Sunday, February 24, 2013

तुम नहीं समझोगे


तुम नहीं समझोगे 
कोई कैसे किसी के भीतर 
हर लम्हा सितार सा बजता है 
कोई झरने सा बहता है कल-कल 
कोई पंछी -सा चहचाहता है निरंतर 
कोई फूल सा खिल जाता है अकस्मात् 
कोई फ़रिश्ता सिफ़त मुस्कुरा देता है अनायास 
कोई मसरूफ है सूफ़ियाना रक्स में  बेतरह 
कोई रूह उतरने को है गहरे 


तुम नहीं समझोगे 
क्योंकि जब तुम्हें अता हुआ यह मौका 
तुम  लग गए ज़िन्दगी के हिसाब-किताब में 
अब सारी टीस किताबों में दर्ज करने से कुछ नहीं होगा 
कुछ भी नहीं।

रक्स -नृत्य 

5 comments:

Reena Maurya said...

वक्त के साथ कुछ बाते हाथ से निकल जाती है..
वक्त रहते ही उन्हें संभल ले तो अच्छा होता है..
भावपूर्ण रचना...

प्रवीण पाण्डेय said...

मन की बातें,
मन के शेष,
और समझाये कौन..

डॉ. मोनिका शर्मा said...

सच में सरल नहीं समझना ......

Rajendra Kumar said...

बहुत ही भावपूर्ण रचना,आभार.

varsha said...

reenaji praveenji monikaji rajendraji aapka shukriya.