Wednesday, July 24, 2013

बोतल में बार, बार में डांस

रोजी सबका हक है  फिर चाहे वह नाचकर ही क्यों न कमाई जा रही हो….   बुरा लगता  है  तो इस अनपढ़,बेबस,लाचार आबादी को  काम दीजिये उसके बाद इस पेशे को  जी भरकर कोसिये …मेरी  राय में तो यदि पुरुषों  के नाच में महिलाओं को आनंद आता है तो उन पुरुषों को भी  पूरा हक़ है कि वे अपने पेशे को जारी रखें


बार डांसर्स पर कवर फोटो के लिए जब तलाश शुरू हुई तो किसी भी फोटो पर निगाह ठहर न सकी। इन तस्वीरों में मौजूद बेबसी, लाचारी और दोहराव की मजबूरी को, मोटे मेकअप की परत भी छिपा नहीं पा रही थी। तस्वीरों के किसी भी हिस्से में सुकून नहीं था। ना बार डांसर्स के चेहरों पर और न उन निगाहों में जो उन्हें  देखने वहां आई थीं। नतीजतन, कवर पर ऐसी किसी भी तस्वीर का फैसला तर्क हो गया ।
जाहिर है जिस काम के छायाचित्र ही आप में ऊर्जा का संचार नहीं करते, वह पेशा कैसे जारी रखा जा सकता है? सर्वोच्च न्यायालय को क्योंकर जरूरी लगा कि डांस बारों को बंद करने का महाराष्ट्र सरकार का फैसला गैर-कानूनी था और महाराष्ट्र सरकार को
सा भरोसा क्यों था जो वह मुंबई उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में गई?  दरअसल, मुंबई, पुणे और अन्य शहरों में साल २००5 तक अस्सी हजार से भी ज्यादा बार डांसर्स थीं। अस्सी से नब्बे फीसदी स्त्रियां वहां इच्छा से नहीं मजबूरी से हैं। किसी का पति बीमार है, किसी ने प्रेम में धोखा खाया है, किसी के पास बूढे़ माता-पिता के साथ छोटे भाई-बहनों की जिम्मेदारी है, तो कोई इतनी फुर्ती से अब नहीं नाच सकती जितनी कि फिल्मों की एक्स्ट्रा को नाचना पड़ता है। ये पेशा उन्हें  रोटी देता है। यह काम है उनका, वैसे ही जैसे आप समय पर दफ्तर जाते हैं। बहुत अधिक अवसर थे कि ये सभी किसी चकलाघर में धकेल दी जातीं जहां देह बेचकर उन्हें रोजी कमानी पड़ती। लेकिन बार डांसर्स यहां नाचकर उस जिल्लत से बची हुई थीं।
   सवाल किया जा सकता है कि यही काम क्यों जरूरी है? दूसरी मेहनतकश महिलाओं की तरह वे भी घरों में काम कर सकती हैं, मजदूरी कर सकती हैं। जैनब और मोनिका के बयानों पर गौर कीजिए- 'आपको लगता है कि हम सीधे इस जगह पर आ गए। हम भी काम मांगने ही निकले थे। ज्यादा नहीं पांच- हजार रुपया महीना कमाने की ख्वाहिश थी लेकिन काम ढूंढ़ते-ढूंढ़ते ही हमें यहां तक पहुंचा दिया गया। हमारी गलती यह रही कि हम गरीब, कम पढ़ी-लिखी और जरूरतमंद थीं। यहां कोई परेशानी नहीं। कोई टच भी नहीं करता हम लोग को। बस, इन पुलिसवालों का ही डर सवार रहता है। '
      शायद हमारे देश में किसी भी तरह की रोक या प्रतिबंध से पहले प्रति व्यक्ति आय यानी आम देशवासी की माली हालत पर गौर करना बहुत जरूरी है। एक बड़ी आबादी आज भी कुपोषण, अशिक्षा और खराब स्वास्थ्य के साथ जीने को मजबूर है। रोजगार के अवसर
सी आबादी के लिए ना के बराबर हैं। घरों में काम करने वाली महिलाओं का काम तब तक ही सलामत है जब तक वे काम कर रही हैं। भविष्य तो असुरक्षित है ही वर्तमान भी महंगाई की मार से धुंधला गया है। अंधेरे में चल रहे रोजगारों की तरफ मुडऩा मजबूरी है। हमारे मानदंड दोहरे हैं। हम बड़ी महफिलों में ठुमके लगाने वाली फिल्मी अदाकारों का तो मान करते हैं लेकिन रोजी के लिए नाच रहीं इन स्त्रियों का नहीं। वरना क्या कारण है कि आठ सालों तक थ्री स्टार्स, फाइव स्टार्स में तो डांस बार चलते रहे लेकिन बाकी जगह इन्हें प्रतिबंधित कर दिया गया। 
  सरकार के पास योजनाओं के नाम पर मुफ्त अनाज बांटने जैसी नीतियां हैं। मुफ्त खाना मिलेगा लेकिन रोजगार नहीं। मिड डे मील भी
सी ही योजना है। थोड़ी देर के लिए अच्छा लगता है कि कुपोषित बच्चे भोजन के लालच में स्कूल आएंगे और शिक्षा भी पाएंगे। मुफ्त की ये योजनाएं जाने क्यों चलती भी उतने ही उन्मुक्त तरीकों से हैं। हम किन सरकारी महकमों को अपनी जिम्मेदारियों के लिए उत्तरदायी बना पाएं हैं जो यहां सा हो पाता? न आप और ना योजना बनाने वाले  इस भोजन को खा सकते हैं तो कैसे उम्मीद करते हैं कि यह अभियान सफल होगा। उन्हें काम मिले आर्थिक सहयोग मिले, यह तो समझ में आता है ताकि वे अपने हिसाब से अपने भोजन की आवश्यकता पूरी कर सकें लेकिन कोई कैसे बेस्वाद भोजन को रोज निगल सकता है। बिहार के छपरा में वह स्कूल कब्रिस्तान में बदल चुका है। मौत की यह सरसराहट पूरे देश में फैल गई है। दुनिया की इस सबसे बड़ी मिड डे मील योजना के हर निवाले में शंका पसर गई है। न खाकर भी मौत है और खाकर भी मौत। हर भारतीय को सम्मानजनक रोजगार मिले इसके लिए आजाद भारत को और कितने साल लगेंगे? चुनावी साल में सब देश को बांटने की बयानबाजी में लग गए हैं। इन मुद्दों पर क्यों कोई अपना विजन नहीं रखता?

2 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

माननीय सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय मानवीय संवेदनाओं को देखकर ही लिया गया होगा।

Ankur Jain said...

न्यायालय को फैसले से तो सहमत हूँ...पर आपकी चिंता को भी जायज समझता हूँ..इनके रोजगार हेतु कोई सार्थक उपाय तो होने ही चाहिये...