Thursday, January 3, 2013

रौशनी को मिले देश का सर्वोच्च सम्मान

फसोस है रोशनी (खुशबू का  दिया नाम) जब तुम जिंदा थीं, यह तंत्र सोया हुआ था लेकिन जब तुम चल बसी, तो पूरा तंत्र तुम्हें कंधा देने आया। देश के प्रधानमंत्री भी तुम्हारे लिए दिल्ली हवाई अड्डे पर आए। तुम्हारे साथ जो हुआ उसके बाद धौलपुर जिला प्रशासन को भी लड़कियों की सुध हो आई है। उन्होंने शाम पांच बजे बाद से लड़कियों के निकलने पर ही रोक लगा दी। सभी कोचिंग कक्षा संचालकों को भी कह दिया कि पांच बजे बाद कक्षाएं संचालित न करें। शहर के वरिष्ठ नागरिक और लड़कियों के माता-पिता को विश्वास में लेने की बात भी कही गई है। अगर घाव है तो उसका इलाज मत करो, उसे बांध दो, फिर चाहे वह नासूर क्यों न बन जाए। जाहिर है प्रशासन ने मान लिया कि हम लड़कियों को सुरक्षा नहीं दे सकते। लड़कियों, तुम कैद हो जाओ और लड़कों तुम छुट्टे घूमो। इस कायर प्रशासन को यह कहते हुए भय लग रहा था कि अगर शाम पांच बजे के बाद भी कोई लुच्चा-लफंगा-बदमाश लड़कियों को छेड़ते हुए देखा गया, तो उसकी खैर नहीं। बस यही फर्क है नजरिए का और यही सोच पहले कोख में और फिर सड़क पर लड़की का विनाश कर देती है।
  धृतराष्ट्र से मनमोहन तक सब आंखों पर पट्टी बांधे हैं, लेकिन इक्कीसवीं सदी के तेरहवें साल में बड़ा फर्क आया है गांधारियों ने अपनी पट्टियां खोल ली हैं .  वे अंधे तंत्र का साथ नहीं देने वालीं। द्वापर में धृतराष्ट्र से ब्याही गांधारी ने यह कहकर पट्टी बांध ली थी कि उनका पति अगर देख नहीं सकता, तो वे भी सारी जिंदगी आंखों पर पट्टी बांधे रहेंगी। धृतराष्ट्र के हर अन्यायी फैसले में भी वे  पट्टी बांधे रहीं। द्रौपदी दांव पर लगी, चीरहरण हुआ। सारे पाप होते रहे, लेकिन  राजतंत्र मौन रहा। दिल्ली की सड़क पर चलती बस में भी यही हुआ। यह अपराध नहीं पाप था। छह में से एक पापी इसलिए भी बच सकता है, क्योंकि उनमें से एक की उम्र अठारह से कुछ महीने कम है। जुवेनाइल एक्ट के तहत अठारह से कम उम्र का अपराधी नाबालिग है और वह कड़ी सजा से बच सकता है।विचारना होगा की जहाँ सरकार बालिग होने की उम्र कम करने पर विचार कर रही हैं वहीँ इतने जघन्य अपराध में लिप्त को बचने का तकनीकी रास्ता मिल जाएगा। 
  कौन है रोशनी? बलिया से दिल्ली अपने माता-पिता के ख्वाब को रोशन करने आई यह लड़की फिजियोथैरेपिस्ट बनने वाली थी। मिडिल क्लास भारतीय का प्रतिनिधित्व करती है रोशनी। हम क्यों उसकी पहचान छिपाए हुए हैं। हमारी न्याय व्यवस्था भी यही कहती है कि पीडि़त लड़की-महिला का नाम मत उजागर करो, क्योंकि वह जानती है कि सारी व्यवस्था उसके खिलाफ है। वह अपमानित होगी। समाज में खुद को स्थापित नहीं कर पाएगी। सब छिपा दो उसे। चुप्पी उसके जीवन का सच बन जाए। इसी चुप्पी ने उसे दोयम दर्जे की नागरिक बनाया है। बोलो, चीखो, बताओ सबको। खुद को दोष देना बंद करो। रोशनी की पहचान भी उजागर होनी चाहिए। शहादत गुमनामी में नहीं जानी चाहिए। वह पथ-प्रदर्शक है। भारत के सर्वोच्च सम्मान की हकदार है। भारत रत्न से कम नहीं है वह।
  पश्चिमी देश गैंग रेप की इस अवधारणा को सुनकर ही सकते में आ गए हैं। उन्हें आश्चर्य है कि कैसा देश है, जो  एक तरफ तो तकनीक और पावरफुल इकोनॉमी की दौड़ में दिखाई देता है, वहीं दूसरी ओर महिलाएं देश की राजधानी में ही गैंग रेप की शिकार हो जाती हैं। कई विदेशी अखबार और चैनल इसी पर बहस कर रहे हैं।
हम नए साल की रोशनी में हैं। आजादी भले ही १५ अगस्त १९४७ को रात बारह बजे  मिली थी, लेकिन इस देश की महिलाओं को २०१२ के बाद यानी २०१३ में मिली है।
यह साल उनके मान-सम्मान और आत्मविश्वास का होगा।

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