Wednesday, January 30, 2013

शब्दों के उत्सव के बाद उत्सव के शब्द

शहर लिटरेचर फेस्टिवल की
गिरफ्त से बाहर आ चुका है। मौसम
की तरह कुछ मेहमानों के आगमन
की भी आदत शहर को हो गई है।
वे वही कविताएं गुनगुनाते हैं और
उन्हीं शब्दों  को दोहरा कर चले जाते
हैं। किताब की जमीं पर खडे़ इस
उत्सव में विवाद के कंकर तो खूब
थे लेकिन मन को सुकून पहुंचा
सके, वैसा हरापन कम था। शब्द  थे
लेकिन उनसे हरितिमा गायब थी।
नंदी दलितों को भ्रष्ट कह गए, तो
नावरिया गांवों को ध्वस्त करने का
बाण चला गए। कौन समझे कि
शहर जिंदा ही गांव के दम पर हैं और आपके ठाठ को जिंदा रखनेवाले कौन थे .आप इस कदर जातिवादी कैसे हो सकते हैं .  बहरहाल, जयपुर में साहित्य उत्सव
भले ही अलविदा कह चुका है
लेकिन हम  गांधी
साहित्य के आगोश में है। बापू के
लफ़्ज़ों से गुजरते हुए महसूस होता
है जैसे हम सरल होते जा रहे हैं।
दिमाग की जटिलता पर दिल की
सरलता असर करती जा रही है।
दरअसल, सच्चे हो जाने का अर्थ
जोर-जोर से सच बोलते जाना नहीं,
बल्कि अपने जीवन को इतना
पारदर्शी कर देना है कि जो भी आप
कर रहे हैं या कह रहे हैं उसमें
बनावट हो  ही नहीं। गांधी ने अपने
जीवन को वैसे ही आर-पार रखा
है। बेहद  सादा।
अपने सर्वोदयी विचारों का
श्रेय भी उन्होंने एक किताब को दिया है।
दक्षिण अफ्रीका में हैनरी पोलाक जो
क्रिटिक पत्रिका में उप-संपादक थे,
उनके मित्र बने। पोलाक पहली बार
महामारी पर छपे उनके पत्र को
पढऩे के बाद उनसे मिलने आए थे।
एक बार पोलाक ने उन्हें जॉन रस्किन
की एक किताब ' अंटु दिस लास्ट'
पढऩे को दी। गांधी जी इस किताब
से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने
उसकी बातों को अमल में लाने की
ठान ली और गुजराती में उसका
अनुवाद सर्वोदय के नाम से किया।
जिन तीन सिद्धांतों से वे सर्वाधिक
प्रभावित हुए, वे थे
१. सबकी भलाई में हमारी
भलाई है।
२. वकील हो या नाई, दोनों के
काम की कीमत एक सी
होनी चाहिए,क्योंकि रोजीरोटी
का अधिकार सबको
समान है।
३. सादा मेहनत मजदूरी का या
किसान का जीवन ही सच्चा
जीवन है।
क्षणभर के लिए हम तिलमिला
सकते हैं कि सफेद कॉलर और
मेहनतकश का मेहनताना एक सा
कैसे हो सकता है, लेकिन गौर
करने पर लगता है कि आज जो दो
दुनिया बन गई हैं वह इसी का
नतीजा है इस खाई के चलते ही
कहीं भुखमरी है, तो कहीं भोजन
सिर्फ जाया हो रहा  है।
गांधी के मित्र पोलाक पर लौटते हैं।
गुड मैन गांधी पोलाक के बेस्ट मैन
थे। दरअसल, यहूदी पोलाक को
दक्षिण अफ्रीका की क्रिश्चियन
लड़की मिली से प्रेम हो गया था।
मिली भी पसंद करती थी, लेकिन
रिश्ता बन पाना इतना आसान नहीं
था। गांधी ने न केवल मिली को
चिट्ठी  लिखी, बल्कि पोलाक की ओर
से बेस्ट मैन भी बने। बेस्ट मैन
ईसाई शादियों में बेहद अहम होता
है। पहले तो चर्च में उनका नाम ही
रजिस्टर्ड नहीं हो रहा था। गांधी ने
यहां भी एक जज से गुजारिश कर
शादी की रस्म को आगे बढ़ाया।
गुड मैन गांधी की बेस्ट मैन की
यह पहचान उनकी दोस्ती में इतनी
प्रगाढ़ता लाई कि पोलाक बाद में
हिंदुस्तान भी आए।
सादगी और सरलता के बारे में
गांधी जी एक जगह लिखते हैं,
जैसे-जैसे मेरे जीवन में सादगी
बढ़ती गई, वैसे-वैसे रोगों के लिए
दवा लेने में भी मेरी अरुचि बढ़ती
गई। मुझे कब्ज़  रहता था और सिर
भी दुखता था। मैनचेस्टर में 'नो
ब्रेकफास्ट एसोसिएशन था । मुझे
लगा मैं भी सुबह का नाश्ता छोड़ दूं
तो शायद..... और सचमुच कुछ ही
दिनों में सिरदर्द मिट गया। मैं दवा
की बजाय पानी और मिट्टी के घरेलू
उपचार में यकीन करता था।
बहरहाल, आज की खुशबू गांधी के
शब्दों से महक रही है। गांधी
साहित्य सादा जीवन उच्च विचार का
मार्ग प्रशस्त करता है, जटिल बनती
जा रही दुनिया में सादगी का संदेश
देता है। सादगी जो मानवता का
बुनियादी मंत्र है।

Tuesday, January 22, 2013

इतवार की वह शाम

a true calling : still from play, image by madan mohan marwal
 क्योंकि नाटक अब भी दिल की आवाज़ है, किसी कमिटमेंट की पैदाईश। यह सिनेमा की तरह सस्ता और बाजारू नहीं हुआ है . प्रतिबद्धता झलकती है  यहाँ . यहाँ टिकने  के लिए आपको कुछ एक्स्ट्रा होना पड़ता है। कई मायनों में more. रंगकर्म को समर्पित वह शाम अद्भुत थी जब विजयदान  देथा 'बिज्जी' की कहानी पर अ ट्रू कॉलिंग मंचित हुआ।
इतवार की वह शाम इस मायने में भी अनूठी थी कि भारत रंग महोत्सव के तहत जयपुर के जवाहर कला केंद्र में एक नाटक खेला गया जो हमारे लोक कथाकार विजयदान देथा की  कहानी पर आधारित था। अ ट्रू कॉलिंग के नाम से अनुदित इस नाटक को खेलने वाले कलाकार और निर्देशक ताइवानी प्रभाव में थे और भाषा थी मणिपुरी और चीनी। भाषा का कोई प्रतिरोध लंबा नहीं टिक पाया क्योंकि कथा हमारी अपनी थी और उसका प्रवाह बेहद जादुई।

कहानियां हम सबको लुभाती हैं और यह कहानी थी एक अभिनेता की। वह माहिर है अपने हुनर में। कभी पंछी बन पूरे इलाके में गूंज जाता है तो कभी शेर बनकर विनाश का चित्र खींच देता है। उसकी आस्था अपने काम में है। एक बार तो वह भिक्षुक का ऐसा जीवंत अभिनय करता है कि एक व्यापारी उसे अपनी समूची धन-दौलत देकर शांति की तलाश में निकल जाना चाहता है।

एक्टर की यह ख्याति वहां के राजा तक पहुंचती है। अपने हर रूप में जान डाल देने वाले बहरुपिए से राजा कहता है कि कुछ ऐसा करो जिससे मेरी तबियत प्रसन्न हो जाए। राजा उसे सुझाता है कि तुम शैतान बनो। मैं इस महल को धूजते हुए देखना चाहता हूं। एक्टर शैतान के  किरदार में यूं प्रवेश करता है कि राजा हैरान हो जाता है। सियासत का षड़यंत्र कहिए या फिर कलाकार का कौशल इस बीच राजा के शराबी भाई की हत्या हो जाती है और वह सारा इलजाम  कलाकार पर मढ़ देता है। मुंहमांगा इनाम देने की घोषणा करने वाला राजा उसे हत्यारा ठहरा देता है।रजा उसे मरने का   हुक्म देता है
  मरने का जो रास्ता राजा उसे सुझाता है उसमें उसे एक स्त्री का रूप धरना है। ऐसी स्त्री जो अपने पति के प्यार में डूबी हुई है और उसकी मौत का दुख सहन नहीं कर पा रही है। राजा हुकुम देता है कि अपने आप को वह सती होकर समाप्त कर दे। हैरान एक्टर राजा के इस फरमान को सुन अपने परिवार का हवाला देता है। राजा आश्वासन देता है कि तुम्हारे मरने के बाद परिवार को कोई कष्ट नहीं होगा। महल उनकी देखभाल करेगा। कलाकार दुख में डूबी स्त्री के किरदार को खुद में जिंदा करते हुए मौत के मुंह में समा जाता है। सत्ता जो कभी किसी की नहीं हुई, उस कलाकार के परिवार की कोई  सुध नहीं लेती।
केवल दो कलाकारों के अभिनय से सजीव हुए इस नाटक में से एक तो उसके निर्देशक ही थे। चोंगथम जयंत मितई मणिपुर के हैं और नेशनल स्कूल आव ड्रामा की उपज हैं। उसके बाद वे पांच साल के लिए ताईवान चले गए। यह कहानी उन्होंने दिल्ली के एक दोस्त से सुनी थी। एशियाई रंग-मंच के बुनियादी स्तंभों यानी नृत्य, संगीत, मुखौटे, अभिनय  और कथा  कहने की उत्कृष्ट तकनीक को साधते हुए जब अ ट्रू कॉलिंग का मंचन हुआ तब उस पर तालियों और पुरस्कार  की बौछार हुई। ऐसा होना ज़रूरी और अच्छा लगता है क्योंकि नाटक अब भी दिल की आवाज़ है, किसी कमिटमेंट की पैदाईश। यह सिनेमा की तरह सस्ता और बाजारू नहीं हुआ है . प्रतिबद्धता  झलकती है  यहाँ . यहाँ टिकने ने के लिए आपको कुछ एक्स्ट्रा होना पड़ता है। कई मायनों में more.
जयपुर के दर्शकों को भी यह प्रस्तुति भिगो गई। खासकर तब जब हम निदा फाजली साहब  की उन पंक्तियों को पकड़े बैठे हैं कि अमिताभ बच्चन और अजमल कसाब एक जैसे हैं। अमिताभ के एंग्री यंग मैन को दोष देना इसलिए भी अनुचित है क्योंकि वे एक एक्टर हैं। वे किरदार में ढल जाने के लिए समर्पित हैं। एक सच्चे प्रोफेशनल, अगर कोई दोषी है तो उनके किरदारों को लिखने वाले। बेशक कसाब से बडे़ दोषी कसाब जैसों को बनाने वाले हैं। कसाब आतंकवाद के मोर्चे पर कठपुतली है तो अमिताभ के किरदार सिनेमाई माध्यम की। एक ट्रू एक्टर वही करता है जो उसका निर्देशक कहता है। वही उसकी ट्रू कॉलिंग है।

Thursday, January 3, 2013

रौशनी को मिले देश का सर्वोच्च सम्मान

फसोस है रोशनी (खुशबू का  दिया नाम) जब तुम जिंदा थीं, यह तंत्र सोया हुआ था लेकिन जब तुम चल बसी, तो पूरा तंत्र तुम्हें कंधा देने आया। देश के प्रधानमंत्री भी तुम्हारे लिए दिल्ली हवाई अड्डे पर आए। तुम्हारे साथ जो हुआ उसके बाद धौलपुर जिला प्रशासन को भी लड़कियों की सुध हो आई है। उन्होंने शाम पांच बजे बाद से लड़कियों के निकलने पर ही रोक लगा दी। सभी कोचिंग कक्षा संचालकों को भी कह दिया कि पांच बजे बाद कक्षाएं संचालित न करें। शहर के वरिष्ठ नागरिक और लड़कियों के माता-पिता को विश्वास में लेने की बात भी कही गई है। अगर घाव है तो उसका इलाज मत करो, उसे बांध दो, फिर चाहे वह नासूर क्यों न बन जाए। जाहिर है प्रशासन ने मान लिया कि हम लड़कियों को सुरक्षा नहीं दे सकते। लड़कियों, तुम कैद हो जाओ और लड़कों तुम छुट्टे घूमो। इस कायर प्रशासन को यह कहते हुए भय लग रहा था कि अगर शाम पांच बजे के बाद भी कोई लुच्चा-लफंगा-बदमाश लड़कियों को छेड़ते हुए देखा गया, तो उसकी खैर नहीं। बस यही फर्क है नजरिए का और यही सोच पहले कोख में और फिर सड़क पर लड़की का विनाश कर देती है।
  धृतराष्ट्र से मनमोहन तक सब आंखों पर पट्टी बांधे हैं, लेकिन इक्कीसवीं सदी के तेरहवें साल में बड़ा फर्क आया है गांधारियों ने अपनी पट्टियां खोल ली हैं .  वे अंधे तंत्र का साथ नहीं देने वालीं। द्वापर में धृतराष्ट्र से ब्याही गांधारी ने यह कहकर पट्टी बांध ली थी कि उनका पति अगर देख नहीं सकता, तो वे भी सारी जिंदगी आंखों पर पट्टी बांधे रहेंगी। धृतराष्ट्र के हर अन्यायी फैसले में भी वे  पट्टी बांधे रहीं। द्रौपदी दांव पर लगी, चीरहरण हुआ। सारे पाप होते रहे, लेकिन  राजतंत्र मौन रहा। दिल्ली की सड़क पर चलती बस में भी यही हुआ। यह अपराध नहीं पाप था। छह में से एक पापी इसलिए भी बच सकता है, क्योंकि उनमें से एक की उम्र अठारह से कुछ महीने कम है। जुवेनाइल एक्ट के तहत अठारह से कम उम्र का अपराधी नाबालिग है और वह कड़ी सजा से बच सकता है।विचारना होगा की जहाँ सरकार बालिग होने की उम्र कम करने पर विचार कर रही हैं वहीँ इतने जघन्य अपराध में लिप्त को बचने का तकनीकी रास्ता मिल जाएगा। 
  कौन है रोशनी? बलिया से दिल्ली अपने माता-पिता के ख्वाब को रोशन करने आई यह लड़की फिजियोथैरेपिस्ट बनने वाली थी। मिडिल क्लास भारतीय का प्रतिनिधित्व करती है रोशनी। हम क्यों उसकी पहचान छिपाए हुए हैं। हमारी न्याय व्यवस्था भी यही कहती है कि पीडि़त लड़की-महिला का नाम मत उजागर करो, क्योंकि वह जानती है कि सारी व्यवस्था उसके खिलाफ है। वह अपमानित होगी। समाज में खुद को स्थापित नहीं कर पाएगी। सब छिपा दो उसे। चुप्पी उसके जीवन का सच बन जाए। इसी चुप्पी ने उसे दोयम दर्जे की नागरिक बनाया है। बोलो, चीखो, बताओ सबको। खुद को दोष देना बंद करो। रोशनी की पहचान भी उजागर होनी चाहिए। शहादत गुमनामी में नहीं जानी चाहिए। वह पथ-प्रदर्शक है। भारत के सर्वोच्च सम्मान की हकदार है। भारत रत्न से कम नहीं है वह।
  पश्चिमी देश गैंग रेप की इस अवधारणा को सुनकर ही सकते में आ गए हैं। उन्हें आश्चर्य है कि कैसा देश है, जो  एक तरफ तो तकनीक और पावरफुल इकोनॉमी की दौड़ में दिखाई देता है, वहीं दूसरी ओर महिलाएं देश की राजधानी में ही गैंग रेप की शिकार हो जाती हैं। कई विदेशी अखबार और चैनल इसी पर बहस कर रहे हैं।
हम नए साल की रोशनी में हैं। आजादी भले ही १५ अगस्त १९४७ को रात बारह बजे  मिली थी, लेकिन इस देश की महिलाओं को २०१२ के बाद यानी २०१३ में मिली है।
यह साल उनके मान-सम्मान और आत्मविश्वास का होगा।