Wednesday, April 24, 2013

गुड़िया भीतर गुड़ियाएं

हम सब गुस्से में हैं। हमारी
संवेदनाओं को एक  बार फिर
बिजली के नंगे तारों ने छू दिया है।
हम खूब बोल रहे हैं, लिख रहे हैं
लेकिन  कोई नहीं बोल रहा है तो
वो सरका र और
कानून व्यवस्था
  के लिए  ज़िम्मेदार लोग। खूब
बोल-लिख कर  भी लग रहा है कि
क्या यह काफी है ? कोई हल है हमारे पास कि  बच्चों
का  यौन शोषण न हो और बेटियों
के  साथ बलात्कार का  सिलसिला
रुक जाए। ऐसी जादू की  छड़ी किसी कानून के पास नहीं लेकिन
कानून लागू करने वालों के  पास
एक शक्ति है वह है इच्छा शक्ति।
ईमानदारी से लागू करने की  इच्छा
शक्ति। हमने किसी  भी सरकारी
मुखिया को  सख्ती से यह कहते
नहीं सुना कि  बहुत हुआ, अब और
नहीं। मेरे देश, मेरे प्रदेश में इस
तरह का कोई  भी अपराध बर्दाश्त
नहीं किया जाएगा। हर मुखिया
बचता नजर आता है। बयान आते
हैं पुलिस क्या करे वह हर दीवार,
हर कौने की  चौकसी नहीं कर
सकती; दुष्कर्म एक सामाजिक
अपराध है; कोई भी सरकार हो,
इलजाम तो सरकार पर ही लगते
हैं; ऐसे उबा देनेवाले बयानों की
लंबी फेहरिस्त है। कोई सख्त
आवाज नहीं गूंजती कि ऐसे
वहशियाना कृत्य को  अंजाम देने
वाले दरिंदों को  बख्शा नहीं
जाएगा। ऐसा  कोई संदेश जब
ऊपर से नहीं आता तो नीचे वाले
अपने आप ही मुक्त हो जाते हैं ।
दरअसल, हमारा समाज अब भी
की  मानसिकता में नहीं है। क्या
हुआ लड़के  ने जोर जबरदस्ती की
चलो शादी कर दो इन दोनों की ।
आज भी यही हल दिखाई देता है
बलात्कारियों का । इसकी  पुष्टि
पकडे़ गए आरोपी मनोज के घर
से भी होती है। दिल्ली में पांच
साल की  बच्ची से दुराचार करने
वाले मनोज ने अपनी पत्नी के
साथ भी यही हरकत की  थी।
पंचायत ने फिर उनका  ब्याह करा
दिया। अपनी साली के  साथ भी
यही व्यवहार दोहराया था और पांच
साल की  मासूम से पहले भी वह
न जाने कितने बच्चों को  अपना
शिकार बना चुका  हो। जरूरी नहीं
कि  इसमें बेटियां ही हों। बेटे भी तो
हो सकते हैं। लड़कों के  माता-पिता
को कतई बेखौफ होने की
जरूरत नहीं।
हम इस अपराध को  अपराध
ही नहीं मानते शायद तभी हर
लड़की  का  अपने जीवन में ऐसे कई अपराधियों से सामना होता
है। घर, छत, गली, थिएटर,
बाथरूम, यहां तक कि  पूजा स्थलों
पर भी ऐसे शिकारी घात लगाए
बैठे होते हैं। लड़की खुद को बचने में  ऊर्जा खर्च
करती हैं वहीं ये दुराचारी अपनी
कुचेष्टाओं को  धारदार बनाने में
लगे रहते हैं। यह जितना प्रचलित
है उतनी ही प्रचलित है घरवालों
की लापरवाही। हर लड़की को  यह
घुट्टी पिला दी जाती है कि  चुप रह,
ज्यादा शोर न मचाना। दुष्कर्मी
पहला शिकार परिवार से ही ढूंढता
है और जब परिवारों की चुप्पी  उसे
शह देती है तो वह निरंकुश हो
जाता है।
इन घटनाओं को  लड़कियों
की  इज्जत से जोड़कर देखा जाता
है। अपराध सहते रहो तो इज्जत
बरकरार है और ज्यों ही आवाज
उठाई वह तार-तार हुई। यह कैसी
इज्जत है जो चुप्पी  से चलती है।
हरकत करने वाला बाइज्जत बरी
और लड़की  बेइज्जत। अभी भी
कई जगह लिखा जा रहा है कि
गुडि़या की  अस्मत की कीमत
पुलिस ने दो हजार रुपए लगाई।
पुलिस की  यह भूमिका  बड़ी रोचक
है। जो पेशकश   अपराधी की  ओर
से होनी चाहिए थी वह पुलिस की
ओर से हो रही थी यानी
अपराधी-पुलिस भाई-भाई।
पांच साल की  गुडिय़ा अकेली
नहीं है। गुडिय़ा भीतर कई
गुडिय़ाएं हैं असंख्य अपराधियों से
घिरीं। एक  समय था डायन, सती,
विधवा प्रताडऩा, नाता जैसी कई
कुप्रथाओं से घिरा था समाज।
राजा राममोहन राय, दयानंद
सरस्वती जैसे समाज सुधारकों  ने
लंबी लड़ाई लड़ी। यह लड़ाई
मुसलसल यानी लगातार जारी
रहनी चाहिए थी। आज उस
भूमिका  में कोई नहीं रह गया है।
दुष्कर्म, अपचार जैसी सामाजि·
बुराईयां बढ़ी हैं। यह दो
राजनैतिक  दलों के  लचर बयानों
से नहीं जानेवाली। इन दलों का
लक्ष्य समाज को  स्वस्थ और
मजबूत बनाने का  नहीं बल्कि सत्ता
प्राप्ति का  है। इनसे और इनके
सिस्टम से न्याय मिलेगा इसमें
संदेह है हर भारतवासी को .

Sunday, April 21, 2013

जान मेरी

जान मेरी
जाने किस पड़ाव पर हूँ ज़िन्दगी के
कोई वाक़या नहीं
कोई मसला नहीं
कोई सिलसिला नहीं
कोई इल्तजा नहीं
कोई मशवरा नहीं
कोई एतराज़ नहीं 
कोई ख़लिश नहीं
कोई रंजिश भी नहीं
है तो बस मोहब्बत की वह  पाक सुराही
छलक  रहा है जहाँ से
 रंग  सुकूं अब भी मेरे लिए .

Wednesday, April 17, 2013

वह जमादारनी है

सुनीता जमादारनी है। रोज सुबह सात बजे  बिल्डिंग का  कू ड़ा उठाने आती है और वहां से फिर दस अलग-अलग मोहल्लों के घरों से कूड़ा लेती है। वापसी में उसे तीन बज जाता है। इस काम में उसके  पति, देवर, बच्चे सब लगे हुए हैं। रहती वह ठसके  से है। साफ, चमकीली, चटख साड़ी पहनती है और सर हमेशा पल्लू से ढका  रहता है। जेवर भी खूब पहनती है और होंठ रंगना ·भी नहीं भूलती। वह किसी से ज्यादा बात नहीं रती, जैसे उसे मालूम है कि  लोगों को  भी कूड़ा ठिकाने लग जाए, उसमें ही दिलचस्पी है। दरवाजा भी नहीं छूती, बस आवाज  देती है। पहली तारीख आते ही वह पैसे मांगना नहीं भूलती। उसका  देवर भी अच्छे जूते और जीन्स में नजर आ जाता है। पति पर तो सुबह से ही काम का  जुनून सवार रहता है। उसी बिल्डिंग में कैलाश सफाई के  लिए आते हैं। अपने बेटे-बेटी को स्कूल  भेजते हैं। दोनों बच्चे होनहार हैं। अच्छे नंबर आने पर वह बिल्डिंग के  लोगों को  खूब खुश होर बताते हैं। वह मोपेड से सफाई के लिए आते हैं। मेहनत के काम को  पूरी मेहनत से अंजाम देते हैं।
   उस दिन सुनीता कुछ भुनभुनाती हुई   कूड़ा ले रही थी। उसने बताया कि  जब फ्लैट में नए रहने वालों से डेढ़ महीने बाद पैसा मांगा, तो कहते हैं- हम कौन  यहां रोज आते हैं। सौ रुपए किस बात के । हम तो खुद ही फेंक  देंगे कूड़ा। सुनीता बड़बड़ा रही थी कि  हमेशा कचरा बाहर ही पटक  देते हैं। कई बार बिल्लियां इनकी  'सब्जी 'को  (नॉनवेज को  वह सब्जी
 कहती हैं) पूरी बालकनी में फैला देती हैं। मैंने उठाया है वह सब। पूरे महीने जाने कैसा-कैसा  कचरा उठाते हैं, तब कहीं जाकर दो रोटी नसीब में आती है और ये लोग पैसे देने में ही आना-कानी करते हैं। आधे पैसे दो, पर दो तो सही। सुनीता की आंखों से गुस्सा टपक  रहा था।
सुनीता के  के लिए इज्जत और भी बढ़ जाती है, क्योंकि एक  दिन वह नहीं आए, तो घर बदबू से सड़ांध मारने लगता है और अगर उसका  साथ बिल्डिंग साफ करने वाले कैलाश जी भी दे  दें , तब तो वह जगह घर की बजाय कूड़ाघर मालूम होती है। बिल्डिंग का  कोई  रहवासी कभी झाड़ू   भी  नहीं लगाता  .
   महात्मा गांधी ने इन्हें हरिजन कहा था। उन्होंने 1932 में हरिजनों की   सेवा के  लिए हरिजन सेवक  संघ की  स्थापना की  थी। यह मानते हुए कि  हरिजन उपेक्षा या अपमान का नहीं, बल्कि सेवा का  पात्र है। गांधीजी को  मैला उठाने   में कोई  एतराज न था, ना वे इस काम को वर्ग विशेष से जोड़कर देखते थे। आज के  शिक्षित भारत में यह चेतना बढ़ी हो,  ऐसा  तो कतई नहीं लगता। न तो हम सुनीता के काम का सम्मान कर  पा रहे हैं, न उसके  मेहनताने को  चुकाने की नीयत रखते हैं, ना ही इस वर्ग को  हमने घर के  भीतर आने की  इजाजत दी है। केवल बीस, तीस, पचास या सौ रुपए महीने पर वे इस काम को कर रही हैं , जो इंसान की  गरिमा के खिलाफ  है। उसके  हाथ कचरे से यारी करने पर मजबूर हैं। कोई दस्ताने या  मास्क उसकी  सहायता के लिए नहीं। हमें जरूरत से ज्यादा खाना खरीदना और फिर कूडे़दान में फेंकना मंजूर है, लेकि न सुनीता को  उसका  हक  देने में तकलीफ  है। कई घरों के लोग दिन ढलते ही घर से थोड़ी दूरी पर कूड़ा पटक  आते हैं। सुबह जब लोग उस  का हिसाब मांगते हैं, तो वे या तो दरवाजा नहीं खोलते या बगलें झांकने लगते हैं। क्यों इन पढ़े-लिखे लोगों को  यह समझाने की  जरूरत पड़ती है कि इनके  चूल्हों को  भी आग की जरूरत पड़ती है।
    साठ के दशक  में डॉ. राम मनोहर लोहिया ने सुझाव दिया था कि  मेहतरों का  वेतन एक  हजार रुपए कर देना चाहिए। धन में बड़ी शक्ति होती है यह ऊंच-नीच के भेद को मिटाने की ताकत रखता है। इस वर्ग की  स्थिति अब भी चिंताजनक  इसलिए है, क्योंकि समुदाय के रूप में इनके  पास काम नहीं है और जहां काम है, वहां आय पर्याप्त नहीं। जाति का  दंश तो हमेशा पीछा करता ही है। शेष समाज अब भी उनके  मान से कतराता है, बल्कि  हेय दृष्टि से देखता है। बात वेतन की  है, तो बेशक  सड़को  पर झाडू़ लगाने वाले, डे्रनेज साफ करने वालों, मृत पशुओं को  उठाने वालों का  वेतन बढ़ा दिया जाना चाहिए। क्यों नहीं वे इंजीनियर, प्रोफेसर के  वेतनमान के  समकक्ष हो सकते? इनके  नाम पर वोट बटोरने वाले ने भी कभी कोई  सार्थक  प्रयास नहीं किया। काम को  धन यदि बड़ा मुकाम दिला सकता है, तो इस काम का  भी सम्मान होना चाहिए। इस असंगठित समूह के पास रोजगार की स्थाई सुविधा तो गायब है ही,  तिरस्कार का  दंश भी शामिल है। बिल्डिंग का वही परिवार कामवाली बाई की मिन्नतें कर उसे बुलाता है और मुंहमांगा पैसा देता है, लेकीन सुनीता के लिए यह अब भी एक  स्वप्न है। हरिजन कहिए या दलित,  वर्ण व्यवस्था  बनाने वालों ने इनके हिस्से भले ही बेहिसाब संघर्ष लिख दिए हों, लेकीन आज का  पढ़ा-लिखा भारतीय भी इसे नहीं समझेगा, तो वह एक अधूरा नागरिक  ही होगा।