपराध पर परदा डाल देते, €यों उसे पूरी दुनिया में फैलाया और हम पर कार्रवाई करने की मजबूरी आन पड़ी। यह वार कृष्णा (काल्पनिक नाम) की केवल देह पर नहीं था, यह उसके स्वाभिमान को भी कुचलने का प्रयास था। बेहद संघर्षशील इस महिला को सबक सिखाने के लिए रचा गया अपराध था।

        एेसे हिंसक Žब्योरे  दर्ज करनेमें रूह चलनी हो आती  है कि एक महिला के नाजुक अंग पर हथियार से वार किए गए। उसकी मौत शरीर पर किए गए घावों से अत्यधिक र€तस्राव की वजह से हुई। स्कूल के पास बने हैंडपंप पर वह घिसटते हुए पानी की तलाश में पहुंची थी, लेकिन इससे पहले कि पानी की बूंद नसीब होती कृष्णा का दम टूट गया। द्वापर युग में भी कृष्णा (द्रौपदी) का सम्मान दांव पर लगा था। कौरवों ने सरे दरबार कृष्णा का चीरहरण किया, लेकिन वहां उसे बचाने के लिए द्रौपदी के आराध्य, सखा कृष्ण आ गए। दु:शासन के हाथ जवाब दे गए, लेकिन कृष्ण के हाथ से चीर कम नहीं हुआ। अस्मिता के लिए महाभारत रची गयी।  यह कलियुग हैयहां कोई कृष्ण नहीं आया। दु:शासन तो कामयाब हुआ ही दरबारियों ने भी तन पर कपड़ा रखना जरूरी नहीं समझा। यह कृष्णा के साथ कई-कई बार हुआ दुष्कर्म है। सरकार कहानी गढ़ रही है। एक अपराधी को पकड़ लाए हैं। अपराधी खुद भी फर्जी, उसकी पहचान भी फर्जी जिसे पकड़ा है, वह खुद तो रामसेवक यादव है, लेकिन वह राजीव नाम से कृष्णा को फोन करता था। सरकारी नुमांइदी कहतीहैं  कि वह हेलमेट लगाए था, इसलिए कृष्णा उसे पहचान नहीं पाई और राजीव समझकर बाइक पर बैठ गई। उत्तर  प्रदेश पुलिस के मुताबिक आरोपी यादव कृष्णा पर बुरी निगाह रखता था और जहां कृष्णा रहती है, वहीं पास ही एक साइट पर सि€योरिटी गार्ड था। पुलिस जिसने पहले सामूहिक दुष्कर्म की बात कही थी, अब रामसेवक को केंद्र में रखकर नई कहानी ले आई है।
                    खुद्दार कृष्णा, जो अपने पति की मौत के बाद अपनी बेटी और बेटे को पाल रही थी, उसकी हत्या ने इस समाज के उस नजरिए को भी उजागर किया है, जो वह अकेली स्त्री के लिए रखता है। इस नजरिए के
हिसाब से अकेली स्त्री का अपने दम पर बच्चों को पालना एक गैरजरूरी प्रयास है, लेकिन कृष्णा की बारह वर्षीय बेटी बातचीत में बताती है कि वह संस्कारों से पाली जा रही बच्ची है। कृष्णा के पिता शिक्षक हैं, जिनकी
आंखें भी यही कहती हैं कि उनकी बेटी के जीवन में बेहिसाब संघर्ष बिंधा था। पति को किडनी की तकलीफ थी और वह संजय गांधी इंस्टीट्यूट ऑव मेडिकल साइंस में  कार्यरत था। कृष्णा अपनी एक किडनी देकर भी उसे नहीं बचा सकी थी । उसके बाद कृष्णा को पति की जगह काम मिला। एक किडनी के साथ दो बच्चों को कृष्णा पूरी ईमानदारी और मेहनत से बड़ा कर रही थी, लेकिन कानून व्यवस्था के लिहाज से बदहाल प्रदेश ने उसकी
देह और मान दोनों को जमींदोज कर दिया।
                      लखनऊ में कृष्णा, जयपुर में 23 साल की इवेंट मैनेजर रमनजोत(जिसे उसका  परिचित लैपटॉपके वायर से गला घोंटकर मार देता है) और बेंगलूरु में छह वर्षीय बच्ची के साथ स्कू ल में हुआ दुष्कर्म। जिन पर यकीन हो, वे ही कातिल बनकर सामने आ रहे हैं। देश के सब प्रदेशों की राजधानियां एक जैसी लग रही हैं। इन सबकी पुलिस एक जैसी है, लेकिन अगर सरकारी प्रतिबद्धता भी एक जैसी होगी तो इस खाज को कोढ़ होने में व€त नहीं लगेगा। सरकारों को धृतराष्ट्र बनने से रुकना चाहिए। धृतराष्ट्र की तो आंखें नहीं थीं, ये आंखें होते हुए भी अंधे बने बैठे हैं। लानत है इन अंधे बयानवीरों पर।

Thursday, July 17, 2014

माहौल में ठंडक बातों में उमस

shobha dey and her daughter...          image mahesh acharya
jaipur women... image  rakesh joshi

जयपुर में शनिवार की वह दोपहर उमस से भरी हुई थी लेकिन एक सुंदर होटल का एक सुंदर हिस्सा महिला अतिथियों से गुलजार था। माहौल में कोई भारीपन नहीं था, बल्कि इंतजार था लेखिका शोभा डे का। इंतजार खत्म हुआ, शोभा डे अपनी बेटी के साथ दाखिल हुईं। इस स्वागत के बारे में शोभा ने बाद में खुद ही कहा कि मैं दुनियाभर में घूमी हूं, लेकिन एेसा शानदार स्वागत मेरा कहींं नहीं हुआ। वैसे यदि पता न हो कि यहां शोभा डे एक व्याख्यान देने आई हैं, जिसका विषय बैंड-बाजा और कन्फ्यूजन है, तो यही लगता है कि आप किसी बॉलीवुड की अवॉर्ड सैरेमनी नाइट में बैठे हैं  और सामने से अभी कोई साड़ी के फॉल सा दिल मैच किया रे ... गाते हुए धमक जाएगा। बहरहाल, सुरभि माहेश्वरी और फिक्की फ्लो की
जयपुर चैप्टर की अध्यक्ष अपरा कुच्छल ने प्रभावी एंकरिंग के साथ शोभा डे को मौजूद अतिथियों से रू-ब-रू कराया।
दरअसल बैंड-बाजा-कन्फ्यूजन विषय से ही स्पष्ट है कि भारत सदी के नहीं, बल्कि सदियों के भीषण बदलाव से गुजर रहा है। शादी की पारंपरिक मान्यताएं नए सिरे से गढ़ी जा रही हैं, दायरे बढ़ गए हैं, पंख खुल गए हैं। वर्जनाएं टूट रही हैं और वर्जिनिटी कोई बड़ा मुद्दा नहीं रह गया है। उम्मीद थी कि मिस डे विषय पर पहले तो कन्फ्यूजन को सामने रखेंगी और फिर किसी एेसी दिशा की ओर इशारा करेंगी जिससे समाज में व्याप्त इस दुविधा से उबरा जा सके। उन्होंने इंदिरा नूई के हाल ही के इंटरव्यू और इरा त्रिवेदी की किताब इंडिया-फॉलिंग इन लव के साथ बॉलीवुड की फिल्मों का भी जिक्र किया। उनका कहना था कि इंदिरा नूई जब अपनी मां को अपने सीईओ बन जाने की खुशखबरी सुनाना चाहती थीं तो उनकी मां ने कहा जाओ पहले बच्ची के लिए दूध लेकर आओ और अपने सीईओ का ताज गैराज में रखकर आओ। क्या वाकई अगर कोई बेटा मां को एेसी खबर सुनाता तो मां का यही रवैया होता। शायद नहीं। यह सबके लिए एक उत्सव का समय होता। फिर व्याख्यान के अगले हिस्से में ही वे यह भी कहती हैं कि पश्चाताप पुरुष के जीवन में भी होते हैं उन्हें भी चौदह साल बाद  समीक्षा करनी पडे़ तो कई चीजें उनकी भी छूटती हैं, दूर होती हैं।
सारी दुनिया की महिलाओं के दिलों को पेप्सिको सीईओ नूई के इस इंटरव्यू ने अगर छुआ है तो इसलिए कि वे सभी यह मानती हैं कि  वे जहां भी जिस किसी मुकाम पर हैं अपना सौ फीसदी नहींं पा सकतीं। कुछ हासिल करती हैं तो कुछ छूटता है। वे बेहतरीन करना चाहती हैं लेकिन फिर भी कभी उनका काम, तो कभी उनका मां का दायित्व तो कभी पत्नी धर्म प्रभावित होता है। एेसा उनकी जैविक संरचना की वजह से होता है। वे मां बनती हैं  दायित्वों के साथ
। शरीर और मन से बेहद संवेदनशील स्त्री केवल चाहने से एेसी नहीं है। यह खूबी उसे कुदरत ने बख्शी है। वह एेसी ना हो तो सृष्टि के चक्र में बाधा होगी।
कन्फ्यूजन केवल बैंड-बाजे का नहीं बैंड बाजे के बाद काम और परिवार में से किसे प्राथमिकता देनी है उसका भी है। मिस डे ने विश्वास जताया कि सदियों से भारतीय स्त्री समय प्रबंधन को साधती आई है और उसे उसकी प्राथमिकताएं पता हैं। फिक्की फ्लो के जयपुर चैप्टर का मकसद यदि महिला सदस्यों की मौजूदगी में एक कार्यक्रम करवाकर अखबार में कवरेज पाना था तो वह उसमें कामयाब रहा है। लेकिन जिस बडे़ कन्फ्यूजन से महिलाएं इन दिनों रू-ब-रू हैं उसका केई हल कम-आज-कम शोभा भा डे के पास तो नहीं था शायद  यह आर्थिक आजादी की कीमत है जो उसे देनी है।
           सर्वथा अजीबोगरीब जुनून पर नॉवल लिखने वाली और व्याख्यान में हम्पटी शर्मा ...और रांझणा का जिक्र करने वाली मिस डे के उद्बोधन में कमी सी मालूम हुई। हकीकत बहुत अलग है। कई कन्फ्यूजन सर उठा रहे हैं। दिल्ली-बदायूं की घटनाएं और इन पर आने वाले बयान सबकी पोल खोल रहे हैं कि कन्फ्यूजन जख्म बनकर फैल गया है। यह कैंसर से कम नहीं। शोभा डे का यह सतही व्याख्यान दिशा देनेवाला नहीं मालूम हुआ, यह किसी बॉलीवुड मसाला फिल्म -सा होकर ही रह गया था
सितारा होटलों में सितारों के साथ ऐसे कार्यक्रमों से कौन जाग्रत होता है यह  फिक्की से पूछने का मन करता  है मिस डे की एक बात जरूर गौर करने लायक रही  कि अरुण जेटली के इस बजट ने महिला सुरक्षा के लिए 50  करोड़ रुपए रखे हैं और सरदार पटेल की मूर्ति के लिए 200  करोड़। ये आंकड़ा पोल खोलता है कमजोर इच्छाशक्ति की। बॉलीवुड-टॉलीवुड तो हर शुक्रवार को अपना बॉक्स ऑफिस गिनते हैं। इनके कोई सामाजिक सरोकार अब नहीं रहे। जिनके हैं भी तो मिस डे की बातों में वे नहीं ही थे।

Wednesday, July 9, 2014

तनु शर्मा के हक़ में


बाईस जून 2014 से पहले तनु शर्मा इंडिया टीवी में एंकर थीं। इस दिन उन्होंने चैनल के दफ्तर के आगे खुदकुशी करने की कोशिश की। वे चूहे मारने की दवा को पी गईं थी लेकिन तुरंत चिकित्सा मिल जाने से बचा ली गईं। तनु ने एेसा करने से पहले चैनल के दो वरिष्ठों (जिनमें एक महिला हैं) के बारे में अपने फेसबुक
स्टेटस पर लिखा कि बहुत मजबूत हूं मैं, सारी जिंदगी मेहनत की, स्ट्रगल किया, हर परेशानी से पार पाकर यहां तक पहुंची। चैनल ने मेरे साथ जो किया वो भयानक सपने से कम नहीं। मैं आपको कभी माफ नहीं करूंगी। अफसोस रहेगा मरने के बाद भी कि मैंने यह चैनल जॉइन किया और एेसे लोगों के साथ काम किया, जो विश्वासघात करते हैं, षड्यंत्र करते हैं। मैं बहादुर हो होकर थक चुकी हूं। बाय।
तनु का कहना है कि सीनियर एडिटर्स  हमेशा जलील करते रहे। उनके कपडे़, हेअर स्टाइल पर तो टिप्पणियाँ
होती ही थी, यह भी कहा जाता कि  आप बिल्कुल भी ग्लैमरस नहीं। आपकी आवाज भी ठीक नहीं, जबकि
मैं कई कार्यक्रमों में अपनी आवाज दे रही थी। वे कहती हैं, अगर आवाज इतनी ही खराब थी तो मुझे वॉइस
ओवर के लिए €यों लिया जाता? तनु का आरोप है कि उससे उ्मीद की जाती थी कि वह तमाम राजनीतिक
हस्तियों और कार्पोरेट घरानों से मुलाकात कर उनकी अनुचित मांगें भी पूरी करें। प्रकारांतर से यह भी
समझाया गया कि यह कोई नई और बड़ी बात नहीं।
       चैनल का अपना जवाब है कि तनु उनके साथ चार महीने पहले जुड़ी थीं और इस दौरान उनका काम बिल्कुल भी संतोषजनक नहीं था। उनकी वजह से दो बार चैनल को शर्मिंदा होना पड़ा। पहली बार तो वे गंभीर खबर को प्रस्तुत करते हुए हंस रही थीं और दूसरी बार वे स्टूडियो ड्यूटी पर रहते हुए कैफेटेरिया में चली गईं जहां उन्होंने अपना फोन साइलेंट मोड पर छोड़ दिया। चैनल को बे्रकिंग न्यूज ग्राफि€स
के सहारे चलानी पड़ी। दोनों बार उन्हें चेतावनी दी गई। अब जब उन्होंने एसएमएस पर नौकरी छोडऩे के बारे में लिखा तो उसे मंजूर कर लिया गया। गौरतलब है कि चैनल के साथ तीन
महीने का कॉन्ट्रे€ट था।
    इन आरोप-प्रत्यारोप के बीच एक बात साफ है कि ढोल-नगाड़ों के साथ खबरें सुनाने और दिखाने वाले इन चैनलों के संचालक और कर्मचारियों के बीच हालात गरिमापूर्ण और शालीन तो नहीं हैं। चैनल्स में काम कर रहे और छोड़ चुके तमाम मित्रों की राय में स्थितियां सामान्य नहीं हैं। वे कहते हैं अगर अध्ययन किया जाए तो बीच में ही काम छोड़ देने वाली लड़कियों की तादाद बहुत ज्यादा है। कई बार लगता है कि हम न्यूज एंकर नहीं, आइटम गर्ल्स हैं। माना कि प्रेजेंटेबल होना इस मीडिया की जरूरत है, लेकिन जब यह अपेक्षा सीमा पार करने लगे तो सब कुछ असहनीय हो जाता है।
        गौरतलब है कि तनु की खुदकुशी की कोशिश को किसी भी चैनल ने कोई तवज्जो नहीं दी मानो कोई छिपा समझौता हो, जबकि यही चैनल तरुण तेजपाल प्रकरण में खूब सक्रिय रहे थे। इन चैनल्स ने प्रीति-नैस की झड़प को भी खूब दिखाया, लेकिन तनु के लिए बोलने वाला कोई नहीं। यही घटना किसी और संस्थान की होती तो भी €या चुह्रश्वपी का यही समझौता कारगर होता? चकित करता है कि जो मीडिया एेसे ही अन्य मामलों में बढ़-चढ़कर पहल करता है, इस मामले में खुद का बचाव बड़े ही पारंपरिक तरीके से करता है। बीबीसी को चैनल ने कहा कि यह गैर-ज्मिेदाराना पत्रकारिता है। €या एेसा नहीं हो सकता था कि चैनल तनु पर सिलसिलेवार इल्जाम लगाने के बजाय केवल इतना कहता कि हम इस मुद्दे को गंभीरता से लेकर स्वयं इसकी जांच करेंगे। आरोपों के जिस तरह जवाब दिए गए हैं वे वैसे ही हैं जैसे किसी भी आम आरोपी के होते हैं। यहां चैनल नई भूमिका अख्तियार कर सकता था। आईबीएन-7 के मैनेजिंग एडिटर
विनय तिवारी का कहना है कि टीवी न्यूज चैनलों में नेतृत्व की भूमिका निभा रहे लोग उन जगहों को सामंती
विचारधारा के तहत अपनी जागीर की तरह चला रहे हैं। वरिष्ठ पत्रकार पामेला फिलीपोज के मुताबिक बदसलूकी होती है, लेकिन भारत में खुद पत्रकार ही मुद्दे को उठाने से डरते हैं। यही चुह्रश्वपी मीडियाकर्मी और मीडिया कंपनियों के असमान रिश्तों को दर्शाती है। बहरहाल, इस मामले में दोनों पक्षों की ओर से एफआईआर दर्ज है, लेकिन जिनसे उ्मीद की जाती है उन्होंने आपसी सहमति से मुद्दे को सुंदर कालीन के नीचे सरका दिया है।सहमतियों से भरी इस चुप्पी  के बीच कई सवाल सर उठा-उठा कर झांकरहे हैं।
खामोशी के मायने सब खैरियत नहीं है
चेहरे जो मुस्कुरा रहे हैं वे भी खुश नहीं हैं


Thursday, June 26, 2014

अपराध की जात बताओ भैया


पिछले सप्ताह खुशबू की कवर स्टोरी गायत्री मांगे इंसाफ (http://dailynewsnetwork.epapr.in/290314/khushboo/18-06-2014#page/1/1 )
पर पाठको की खूब प्रतिक्रियाएं मिलीं। ज्यादातर गायत्री के हालात पर दुखी थे तो कुछ का यह भी मानना था कि ये सांसी जाति तो यूं भी आजीविका के लिए शराब और देह व्यापार के अपराध में लिप्त होती है। ये तो पुलिस रिकॉर्ड में भी ‘जरायम पेशा ’ के नाम से दर्ज होते हैं। जरायम फारसी भाषा का शब्द है जिसके मायने अपराध चोरी-डकैती को पेशा बनाने वाली बिरादरी से है। अंग्रेजों के शासनकाल में एेसी कई जातियों को जरायम पेशा समूह में रखा गया था। उनका मानना था कि इन जातियों के समूह के समूह अपराधिक गतिविधियों में लिप्त हैं और यही उनका पेशा है और इनके साथ कोई ढील नहीं बरती जाए।अंग्रेजों से आजाद हुए देश को 67 बरस हो चले हैं लेकिन हमारी पुलिस अब भी इस नजरिए से आजाद नहीं हो पाई है। पुलिस ऐसा ही मानती है और सरकार व समाज ने कभी इस दायित्व को नहीं समझा कि आखिर कब तक हम इन्हें यूंही संबोधित करते रहेंगे और एेसा ही बनाए रखेंगे। इन्हें मुख्यधारा में लाने के प्रयास ना के बराबर हैं। ये यूं ही अलग-थलग पडे¸ हैं।
एक अंग्रेजी अखबार में बीस जून को पहले पन्ने पर प्रकाशित इस खबर में पुलिस का रवैया देखें। अलवर के विराट नगर में एक 46 वर्षीय विधवा की सामूहिक दुष्कर्म के बाद हत्या हो जाती है। बेटियों की शादी हो चुकी हैं और एक बेटा मुंबई में है। पुलिस प्रारंभिक तहकीकात के बाद कहती है- ‘‘एेसा लगता है कि यह किसी संगठित गिरोह जैसे बावरिया और पारदी गैंग का काम है। जिन्होंने दरवाजा तोड़कर जघन्य वारदात को अंजाम दिया।’’ हैरानी होती है कि ये गिरोह इतने बरसों तक़ क्या पुलिस की ढाल बनने का ही काम करते रहे हैं? क्यों पारदी या कच्छा बनियान या कंजर नाम लेकर इन अपराधों पर हमेशा मुहर लगाई जाती है। क्यों ये समुदाय अब तक़ इस दलदल से ही नहीं निकल पाए? क्यों किसी भी सरकार ने इनके विकास का बीड़ा अब तक़ नहीं उठाया? हम बड़े बेफिक्र होकर कह डालते हैं क़ि बेड़िया, बांछड़ा इनका क्या, इनकी स्त्रियां तो यही काम करती हैं? गौरतलब है की मध्य प्रदेश के मन्दसौर, नीमच और राजस्थान के बांसवाड़ा, डूंगरपुर के सीमावर्ती क्षत्रों में यह जाती यही पेशा  अपनाए हुए हैं.  कैसे हम बरसों-बरस इन समुदायों को एेसे ही कटघरों में रखकर इन्हें आरोपों के दायरों में बांधते रहेंगे।
         गायत्री ने आवाज बुलंद की  है। उसे नहीं मंजूर खुद के  लिए एेसे शब्दों का  इस्तेमाल और काम। बचपन में घर छोड़ने की  भूल ने उसे देह व्यापार के दलदल में धकेल दिया। ईमानदारी से समीक्षा की  जाए तो उसका  कथित पति वीर सिंह सांसी भी उसी जरायम पेशा नजरिए का  शिकार है। जिसकी बुनियाद अंग्रेजी रियासत ने रखी थी।वह सामान्य जीवन शैली अपनाना चाहता है लेकिन नजरिया ऐसा होने नहीं देता। सांसी जाति को  भी अपराधी पेशों से जुड़ी जाति माना गया है। इनका  मूल सिंध के  शूद्र राजा और राजपूतों से जुड़ता है । तंग सोच और आधुनिक समाज से कदमताल ना मिला पाने की मजबूरियों ने कई विसंगतियों को  जन्म दिया है।
 एक अन्य मामला भीलवाड़ा का है जहां नौ साल की बच्ची की हत्या का आरोप पुलिस ने उसकी बहन और पिता पर लगाया है। पुलिस का मानना है कि ये कालबेलिया जाति से हैं और देह व्यापार इनका पेशा है। बड़ी बहन यही काम करती थी। अब हालात यह है कि इस बड़ी बहन से अपने हक में बयान उगलवाने के लिए पुलिस अमानवीयता पर उतर आई है। एेसा तब से चल रहा है जब पिता ने बकरियां चराने गई छोटी बेटी की लाश को लेने से मना कर दिया था। उसे किसी ने पत्थर से पीट-पीट कर मार डाला था। हालांकि बाद में लाश ले ली गई लेक़िन अब पुलिस इन्हें ही अपराधी करार देने पर तुली है। राजस्थान कालबेलिया जाती बरसों से इसी जरायम पेशा नजरीये की शिकार है। नतीजतन विकास में भी कौसों पीछे धकेल दी गयी।
पुलिस और समाज कैसे पूरी जाति को अपराध के सुपुर्द कर खुद को मुक्त पा सक़ते हैं। ये जातियां आज भी अभाव में जीने को अभिशप्त हैं। सदियों से इन पर अत्याचार ही हुए हैं और हम सब वही दोहरा रहे हैं। रोजगार का कोई विकल्प इनके सामने नहीं। यहां इन जातियों के अपराध करने की प्रवृत्ति का समर्थन नहीं बल्कि अब भी इन्हें इसी श्रेणी में रखकर कोई प्रयास ना होने का अफसोस है। इनकी शिकायतों पर कोई कार्रवाई और इनकी जरूरतों पर कोई सुनवाई नहीं होती। कोई सांसी, कोई पारदी, कोई कालबेलिया सामान्य जीवन शैली अपनाना भी चाहै लेकिन जरायम पेशा नजरिया ऐसा होने नहीं देता। ऐसे में कैसे कोई समाज अपराध से मुक्त हो सकता है। बेशक गरीबी और अभाव ही इन्हें अपराध की ओर धकेलते हैं। आखिर कब तक अपराध का ठीकरा इनके सिर फोड़कर हम खुद कॉ सभ्य समाज कहलाने क ढोंग करते रहेंगे?

Tuesday, June 17, 2014

और कितना तपोगे थार

 शून्य से पचास  डिग्री के बीच झूलते थार में इन दिनों मामला एकदम दूसरे छोर पर है।  जयपुर भी पचास को छूकर अब भारी उमस की चपेट में है  लेकिन थार की जुबां  उफ़ जैसे शब्दों के लिए नहीं है रंगीलो राजस्थान का कोई रंग फीका नहीं है। गर्मी से थर्राते थार का मानस जाने कैसे कूल बना रहता है लेकिन तुम और कितना तपोगे थार

 
सोमवार की  जेठ दोपहरी इस लिहाज से बहुत शानदार थी कि  चलती सड़क के  दोनों ओर से कुछ सेवाभावी युवा हाथ में शरबत और नीबू पानी लेकर आ खड़े हुए। तपती गर्मी में नीबू पानी एक ही सांस में भीतर उतर गया। इस राहत के  भीतर जाते ही एक दुआ-सी बाहर आई।  वाकई जयपुर में श्याम नगर से सिविल लाइंस तक  इन छोटे-छोटे तंबूओं से उस दिन सुकून और राहत बांटी जा रही थी । यह निर्जला एकादशी का  दिन था। माना जाता है की इस दिन सूखे कंठों  को  शीतल जल, शिकंजी  शरबत पिलाकर पुण्य अर्जित किया जाता है। कितना सुन्दर फलसफा कि  राहत पहुंचाओ पुण्य कमाओ। निर्जला एकादशी का  संदर्भ जानने के  लिए वैद्य हरिमोहन शर्मा जी को  फोन से दस्तक  दी। वैद्य जी ने बताया कई  कि संदर्भ महाभारत से जुड़ता है। पांडवों में भीम को  सर्वाधिक  भूख लगती थी। उनका  एक नाम वक्रोदर भी है। वक्र यानी भेड़िया। भेड़िए सी भूख वाला पेट। महीने के  दो और साल के  २४ एकादशी  व्रत भीम को  खूब भारी पड़ते। वे भीष्म पितामह के पास गए कि  पितामह मैं भूखा नहीं रह सकता। पितामह ने कृष्ण से राय लेने की  बात कही। कृष्ण ने भीम से कहा कि  ठी है भीम जो तुम जेठ के  महीने की  इस एकादशी को  निर्जल व्रत रोगे तो वही पुण्य मिलेगा जो 24 व्रत रने से मिलता है। तभी से निर्जला एकादशी  व्रत रने की  परंपरा चली  आ रही है। तप और ताप की  यह जुगलबंदी मनुष्य में असीम शक्ति जागृत रने के लिए ही बनाई गई थी।
     ए मित्र की  मां न केवल इस दिन व्रत रतीं, बल्कि जयपुर के  गलताजी जाकर सारे मंदिरों के  दर्शन भी करतीं और वहींं कुण्ड  में स्नान भी । शायद शरीर को  तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों से गुजारर ही मानव श्रेष्ठता की  दिशा में आगे बढ़ता है।
कहते हैं एेसी तपिश सौ सालों में भी नहीं महसूस की गई। लगता है जैसे पृथ्वी सूर्य से गले मिल गई है, लेकिन सच्चाई कुछ और है इन दिनों धरती सूर्य से सर्वाधिक दूरी पर है। सर्वाधिक  गर्म इलाका  तो केलिफोर्निया की  डेथ वैली है, जहां तापमान 58 डिग्री छू जाता है। दक्षिण अफ्रीका का टिम्ब
टू भी एेसा ही इलाका  है। यहां तापमान 56 डिग्री सेल्सियस हो जाता है। मकान नारियल के  तने कीचड़ और छप्पर से बनते हैं। इसके अलावा सभी गैर कुदरती चीजें तपाने कस  ही काम रती हैं। बेश हम भी ए प्रतिकूल परिस्थिति को  जी रहे हैं। गौर रेंगे तो पाएंगे कि  सुकून, शांति प्रकृति के रीब ही है। लोहे की  बंद गाड़ियां और बंद दड़बेनुमा मकान तबीयत को  नुसान पहुंचा रहे हैं। ए पेड़ की  छाया भी तापघात का  कारण नहीं बनती। मटके का  जल, मतीरे की  काश (फां) , नीबू-केरी की  खटास और पतली छाछ आपमें जीवन भर सकती है, जबकि  महंगे वाहनों के  फेल हुए वातानुकूलन मरीज को  लो बीपी का  शिकार बनाकर अस्पताल पहुंचा रहे हैं। हमारा समूचा दर्शन कुदरत से  एकाकार  में है और फिलहाल हम अपनी समूची ताकत उससे दूर जाने में लगा रहे हैं।
बहरहाल, हमारे ख्वाबों में इन दिनों बर्फीले इलाको की  सैर ही है। धरती का  सबसे ठंडा इलाका  अंटार्कटिका  में वोस्तोक स्टेशन है जहां तापमान माइनस 90 डिग्री तक चला जाता है। दुनिया की  90 फीसदी बर्फ यही होती है। बारिश बिल्कुल  नहीं होती। यह बर्फीला रेगिस्तान है  और हम
रेतीले  रेगिस्तान थार में हैं। गर्म रेतीला रेगिस्तान। ग्रामीण इस गर्मी को  कोसते नहीं, अपनी जीवटता बढ़ाते हैं। बाड़मेर, जैसलमेर के  बाशिंदों को  कभी त्राहिमाम करते नहीं देखा। वे कहते हैं, दिन और रात की तरह  मौसम का भी चक्र है।  सूरज की किरणें पृथ्वी को स्पंदित कर रही हैं। तमाम जीवाणु, कीटाणु इस मौसम में पनाह मांगने लगते हैं। इंसान का फर्ज केवल इतना है कि वे आसपास मौजूद पशु-पक्षियों की  उपेक्षा न करें । परिंदों के  लिए पानी  हर घर के  आसपास हो।  पशुओं के लिए मुश्किल  समय है लेकिन उनके  भोजन, पानी, का  हिस्सा निकालना हमारे संस्कारों में है। इस ऋतु चक्र में प्राणिमात्र पर दया इस पर अमल रके ही हम अपने पर्यावरण को  बचा सते हैं। एक  काम बाकी  है बारिश से पहले पौधे रोप देने हैं।

Wednesday, April 23, 2014

टोपी तिलक सब लीनी


टोपी हो या तिलक  इसे  ना कहने
वालों के  लिए एक  ही खयाल सामने
आता है कि  ये या तो हिंदुस्तान की
तहजीब से वाकिफ नहीं या फिर
अपने पुरखों को नहीं मानते। ये उन
लोगों का  अपमान है जो अपने
मजहब का  पालन करते हुए भी सर
पर हाथ रखकर तिलक  स्वीकार
करते हैं, टोपी पहनते हैं, बिंदी धारण
करते हैं। हमारी एक  साथी थीं

अभी दूसरे शहर हैं । भरापूरा कुनबा
था उनका । दफ्तर बिंदी लगाकर
आती थीं।   कभी किसी ने एतराज
नहीं किया। कई साहित्यकार,
लेखक , कलाकार स्वागत में तिलक
स्वीकार करते हैं। दीप प्रज्ज्वलित
 
करते हैं। मूर्तिपूजक न होने के बावजूद ईश्वर की मूर्तियां हाथ जोड़कर ग्रहण करते हैं। तो क्या वे धर्मद्रोही हो गए, क्या ऐसा करने से इनकी
आस्था घट गई या वे उस मजहब के
नहीं रहे, जहां वे पैदा हुए हैं। बनारस
के  गंगा
घाट पर बने मंदिर के  अहाते में
बिस्मिल्लाह खां साहब का शहनाई
वादन तो जैसे 
कुफ़्र (पाप) हो गया।
अस्वीकार एक  तरह की  फिरकापरस्ती
ही है फिर चाहे वह किसी भी
ओर से हो। यह अमीर खुसरो,
तुलसी, गुरुनानक की  रवायत का
अपमान है। अमीर खुसरो ने लिखा
है
अपनी छवि बनाई के  मैं पी के पास गई
जब छवि देखी पीहू की  तो अपनी भूल गई
छाप तिलक  सब छीनी रे मौसे
नैना मिलाई के ...
दो तहजीबों के  साए में पले
(मां राजपूत थीं) खुसरो पर ख्वाजा
निजामुद्दीन औलिया की  कृपा थी।
एटा में जन्मे खुसरो संस्कृत,
अरबी, फारसी समेत अनेक भारतीय
भाषाओं में पारंगत थे। वे कवि तो थे
ही हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में भी
उन्हें महारत हासिल थी जबकि
इस्लाम में गाना-बजाना धर्म संगत
नहीं। गोस्वामी तुलसीदास को
मानस लिखने की  प्रेरणा कृष्ण भक्त
अब्दुर्रहीम खानखाना से मिली।

तुलसीदास रात को  मस्जिद में ही
सोते थे। अवध के  नवाब वाजिद
अली शाह के दरबार में तेरह दिन
का  रासलीला उत्सव कृष्ण को  याद
करके  होता था। आजाद हिंद फौज
के  कप्तान आबिद हसन ने 1942 में
जय हिंद का  नारा बुलंद किया।
से में जमीयत उलेमा ए हिंद
के  चीफ यह कहते हैं कि उन्हें टोपी
पहनने की  जरूरत नहीं है।  वे कहते हैं ठीक
वैसे ही जैसे मैं तिलक  नहीं लगा
सकता उन्हें भी धार्मिक चिन्ह लेने
की जरूरत नहीं है। देश के बडे़
तबके  को  इस बयान में भले ही भारी
सुगंध का  आभास हुआ हो जबकि
टोपी-तिलक  कोई ताल्लुक
मजहब से साबित नहीं किया जा
सकता। टोपी, तिलक
  में उलझाकर
रखने वाले ये लोग देश को  पीछे ले
जा रहे हैं। उनमें तेरहवीं सदी की
आधुनिकता भी नहीं।
दक्षिण के  उस हिस्से की  स्त्रियों
का क्या  कीजिएगा जहाँ स्त्रियां  बिंदी लगाती
हैं और मंगलसूत्र भी पहनती हैं। फिर तो
 दोष उनका  भी है जो सलवार
कमीज पहन रहे हैं  और उनका  भी
जो साड़ी पहनते हैं । उनका  भी जो
गैर मजहबी होकर ताजिए की
परिक्रमा करते
  है और उनका  भी
जो दरगाह पर चादर चढ़ाते
  है। ये
परंपराएं मजहबी नहीं हैं फिर भी
हैं। हो जाइए सख्त और रोक
दीजिए सबको । ये मिट्टी के  तौर-तरीके
 हैं जो संग-संग रहते हुए हम
सबने अपना लिए हैं।
मुस्लिम टोपी, हिंदू तिलक , में
एक  ऐसी विभाजक  रेखा की
साजिश नजर आती है जो तहजीब
पर करारा तमाचा है। ये तो वे लोग
हैं, जिन्हें योग क र रहे मजहबी को
देखकर भी तकलीफ होती होगी।
योग, ध्यान ऐ
सी संपन्न भारतीय
साधनाएं हैं  जिनकी  पूरी दुनिया
मुरीद है। इस सीमित सोच पर
हैरानी तो होती है उससे भी ज्यादा
हैरानी तब होती है जब इस बयान के
स्वागत में बयान आते हैं। सियासी
संतुलन बनाने की  इस फूहड़
कोशिश में किसी भी सच्चे
हिंदुस्तानी को  यकीन नहीं होगा। ये
वो लोग हैं जिन्होंने युगों-युगों से
माला फेरी है लेकिन मन की  माला
का  एक भी मनका  नहीं फेर पाए हैं।
संत
कबीर  ने ही कहा है
माला फेरत जुग भया,
फिरा ना मन का फेर
कर का  मनका  डार दे,
मन का  मनका  फेर
इन दिनों हर चैनल ने वोटों
की बहस पर कार्यक्रम बनाए हैं। ये
इस धर्म का , ये इस जाति का । ये
चुनाव के समय ही €क्यों  याद आते हैं
इन्हें। ये फितनों की  याद दिलाते हैं।
इन दिनों सद्भाव पर ना के  बराबर
रपटे हैं । सब गिनने को आतुर हैं।
कोई  जख्म तो कोई  सर। यह
लोकतंत्र का  तकाजा नहीं है। यह
अलगाव की कोशिश है। खुसरो ने
शायद इन्हीं लम्हों के  लिए लिखा था
बहुत कठिन है डगर पनघट की
कै से भर लाऊं मधवा से मटकी ।

Tuesday, April 15, 2014

देह की मंडी में बिक गयी लक्ष्मी




जयपुर में गुरुवार की  वह दोपहर काफी अलग थी। संतरी लिबास में खिली हुई महिलाओं का यूं मिलना अक्सर नहीं ही होता था। वे सब एक  फिल्म देखने के  लिए आमंत्रित की  गई थीं। प्रवीणलता संस्थान यह फिल्म इन महिलाओं को  दिखाने की  ख्वाहिश रखता था, जो काम-काजी हैं, ऊंचे पदों पर हैं और जो दृश्य बदलने की  ताकत रखती हैं। लक्ष्मी यही नाम था फिल्म का । फिल्म के  शुरू होने से पहले जो जुबां चहक  रही थीं , चेहरे दमक  रहे थे, वे फिल्म शुरू होते-होते खामोश और मायूस होते गए। सन्नाटा यकायक  कभी सिसकियों में तो कभी कराह में बदल उठता था। घटता पर्दे पर था टीस दर्शक के भीतर उठती थी।
 

मानव तस्करी से जुड़ी है कथा
लक्ष्मी एक चौदह साल की लड़की  है। बेहद खूबसूरत और प्यारी जिसे उसका  पिता तीस हजार रुपए में बेच देता है। कसाईनुमा चिन्ना इन लड़कियों को  भेड़-बकरियों की  तरह भरकर देह की  मंडियों तक  पहुंचाता है। रेड्डी सबसे छोटी लक्ष्मी को  यह कहकर चुन लेता है कि  यह तो सबसे छोटी है फिर उसी लड़की  को घर में रखकर उसके  साथ दुष्कर्म करता है। जबरदस्ती के  बाद पानी में घुलता रक्त सिनेमा हॉल में मौजूद कई युवतियों को  विचलित कर देता है। इसके  बाद लक्ष्मी रेड्डी के  कोठे पर भेज दी जाती है जिसे बेसहारा अनाथ लड़कियों की  सेवा के  नाम पर बतौर गर्ल्स  हॉस्टल चलाया जाता है। छोटी बच्ची के लिए पुरुष ग्राहक  खूब दाम चुकाते हैं। वह बच्ची इस घिनौनी दुनिया से कई बार भागने की कोशिश करती है लेकिन चिन्ना उसे हर बार पकड़ लाता है। बेरहमी से पिटती लक्ष्मी पर कोई रहम नहीं खाता, उसे उस दिन और ज्यादा ग्राहक लेने पड़ते हैं। बूढ़े के  फॉर्म हाउस पर नाचते हुए मौका देखकर लक्ष्मी फिर दीवार फांदने का प्रयास ·रती है लेकिन अब की  बार चिन्ना बेरहमी के साथ उसके  पैर पर कीलों वाला डंडा घुसा देता है। पीड़ा से भरी लक्ष्मी की  फिर वही सजा कि  इस हाल में भी वह ग्राहक लेगी।
 

लक्ष्मी चाहती है सजा दिलवाना
ज्योति( शेफाली छाया ) को  लक्ष्मी के  इस हाल पर खूब रहम आता है और वह चिन्ना से इस हाल में ग्राहक  ना लेने की  इल्तजा करती हैं। ज्योति स्वयं एक  बेटी की  मां है जो नर्क  में रहते हुए भी अपनी बेटी को  इंजीनियर बना रही है। उसकी  बेटी को  यही मालूम है कि मां एक दफ्तर में काम करती है। हॉस्टल में उमा नामक  एक्टिविस्ट का  नियमित आना-जाना है जो देह व्यापार में लिप्त महिलाओं को  सुरक्षा और साफ-सफाई की  सामग्री देने आती है, वह लक्ष्मी से भी मिलती है। एक  और सामाजिक कार्यकर्ता कैमरा लेकर लक्ष्मी के  पास ग्राहक बनकर आता है। वह बीमार और घायल लक्ष्मी पर हो रही ज्यादती को  रिकॉर्ड करता है। इस बीच हॉस्टल पर छापा पड़ता है, रेड्डी और चिन्ना गिरफ्तार क र लिए जाते हैं। पीटा एक्ट के तहत लड़कियां पुनर्वास केंद्र में लाई जाती हैं। वे वहां सिलाई-टोकरी बुनने का प्रशिक्षण लेती हैं। लेकिन कुछ ही दिनों में चिन्ना-रेड्डी छूट जाते हैं और कोठा फिर आबाद हो जाता है। लड़कि यां लौट जाती हैं कि   यह काम उनसे नहीं होता। लक्ष्मी नहीं लौटती। वह सजा दिलाना चाहती है।
 

लक्ष्मी को  मिलता है न्याय
तमाम उतार-चढ़ावों के  बाद लक्ष्मी को  न्याय मिलता है। रेड्डी का  डॉक्टर साबित करता है कि  उसके  पेशेंट को एड्स है और उसी ने लक्ष्मी से बलात्कार किया है। रेड्डी के  कहने पर ही लक्ष्मी को  इंजेक्शन दिए गए कि  लड़की  जल्दी बड़ी हो जाए। चिकित्सक का यह बयान मील का  आखिरी पत्थर साबित होता है। लक्ष्मी आंध्रप्रदेश की  पहली लड़की  है जिसे इममोरल ट्रैफिक (प्रिवेंशन) एक्ट-पीटा के  तहत २०१२ में न्याय मिला है। सच तो यह है कि कायदे-कानून के बावजूद यह सिलसिला रुकता नहीं। समाज इसे अपराध नहीं मान पाता। इसे सदियों पुराना पेशा बताकर महिमामंडित और किया जाता है।
किस्से कहानियों में सुनते आए हैं कि  बड़ी कायदे की  तवायफ थी, कमाल का  मुजरा करती थी या फलां तवायफ के  गले में ईश्वर का वास था। उफ, कला को  सराहने का  ये क्या सलीका  हुआ?
 

घृणा से भर देता है चिन्ना
फिल्म देखने वाले को  लक्ष्मी के  आसपास की  दुनिया से घिन हो आती है। चिन्ना के  भद्दे जोक्स-भाषा इस पेशे की  भयावहता को  खूब अभिव्यक्त करते हैं। चिन्ना के  कई संवाद पिघले सीसे की  तरह कानों में पड़ते हैं। चिन्ना का  किरदार फिल्म के  लेखक-निर्देशक  नागेश कुकुनूर ने अदा किया है। वे किरदार में यूं  जा बैठे हैं कि  देखनेवाला नफरत से भर उठता है। नागेश निर्मम निर्देश· हैं, उन्होंने हालात को  जस का  तस दिखाया है। यही वजह है कि  फिल्म अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सराहना और सम्मान पा रही है। कई लड़कियां इन दृश्यों को  बर्दाश्त नहीं कर  सकीं   और हॉल छोड़·र चली गईं। आयोजकों  को  भला-बुरा कहते हुए कि  आपने ये दिखाने के  लिए हमें बुलाया था। वैसे नागेश काम  हिंसा के  साथ इसे प्रदर्शित कर  सकते  तो प्रदर्शित तो ज़रूर होती लेकिन अपना असर कुछ काम पैदा करती 


  मंटो की याद

दरअसल, हमारा समाज ऐसा ही है। एक  तबका  दूसरे तबके की  तकलीफों से बिल्कुल अंजान है या फिर समझते हुए भी उसकी  अनदेखी करना चाहता है। वह अपने चारों ओर खिली हुई सुंदर दुनिया की  कल्पना में ही जीना चाहता है। चिन्ना जब कहता है कि मेरा तन रहा है... कौन तैयार है.. देह मंडी में स्त्री के केवल एक मांस पिंड होने की  पुष्टि करता है। एक दृश्य में लक्ष्मी घायल और बीमार होने के बावजूद यंत्रवत इसलिए कपडे़ खोलने लगती है कि उसे लगता है की  ग्राहक आया है। यह महान कथाकार सआदत हसन मंटो की  कहानी खोल दो की  याद दिलाता है जिसमें बंटवारे के बाद नायिका  शैतानों के  हत्थे चढ़ जाती है जहां उसकी  देह सिर्फ इस्तेमाल की  हुई वस्तु बनकर रह जाती है। मंटो पर गुलाम भारत में मुकदमे चले थे और आजाद भारत में नागेश की यह फिल्म प्रदर्शन से पहले ही प्रतिबंधित हो गई है।

Thursday, February 13, 2014

प्यार के चार अक्स

खुशियां आती हैं
मेरे पास
तन्हाई के रैपर में
लिपटी हुई

तुम्हें नहीं मालूम
तन्हाई के रैपर में
लिपटी हुई खुशियों के मायने
इसके खुलते ही मैं
समां जाती हूँ इसमें

सारा जुनूं
बस तुम्हारे करीब
रहने का है।
तुम्हारी यादों की
नम मिटटी में बने शामियाने
में शाम गुज़ारने का है। 



2


 ये जो मेरे भीतर भरा है
 तेरे लिए प्रेम
चाहती हूँ
यह ऊष्मा
संचारित हो जाए
किसी जोड़े में
प्यार की सबसे ज़यादा दरकार
ज़िंदा कौमों को है


3
कभी कहा था
तुम बिन
नहीं होगा जीना
फिर, ये कौन जीए जाता है

एक बुत
ताबूत से बना.


4

वह दुनिया का
सबसे लम्बा चुम्बन था
समय के फैर में कौन पड़ता
वह तो गुम थी युगों के लिए.