Thursday, September 26, 2013

आखर बंदी

ये कौन बांधे है
तुझे-मुझे अब भी
जन्म में यकीं नहीं
कच्ची उम्र को गुज़रे अरसा हुआ
तेरे हर्फ़
बस यही  बिखरे पड़े हैं
मेरे चारों ओर
कभी सहलाते हैं
कभी तकरार करते हैं
कभी बरस जाते हैं मुझ पर गहरे
भिगो देते हैं भीतर तक 
मैं इन आखरों की बंदी हूँ
ये आखर-बंधन मैंने लिया है
सात फेरों की तरह.
इस जन्म के लिए
जीते जी . 

image: varsha

हर लो मेरा चैतन्य
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तुम नहीं जानते
तुमने अनन्या मान
कितना अन्याय किया है मेरे साथ
मैं अचेत ही भली थी
अब जब चेतना मुझे छू गयी है
मुझे तुन्हारे सिवा कुछ नज़र नहीं आता

हर लो मेरा चैतन्य
दे दो जड़ता मुझे
इस दुनिया में जीने के लिए
कह दो कि मेरा-तुम्हारा कुछ नहीं
आजाद करो मुझे
इस मोहपाश से
जानो तुम यह सब
क्या तुम नहीं जानते ?

 

Wednesday, September 11, 2013

पाकिस्तान में मलाला अफगानिस्तान में सुष्मिता


अफगानिस्तान में अमेरिकी दखल
हो जाने के बावजूद लेखिका और
स्त्री सेहत से जुड़ी सक्रिय
कार्यकर्ता सुष्मिता बैनर्जी की हत्या
हो जाती है। इन दिनों यह
ताकतवर देश जाने किस हक से
सीरिया पर हमला करने की मंशा
रखता है। दुनिया के बड़े हिस्से में
जब स्त्री को जीने लायक
परिस्थिति दे पाना ही नामुमकिन
हो रहा है ये देश युद्ध के जरिए
शांति प्रयासों में लगा है? 

स्त्रियों की
सेहत के लिए काम कर रहीं
सुष्मिता बैनर्जी अफगानिस्तान में
गोलियों से भून दी जाती हैं, तो स्त्री
शिक्षा के लिए संघर्ष कर रही
किशोरी मलाला यूसुफजई को
तालिबानी पाकिस्तान में मौत देने
की कोशिश करते हैं।
मलाला सौभाग्यशाली रहीं कि वे
आज जिंदा हैं, लेकिन सुष्मिता के
साथ ऐसा   न हो सका। वे
अफगानिस्तान के पूर्वी पक्तिका
प्रांत में अपने घर पर मार दी गईं।
उनके पति जांबाज खान को बांध
दिया गया और आतंकी उन्हें यह
कहते हुए मारने लगे कि तुमने
हमारे खिलाफ लिखना नहीं छोड़ा।
उनचास साल की सुष्मिता को प्रेम
और सौहार्द की कीमत जान से
चुकानी पड़ी। काबुलीवाले की
बंगाली बहू के स्नेह संदेश में
कट्टरपंथियों को अपने इरादों की
मौत का पैग़ाम नजर आया। यही
उनकी लिखी किताब का शीर्षक
था। संभवत: यह गुरु रवींद्रनाथ
टैगोर की लिखी कहानी
काबुलीवाला के आगे की कथा थी।
इस बार काबुलीवाला यानी
अफगानी पठान का नाम जांबाज
खान था। असल में वह
अफगानिस्तान से कोलकाता
व्यवसाय के सिलसिले में आया था,
जहां सुष्मिता से उसकी मुलाकात
हुई। तब पच्चीस बरस की सुष्मिता
को इस काबुलीवाले से प्रेम हो
गया और वह उसके साथ उसके
देश चली गयीं । जमीन उस वक्त
सुष्मिता के पैरों तले पूरी ही निकल
गई, जब उन्हें पता चला कि
जांबाज पहले ही विवाहित है और
उसके बच्चा भी है। हालांकि, पहली
पत्नी के हालात पर उन्हें दया आ
गई। स्त्री वहां आधी-अधूरी
नागरिक ही थी।
सक्रिय और संवेदनशील सुष्मिता
उनके हक के लिए संघर्ष में
व्यस्त हो गईं। सुष्मिता ने सुरक्षा
के लिए इस्लाम कुबूल किया। वह
सईदा हो गईं। हालात तब बिगडे़,
जब १९९४ के आसपास किसी
तरह बचते-बचाते वहां से भाग
निकलीं। तालिबान ने उनकी
डिस्पेंसरी बंद कर दी थी और
उन्हें दुष्चरित्र स्त्री बतौर प्रचारित
किया। कोलकाता पहुंचकर किताब
'काबुलीवालार बंगाली बोऊ' 
लिखी।
किताब में तालिबानियों के चंगुल से
निकलकर जिंदा रहने का .यौरा
था। इस पर २००३ में बॉलीवुड में
एस्केप फ्रॉम तालिबान नामक
फिल्म भी बनी। किताब ने सुष्मिता
को बंगाल में स्थापित कर दिया।
           
       हाल ही सुष्मिता का दोबारा पति के
पास लौटना शायद सही नहीं था।
 तसलीमा नसरीन के लिए भी बंगलादेश के  
कट्टरपंथी ताक में बैठे  हैं लेकिन वे वहां नहीं लौटतीं। 
 सुष्मिता अफगान औरतों पर एक और किताब लिखना चाहती
थीं कि किस तरह वे जीने के अधिकारों से
महरूम हैं। वे वहां एक डिस्पेंसरी
चला रही थीं ताकि इन महिलाओं
को अच्छी सेहत का पाठ पढ़ा
सकें। उधर, कोलकाता में सुष्मिता
के भाई गोपाल बैनर्जी का कहना
है कि जांबाज से उनकी बात हुई
थी और वे काफी परेशान नजर आ
रहे थे। मौत के अगले दिन ही
इस्लामिक कायदों से सुष्मिता का
अंतिम संस्कार कर दिया गया।
सुष्मिता की यह मौत उस इंसान
की मौत है, जो व्यापक दृष्टिकोण
के साथ जीता है। सरहदें उसकी
सोच को दायरों में नहीं बांध पातीं।
वह जहां होता है, समाज की भलाई
की दिशा में लग जाता है। वे
आजाद खयाल अमन पसंद
भारतीय थीं। जाहिर है उस मुल्क
में कुछ भी नहीं बदला है और वहां
रह रहे भारतीयों की जान मुश्किल में ही है . 

Wednesday, September 4, 2013

वो सजदे के काबिल तो हो


कई बार लगता है कि हम वो समाज हैं जिसे ईश्वर तक पहुंचने के लिए कई सारे जरियों की जरूरत होती है। हम हमेशा माध्यम की ताक में रहते हैं और उम्मीद करते हैं कि कोई आए और हमारा हाथ पकड़कर उस तक ले जाए। हमें ऐसे लोग खूब रास आते हैं, जो हमें यकीन दिला देते हैं कि वे हमें प्रभु तक ले जाएंगे। फिर एक वक्त आता है, जब ये बिचौलिये ही हमें भगवान लगने लगते हैं और हम इनके कहे मुताबिक शतरंज के मोहरों की तरह चलने लगते हैं। यह तो बहुत अच्छा हुआ कि सोलह साल की बेटी के इस पिता की आंखें खुल गईं वरना कई परिवार अपनी संतानों को समर्पित करके भी आंखें बंद किए बैठे हैं। वे इसे बाबा का प्रसाद या धर्म की राह में दी गई आहुति मानते हैं। इस लड़की के पिता भी आसाराम के अंधभक्त थे। लखनऊ से डेढ़ सौ किलोमीटर दूर शाहजहांपुर में उनका अपना व्यवसाय था कि दस साल पहले आसाराम के फेर में आ गए और दीक्षा ले ली। पास ही जगह खरीदी और अपने पैसों से आश्रम बनाया। चेतना तो तब लौटी, जब आसाराम ने बेटी को भी इसी सिलसिले में जोड़ लिया।
  जिस इंदौर शहर से आसाराम की गिरफ्तारी हुई है, उसी शहर की कई महिलाएं और युवतियां बीस साल पहले ही शपथ पत्र देकर इस कथित बापू की पोल खोल चुकी हैं। उन्होंने साफ कहा था कि  बापू का चरित्र ठीक नहीं है और इसने हमारा शोषण किया है। सामाजिक और राजनीतिक दबावों के चलते मामले को रफा-दफा कर दिया गया और परिवार पीछे हट गए। तीन साल पहले एक टीवी चैनल के स्टिंग ऑपरेशन में भी आसाराम को कानून से भागी युवती को शरण देते हुए दिखाया गया था। आसाराम स्टिंग कर रही रिपोर्टर को सलाह देते हैं कि घबराने की कोई जरूरत नहीं। तुम यहां पूरी तरह सुरक्षित हो, अपने तमाम बैंक खातों में नाम बदल डालो ताकि पुलिस और कानून से मुक्त हो जाओ । अचरज नहीं होना चाहिए कि भक्ति की आड़ में यहां कई भगौड़ों को आश्रय दिया जाता हो। हर बडे़ शहर में कई बीघा जमीनों पर दिन में भले ही फलों से लदे पेड़ और प्रवचन की ध्वनि सुनाई देती हो, लेकिन रात वहां काली करतूतों का सबब बनकर आती है।
   सवाल ये उठता है कि इस अंधभक्ति की लौ जलती कैसे है? कहां से आता है इतना बड़ा जनसमूह? कैसे पैदा होती है यह श्रद्धा कि बाबा दर्शन दें और हम उनके चरणों में गिरें? क्यों हमारी चेतना एक बार भी यह सवाल नहीं करती कि यह भी हमारी ही तरह हाड़-मांस का पुतला है, इसके आगे क्यों शीश नवाना? गुस्ताखी माफ, लेकिन हम सब ऐसे ही परिवारों से आते हैं, जहां आदर करना, शीश झुकाना संस्कारों के दायरे में आता है। फिर चाहे संबंधित इसके योग्य हो या नहीं। आस्था की लहर हमारे भीतर हमेशा हिलोरे लेती रहती है। इसे भुनाना बहुत आसान है। यह भेड़चाल भी है।
   पच्चीस-तीस साल पहले इंदौर, जयपुर, लखनऊ जैसे शहरों में ऐ से कई सत्संगी संगठनों का जन्म हुआ। पहले पहल तो लोग आपस में ही बातचीत करते कि कथित बाबा के डेरे पर गए हो.. वहां दस पैसे की चाय और चार आने का समोसा मिलता है। दूसरे कहते तुम वहां भी जाना,  बड़ी हरियाली है। शाम को प्रवचन होते हैं। मन को खूब शांति मिलती है। गरीबी, बीमारी और तमाम परेशानियों से जूझ रहा समाज इन डेरों पर जाहिर है काफी राहत महसूस करता। जनमानस इतना भोला और सरल कि इस निजाम (खाने-पीने और व्याख्यान ) को चलाने वाले की एक झलक पाकर धन्य होने लगा। कथित बाबा और बापू के दर्शन में इन्हें अपनी जिंदगी की चुनौतियां कम लगने लगतीं। कइयों को लगता है कि वह तीन साल से बाबा की सेवा में जा रही है और उसकी आर्थिक दशा एकाएक सुधर गई, तो वह भी सपने देखने लगती। इनके सपने पूरे हुए कि नहीं, लेकिन बाबाओं के ठाठ बढ़ते गए। वे खुद को भगवान का दर्जा देने लगे। लोग इनकी तस्वीरों को पूजन कक्ष में जगह देने लगे। जो ये संत और सच्चे गुरु होते, तो कभी गोविंद की जगह नहीं लेते। ये गोविंद से पहचान कराने की बजाय खुद गोविंद बनने की कोशिश में लिप्त हो गए।
  एक बाबा तो बेतुकी बातों से ही कृपा बरसने का हुनर बता रहे हैं। बौराए लोग उस बाबा के खाते में हर रोज पैसा जमा कराने बैंकों में पहुंच जाते हैं। दिमागी बदहाली का ये आलम है कि बाबा कहता है काला ब्रांडेड पर्स रखो, कृपा आनी शुरू हो जाएगी तो स्त्रियां वाकई सा करने लगती हैं। जो समाज इस कदर आतुर है खुद को प्रस्तुत करने के लिए, वहां एक नहीं कई बाबाओं का मार्ग बरसों बरस प्रशस्त है।
   इन हरकतों की पोल खोलने के लिए जब डॉ. नरेंद्र दाभोलकर जैसे वैज्ञानिक सोच वाले इंसान सामने आते हैं तो पुणे में उनकी हत्या कर दी जाती है।  बलात्कार के आरोपी को गिरफ्तार होने में बारह दिन लग जाते हैं, लेकिन वैज्ञानिक सोचवाले व्यक्ति की हत्या हो जाती है। हमारा यही रवैया बता देता है कि हम नेतृत्व के नाम पर कैसे लोगों से घिरे हैं और किस दिशा में जा रहे हैं। इस शिक्षक दिवस पर बस एक ही बात कि आंख मूंद कर किसी पर यकीन मत करो। अंध भक्ति दिमाग की बत्ती गुल होने के बाद ही जागती है।

तुमने तो झुका लिया अकीदत  से भरा सर 
 तख़्त ए शान पर काबीज़ उस काबिल तो हो