Thursday, November 28, 2013

त हल्का

जयपुर से प्रकाशित डेली न्यूज़ की साप्ताहिक पत्रिका खुशबू
http://dailynewsnetwork.epapr.in/190567/khushboo/27-11-2013#page/1/2 
इस घटना से पहले तक तरुण तेजपाल धारदार ब्रितानी अंग्रेजी में अपनी बात रखने वाले शानदार वक्ता और लेखक  थे। एेसा वक्ता, जो बात कहते हुए कभी-भार  पंजाबी धुनों पर सवार होर थोड़ा मनमौजी हो जाता था। पचास साल के  इस लेख-पत्रकार की  पकड़ यदि भारत के  एलीट क्लास पर थी तो उतना ही दखल कमजोर तबके  पर भी था। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में ई बार इस चोटीवाले, ऊंचे द के  गोरे चिट्टे शख्स को  सुना। जिस किताब के  अंश उन्होंने यहां पढे़, उसमें एक किशोर उम्र का  बाल था और था असहज रता टेक्स्ट।
बहरहाल, इस गोरे चिट्टे शख्स पर आज दागदार इल्जाम लगे हैं। शायद इल्जाम
हना गलत होगा यह तो सच्चाई है, क्योंकि स्वयं तेजपाल इसे स्वीकार  चुके  हैं और अपनी प्रबंध संपादक और पत्रकार लड़की  दोनों से माफी  मांग चुके  हैं और स्वयंभू न्यायाधीश बनकर खुद को छह महीने तक  पद से अलग रखने का  फैसला भी कर चुके  हैं। .... और फिर ज्यों ही पता चलता है कि फैसला भारतीय क़ानून के  मुताबिक होगा, तो वे भी किसी आदतन  अपराधी की  तरह ही व्यवहार रने लगते हैं। ये वही तेजपाल हैं, जिन्होंने तहलका  को  वो मुकाम दिया जहां तक  पहुंचने का  ख्वाब, जोश-ओ-जुनून से भरा हुआ हर पत्रकार देखता है। तेजपाल की  अगर क़ानून में इतनी भी आस्था नहीं तो कैसे  उम्मीद की जा सकती है कि  तहलका  ने जो भी स्टिंग्स किए, उसमें अपराधियों पर क़ानूनी प्रक्रिया चलवाने की  मंशा रही होगी। जब खुद पर बीतती है, तो इनसान यूं ही पलटता है?
 
तहलका कि प्रबंध संपादक शोमा चौधरी कि भूमिका कहीं भी ऐसी नहीं थी कि वे किसी आम नियोक्ता से अलग नज़र आयें। यही होता है वर्क प्लेस पर हरकतें होती हैं  और फिर यही कोशिश कि लड़की किसी तरह से संस्थान ही छोड़ कर चली जाए । वही शोमा जो महिला मुद्दों की  पैरवी रते हुए सरकार हिला देने का  माद्दा रखती हैं, इस मुद्दे पर बचाव की  मुद्रा में दिखीं। उनसे नहीं हा गया कि  जो भी हो हम मामले की  पूरी तहकीकात  रेंगे। उल्टे उन्होंने तेजपाल से हा कि आपने पत्रकार को  जो ईमेल लिखा है उसकी  भाषा को  थोड़ा विनम्र और माफीनामा जैसी बनाइए। उनकी  कोशिश थी कि  मामला इसी लिखा-पढ़ी के  बीच सुलझ जाए, लेकिन गुनाह बड़ा था। तेजपाल ने सात और आठ नवंबर को  लगातार दो बार घृणित हरकत की । पत्रकार लड़की  ने इस घटना का  पूरा ब्यौरा गोवा में मौजूद अपने तीन सहर्मियों को भी दिया था। सुखद है कि  इन तीनों ने अपने बयान गोवा पुलिस को  दर्ज रा दिए हैं और वे तीनों इस दर व्यथित थे कि  अपनी नौरियों से इस्तीफा देने को  भी तैयार थे। गौरतलब है कि  सोलह दिसंबर २०१२ को दिल्ली की  एक  बस में हुआ सामूहि दुष्र्म और फिर अगस्त २०१3 में मुंबई के शक्तिमिल्स कंपाउंड में पत्रकार के साथ हुए एक और सामूहि दुष्र्म के बाद गोवा की  इस घटना में भी पीडि़ताओं के साथी सहर्मियों का रवैया बहुत ही संवेदनशील रहा है।      
माफीनामा जारी
र तेजपाल घिर चुके  हैं। दिल्ली की  घटना के  बाद सीआरपीसी में किए  गए संशोधन के  मुताबि धारा ३०९ के तहत छह महीने में इस ट्रायल को  पूरा रना होगा। उम्मीद की  जानी चाहिए कि यह छह महीने कार्यस्थल  पर हो रही छेड़छाड़ के लिहाज से टर्निंग पॉइंट साबित हों।

          पूर्व तहलका पत्रकार ने यह भी कहा था कि  तेजपाल के  रिश्तेदार उसके परिवार पर भावनात्म
दबाव बना रहे हैं। यह दुखद है कि  अपनी सहेली के   पापा को किसी कठघरे में खड़ा करना पडे़, अपने पिता के मित्र को  इस रूप में देखना पडे़। लड़कियों ने करिअर की  राह में जरूर इरादे बुलंद किए हैं लेकिन आत्मसम्मान  तापर नहीं रखा है। वे बोल रही हैं। अन्याय के खिलाफ इंसाफ चाहती हैं और ये भी चाहती हैं कि  उनका  शुभचिंत बनने की आड़ में कोई ई उनका  देहशोषण नहीं र सता। अब जब लड़कियां अपनी बात न्यायिसंस्था त पहुंचाने का  साहस दिखा रही हैं इंसाफ की राह में शामिल संस्थाओं  को भी संवेदनशील होना पडेग़ा। यहां आज भी सारा दारोमदार पीडि़ता पर है कि  वह साबित रे कि  उसके साथ दुष्र्म या दुव्र्यवहार हुआ है। न्याय पाने की  इस वायद में अपने जख्म दिखाते-दिखाते वह इतनी घायल हो जाती है कि  खुद ही हार जाती है। एेसी हर शिकायत की  संजीदगी से लेने की पहल पहले संस्थान  और फिर पुलिस को  रनी होगी। यही उम्मीद कि केवल तहलका न मचें गम्भीर तहकीकात भी हो कि काम पर निकली ये लड़कियां गर सभी मसलों पर आपसे संवाद कर रही हैं तो इसका कतई ये अर्थ नहीं कि वे आपके साथ आपके इरादों में शरीक हो।  इस मामले में भी तेजपाल ने आड़ ली है कि हमारी चर्चा सेक्स और डिजायर जैसे मामलों पर हो रही थी जिसका पत्रकार लड़की ने यह कहकर विरोध किया कि यह चर्चा आपने शुरू की थी  क्योंकि आप यही चाहते थे।

Wednesday, November 13, 2013

बिज्जी का जाना वाल्मिकी और वेदव्यास का जाना है

विजय दान देथा 'बिज्जी' का जाना हमारे बीच से वाल्मिकी और वेदव्यास के  चले जाने से कम नहीं। रचना में जितनी गहराई व्यक्तित्व में उतनी ही सादगी। वे कतई अपने कद का बोझ लिए नहीं चलते। बातचीत से कभी कोई आभास नहीं कि  उन्होंने कुछ एेसा रचा है जिसके  लिए बड़े-बडे़ फिल्मकार उनकी  ड्योढ़ी चढ़ते हैं। जोधपुर में बिताए बीसवीं सदी के अंतिम तीन बरसों में जब कभी वे सड़कों  पर भी टकराए तो सादगी और विनयशीलता उनके  कंधे से लटके  झोले की तरह ही मिलती ।
एक  बार वे लोक कला मर्मज्ञ कोमल कोठारी  के घर से निकले ही थे कि  सामने मैं पड़ गई। गौरतलब है कि  कोमल कोठारी के  साथ मिलकर बिज्जी ने रूपायन संस्था बनाई, जो राजस्थान की  लोक  संस्कृति को  सहेजने का बड़ा काम कर रही थी। पूछने पर कि  चलिए मैं छोड़ देती हूं थोड़ी ना-नुकुर के  बाद वे मोपेड की  पिछली सीट पर बैठ गए और मैंने उनकी  बताई जगह पर छोड़ दिया जो ज्यादा दूर नहीं थी। जिंदगी एेसे मौके  कहां रोज मुहैया कराती है। बहरहाल, लोक साहित्य को  लोकभाषा में कलमबद्ध करनेवाले  बिज्जी इस लिहाज से भी अनूठे थे, क्योंकि अक्सर साहित्यकारों के आसपास उनका  आभामंडल बनाए रखने वाला समूह होता है और वे उनके  बीच बैठकर ही बौद्धिकता के  गंभीर बयान जारी करते हैं। ऐसा कभी भी बिज्जी के साथ नजर नहीं आया। बिज्जी की  एक कहानी पर गौर कीजिए। दोहरी जिंदगी नामक कथा संग्रह को  पेंग्विन ने 2007 में प्रकाशित किया। शीर्षक  कहानी ही लेस्बियन यानी दो स्त्रियों के रिश्ते को इतनी सहजता से बयां क रती है कि  यकीन नहीं होता, वह भी ग्रामीण परिवेश में।
   जोधपुर के  बाद बिज्जी साल 2001 में विदेशी पाहुणों को  आकर्षित करने वाले सम्मेलन राजस्थानी कॉनक्लेव, जयपुर  में मिले। वहां भी बेहद सादगी के  साथ एक हॉल से दूसरे हॉल में वक्ताओं को  सुनते और चल पड़ते। सहज सवाल उभरता है कि  एेसी कौनसी पृष्ठभूमि है जो अर्श पर पहुंच चुकी  लेखनी के  कदमों को  इतनी मजबूती के साथ फर्श पर थामे रही। कथाकार उदयप्रकाश के  शब्दों में महान कथाकार जिसका  समूचा जीवन कठिनाइयों, संघर्ष, शोक और वियोगों से भरा रहा। जिसने चार वर्ष की  आयु में सामंती हिंसा के  शिकार बने अपने पिता का  टुकड़ों में कटा शरीर देखा। फिर, भयावह आर्थिक  संकटों के  बीच अपने परिवार का  संपोषण कि या। एक  के  बाद एक  पुत्र, प्रपौत्र, पत्नी और परिजनों के  वियोग के आकस्मिक  आघात सहे। वह अपूर्व साहित्यकार जिसका जीना, सांस लेना, चलना-फिरना सब कु छ शब्दों और वाक्यों की  अनंत अबूझ पगडंडियों से यात्रा करते हुए बीता। सच है कि  एेसा इंसान जब कलम थाम लेतो बिज्जी बन के  ही उभरता है।
हमारी पीढ़ी का  दुर्भाग्य है कि  हम किताबों की  ओर फिल्मों से जाते हैं। बरसों पहले जब मणि कौल की  दुविधा  फिल्म देखी तो यकी न नहीं हुआ था कि  वे वही बिज्जी हैं, जिनकी  क़था पर बनी फिल्म देखकर चकित रहने के सिवा कोई चारा नहीं था। फिर, जब बिज्जी से मुलाकात हुई तो हैरान रह गई कि ये व्यक्ति किस कदर सादा तबीयत हैं । वरना आज के  दौर के  क़थाकार एक  दो किताब छपवाकर ही अपने अहंकार  को  संतुलित करने में नाकाम हो जाते हैं। यह बौद्धिक  आतंक  बिज्जी के  पास कभी नहीं फटका । एक कहानी डायरी का पृष्ठ सांप्रदायिक पन्नालाल की पोल खोल कर रख देती है . उसे तब तक चैन नहीं आता जब तक एक पन्ना वह अपनी हरकतों से न रंग ले।  
जोधपुर के विनोद विट्ठल के शब्दों पर गौर कीजिए 'बीज जितने पुराने और बादल जितने नए थे बिज्जी। बिज्जी से मिलना हजार साल की उम्र वाले एक  एेसे जवान किस्सागो से मिलना था, जिसने कई-कई युग देखे और जो पखेरुओं और रूखड़ों  (पेड़ ) से लेकर अंधेरे और चांदनी तक की बोलियां जानता था। अबोला वहां सुन सकता था और अदेखे का आख्यान बना  सकता था। रसूल हमजातोव और चेखोव से लेकर दोस्तोवस्की  तक उसकी  बातों में हुंकार भरते थे। विक्टर ह्यूगो से लेक र लियो तॉलस्तॉय तक  उसके  बुलावे पर आते थे।'  एेसे किस्सागो को  नमन और उस माटी को  भी जिसने एेसी कहानियां दी। जो देहात, शहर, प्रदेश, देश की  सरहद लांघ दुनियाभर में फैल गई। तभी तो पद्मश्री बिज्जी दो साल पहले नोबल की  श्रेणी में नामित थे। मिट्टी की  बात कहने वाले बिज्जी ने बोरुंदा को  ही घरोंदा बनाए रखा। वे क भी नहीं उडे़, लेकिन किस्से गुनने की  उनकी ताकत ने उनके कदमों में ही दुनिया को  ला खड़ा किया उस भाषा की  ओर, जिसे देश मान्यता ही नहीं दे सका  है।
 

ps:स्मृति शेष - विजय दान देथा 'बिज्जी' अनूठे रचनाधर्मी होने के साथ अनोखे इंसान भी थे। जोधपुर में कभी-कभार मैं और मेरे पति शाहिद मिर्ज़ाजी उनसे टकरा जाते तो वे चुटकी लेने से बाज़ नहीं आते और हमें वर्षा का बादल कहते हुए ज़ोर से हंस पड़ते। कथाकार को कुछ ज़यादा पढ़ने की क़ुव्वत हासिल होती है। उन्हें सादर नमन।