Wednesday, September 4, 2013

वो सजदे के काबिल तो हो


कई बार लगता है कि हम वो समाज हैं जिसे ईश्वर तक पहुंचने के लिए कई सारे जरियों की जरूरत होती है। हम हमेशा माध्यम की ताक में रहते हैं और उम्मीद करते हैं कि कोई आए और हमारा हाथ पकड़कर उस तक ले जाए। हमें ऐसे लोग खूब रास आते हैं, जो हमें यकीन दिला देते हैं कि वे हमें प्रभु तक ले जाएंगे। फिर एक वक्त आता है, जब ये बिचौलिये ही हमें भगवान लगने लगते हैं और हम इनके कहे मुताबिक शतरंज के मोहरों की तरह चलने लगते हैं। यह तो बहुत अच्छा हुआ कि सोलह साल की बेटी के इस पिता की आंखें खुल गईं वरना कई परिवार अपनी संतानों को समर्पित करके भी आंखें बंद किए बैठे हैं। वे इसे बाबा का प्रसाद या धर्म की राह में दी गई आहुति मानते हैं। इस लड़की के पिता भी आसाराम के अंधभक्त थे। लखनऊ से डेढ़ सौ किलोमीटर दूर शाहजहांपुर में उनका अपना व्यवसाय था कि दस साल पहले आसाराम के फेर में आ गए और दीक्षा ले ली। पास ही जगह खरीदी और अपने पैसों से आश्रम बनाया। चेतना तो तब लौटी, जब आसाराम ने बेटी को भी इसी सिलसिले में जोड़ लिया।
  जिस इंदौर शहर से आसाराम की गिरफ्तारी हुई है, उसी शहर की कई महिलाएं और युवतियां बीस साल पहले ही शपथ पत्र देकर इस कथित बापू की पोल खोल चुकी हैं। उन्होंने साफ कहा था कि  बापू का चरित्र ठीक नहीं है और इसने हमारा शोषण किया है। सामाजिक और राजनीतिक दबावों के चलते मामले को रफा-दफा कर दिया गया और परिवार पीछे हट गए। तीन साल पहले एक टीवी चैनल के स्टिंग ऑपरेशन में भी आसाराम को कानून से भागी युवती को शरण देते हुए दिखाया गया था। आसाराम स्टिंग कर रही रिपोर्टर को सलाह देते हैं कि घबराने की कोई जरूरत नहीं। तुम यहां पूरी तरह सुरक्षित हो, अपने तमाम बैंक खातों में नाम बदल डालो ताकि पुलिस और कानून से मुक्त हो जाओ । अचरज नहीं होना चाहिए कि भक्ति की आड़ में यहां कई भगौड़ों को आश्रय दिया जाता हो। हर बडे़ शहर में कई बीघा जमीनों पर दिन में भले ही फलों से लदे पेड़ और प्रवचन की ध्वनि सुनाई देती हो, लेकिन रात वहां काली करतूतों का सबब बनकर आती है।
   सवाल ये उठता है कि इस अंधभक्ति की लौ जलती कैसे है? कहां से आता है इतना बड़ा जनसमूह? कैसे पैदा होती है यह श्रद्धा कि बाबा दर्शन दें और हम उनके चरणों में गिरें? क्यों हमारी चेतना एक बार भी यह सवाल नहीं करती कि यह भी हमारी ही तरह हाड़-मांस का पुतला है, इसके आगे क्यों शीश नवाना? गुस्ताखी माफ, लेकिन हम सब ऐसे ही परिवारों से आते हैं, जहां आदर करना, शीश झुकाना संस्कारों के दायरे में आता है। फिर चाहे संबंधित इसके योग्य हो या नहीं। आस्था की लहर हमारे भीतर हमेशा हिलोरे लेती रहती है। इसे भुनाना बहुत आसान है। यह भेड़चाल भी है।
   पच्चीस-तीस साल पहले इंदौर, जयपुर, लखनऊ जैसे शहरों में ऐ से कई सत्संगी संगठनों का जन्म हुआ। पहले पहल तो लोग आपस में ही बातचीत करते कि कथित बाबा के डेरे पर गए हो.. वहां दस पैसे की चाय और चार आने का समोसा मिलता है। दूसरे कहते तुम वहां भी जाना,  बड़ी हरियाली है। शाम को प्रवचन होते हैं। मन को खूब शांति मिलती है। गरीबी, बीमारी और तमाम परेशानियों से जूझ रहा समाज इन डेरों पर जाहिर है काफी राहत महसूस करता। जनमानस इतना भोला और सरल कि इस निजाम (खाने-पीने और व्याख्यान ) को चलाने वाले की एक झलक पाकर धन्य होने लगा। कथित बाबा और बापू के दर्शन में इन्हें अपनी जिंदगी की चुनौतियां कम लगने लगतीं। कइयों को लगता है कि वह तीन साल से बाबा की सेवा में जा रही है और उसकी आर्थिक दशा एकाएक सुधर गई, तो वह भी सपने देखने लगती। इनके सपने पूरे हुए कि नहीं, लेकिन बाबाओं के ठाठ बढ़ते गए। वे खुद को भगवान का दर्जा देने लगे। लोग इनकी तस्वीरों को पूजन कक्ष में जगह देने लगे। जो ये संत और सच्चे गुरु होते, तो कभी गोविंद की जगह नहीं लेते। ये गोविंद से पहचान कराने की बजाय खुद गोविंद बनने की कोशिश में लिप्त हो गए।
  एक बाबा तो बेतुकी बातों से ही कृपा बरसने का हुनर बता रहे हैं। बौराए लोग उस बाबा के खाते में हर रोज पैसा जमा कराने बैंकों में पहुंच जाते हैं। दिमागी बदहाली का ये आलम है कि बाबा कहता है काला ब्रांडेड पर्स रखो, कृपा आनी शुरू हो जाएगी तो स्त्रियां वाकई सा करने लगती हैं। जो समाज इस कदर आतुर है खुद को प्रस्तुत करने के लिए, वहां एक नहीं कई बाबाओं का मार्ग बरसों बरस प्रशस्त है।
   इन हरकतों की पोल खोलने के लिए जब डॉ. नरेंद्र दाभोलकर जैसे वैज्ञानिक सोच वाले इंसान सामने आते हैं तो पुणे में उनकी हत्या कर दी जाती है।  बलात्कार के आरोपी को गिरफ्तार होने में बारह दिन लग जाते हैं, लेकिन वैज्ञानिक सोचवाले व्यक्ति की हत्या हो जाती है। हमारा यही रवैया बता देता है कि हम नेतृत्व के नाम पर कैसे लोगों से घिरे हैं और किस दिशा में जा रहे हैं। इस शिक्षक दिवस पर बस एक ही बात कि आंख मूंद कर किसी पर यकीन मत करो। अंध भक्ति दिमाग की बत्ती गुल होने के बाद ही जागती है।

तुमने तो झुका लिया अकीदत  से भरा सर 
 तख़्त ए शान पर काबीज़ उस काबिल तो हो

1 comment:

प्रदीप कांत said...

जब जानते बूझते अन्धे हो जाया जाए तो वैसे ही कुछ दिखाई नहीं दे सकता