Friday, June 21, 2013

मैंने चाहा था ख़ुशबू को मुट्ठी में कैद करना


ख़ुशबू
मैंने चाहा था ख़ुशबू को मुट्ठी में कैद करना
ऐसा कब होना था
वह तो सबकी थी
उड़ गयी
मेरी मुट्ठी में रह गया वह लम्स
उसकी लर्ज़िश
और खूबसूरत एहसास
काफ़ी है एक उम्र के लिए 


  

 नासमझी
 

अक्सर दुआओं में उठे
तुम्हारे हाथ देखकर,
मैं कहती
इनकी सुनना मौला
मैं नासमझ नादाँ
कहाँ समझ पाई थी
कि तुम्हारी
हर अरदास
हर अर्ज़
हर इबादत
में मैं थी.
काश, कोई एक सजदा
कभी अपने लिए भी किया होता तुमने ..
.

7 comments:

अरुन शर्मा 'अनन्त' said...

आपकी यह रचना कल शनिवार (22 -06-2013) को ब्लॉग प्रसारण पर लिंक की गई है कृपया पधारें.

अरुन शर्मा 'अनन्त' said...
This comment has been removed by the author.
निहार रंजन said...

दोनों रचनाएँ बहुत ही सुन्दर.

प्रवीण पाण्डेय said...

भावमयी रचनायें।

शिवनाथ कुमार said...

कभी कभी अहसास भी कितने मायने रखते हैं हमारे लिए ...
दोनों रचनाएं बेहद खुबसूरत

डॉ. मोनिका शर्मा said...

भावपूर्ण पंक्तियाँ

pushpey om said...

Ahsas jaga gayi apki rachnae...