Saturday, July 13, 2013

xxx और 00 !! आप नहीं समझेंगे



चौदह जुलाई को किया जानेवाला तार भारत का अंतिम तार होगा , इसी के साथ १ ६ ० साल पुरानी  यह तकनीक हमेशा के लिए अलविदा कह देगी 

ह समय तार को शोक संदेश भेजने का
है। आज  के बाद तार इतिहास
बनकर रह जाएगा। वह तार जिसका
अतीत वाकई सुनहरे लफ्जों में लिखा
है। इतना सुनहरा कि इसके बारे में
जानते-समझते हुए आपका दिमाग
रोशन होता हुआ मालूम होता है। संदेश
भेजने की भूख इंसान में हमेशा से रही
है। इमारतों से निकलते धुंए  , दूत, नगाडे़, कबूतर, बोतल में रखी
चिट्ठी से भी जब इंसान का मन शांत
नहीं हुआ, तो वह सुनियोजित डाक की
ओर मुड़ा। खत वक़्त  लेते थे और आवाजाही
की बेहतर व्यवस्था ही इन्हें सुगम
बनाती थी, लेकिन तार विद्युत तरंगों से
उपजी ध्वनि को पढऩे की तकनीक थी।
गर्र गर्र..गट्ट गट्ट.. की आवाज से
ट्रेंड टेलीग्राफिस्ट मैसेज को नोट करता
था। अगर जो संदेश ००० श्रेणी का है,
तो वह पहली प्राथमिकता के साथ भेजा
जाता। संदेश आते ही तुरंत 'बॉय
पियन' को आवाज दी जाती थी। वह
दौड़ता हुआ आता था । उसकी उम्र 16 से
20 तक की होती थी ताकि स्फूर्ति से दौड़ सके, संदेश रिकॉर्ड में
दर्ज होता और मैसेंजर तुरंत उसे गंतव्य
तक पहुंचा देता । यह २४ घंटे की सेवा थी। तार घरों
में ही डोरमैट्रीज बनी होती थी, जहां तार
बाबू आराम कर सकते थे । ओवर टाइम
तो लगभग हर कर्मचारी के हिस्से आता
था। डबल एक्स  मैसेज के तहत मृत्यु के
संदेश आते थे, जो भी प्राथमिकता के
तहत डिलीवर होते थे। सेना, सरकार
और मौसम से जुडे़ संदेश ००० के तहतहोता
ही भेजे जाते थे।
०००  बेहद ज़रूरी सन्देश अंग्रेजों का स्थापित यह
नेटवर्क इतना जबरदस्त था कि गलती
करने वाले पर तुरंत एक्शन  होता था।

मैसेज आते ही रिसीवर अपना नाम दर्ज
करते थे। रिसीविंग का टाइम और
डिलीवरी का टाइम बकायदा नोट होता
था और जो इसमें कोई चूक हुई, तो
सख्त कार्यवाही तय थी।
इंडियन टेलीग्राफ डिपार्टमेंट में वर्ष
१९६६ में जब एक २१ साल का नौजवान
शामिल हुआ, तो वह सचमुच वाकिफ
नहीं था कि आखिर वह किस विभाग से
जुड़ रहा है। ट्रेनिंग पीरियड के दौरान
जब अधिकारियों ने कहा कि वे दुनिया
की एक श्रेष्ठ सेवा और बेहतरीन विभाग
से जुड़ रहे हैं, तब भी नौजवान को
यकीन नहीं हुआ। उनके वरिष्ठ का
कहना था कि हालांकि तार अपना श्रेष्ठ
समय देख चुका है, लेकिन अभी भी
इसके जलवे कुछ समय बरकरार
रहेंगे। नौजवान ने ट्रेनिंग के दौरान ही
जान लिया कि यदि आप बुद्धिमान हैं और
आपको अपना सौ फीसदी देना आता है
तो आप कामयाब हैं, क्योंकि  संचार की

इस दुनिया में गलती की कोई गुंजाइश
नहीं थी और एक सिपाही की तरह ही
मोर्चा संभालना होता था। शायद किसी भी
सेवा को बेहतर बनाना काम के दौरान
हो रही गलतियों को समझने के साथ ही
हो सकता है और टेलीग्राम में गलतियों
की कोई माफी नहीं थी, वे बाकायदा
दर्ज होती थीं।
इस नौजवान ने १९८० तक तार का
जलवा देखा था उसके बाद आई संचार
क्रांति में फोन बेमिसाल साबित हुए। वैसे
नौजवान का अनुभव यह भी कहता है
कि आप तो आज तेज गति से संदेश आदान-प्रदान
करते ही हैं,हम भी जब कई बार जब मोर्स

तकनीक से संदेश पढ़ते हैं, तो भेजने
वाले की गति और समझ के हिसाब से
ही दूसरे स्टेशन पर बैठे बंदे का नाम
जान जाया करते थे। कभी-कभार जब
संदेश का दबाव नहीं होता, तो हम मित्रों
से यूं ही मोर्स पर बात किया करते। यह
आज की चैटिंग ही थी। नौजवान २००६
में इस विभाग को अलविदा कह चुका
है। भले ही आपको उन्हें अब भी नौजवान
कहना मुनासिब ना लगे, लेकिन इन
चालीस बरसों में ही उन्होंने बीस साल
तार को दौड़ते हुए देखा, तो आखिरी
बीस साल हांफते हुए। इस मैराथन में
विजयी रहे, क्योंकि विभाग ने उनके
फख्र में हमेशा इजाफा किया। वक़्त  के
साथ तकनीक और तकनीक के साथ
संचार भी हमेशा बदलेगा, लेकिन अगर
कोई विभाग इंसान के जुनून और आत्म
स्मान को कायम रख पाता है, तो यही
उसकी सार्थकता है। तार विभाग अब
तक औपचारिकता पूरी करने के लिए
चल रहा है। बेशक यह संचार की
मजबूत नींव रहा, लेकिन अब ये तार
आज के जमाने से सुर-ताल
नहीं मिला पा रहा। अलविदा तार। तुम
याद रहोगे।
illustration courtesy : HINDU


4 comments:

Rahul Singh said...

तार के इस दौर में अच्‍छा लेख पढ़ने को मिला.

सरिता भाटिया said...

आपकी इस प्रस्तुति की चर्चा कल सोमवार [15.07.2013]
चर्चामंच 1307 पर
कृपया पधार कर अनुग्रहित करें
सादर
सरिता भाटिया

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

वाह ...
बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
साझा करने के लिए आभार।
सप्ताह मंगलमय हो।

प्रवीण पाण्डेय said...

एक महान युग को विदा..