Wednesday, July 31, 2013

टंच स्त्रियाँ और चंट राजनेता

आईएएस दुर्गा शक्ति नागपाल 
सांसद मीनाक्षी नटराजन 
अगर जो निलंबन का आधार दुर्गा शक्ति नागपाल की गिराई मस्जिद की दीवार है, जिसके लिए  कोई अनुमति नहीं ली गयी थी तो नेताओं की ऐसी सोच विकास की कौनसी सीढ़ी चढ़ेगी नहीं  कहा जा सकता । यह तो जबरदस्ती उन मुद्दों को हवा देना है जिसकी ओर देश का ध्यान ही नहीं था.  माफिया से राजनेताओं की साँठ-गाँठ  है  जो इस व्यवस्था को और  पंगू बना रही है.एक पढ़े-लिखे युवा मुख्य मंत्री ने यह कार्यवाही कर निराश किया है तो  दूसरे  पढ़े-लिखे मुख्य मंत्री ने मंदसौर की सांसद मीनाक्षी नटराजन को सौ टंच माल कहकर साफ़ ज़ाहिर कर दिया है कि  वे स्त्री के लिए चीज़ और माल से बेहतर कोई  उपाधि नहीं खोज सकते


एक सियासत में अच्छे मुकाम पर हैं, तो दूसरी ब्यू
रोक्रेसी में अच्छे ओहदे पर। करिअर में खुद को ऐसी जगह देखने की ख्वाहिश में कई युवतियां दिन-रात मेहनत कर रही हैं, लेकिन मेहनत की दुनिया से निकलने के बाद होता क्या है? मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के प्रवक्ता महिला सांसद को ' सौ टंच माल' कह देते हैं और दूसरी को उत्तर  प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पद से ही निलंबित कर देते हैं। पहले बात 2009  बैच की आईएएस अधिकारी दुर्गा शक्ति  नागपाल की, जो निलंबन से पहले नोएडा की एसडीएम थीं। जब से वे इस पद पर आई थीं रेत खनन माफिया के खिलाफ उन्होंने एक माह में दो दर्जन से भी ज्यादा चालान कटवाए थे। ये अवैध रेत खनन यमुना और हिंडन नदी के किनारों से होता था। वे उनके डंपर और जेसीबी जब्त  कर लेती थीं। कई अवैध पुल भी उन्होंने ध्वस्त कराए । उनकी इस कार्रवाई से हड़कंप मचा हुआ था। अवैध कारोबार को रोकने के इनाम स्वरूप उत्तर  प्रदेश सरकार ने इस अधिकारी को यह कहकर निलंबित कर दिया कि ग्रेटर नोएडा के गांव कादलपुर क्षेत्र में इन्होंने एक निर्माणाधीन मस्जिद की दीवार गिरा दी। मस्जिद का निर्माण एक निजी जमीन पर हो रहा था, जिसकी कोई अनुमति प्रशासन से नहीं ली गई थी। मुख्यमंत्री से जब पत्रकारों ने पूछा कि एसडीएम का निलंबन  क्यों  हुआ, तो उनका कहना था कि जब हम एक्शन  नहीं लेते, तो आप लोग कहते हैं कि एक्शन नहीं लिया और जब एक्शन  लिया, तो आप कहते हैं सख्त कार्रवाई कर दी।
               दुर्गा शक्ति 
पंजाब कैडर की आईएएस हैं, जो 2011 की यूपी कैडर के अभिषेक सिंह से शादी के बाद उत्तर  प्रदेश आ गई थीं। उन्हें इलाके में एक ईमानदार अधिकारी के रूप में जाना जाने लगा था। उन्होंने एक स्पेशल उडऩ दस्ता बनाया था जो अवैध काम को रोकता था। गौरतलब
है कि मार्च 2012 
में अवैध खनन को रोकने में लगे आइपीएस नरेंद्र कुमार
सिंह की तो मध्य प्रदेश के मुरैना में हत्या ही कर दी गई थी।
                

उधर, दिग्विजय सिंह ने मध्य प्रदेश की मंदसौर जिले की सांसद मीनाक्षी नटराजन को 'टंच माल' कहकर जाहिर कर दिया है कि वे साथी स्त्रियों को किस नजर से देखते हैं। उन्होंने भले ही सफाई दी हो कि उनका इरादा खरेपन और साफ छवि वाली कहने का था, लेकिन मध्यप्रदेश, यूपी, बिहार में सब जानते हैं कि यह किन संदर्भों में इस्तेमाल किया जाता है।  'टंच माल' टिप्पणी  है, जिसका अर्थ दैहिक संदर्भों में है। यह कतई किसी स्त्री की कार्यकुशलता को पूरे अंक देने के लिए नहीं कहा जाता। इन दलों के नेता आपसी बैठकों में लाख कह लें कि बयानबाजी बहुत सोच समझकर की जानी चाहिए लेकिन जब वरिष्ठ नेताओं की  ज़ुबां  ही सार्वजनिक मंचों पर फिसल-फिसल जाती है, तो आमतौर पर क्या  होता होगा इसकी
कल्पना सहज की जा सकती है।
            राहुल गांधी ने मीनाक्षी नटराजन को 2008 
में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति का सचिव नियुक्त किया था। 2009  में उन्होंने मंदसौर सीट से सांसद का चुनाव जीता। इस टिप्पणी  का कारगर विरोध अब तक उनकी ओर से नहीं आया है। उन्होंने कमजोर जवाब दिया कि यह
उनके कामकाज के संदर्भ में की गई टिप्पणी 
थी। यूं भी सियासत में महिलाओं की भागीदारी न के बराबर है और जब ऐसी अवमाननाकारी टिप्पणियाँ  कथित वरिष्ठों की ओर से आएगी, तो हालात समझे जा सकते हैं। हमारे ग्रामीण विकास मंत्री महोदय ने एक वजनी महिला चिकित्सक को रोडरोलर बता दिया और कहा कि इनके पति को पद्मविभूषण मिलना चाहिए इसका क्या अर्थ है ये श्रीमान जयराम रमेश जी ही जाने. पता नहीं क्या उनके मन मे उमड़-घुमड़ रहा था. लेकिन इस सब को बढ़ावा तब मिलता है जब ये चिकित्सक कहती है कि i could read the wit and humour  in his comments and it not be seen as a personal comment on a lady doctor. स्त्री विरोधी टिप्पणी में सबसे पहले चरित्र हनन का सहारा लिया जाता है, दूसरा स्थान देह पर टीका टिप्पणी  का है। अधिकारी, खिलाड़ी कोई इस से बच नहीं पाता। सियासत जिनके हाथ में है, वे अब भी ईमानदार और समर्पण का सम्मान  कर पाना नहीं सीखे हैं।  ये महिलाएं ज़रूर टंच यानी  खरी हैं लेकिन ये  नेता चंट हैं. इन 'सेक्सिस्ट कमेंट्स'  का विरोध जब तक मुखर होकर नहीं किया जाएगा, तब तक बराबरी की बातें केवल किताबी हैं। तरक्की  की सीढ़ी अगर अवमानना के रास्ते से गुजरती हो तो वह अधूरी है

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Wednesday, July 24, 2013

बोतल में बार, बार में डांस

रोजी सबका हक है  फिर चाहे वह नाचकर ही क्यों न कमाई जा रही हो….   बुरा लगता  है  तो इस अनपढ़,बेबस,लाचार आबादी को  काम दीजिये उसके बाद इस पेशे को  जी भरकर कोसिये …मेरी  राय में तो यदि पुरुषों  के नाच में महिलाओं को आनंद आता है तो उन पुरुषों को भी  पूरा हक़ है कि वे अपने पेशे को जारी रखें


बार डांसर्स पर कवर फोटो के लिए जब तलाश शुरू हुई तो किसी भी फोटो पर निगाह ठहर न सकी। इन तस्वीरों में मौजूद बेबसी, लाचारी और दोहराव की मजबूरी को, मोटे मेकअप की परत भी छिपा नहीं पा रही थी। तस्वीरों के किसी भी हिस्से में सुकून नहीं था। ना बार डांसर्स के चेहरों पर और न उन निगाहों में जो उन्हें  देखने वहां आई थीं। नतीजतन, कवर पर ऐसी किसी भी तस्वीर का फैसला तर्क हो गया ।
जाहिर है जिस काम के छायाचित्र ही आप में ऊर्जा का संचार नहीं करते, वह पेशा कैसे जारी रखा जा सकता है? सर्वोच्च न्यायालय को क्योंकर जरूरी लगा कि डांस बारों को बंद करने का महाराष्ट्र सरकार का फैसला गैर-कानूनी था और महाराष्ट्र सरकार को
सा भरोसा क्यों था जो वह मुंबई उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में गई?  दरअसल, मुंबई, पुणे और अन्य शहरों में साल २००5 तक अस्सी हजार से भी ज्यादा बार डांसर्स थीं। अस्सी से नब्बे फीसदी स्त्रियां वहां इच्छा से नहीं मजबूरी से हैं। किसी का पति बीमार है, किसी ने प्रेम में धोखा खाया है, किसी के पास बूढे़ माता-पिता के साथ छोटे भाई-बहनों की जिम्मेदारी है, तो कोई इतनी फुर्ती से अब नहीं नाच सकती जितनी कि फिल्मों की एक्स्ट्रा को नाचना पड़ता है। ये पेशा उन्हें  रोटी देता है। यह काम है उनका, वैसे ही जैसे आप समय पर दफ्तर जाते हैं। बहुत अधिक अवसर थे कि ये सभी किसी चकलाघर में धकेल दी जातीं जहां देह बेचकर उन्हें रोजी कमानी पड़ती। लेकिन बार डांसर्स यहां नाचकर उस जिल्लत से बची हुई थीं।
   सवाल किया जा सकता है कि यही काम क्यों जरूरी है? दूसरी मेहनतकश महिलाओं की तरह वे भी घरों में काम कर सकती हैं, मजदूरी कर सकती हैं। जैनब और मोनिका के बयानों पर गौर कीजिए- 'आपको लगता है कि हम सीधे इस जगह पर आ गए। हम भी काम मांगने ही निकले थे। ज्यादा नहीं पांच- हजार रुपया महीना कमाने की ख्वाहिश थी लेकिन काम ढूंढ़ते-ढूंढ़ते ही हमें यहां तक पहुंचा दिया गया। हमारी गलती यह रही कि हम गरीब, कम पढ़ी-लिखी और जरूरतमंद थीं। यहां कोई परेशानी नहीं। कोई टच भी नहीं करता हम लोग को। बस, इन पुलिसवालों का ही डर सवार रहता है। '
      शायद हमारे देश में किसी भी तरह की रोक या प्रतिबंध से पहले प्रति व्यक्ति आय यानी आम देशवासी की माली हालत पर गौर करना बहुत जरूरी है। एक बड़ी आबादी आज भी कुपोषण, अशिक्षा और खराब स्वास्थ्य के साथ जीने को मजबूर है। रोजगार के अवसर
सी आबादी के लिए ना के बराबर हैं। घरों में काम करने वाली महिलाओं का काम तब तक ही सलामत है जब तक वे काम कर रही हैं। भविष्य तो असुरक्षित है ही वर्तमान भी महंगाई की मार से धुंधला गया है। अंधेरे में चल रहे रोजगारों की तरफ मुडऩा मजबूरी है। हमारे मानदंड दोहरे हैं। हम बड़ी महफिलों में ठुमके लगाने वाली फिल्मी अदाकारों का तो मान करते हैं लेकिन रोजी के लिए नाच रहीं इन स्त्रियों का नहीं। वरना क्या कारण है कि आठ सालों तक थ्री स्टार्स, फाइव स्टार्स में तो डांस बार चलते रहे लेकिन बाकी जगह इन्हें प्रतिबंधित कर दिया गया। 
  सरकार के पास योजनाओं के नाम पर मुफ्त अनाज बांटने जैसी नीतियां हैं। मुफ्त खाना मिलेगा लेकिन रोजगार नहीं। मिड डे मील भी
सी ही योजना है। थोड़ी देर के लिए अच्छा लगता है कि कुपोषित बच्चे भोजन के लालच में स्कूल आएंगे और शिक्षा भी पाएंगे। मुफ्त की ये योजनाएं जाने क्यों चलती भी उतने ही उन्मुक्त तरीकों से हैं। हम किन सरकारी महकमों को अपनी जिम्मेदारियों के लिए उत्तरदायी बना पाएं हैं जो यहां सा हो पाता? न आप और ना योजना बनाने वाले  इस भोजन को खा सकते हैं तो कैसे उम्मीद करते हैं कि यह अभियान सफल होगा। उन्हें काम मिले आर्थिक सहयोग मिले, यह तो समझ में आता है ताकि वे अपने हिसाब से अपने भोजन की आवश्यकता पूरी कर सकें लेकिन कोई कैसे बेस्वाद भोजन को रोज निगल सकता है। बिहार के छपरा में वह स्कूल कब्रिस्तान में बदल चुका है। मौत की यह सरसराहट पूरे देश में फैल गई है। दुनिया की इस सबसे बड़ी मिड डे मील योजना के हर निवाले में शंका पसर गई है। न खाकर भी मौत है और खाकर भी मौत। हर भारतीय को सम्मानजनक रोजगार मिले इसके लिए आजाद भारत को और कितने साल लगेंगे? चुनावी साल में सब देश को बांटने की बयानबाजी में लग गए हैं। इन मुद्दों पर क्यों कोई अपना विजन नहीं रखता?

Wednesday, July 17, 2013

इश्क़ करूँ या करूँ इबादत इक्कोइ गल है


 मिल्खा सिंह ने चोरी-चकारी के जीवन को तज कर दौड़ जीतने के लिए जिस मेहनत  से  इश्क़  किया वही जज़्बा  और जूनून राकेश ओम  प्रकाश मेहरा की टीम ने भी रचा  है 

"जब से देश आजाद हुआ है, तब से
केवल पांच एथलीट ओलंपिक्स
 
के
फाइनल मुकाबलों में पहुंचे हैं लेकिन
मेडल कोई नहीं जीत पाया। मैं,
गुरुजीत सिंह रंधावा, पीटी उषा, राम
सिंह और अंजू बॉबी जॉर्ज। मैं जब तक
जिंदा हूं मेरी आंखों में एक ही सपना
रहेगा कि भारत का तिरंगा वहां
लहराता देखूं" - मिल्खा सिंह

 

 अठहत्तर  साल के मिल्खा सिंह यानी
भारत के वो एथलीट, जिन्होंने जान
की बाजी लगाकर पसीना बहाया।
कई बार तो इतना कि मुंह से खून
बनकर निकला। सारी दुनिया को
लगता था कि चार सौ मीटर का
गोल्ड मेडल तो मिल्खा ही
जीतेंगे , क्योंकि उन्होंने ८० में से ७७
दौड़ें अपने नाम की थीं, लेकिन सेकंड
के सौंवे हिस्से से मिल्खा चूक गए।
ओलंपिक का पदक उनके हाथ से
निकल गया और एक अफसोस
उनके भीतर हमेशा के लिए पैबस्त हो
गया।
मिल्खा के पास जब निर्देशक
राकेश ओमप्रकाश मेहरा आए, तो
उनके गोल्फर बेटे जीव मिल्खा सिंह
ने कहा कि पापा अगर आप पर कोई
फिल्म बनाए, तो ये ही बनाएं,
मैंने इनकी रंग दे बसंती देखी है।
गौरतलब है कि स्वयं मिल्खा सिंह ने
१९६० से कोई फिल्म नहीं देखी।
उन्हें नहीं मालूम कि कौनसे एक्टर
इन दिनों अच्छा और खराब काम कर
रहे हैं। मिल्खा सिंह के शब्दों 
में- इस
बच्चे 'फरहान अख्तर' ने बहुत
मेहनत की है। मैं चाहता था कि
फिल्म ऐसी 
बने कि लोग उठ खड़े हों
और भारत की झोली में मेडल आएं।
दरअसल, भाग मिल्खा भाग फिल्म
महज तीन घंटे का प्रवाह भर नहीं,
बल्कि ऐसा
तूफान है, जो आपके साथ
लंबे समय तक रहता है। दर्शकों को लगता है कि
वह सिनेमा हॉल में
नहीं स्टेडियम में हैं, क्योंकि  वैसी ही
सांसें रुकती हैं और तालियों की गडग़ड़ाहट वहां गूंजती है। फिल्म
से पहले फरहान को लगता था कि वे दौड़ लेंगे लेकिन जब उनके ट्रैक
एंड फील्ड कोच मैल्विन ने उन्हें दौड़ते हुए देखा, तो कहा कि कोई
भी धावक ऐसे 
  नहीं दौड़ता। यह
ट्रेड 
मिल की दौड़ है। भाग मिल्खा भाग जिंदगी का ऐसा चित्र है, जिसे
देखकर पता चलता है कि एक एथलीट किस कदर हार्डवर्क और समर्पण की
मिसाल होता है। पसीना उसका गौरव रचता है। मिल्खा सिंह कहते हैं, जब
मैं पाकिस्तान में दौड़ा, तो स्टेडियम में मौजूद दस हजार बुर्कानशीनों ने बुर्का
उतारकर मुझे देखा। यही नायकत्व है कि दुश्मन देश को आप बंदूक के
जोर पर नहीं, बल्कि अपने कौशल पर आत्म समर्पण करने को मजबूर कर
दें। खिलाड़ी के जोश-ओ-जुनून के साथ भाग मिल्खा भाग इसीलिए न्याय कर पाती है, क्योंकि 
इसके निर्देशक राकेश ओमप्रकाश मेहरा भी खेलों की
दुनिया से आते हैं। नई दिल्ली, १९८२ के एशियन गेम्स
में वे तैराकी टीम के सदस्य रहे थे। मिल्खा अगर कहते हैं  कि मैं मौत को तली में ले के आगे बढ़ा हूं, तो राकेश ओमप्रकाश मेहरा की टीम ने भी एक ऐसी  फिल्म रची है, जो यकीनन नए खिलाडि़यों को प्रेरित करेगी। अभिनव बिंद्रा ने जब ओलंपिक्स में स्वर्ण पदक पहना था, हर भारतवासी का सीना चौड़ा और दिल भर आया था।
ब्ले
जर पर लिखा इंडिया खिलाड़ी को किस कदर
रोमांचित करता है यह फिल्म बताती है। बाल्टीभर पसीना, आय एम नॉट रिलेक्सिंग 
आय एम मिल्खा सिंह। टूटी गेंद में लिखे प्रेम पत्र, एथलीट फरहान का भुजाएं फड़काने वाला डांस, बचपन के दोस्त का पाकिस्तान में रहते हुए मौलवी के यहां बड़ा होना, बड़ी बहन का प्यार शंकर-एहसान-लॉय के संगीत पर प्रसून जोशी के थिरकते बोल फिल्म को अलहदा बनाते हैं। मिल्खा सिंह की नजरों के सामने ऐसे  बायोपिक का बन जाना मायने रखता है।  क्या उडऩपरी पीटी उषा के साथ भी ऐसा  होगा? वे भी सेकंड के सौवें हिस्से से मेडल चूक गई थीं।
अंत में जिस बात को मिल्खा सिंह कोट करते हैं, वही आपके
  लिए
मत घबरा तू तूफानों से 

ये तो चलते हैं तुझे ऊपर उठाने के लिए

Saturday, July 13, 2013

xxx और 00 !! आप नहीं समझेंगे



चौदह जुलाई को किया जानेवाला तार भारत का अंतिम तार होगा , इसी के साथ १ ६ ० साल पुरानी  यह तकनीक हमेशा के लिए अलविदा कह देगी 

ह समय तार को शोक संदेश भेजने का
है। आज  के बाद तार इतिहास
बनकर रह जाएगा। वह तार जिसका
अतीत वाकई सुनहरे लफ्जों में लिखा
है। इतना सुनहरा कि इसके बारे में
जानते-समझते हुए आपका दिमाग
रोशन होता हुआ मालूम होता है। संदेश
भेजने की भूख इंसान में हमेशा से रही
है। इमारतों से निकलते धुंए  , दूत, नगाडे़, कबूतर, बोतल में रखी
चिट्ठी से भी जब इंसान का मन शांत
नहीं हुआ, तो वह सुनियोजित डाक की
ओर मुड़ा। खत वक़्त  लेते थे और आवाजाही
की बेहतर व्यवस्था ही इन्हें सुगम
बनाती थी, लेकिन तार विद्युत तरंगों से
उपजी ध्वनि को पढऩे की तकनीक थी।
गर्र गर्र..गट्ट गट्ट.. की आवाज से
ट्रेंड टेलीग्राफिस्ट मैसेज को नोट करता
था। अगर जो संदेश ००० श्रेणी का है,
तो वह पहली प्राथमिकता के साथ भेजा
जाता। संदेश आते ही तुरंत 'बॉय
पियन' को आवाज दी जाती थी। वह
दौड़ता हुआ आता था । उसकी उम्र 16 से
20 तक की होती थी ताकि स्फूर्ति से दौड़ सके, संदेश रिकॉर्ड में
दर्ज होता और मैसेंजर तुरंत उसे गंतव्य
तक पहुंचा देता । यह २४ घंटे की सेवा थी। तार घरों
में ही डोरमैट्रीज बनी होती थी, जहां तार
बाबू आराम कर सकते थे । ओवर टाइम
तो लगभग हर कर्मचारी के हिस्से आता
था। डबल एक्स  मैसेज के तहत मृत्यु के
संदेश आते थे, जो भी प्राथमिकता के
तहत डिलीवर होते थे। सेना, सरकार
और मौसम से जुडे़ संदेश ००० के तहतहोता
ही भेजे जाते थे।
०००  बेहद ज़रूरी सन्देश अंग्रेजों का स्थापित यह
नेटवर्क इतना जबरदस्त था कि गलती
करने वाले पर तुरंत एक्शन  होता था।

मैसेज आते ही रिसीवर अपना नाम दर्ज
करते थे। रिसीविंग का टाइम और
डिलीवरी का टाइम बकायदा नोट होता
था और जो इसमें कोई चूक हुई, तो
सख्त कार्यवाही तय थी।
इंडियन टेलीग्राफ डिपार्टमेंट में वर्ष
१९६६ में जब एक २१ साल का नौजवान
शामिल हुआ, तो वह सचमुच वाकिफ
नहीं था कि आखिर वह किस विभाग से
जुड़ रहा है। ट्रेनिंग पीरियड के दौरान
जब अधिकारियों ने कहा कि वे दुनिया
की एक श्रेष्ठ सेवा और बेहतरीन विभाग
से जुड़ रहे हैं, तब भी नौजवान को
यकीन नहीं हुआ। उनके वरिष्ठ का
कहना था कि हालांकि तार अपना श्रेष्ठ
समय देख चुका है, लेकिन अभी भी
इसके जलवे कुछ समय बरकरार
रहेंगे। नौजवान ने ट्रेनिंग के दौरान ही
जान लिया कि यदि आप बुद्धिमान हैं और
आपको अपना सौ फीसदी देना आता है
तो आप कामयाब हैं, क्योंकि  संचार की

इस दुनिया में गलती की कोई गुंजाइश
नहीं थी और एक सिपाही की तरह ही
मोर्चा संभालना होता था। शायद किसी भी
सेवा को बेहतर बनाना काम के दौरान
हो रही गलतियों को समझने के साथ ही
हो सकता है और टेलीग्राम में गलतियों
की कोई माफी नहीं थी, वे बाकायदा
दर्ज होती थीं।
इस नौजवान ने १९८० तक तार का
जलवा देखा था उसके बाद आई संचार
क्रांति में फोन बेमिसाल साबित हुए। वैसे
नौजवान का अनुभव यह भी कहता है
कि आप तो आज तेज गति से संदेश आदान-प्रदान
करते ही हैं,हम भी जब कई बार जब मोर्स

तकनीक से संदेश पढ़ते हैं, तो भेजने
वाले की गति और समझ के हिसाब से
ही दूसरे स्टेशन पर बैठे बंदे का नाम
जान जाया करते थे। कभी-कभार जब
संदेश का दबाव नहीं होता, तो हम मित्रों
से यूं ही मोर्स पर बात किया करते। यह
आज की चैटिंग ही थी। नौजवान २००६
में इस विभाग को अलविदा कह चुका
है। भले ही आपको उन्हें अब भी नौजवान
कहना मुनासिब ना लगे, लेकिन इन
चालीस बरसों में ही उन्होंने बीस साल
तार को दौड़ते हुए देखा, तो आखिरी
बीस साल हांफते हुए। इस मैराथन में
विजयी रहे, क्योंकि विभाग ने उनके
फख्र में हमेशा इजाफा किया। वक़्त  के
साथ तकनीक और तकनीक के साथ
संचार भी हमेशा बदलेगा, लेकिन अगर
कोई विभाग इंसान के जुनून और आत्म
स्मान को कायम रख पाता है, तो यही
उसकी सार्थकता है। तार विभाग अब
तक औपचारिकता पूरी करने के लिए
चल रहा है। बेशक यह संचार की
मजबूत नींव रहा, लेकिन अब ये तार
आज के जमाने से सुर-ताल
नहीं मिला पा रहा। अलविदा तार। तुम
याद रहोगे।
illustration courtesy : HINDU


Sunday, July 7, 2013

सलाम तो सीधे खुदा को जाता है



क्यों करता है वह सलाम
और क्यों ऊंचा हो जाता है मेरा कद
रोज़ मेरे आस-पास ऐसा ही होता
फिर एक दिन अचानक
मेरे ही पाले से आती है एक आवाज़
सलाम हुज़ूर!!
सलाम बजानेवाला चौंक उठता है
ये मेरी आवाज़ में कौन बोला
मेरा सुर इस कंठ
में कैसे गूंजा


 .....तभी से मैं और वह हो लेते हैं
इस आवाज़ के साथ
जो कहता है
मैं कहूं, तुम कहो क्या फर्क पड़ता है
न कहने वाला छोटा
न लेने वाला बड़ा

सलाम तो सीधे खुदा को जाता है .

Wednesday, July 3, 2013

तीसरा तेरह साल बाद

शाहरुख खान और गौरी खान के घर तीसरी संतान अब्राहम का आगमन हुआ है। यह उनका सरोगेट बेबी है यानी जैविक रूप से वे दोनों ही बच्चे के माता-पिता हैं, लेकिन उसे जन्म देने वाली यानी नौ माह कोख में रखने वाली मां कोई और है। इस मामले में सरोगेट मां की भूमिका गौरी की भाभी नमिता छिब्बर ने अदा की है। बच्चे का जन्म समय से दो माह पहले ही हो गया और उसे मुंबई के प्रमुख अस्पताल की इंटेसिव केअर युनिट में रखना पड़ा। पूरी देखरेख डॉ. इंदिरा हिंदुजा की रही, जिन्होंने १९८६ में   देश के पहले टेस्ट ट्यूब बेबी का जन्म करवाया था। शाहरुख-गौरी के दो बच्चे पहले ही हैं। बेटा आर्यन पंद्रह साल का है और बेटी सुहाना तेरह साल की। शाहरुख पर इलजाम है कि उन्होंने अपने तीसरे बेटे का लिंग परीक्षण पहले ही करा लिया था।
अभिनेता शाहरुख से जब पत्रकार इस मसले पर बात करना चाहते हैं, तो वे चुप्पी साध लेते हैं और उन्हें अब्राहम की बजाय अपनी नई फिल्म चेन्नई एक्सप्रेस के बारे में बात करना ज्यादा सुहाता है।
बहरहाल, शाहरुख खान के निजी मसलों पर न्यायाधीश बनने का कोई इरादा नहीं है, लेकिन सवाल उठता है कि ऐसे फैसले आखिर उनके चाहने वालों को क्या संदेश देते हैं। माता-पिता, एक बेटा और बेटी शायद यही अवधारणा है पूरे परिवार की। दो बेटे या दो बेटियों वाले परिवार भी उतने ही खुशहाल हो सकते हैं, लेकिन अगर कोई जोड़ा दोनों को पालने का सुख पाना चाहता है, तो यहां वह भी पूरा होता था। सैंतालिस बरस के शाहरुख लिंग परीक्षण के बाद तीसरी संतान पैदा करते हैं। वे किसी अनाथ बच्चे को गोद नहीं लेते। ठीक वैसे ही सोचते हुए लगते हैं, जैसे कोई धनी  व्यवसाई अपने अम्पायर को संभालने के लिए खुद का वारिस चाहता हो। वह भी बेटा। आज जब देश में आबादी सबसे गंभीर चुनौती बनकर सामने आ रही है, वहीं हमारे स्थापित कलाकार तीसरे बच्चे का संदेश देते हैं। हो सकता है की आप निजी टूर पर कई बच्चों  पलने की कुव्वत रखते हों लेकिन संसाधनों को बढ़ने की क्षमता तो  आप में नहीं है न ?
कभी-कभार लगता है कि हमारे ये कथित हीरो इस बात से बेखबर हैं कि उनके किए-धरे को उनके प्रश्संक देखते हैं। अमिताभ बच्चन अपनी होने वाली बहू की शादी पहले एक पेड़ से कराते हैं। यह उनका अनहोनी टालने का एक प्रयोजन होता है। फिर पोता होगा या पोती के संदर्भ में उनकी सारी प्रतिक्रियाएं पोते को केंद्र में रखकर ही आती हैं। हमारे देश में जहां आज भी लड़कियां गर्भ में ही गिरा दी जाती हैं, वहां ये स्टार्स अपने कद का ध्यान रखते हुए संयत नहीं हो सकते? 
          एक अठारह साल की लड़की सौम्या मिली थी पिछले दिनों। कह रही थी मैंने आमिर खान के सत्यमेव जयते का हर एपिसोड  देखा। सभी मुद्दे जरूरी थे, लेकिन  जब वे अंतरधार्मिक प्रेम के मुद्दे को लेकर आए, तो मैं समझ ही नहीं पाई कि मैं किसे ध्यान में रखकर उनकी बात समझूं। उनकी पहली पत्नी रीना को लेकर या दूसरी किरण। वे जब बच्चों के साथ ज्यादातियों की बात कर रहे थे, तो मैं सोच रही थी कि वे किसके लिए ज्यादा संजीदा होंगे पहली शादी के दो बच्चों से या फिर दूसरी शादी से जन्में बेटे आज़ाद का ? सौम्या का कहना था कि सेलिब्रिटीज का बहुत असर हम पर पड़ता है। वे जो करते हैं उसका तो और भी ज्यादा। सौम्या कहती हैं, मैं इनसे ज्यादा सुष्मिता सेन का सम्मान कर पाती हूं, जो दो अनाथ बच्चियों को अपनी बेटी की तरह पाल रही हैं।
अठारह साल की सौम्या उनमें से हैं, जो सफल लोगों के निर्णयों को पूरी गंभीरता से जज करती हैं। वह खुद कोई फैसला नहीं सुनाती, लेकिन गौर करती हैं कि पब्लिक के पैसों पर बड़ा साम्राज्य बनाने वाले अपने लोक दायित्वों के प्रति कितने जिम्मेदार हैं। वह नेताओं के साथ बिजनेसमैन और बॉलीवुड के तोप सितारों को भी इसी कैटेगिरी में रखती हैं, जो संकट के समय सही निर्णय लेने की बजाय या तो खूब बोलते हैं या फिर परदे के पीछे चुप्पी साध लेते हैं। नेता उसे खूब बोलने वाले और सितारे उसे चुप्पे लगते हैं। उत्तराखंड त्रासदी का पहाड़ सर पर टूटा  है, पर बहुत कम हाथ उस ओर बढ़े हैं।
पहाड़ों पर टूटा है कैसा कहर आज
खामोश हैं पहाड़-सा कद रखने वाले