मंगलवार, 1 अक्तूबर 2013

बन्दे में था दम और हम बेजान बेदम

गांधी जयंती से ठीक पहले कोई इस एहसास को पा जाए कि हिंसा के एवज में प्रतिहिंसा न करते हुए, खुद को बचा ले जाना कितना मुश्किल है, मायने रखता है। आवेश में रोम-रोम कांपता है। हाथ-पैर पर नियंत्रण भले ही कायम रह जाए लेकिन, शाब्दिक हिंसा  से जुबां बाज नहीं आती। बेहद मुश्किल है वहां से खामोश निकल जाना।
   शाम के सात बजने वाले थे और वह अपनी बिल्डिंग के दरवाजे पर होती है। एक स्त्री (स्वाति) ठीक सामने आकर आंखों में क्रोध, लेकिन जुबां पर हैलो कहकर उससे बात करना चाहती है। वह कहती है, जी कहिए। 'आपके बच्चे ने मेरी गाड़ी पर अपनी सायकल निकालते हुए स्क्रेच लगा दिया। ओह, माफी चाहती हूं, कहां है आपकी गाड़ी? "गाड़ी मेरे पति ले गए हैं। आप गाड़ी का पूछ रही हैं। बच्चे को संस्कार नहीं देंगी?" क्या ज्यादा नुकसान हुआ है अगर एसा है, तो मैं भरपाई करने की कोशिश करुंगी। वह बोली।"क्या भरपाई करेंगी आप? आपकी औकात भी है भरपाई करने की?" औकात तो मेरी स्कूटर की भी नहीं, लेकिन मेरा मानसिक स्तर आपसे ऊंचा है। वह तेज लेकिन कांपते स्वर में बोलकर सीढि़यां चढऩे लगती है। स्वाति ने उसका हाथ पकड़कर खींचा और गिराने की कोशिश की, मानो यह पीछा छुड़ाना उसे बेहद नागवार गुजरा हो। ' तूने अगर बच्चों को यहां खेलने से मना नहीं किया, तो फिर मैं देख लूंगी बच्चों को।" किसी तरह  तेज स्वर में बच्चों को ना छूने की ताकीद देते हुए वह बचकर ऊपर तक पहुंच गई।
   दस मिनट ही बीते होंगे कि स्वाति उसके फ्लैट के सामने थी। घबराकर उसने दरवाजा बंद कर लिया, तो
स्वाति ने दरवाजे को पीटना और खिड़कियों के कांच को ठोकना शुरू कर दिया। शुभचिंतक पड़ोसी स्वाति को वहां से नीचे ले जाते हैं। वह तब भी चीखती रही कि इतना ही खेलने का शौक है, तो पार्क में जाकर खेलो।
   भयग्रस्त स्त्री यकायक हुए इस घटनाक्रम की सूचना दफ्तर को देती है दफ्तर के वरिष्ठ स्थिति को भांपते हुए पुलिस को खबर करते हैं। पुलिस को स्वाति गेट पर ही मिल जाती है। वह और पुलिस साथ ही फरियादी के घर में दाखिल होते हैं। पुलिस दो स्त्रियों की उलझन से ज्यादा इसे कुछ नहीं मान पाती है। वह बच्चों को समझाती है। थोड़ी देर पहले शाब्दिक और दैहिक हिंसा कर रही स्त्री विजयी भाव से मुस्कुराती हुई लौट जाती है। 'मेरी गाड़ी को कुछ नहीं होना चाहिए।"  पुलिसकर्मी धीरे से बुदबुदाते हैं, जो सड़क पर होता, तो क्या करती? अब तक पुलिसवालों ने यह पूछने की जहमत नहीं उठाई है कि वह गाड़ी कहां है जिसे लेकर शोर मचाया गया है। पुलिस पानी पीकर चल देती है और कह जाती है कि अच्छा थोड़ी लगता है, पुलिस आए।
    संभव है कि स्वाति को गाडि़यों से अतिरिक्त मोहब्बत हो या कहीं कोई कमी उसे बच्चों से दूर करती हो। एक बार पहले भी वह खेलते हुए बच्चे की कलाई को नाखून से दबाकर घायल कर चुकी है। जो भी हो यह कड़वी सच्चाई है कि हम बच्चों के प्रति असहिष्णु समाज हैं। उनके खेल से हमें एतराज है। बिल्डिंग के कंपाउंड में बड़ों की इजाजत नहीं है। लॉन खराब होता है, इसलिए वहां भी मनाही है। बच्चे जब पार्क  जाने लगते हैं, तो वहां के बुजुर्ग उन्हें डांटकर भगा देते हैं कि तुम हमारी गली के नहीं, कहीं और खेलो।
   सच तो यह है कि ना जाने कितने बच्चे अपने बड़ों से इसी तरह झगड़ते हुए बड़े होते हैं। कभी बॉल नहीं लौटाई जाती, तो कभी जगह नहीं दी जाती। कभी कांच तोडऩे पर पिटाई हो जाती है, तो कभी खेलने जाने पर टांगे तोड़ देने की धमकी दे दी जाती है। इन तमाम बंदिशों से उलझते हुए ही हिंदुस्तानी बच्चे बडे़ होते हैं, यही हाल स्कूलों का है। खेलने की बुनियादी सुविधा यानी जगह देने में ही हमें एतराज है। विशेष सुविधाओं को तो कोने में बैठकर सुबक लेने में ही भलाई है। इतनी संकीर्ण सोच के रहते हुए अगर कोई प्रतिभा भारत का नाम रोशन करती है तो वह किसी के सामूहिक प्रयासों का नहीं, निजी प्रयासों का नतीजा होता है। शूटर अभिनव बिंद्रा के पिता ने बेटे के लिए व्यक्तिगत तौर पर सुविधाएं उपलब्ध कराईं तब कहीं ओलंपिक्स का गोल्ड मैडल हासिल हुआ। पी गोपीचंद को जुनून सवार है अच्छी कोचिंग देने का तभी साइना नेहवाल ओलम्पिक्स में और पीवी सिंधु वल्र्ड चैंपियनशिप में बैडमिंटन का
ब्रोंज़ जीत पाती हैं।
  बहरहाल, आज महात्मा गांधी का जन्मदिवस है। उनका प्रिय भजन है वैष्णवजन तो तेणे कहिए जै पीड़ पराई जाणे रे..। हिंसा के प्रति उकसाए जाने के बावजूद खुद को वहां से बचा ले जाने में सामान्य शख्स की रूह छलनी हो आती है लेकिन शायद यही गांधीवाद है। बन्दे में
दम था और हम वाकई बेदम हैं .

11 टिप्‍पणियां:

yashoda Agrawal ने कहा…

आपकी लिखी रचना की ये चन्द पंक्तियाँ.........
बन्दे में था दम और हम बेजान बेदम

बुधवार 02/10/2013 को
http://nayi-purani-halchal.blogspot.in
को आलोकित करेगी.... आप भी देख लीजिएगा एक नज़र ....
लिंक में आपका स्वागत है ..........धन्यवाद!

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

लगन लग जाये तो अन्तः में गांधी का निर्माण होने लगता है।

प्रदीप कांत ने कहा…

दरअसल ये पूरा समाज ही असहिष्णु होता जा रहा और सहनशीलता की कमी। हम बच्चों को डाँटने में सक्षम है पर जब सडक पर अत्याचार होता है तो हमारी ज़्बान कहाँ दबी छुपी होती है, पता नहीं

Ek ziddi dhun ने कहा…

हां, बच्चों के प्रति हम उतने ही क्रूर हैं जितने कि अपने आसपास की हर वनरेबल चीजों, प्राणियों के प्रति।

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

सार्थक विचार ....

दिगम्बर नासवा ने कहा…

सोचने वाली बात लिखी है ... अगर समाज ऐसा ही रहा तो पता नहीं क्या होने वाला है ...

Smart Indian ने कहा…

बहुत कठिन है डगर पनघट की ...

सुनीता अग्रवाल "नेह" ने कहा…

बन्दे में वाकई दम था तभी आज तलक जिन्दा है ... बहुत सही कहा आपने बच्चो के प्रति हम क्रूर होते जा रहे है .. अगर प्रतिभाओ का सम्मान करना है तो उचित सुविधा मुहैया करना जरुरी है जो केबल कागजी बन कर रह गयी ..बधाई

कविता रावत ने कहा…

सार्थक सामयिक प्रस्तुति ..

राजीव कुमार झा ने कहा…

सुंदर समसामयिक प्रस्तुति.
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Ankur Jain ने कहा…

एकदम सही कहा...यदि गाँधीजी की फोटो नोटों पे चस्पा न होती तो आज की जनरेशन तो संभवतः उन्हें भुला ही देती।।।