Wednesday, December 4, 2013

अमृता की आन

सब इंस्पेक्टर अमृता सोलंकी जैसी कामकाजी महिलाओं को सलाम है जो फ़र्ज़ और कर्त्तवय की राह में कभी आत्मसम्मान कुर्बान नहीं करती।
लगता है यह लड़कियों के मुखर होने का समय है। वे हिम्मत बटोरने लगी हैं अपने सीनियर्स के अपमानजनक व्यवहार के खिलाफ। वे बोल रही हैं जज के बारे में, पत्रकार के बारे में और हाल ही एक मामला मध्य प्रदेश से आया है, जहां सेंधवा की पुलिसकर्मी अमृता सोलंकी ने अपने साथ हुए अन्याय का विरोध करते हुए न केवल इस्तीफा दिया, बल्कि फेसबुक पर मुहिम छेड़ दी है। तहलका पत्रकार के इस्तीफे से पहले का इस्तीफा है अमृता सोलंकी का। यहां अधिकारी ने उनका अपमान शब्दों से किया।
अमृता
मध्यप्रदेश के  राजगढ़ ज़िले के मलावर ठाने  में सब-इंस्पेक्टर हैं। बाइस नवंबर की रात वे  के ब्यावरा में ड्यूटी पर तैनात थीं। रात साढे़ बारह बजे एक बंद लालबत्ती का वाहन सामने से गुजरा । अमृता ने उसे रोका। वाहन में नरसिंहगढ़ के चुनाव पर्यवेक्षक थे। उन्होंने गुस्से से पूछा वाहन क्यों रोका? अमृता ने कहा मेरे अधिकारियों के निर्देश हैं कि लाल-पीली बत्ती की आड़ में कोई अवैध वाहन नहीं गुजर जाए। उन्होंने डांटकर कहा, अंधी हो क्या। दिखाई नहीं देता। सामने लिखा है ना मुख्य चुनाव पर्यवेक्षक। अमृता के कहने पर कि वाहन जानबूझ कर नहीं रोका गया, पर्यवेक्षक ने उनका नाम पूछा और कहा कि तेरे एसपी को बताऊंगा और नाराज होकर कहा कि पैसे देकर भरती हुई है क्या? तुझे अक्ल नहीं है, तू नौकरी के लायक नहीं है।
अमृता के इस्तीफे को हालांकि पुलिस विभाग ने स्वीकार नहीं किया हैै लेकिन इसी विभाग में उनके साढ़े तीन साल में दस तबादले हो चुके हैं।  वे एक दबंग सब-इंस्पेक्टर बतौर पहचानी जाती हैं और इस इलाके में भी उन्हें एक दलित व्यक्ति की हत्या के बाद पोस्टिंग दी गई थी। चुनौती बड़ी थी, क्योंकि थाने का घेराव कर लिया गया था, जनता को शक था कि दलित की हत्या थाने में हिरासत के दौरान हुई। अमृता जब बोलीं, तो कई साथी पुलिसकर्मियों ने भी अपने साथ हुए व्यवहार का खुलासा किया। दरअसल, मातहतों का अपने वरिष्ठों से टकराव कोई नया नहीं है, लेकिन ये कैसे वरिष्ठ हैं, जो अपने अधीनस्थों की ही अवमानना कर जाते हैं। जूनियर्स को वे कैसी सीख दे रहे हैं कि हमसे हमारी पहचान ही न पूछो? क्यों वे सलाम और साष्टांग दंडवत की अपेक्षा में होते हैं? क्या हो जाएगा यदि लाल बत्ती में बैठा अधिकारी पहले अपनी पहचान सहर्ष जाहिर करे, उसके बाद मातहत का सलाम कुबूल करे? हमारी दिक्कत है कि हम इन सब बातों को रुतबे से जोड़कर देखते हैं। देखा, मुझे ट्रेफिक हवलदार ने कैसे झुककर जाने दिया। देखा, मैंने जब एंट्री की, तो सामने वाले की हिम्मत ही नहीं हुई मेरा कार्ड देखने की। देखा, मैं पिछले तीन साल से ये मैचेज बिना किसी टिकट के देख रहा हूं। हमारी कोशिश होती है कि लोग हमें इस तरह जाने या माने। कल को इसी आड़ में कोई धमाका या हादसा हो गया तो? क्यों नहीं हम आगे रहकर जांच में सहयोग करते। जिस विकट समय काल में हम खडे़ हैं, वहां हर पल अपनी पहचान के कागजों के साथ रहना आपकी मजबूरी है। आप पहले एक नंबर हैं उसके बाद इंसान।
बहरहाल, लड़कियां अब मजबूरी के साथ नहीं, मजबूती के साथ मोर्चे पर हैं। वे अपमान की मुख़ालिफ़त कर रही हैं। वे जिस पद पर भी हैं, आत्मसम्मान उनके लिए सर्वोपरि बन रहा है। देश का संविधान उन्हें यह हक देता है। काम के मोर्चे पर भी वे कोई साधारण ड्यूटी की अपेक्षा नहीं करती। अमृता रात साढे़ बारह बजे ड्यूटी पर तैनात थीं और तहलका पत्रकार अपने शहर से दूर गोवा में अपने कर्तव्यों का निर्वाह कर रही थी। कर्मठ आधी दुनिया अपनी पेशेगत ड्यूटीज को पूरी ईमानदारी से अंजाम दे रही हैं। अवमानना बर्दाश्त करते हुए काम करते जाना उन्हें नामंजूर है। स्त्री ही क्यों, ऐसा तो किसी पुरुष मातहत को भी बर्दाश्त नहीं करना चाहिए, बशर्ते कि वह सच्चाई और कर्त्तवय की दिशा में हो।

Thursday, November 28, 2013

त हल्का

जयपुर से प्रकाशित डेली न्यूज़ की साप्ताहिक पत्रिका खुशबू
http://dailynewsnetwork.epapr.in/190567/khushboo/27-11-2013#page/1/2 
इस घटना से पहले तक तरुण तेजपाल धारदार ब्रितानी अंग्रेजी में अपनी बात रखने वाले शानदार वक्ता और लेखक  थे। एेसा वक्ता, जो बात कहते हुए कभी-भार  पंजाबी धुनों पर सवार होर थोड़ा मनमौजी हो जाता था। पचास साल के  इस लेख-पत्रकार की  पकड़ यदि भारत के  एलीट क्लास पर थी तो उतना ही दखल कमजोर तबके  पर भी था। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में ई बार इस चोटीवाले, ऊंचे द के  गोरे चिट्टे शख्स को  सुना। जिस किताब के  अंश उन्होंने यहां पढे़, उसमें एक किशोर उम्र का  बाल था और था असहज रता टेक्स्ट।
बहरहाल, इस गोरे चिट्टे शख्स पर आज दागदार इल्जाम लगे हैं। शायद इल्जाम
हना गलत होगा यह तो सच्चाई है, क्योंकि स्वयं तेजपाल इसे स्वीकार  चुके  हैं और अपनी प्रबंध संपादक और पत्रकार लड़की  दोनों से माफी  मांग चुके  हैं और स्वयंभू न्यायाधीश बनकर खुद को छह महीने तक  पद से अलग रखने का  फैसला भी कर चुके  हैं। .... और फिर ज्यों ही पता चलता है कि फैसला भारतीय क़ानून के  मुताबिक होगा, तो वे भी किसी आदतन  अपराधी की  तरह ही व्यवहार रने लगते हैं। ये वही तेजपाल हैं, जिन्होंने तहलका  को  वो मुकाम दिया जहां तक  पहुंचने का  ख्वाब, जोश-ओ-जुनून से भरा हुआ हर पत्रकार देखता है। तेजपाल की  अगर क़ानून में इतनी भी आस्था नहीं तो कैसे  उम्मीद की जा सकती है कि  तहलका  ने जो भी स्टिंग्स किए, उसमें अपराधियों पर क़ानूनी प्रक्रिया चलवाने की  मंशा रही होगी। जब खुद पर बीतती है, तो इनसान यूं ही पलटता है?
 
तहलका कि प्रबंध संपादक शोमा चौधरी कि भूमिका कहीं भी ऐसी नहीं थी कि वे किसी आम नियोक्ता से अलग नज़र आयें। यही होता है वर्क प्लेस पर हरकतें होती हैं  और फिर यही कोशिश कि लड़की किसी तरह से संस्थान ही छोड़ कर चली जाए । वही शोमा जो महिला मुद्दों की  पैरवी रते हुए सरकार हिला देने का  माद्दा रखती हैं, इस मुद्दे पर बचाव की  मुद्रा में दिखीं। उनसे नहीं हा गया कि  जो भी हो हम मामले की  पूरी तहकीकात  रेंगे। उल्टे उन्होंने तेजपाल से हा कि आपने पत्रकार को  जो ईमेल लिखा है उसकी  भाषा को  थोड़ा विनम्र और माफीनामा जैसी बनाइए। उनकी  कोशिश थी कि  मामला इसी लिखा-पढ़ी के  बीच सुलझ जाए, लेकिन गुनाह बड़ा था। तेजपाल ने सात और आठ नवंबर को  लगातार दो बार घृणित हरकत की । पत्रकार लड़की  ने इस घटना का  पूरा ब्यौरा गोवा में मौजूद अपने तीन सहर्मियों को भी दिया था। सुखद है कि  इन तीनों ने अपने बयान गोवा पुलिस को  दर्ज रा दिए हैं और वे तीनों इस दर व्यथित थे कि  अपनी नौरियों से इस्तीफा देने को  भी तैयार थे। गौरतलब है कि  सोलह दिसंबर २०१२ को दिल्ली की  एक  बस में हुआ सामूहि दुष्र्म और फिर अगस्त २०१3 में मुंबई के शक्तिमिल्स कंपाउंड में पत्रकार के साथ हुए एक और सामूहि दुष्र्म के बाद गोवा की  इस घटना में भी पीडि़ताओं के साथी सहर्मियों का रवैया बहुत ही संवेदनशील रहा है।      
माफीनामा जारी
र तेजपाल घिर चुके  हैं। दिल्ली की  घटना के  बाद सीआरपीसी में किए  गए संशोधन के  मुताबि धारा ३०९ के तहत छह महीने में इस ट्रायल को  पूरा रना होगा। उम्मीद की  जानी चाहिए कि यह छह महीने कार्यस्थल  पर हो रही छेड़छाड़ के लिहाज से टर्निंग पॉइंट साबित हों।

          पूर्व तहलका पत्रकार ने यह भी कहा था कि  तेजपाल के  रिश्तेदार उसके परिवार पर भावनात्म
दबाव बना रहे हैं। यह दुखद है कि  अपनी सहेली के   पापा को किसी कठघरे में खड़ा करना पडे़, अपने पिता के मित्र को  इस रूप में देखना पडे़। लड़कियों ने करिअर की  राह में जरूर इरादे बुलंद किए हैं लेकिन आत्मसम्मान  तापर नहीं रखा है। वे बोल रही हैं। अन्याय के खिलाफ इंसाफ चाहती हैं और ये भी चाहती हैं कि  उनका  शुभचिंत बनने की आड़ में कोई ई उनका  देहशोषण नहीं र सता। अब जब लड़कियां अपनी बात न्यायिसंस्था त पहुंचाने का  साहस दिखा रही हैं इंसाफ की राह में शामिल संस्थाओं  को भी संवेदनशील होना पडेग़ा। यहां आज भी सारा दारोमदार पीडि़ता पर है कि  वह साबित रे कि  उसके साथ दुष्र्म या दुव्र्यवहार हुआ है। न्याय पाने की  इस वायद में अपने जख्म दिखाते-दिखाते वह इतनी घायल हो जाती है कि  खुद ही हार जाती है। एेसी हर शिकायत की  संजीदगी से लेने की पहल पहले संस्थान  और फिर पुलिस को  रनी होगी। यही उम्मीद कि केवल तहलका न मचें गम्भीर तहकीकात भी हो कि काम पर निकली ये लड़कियां गर सभी मसलों पर आपसे संवाद कर रही हैं तो इसका कतई ये अर्थ नहीं कि वे आपके साथ आपके इरादों में शरीक हो।  इस मामले में भी तेजपाल ने आड़ ली है कि हमारी चर्चा सेक्स और डिजायर जैसे मामलों पर हो रही थी जिसका पत्रकार लड़की ने यह कहकर विरोध किया कि यह चर्चा आपने शुरू की थी  क्योंकि आप यही चाहते थे।

Wednesday, November 13, 2013

बिज्जी का जाना वाल्मिकी और वेदव्यास का जाना है

विजय दान देथा 'बिज्जी' का जाना हमारे बीच से वाल्मिकी और वेदव्यास के  चले जाने से कम नहीं। रचना में जितनी गहराई व्यक्तित्व में उतनी ही सादगी। वे कतई अपने कद का बोझ लिए नहीं चलते। बातचीत से कभी कोई आभास नहीं कि  उन्होंने कुछ एेसा रचा है जिसके  लिए बड़े-बडे़ फिल्मकार उनकी  ड्योढ़ी चढ़ते हैं। जोधपुर में बिताए बीसवीं सदी के अंतिम तीन बरसों में जब कभी वे सड़कों  पर भी टकराए तो सादगी और विनयशीलता उनके  कंधे से लटके  झोले की तरह ही मिलती ।
एक  बार वे लोक कला मर्मज्ञ कोमल कोठारी  के घर से निकले ही थे कि  सामने मैं पड़ गई। गौरतलब है कि  कोमल कोठारी के  साथ मिलकर बिज्जी ने रूपायन संस्था बनाई, जो राजस्थान की  लोक  संस्कृति को  सहेजने का बड़ा काम कर रही थी। पूछने पर कि  चलिए मैं छोड़ देती हूं थोड़ी ना-नुकुर के  बाद वे मोपेड की  पिछली सीट पर बैठ गए और मैंने उनकी  बताई जगह पर छोड़ दिया जो ज्यादा दूर नहीं थी। जिंदगी एेसे मौके  कहां रोज मुहैया कराती है। बहरहाल, लोक साहित्य को  लोकभाषा में कलमबद्ध करनेवाले  बिज्जी इस लिहाज से भी अनूठे थे, क्योंकि अक्सर साहित्यकारों के आसपास उनका  आभामंडल बनाए रखने वाला समूह होता है और वे उनके  बीच बैठकर ही बौद्धिकता के  गंभीर बयान जारी करते हैं। ऐसा कभी भी बिज्जी के साथ नजर नहीं आया। बिज्जी की  एक कहानी पर गौर कीजिए। दोहरी जिंदगी नामक कथा संग्रह को  पेंग्विन ने 2007 में प्रकाशित किया। शीर्षक  कहानी ही लेस्बियन यानी दो स्त्रियों के रिश्ते को इतनी सहजता से बयां क रती है कि  यकीन नहीं होता, वह भी ग्रामीण परिवेश में।
   जोधपुर के  बाद बिज्जी साल 2001 में विदेशी पाहुणों को  आकर्षित करने वाले सम्मेलन राजस्थानी कॉनक्लेव, जयपुर  में मिले। वहां भी बेहद सादगी के  साथ एक हॉल से दूसरे हॉल में वक्ताओं को  सुनते और चल पड़ते। सहज सवाल उभरता है कि  एेसी कौनसी पृष्ठभूमि है जो अर्श पर पहुंच चुकी  लेखनी के  कदमों को  इतनी मजबूती के साथ फर्श पर थामे रही। कथाकार उदयप्रकाश के  शब्दों में महान कथाकार जिसका  समूचा जीवन कठिनाइयों, संघर्ष, शोक और वियोगों से भरा रहा। जिसने चार वर्ष की  आयु में सामंती हिंसा के  शिकार बने अपने पिता का  टुकड़ों में कटा शरीर देखा। फिर, भयावह आर्थिक  संकटों के  बीच अपने परिवार का  संपोषण कि या। एक  के  बाद एक  पुत्र, प्रपौत्र, पत्नी और परिजनों के  वियोग के आकस्मिक  आघात सहे। वह अपूर्व साहित्यकार जिसका जीना, सांस लेना, चलना-फिरना सब कु छ शब्दों और वाक्यों की  अनंत अबूझ पगडंडियों से यात्रा करते हुए बीता। सच है कि  एेसा इंसान जब कलम थाम लेतो बिज्जी बन के  ही उभरता है।
हमारी पीढ़ी का  दुर्भाग्य है कि  हम किताबों की  ओर फिल्मों से जाते हैं। बरसों पहले जब मणि कौल की  दुविधा  फिल्म देखी तो यकी न नहीं हुआ था कि  वे वही बिज्जी हैं, जिनकी  क़था पर बनी फिल्म देखकर चकित रहने के सिवा कोई चारा नहीं था। फिर, जब बिज्जी से मुलाकात हुई तो हैरान रह गई कि ये व्यक्ति किस कदर सादा तबीयत हैं । वरना आज के  दौर के  क़थाकार एक  दो किताब छपवाकर ही अपने अहंकार  को  संतुलित करने में नाकाम हो जाते हैं। यह बौद्धिक  आतंक  बिज्जी के  पास कभी नहीं फटका । एक कहानी डायरी का पृष्ठ सांप्रदायिक पन्नालाल की पोल खोल कर रख देती है . उसे तब तक चैन नहीं आता जब तक एक पन्ना वह अपनी हरकतों से न रंग ले।  
जोधपुर के विनोद विट्ठल के शब्दों पर गौर कीजिए 'बीज जितने पुराने और बादल जितने नए थे बिज्जी। बिज्जी से मिलना हजार साल की उम्र वाले एक  एेसे जवान किस्सागो से मिलना था, जिसने कई-कई युग देखे और जो पखेरुओं और रूखड़ों  (पेड़ ) से लेकर अंधेरे और चांदनी तक की बोलियां जानता था। अबोला वहां सुन सकता था और अदेखे का आख्यान बना  सकता था। रसूल हमजातोव और चेखोव से लेकर दोस्तोवस्की  तक उसकी  बातों में हुंकार भरते थे। विक्टर ह्यूगो से लेक र लियो तॉलस्तॉय तक  उसके  बुलावे पर आते थे।'  एेसे किस्सागो को  नमन और उस माटी को  भी जिसने एेसी कहानियां दी। जो देहात, शहर, प्रदेश, देश की  सरहद लांघ दुनियाभर में फैल गई। तभी तो पद्मश्री बिज्जी दो साल पहले नोबल की  श्रेणी में नामित थे। मिट्टी की  बात कहने वाले बिज्जी ने बोरुंदा को  ही घरोंदा बनाए रखा। वे क भी नहीं उडे़, लेकिन किस्से गुनने की  उनकी ताकत ने उनके कदमों में ही दुनिया को  ला खड़ा किया उस भाषा की  ओर, जिसे देश मान्यता ही नहीं दे सका  है।
 

ps:स्मृति शेष - विजय दान देथा 'बिज्जी' अनूठे रचनाधर्मी होने के साथ अनोखे इंसान भी थे। जोधपुर में कभी-कभार मैं और मेरे पति शाहिद मिर्ज़ाजी उनसे टकरा जाते तो वे चुटकी लेने से बाज़ नहीं आते और हमें वर्षा का बादल कहते हुए ज़ोर से हंस पड़ते। कथाकार को कुछ ज़यादा पढ़ने की क़ुव्वत हासिल होती है। उन्हें सादर नमन।

Tuesday, October 1, 2013

बन्दे में था दम और हम बेजान बेदम

गांधी जयंती से ठीक पहले कोई इस एहसास को पा जाए कि हिंसा के एवज में प्रतिहिंसा न करते हुए, खुद को बचा ले जाना कितना मुश्किल है, मायने रखता है। आवेश में रोम-रोम कांपता है। हाथ-पैर पर नियंत्रण भले ही कायम रह जाए लेकिन, शाब्दिक हिंसा  से जुबां बाज नहीं आती। बेहद मुश्किल है वहां से खामोश निकल जाना।
   शाम के सात बजने वाले थे और वह अपनी बिल्डिंग के दरवाजे पर होती है। एक स्त्री (स्वाति) ठीक सामने आकर आंखों में क्रोध, लेकिन जुबां पर हैलो कहकर उससे बात करना चाहती है। वह कहती है, जी कहिए। 'आपके बच्चे ने मेरी गाड़ी पर अपनी सायकल निकालते हुए स्क्रेच लगा दिया। ओह, माफी चाहती हूं, कहां है आपकी गाड़ी? "गाड़ी मेरे पति ले गए हैं। आप गाड़ी का पूछ रही हैं। बच्चे को संस्कार नहीं देंगी?" क्या ज्यादा नुकसान हुआ है अगर एसा है, तो मैं भरपाई करने की कोशिश करुंगी। वह बोली।"क्या भरपाई करेंगी आप? आपकी औकात भी है भरपाई करने की?" औकात तो मेरी स्कूटर की भी नहीं, लेकिन मेरा मानसिक स्तर आपसे ऊंचा है। वह तेज लेकिन कांपते स्वर में बोलकर सीढि़यां चढऩे लगती है। स्वाति ने उसका हाथ पकड़कर खींचा और गिराने की कोशिश की, मानो यह पीछा छुड़ाना उसे बेहद नागवार गुजरा हो। ' तूने अगर बच्चों को यहां खेलने से मना नहीं किया, तो फिर मैं देख लूंगी बच्चों को।" किसी तरह  तेज स्वर में बच्चों को ना छूने की ताकीद देते हुए वह बचकर ऊपर तक पहुंच गई।
   दस मिनट ही बीते होंगे कि स्वाति उसके फ्लैट के सामने थी। घबराकर उसने दरवाजा बंद कर लिया, तो
स्वाति ने दरवाजे को पीटना और खिड़कियों के कांच को ठोकना शुरू कर दिया। शुभचिंतक पड़ोसी स्वाति को वहां से नीचे ले जाते हैं। वह तब भी चीखती रही कि इतना ही खेलने का शौक है, तो पार्क में जाकर खेलो।
   भयग्रस्त स्त्री यकायक हुए इस घटनाक्रम की सूचना दफ्तर को देती है दफ्तर के वरिष्ठ स्थिति को भांपते हुए पुलिस को खबर करते हैं। पुलिस को स्वाति गेट पर ही मिल जाती है। वह और पुलिस साथ ही फरियादी के घर में दाखिल होते हैं। पुलिस दो स्त्रियों की उलझन से ज्यादा इसे कुछ नहीं मान पाती है। वह बच्चों को समझाती है। थोड़ी देर पहले शाब्दिक और दैहिक हिंसा कर रही स्त्री विजयी भाव से मुस्कुराती हुई लौट जाती है। 'मेरी गाड़ी को कुछ नहीं होना चाहिए।"  पुलिसकर्मी धीरे से बुदबुदाते हैं, जो सड़क पर होता, तो क्या करती? अब तक पुलिसवालों ने यह पूछने की जहमत नहीं उठाई है कि वह गाड़ी कहां है जिसे लेकर शोर मचाया गया है। पुलिस पानी पीकर चल देती है और कह जाती है कि अच्छा थोड़ी लगता है, पुलिस आए।
    संभव है कि स्वाति को गाडि़यों से अतिरिक्त मोहब्बत हो या कहीं कोई कमी उसे बच्चों से दूर करती हो। एक बार पहले भी वह खेलते हुए बच्चे की कलाई को नाखून से दबाकर घायल कर चुकी है। जो भी हो यह कड़वी सच्चाई है कि हम बच्चों के प्रति असहिष्णु समाज हैं। उनके खेल से हमें एतराज है। बिल्डिंग के कंपाउंड में बड़ों की इजाजत नहीं है। लॉन खराब होता है, इसलिए वहां भी मनाही है। बच्चे जब पार्क  जाने लगते हैं, तो वहां के बुजुर्ग उन्हें डांटकर भगा देते हैं कि तुम हमारी गली के नहीं, कहीं और खेलो।
   सच तो यह है कि ना जाने कितने बच्चे अपने बड़ों से इसी तरह झगड़ते हुए बड़े होते हैं। कभी बॉल नहीं लौटाई जाती, तो कभी जगह नहीं दी जाती। कभी कांच तोडऩे पर पिटाई हो जाती है, तो कभी खेलने जाने पर टांगे तोड़ देने की धमकी दे दी जाती है। इन तमाम बंदिशों से उलझते हुए ही हिंदुस्तानी बच्चे बडे़ होते हैं, यही हाल स्कूलों का है। खेलने की बुनियादी सुविधा यानी जगह देने में ही हमें एतराज है। विशेष सुविधाओं को तो कोने में बैठकर सुबक लेने में ही भलाई है। इतनी संकीर्ण सोच के रहते हुए अगर कोई प्रतिभा भारत का नाम रोशन करती है तो वह किसी के सामूहिक प्रयासों का नहीं, निजी प्रयासों का नतीजा होता है। शूटर अभिनव बिंद्रा के पिता ने बेटे के लिए व्यक्तिगत तौर पर सुविधाएं उपलब्ध कराईं तब कहीं ओलंपिक्स का गोल्ड मैडल हासिल हुआ। पी गोपीचंद को जुनून सवार है अच्छी कोचिंग देने का तभी साइना नेहवाल ओलम्पिक्स में और पीवी सिंधु वल्र्ड चैंपियनशिप में बैडमिंटन का
ब्रोंज़ जीत पाती हैं।
  बहरहाल, आज महात्मा गांधी का जन्मदिवस है। उनका प्रिय भजन है वैष्णवजन तो तेणे कहिए जै पीड़ पराई जाणे रे..। हिंसा के प्रति उकसाए जाने के बावजूद खुद को वहां से बचा ले जाने में सामान्य शख्स की रूह छलनी हो आती है लेकिन शायद यही गांधीवाद है। बन्दे में
दम था और हम वाकई बेदम हैं .

Thursday, September 26, 2013

आखर बंदी

ये कौन बांधे है
तुझे-मुझे अब भी
जन्म में यकीं नहीं
कच्ची उम्र को गुज़रे अरसा हुआ
तेरे हर्फ़
बस यही  बिखरे पड़े हैं
मेरे चारों ओर
कभी सहलाते हैं
कभी तकरार करते हैं
कभी बरस जाते हैं मुझ पर गहरे
भिगो देते हैं भीतर तक 
मैं इन आखरों की बंदी हूँ
ये आखर-बंधन मैंने लिया है
सात फेरों की तरह.
इस जन्म के लिए
जीते जी . 

image: varsha

हर लो मेरा चैतन्य
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तुम नहीं जानते
तुमने अनन्या मान
कितना अन्याय किया है मेरे साथ
मैं अचेत ही भली थी
अब जब चेतना मुझे छू गयी है
मुझे तुन्हारे सिवा कुछ नज़र नहीं आता

हर लो मेरा चैतन्य
दे दो जड़ता मुझे
इस दुनिया में जीने के लिए
कह दो कि मेरा-तुम्हारा कुछ नहीं
आजाद करो मुझे
इस मोहपाश से
जानो तुम यह सब
क्या तुम नहीं जानते ?

 

Wednesday, September 11, 2013

पाकिस्तान में मलाला अफगानिस्तान में सुष्मिता


अफगानिस्तान में अमेरिकी दखल
हो जाने के बावजूद लेखिका और
स्त्री सेहत से जुड़ी सक्रिय
कार्यकर्ता सुष्मिता बैनर्जी की हत्या
हो जाती है। इन दिनों यह
ताकतवर देश जाने किस हक से
सीरिया पर हमला करने की मंशा
रखता है। दुनिया के बड़े हिस्से में
जब स्त्री को जीने लायक
परिस्थिति दे पाना ही नामुमकिन
हो रहा है ये देश युद्ध के जरिए
शांति प्रयासों में लगा है? 

स्त्रियों की
सेहत के लिए काम कर रहीं
सुष्मिता बैनर्जी अफगानिस्तान में
गोलियों से भून दी जाती हैं, तो स्त्री
शिक्षा के लिए संघर्ष कर रही
किशोरी मलाला यूसुफजई को
तालिबानी पाकिस्तान में मौत देने
की कोशिश करते हैं।
मलाला सौभाग्यशाली रहीं कि वे
आज जिंदा हैं, लेकिन सुष्मिता के
साथ ऐसा   न हो सका। वे
अफगानिस्तान के पूर्वी पक्तिका
प्रांत में अपने घर पर मार दी गईं।
उनके पति जांबाज खान को बांध
दिया गया और आतंकी उन्हें यह
कहते हुए मारने लगे कि तुमने
हमारे खिलाफ लिखना नहीं छोड़ा।
उनचास साल की सुष्मिता को प्रेम
और सौहार्द की कीमत जान से
चुकानी पड़ी। काबुलीवाले की
बंगाली बहू के स्नेह संदेश में
कट्टरपंथियों को अपने इरादों की
मौत का पैग़ाम नजर आया। यही
उनकी लिखी किताब का शीर्षक
था। संभवत: यह गुरु रवींद्रनाथ
टैगोर की लिखी कहानी
काबुलीवाला के आगे की कथा थी।
इस बार काबुलीवाला यानी
अफगानी पठान का नाम जांबाज
खान था। असल में वह
अफगानिस्तान से कोलकाता
व्यवसाय के सिलसिले में आया था,
जहां सुष्मिता से उसकी मुलाकात
हुई। तब पच्चीस बरस की सुष्मिता
को इस काबुलीवाले से प्रेम हो
गया और वह उसके साथ उसके
देश चली गयीं । जमीन उस वक्त
सुष्मिता के पैरों तले पूरी ही निकल
गई, जब उन्हें पता चला कि
जांबाज पहले ही विवाहित है और
उसके बच्चा भी है। हालांकि, पहली
पत्नी के हालात पर उन्हें दया आ
गई। स्त्री वहां आधी-अधूरी
नागरिक ही थी।
सक्रिय और संवेदनशील सुष्मिता
उनके हक के लिए संघर्ष में
व्यस्त हो गईं। सुष्मिता ने सुरक्षा
के लिए इस्लाम कुबूल किया। वह
सईदा हो गईं। हालात तब बिगडे़,
जब १९९४ के आसपास किसी
तरह बचते-बचाते वहां से भाग
निकलीं। तालिबान ने उनकी
डिस्पेंसरी बंद कर दी थी और
उन्हें दुष्चरित्र स्त्री बतौर प्रचारित
किया। कोलकाता पहुंचकर किताब
'काबुलीवालार बंगाली बोऊ' 
लिखी।
किताब में तालिबानियों के चंगुल से
निकलकर जिंदा रहने का .यौरा
था। इस पर २००३ में बॉलीवुड में
एस्केप फ्रॉम तालिबान नामक
फिल्म भी बनी। किताब ने सुष्मिता
को बंगाल में स्थापित कर दिया।
           
       हाल ही सुष्मिता का दोबारा पति के
पास लौटना शायद सही नहीं था।
 तसलीमा नसरीन के लिए भी बंगलादेश के  
कट्टरपंथी ताक में बैठे  हैं लेकिन वे वहां नहीं लौटतीं। 
 सुष्मिता अफगान औरतों पर एक और किताब लिखना चाहती
थीं कि किस तरह वे जीने के अधिकारों से
महरूम हैं। वे वहां एक डिस्पेंसरी
चला रही थीं ताकि इन महिलाओं
को अच्छी सेहत का पाठ पढ़ा
सकें। उधर, कोलकाता में सुष्मिता
के भाई गोपाल बैनर्जी का कहना
है कि जांबाज से उनकी बात हुई
थी और वे काफी परेशान नजर आ
रहे थे। मौत के अगले दिन ही
इस्लामिक कायदों से सुष्मिता का
अंतिम संस्कार कर दिया गया।
सुष्मिता की यह मौत उस इंसान
की मौत है, जो व्यापक दृष्टिकोण
के साथ जीता है। सरहदें उसकी
सोच को दायरों में नहीं बांध पातीं।
वह जहां होता है, समाज की भलाई
की दिशा में लग जाता है। वे
आजाद खयाल अमन पसंद
भारतीय थीं। जाहिर है उस मुल्क
में कुछ भी नहीं बदला है और वहां
रह रहे भारतीयों की जान मुश्किल में ही है . 

Wednesday, September 4, 2013

वो सजदे के काबिल तो हो


कई बार लगता है कि हम वो समाज हैं जिसे ईश्वर तक पहुंचने के लिए कई सारे जरियों की जरूरत होती है। हम हमेशा माध्यम की ताक में रहते हैं और उम्मीद करते हैं कि कोई आए और हमारा हाथ पकड़कर उस तक ले जाए। हमें ऐसे लोग खूब रास आते हैं, जो हमें यकीन दिला देते हैं कि वे हमें प्रभु तक ले जाएंगे। फिर एक वक्त आता है, जब ये बिचौलिये ही हमें भगवान लगने लगते हैं और हम इनके कहे मुताबिक शतरंज के मोहरों की तरह चलने लगते हैं। यह तो बहुत अच्छा हुआ कि सोलह साल की बेटी के इस पिता की आंखें खुल गईं वरना कई परिवार अपनी संतानों को समर्पित करके भी आंखें बंद किए बैठे हैं। वे इसे बाबा का प्रसाद या धर्म की राह में दी गई आहुति मानते हैं। इस लड़की के पिता भी आसाराम के अंधभक्त थे। लखनऊ से डेढ़ सौ किलोमीटर दूर शाहजहांपुर में उनका अपना व्यवसाय था कि दस साल पहले आसाराम के फेर में आ गए और दीक्षा ले ली। पास ही जगह खरीदी और अपने पैसों से आश्रम बनाया। चेतना तो तब लौटी, जब आसाराम ने बेटी को भी इसी सिलसिले में जोड़ लिया।
  जिस इंदौर शहर से आसाराम की गिरफ्तारी हुई है, उसी शहर की कई महिलाएं और युवतियां बीस साल पहले ही शपथ पत्र देकर इस कथित बापू की पोल खोल चुकी हैं। उन्होंने साफ कहा था कि  बापू का चरित्र ठीक नहीं है और इसने हमारा शोषण किया है। सामाजिक और राजनीतिक दबावों के चलते मामले को रफा-दफा कर दिया गया और परिवार पीछे हट गए। तीन साल पहले एक टीवी चैनल के स्टिंग ऑपरेशन में भी आसाराम को कानून से भागी युवती को शरण देते हुए दिखाया गया था। आसाराम स्टिंग कर रही रिपोर्टर को सलाह देते हैं कि घबराने की कोई जरूरत नहीं। तुम यहां पूरी तरह सुरक्षित हो, अपने तमाम बैंक खातों में नाम बदल डालो ताकि पुलिस और कानून से मुक्त हो जाओ । अचरज नहीं होना चाहिए कि भक्ति की आड़ में यहां कई भगौड़ों को आश्रय दिया जाता हो। हर बडे़ शहर में कई बीघा जमीनों पर दिन में भले ही फलों से लदे पेड़ और प्रवचन की ध्वनि सुनाई देती हो, लेकिन रात वहां काली करतूतों का सबब बनकर आती है।
   सवाल ये उठता है कि इस अंधभक्ति की लौ जलती कैसे है? कहां से आता है इतना बड़ा जनसमूह? कैसे पैदा होती है यह श्रद्धा कि बाबा दर्शन दें और हम उनके चरणों में गिरें? क्यों हमारी चेतना एक बार भी यह सवाल नहीं करती कि यह भी हमारी ही तरह हाड़-मांस का पुतला है, इसके आगे क्यों शीश नवाना? गुस्ताखी माफ, लेकिन हम सब ऐसे ही परिवारों से आते हैं, जहां आदर करना, शीश झुकाना संस्कारों के दायरे में आता है। फिर चाहे संबंधित इसके योग्य हो या नहीं। आस्था की लहर हमारे भीतर हमेशा हिलोरे लेती रहती है। इसे भुनाना बहुत आसान है। यह भेड़चाल भी है।
   पच्चीस-तीस साल पहले इंदौर, जयपुर, लखनऊ जैसे शहरों में ऐ से कई सत्संगी संगठनों का जन्म हुआ। पहले पहल तो लोग आपस में ही बातचीत करते कि कथित बाबा के डेरे पर गए हो.. वहां दस पैसे की चाय और चार आने का समोसा मिलता है। दूसरे कहते तुम वहां भी जाना,  बड़ी हरियाली है। शाम को प्रवचन होते हैं। मन को खूब शांति मिलती है। गरीबी, बीमारी और तमाम परेशानियों से जूझ रहा समाज इन डेरों पर जाहिर है काफी राहत महसूस करता। जनमानस इतना भोला और सरल कि इस निजाम (खाने-पीने और व्याख्यान ) को चलाने वाले की एक झलक पाकर धन्य होने लगा। कथित बाबा और बापू के दर्शन में इन्हें अपनी जिंदगी की चुनौतियां कम लगने लगतीं। कइयों को लगता है कि वह तीन साल से बाबा की सेवा में जा रही है और उसकी आर्थिक दशा एकाएक सुधर गई, तो वह भी सपने देखने लगती। इनके सपने पूरे हुए कि नहीं, लेकिन बाबाओं के ठाठ बढ़ते गए। वे खुद को भगवान का दर्जा देने लगे। लोग इनकी तस्वीरों को पूजन कक्ष में जगह देने लगे। जो ये संत और सच्चे गुरु होते, तो कभी गोविंद की जगह नहीं लेते। ये गोविंद से पहचान कराने की बजाय खुद गोविंद बनने की कोशिश में लिप्त हो गए।
  एक बाबा तो बेतुकी बातों से ही कृपा बरसने का हुनर बता रहे हैं। बौराए लोग उस बाबा के खाते में हर रोज पैसा जमा कराने बैंकों में पहुंच जाते हैं। दिमागी बदहाली का ये आलम है कि बाबा कहता है काला ब्रांडेड पर्स रखो, कृपा आनी शुरू हो जाएगी तो स्त्रियां वाकई सा करने लगती हैं। जो समाज इस कदर आतुर है खुद को प्रस्तुत करने के लिए, वहां एक नहीं कई बाबाओं का मार्ग बरसों बरस प्रशस्त है।
   इन हरकतों की पोल खोलने के लिए जब डॉ. नरेंद्र दाभोलकर जैसे वैज्ञानिक सोच वाले इंसान सामने आते हैं तो पुणे में उनकी हत्या कर दी जाती है।  बलात्कार के आरोपी को गिरफ्तार होने में बारह दिन लग जाते हैं, लेकिन वैज्ञानिक सोचवाले व्यक्ति की हत्या हो जाती है। हमारा यही रवैया बता देता है कि हम नेतृत्व के नाम पर कैसे लोगों से घिरे हैं और किस दिशा में जा रहे हैं। इस शिक्षक दिवस पर बस एक ही बात कि आंख मूंद कर किसी पर यकीन मत करो। अंध भक्ति दिमाग की बत्ती गुल होने के बाद ही जागती है।

तुमने तो झुका लिया अकीदत  से भरा सर 
 तख़्त ए शान पर काबीज़ उस काबिल तो हो

Wednesday, July 31, 2013

टंच स्त्रियाँ और चंट राजनेता

आईएएस दुर्गा शक्ति नागपाल 
सांसद मीनाक्षी नटराजन 
अगर जो निलंबन का आधार दुर्गा शक्ति नागपाल की गिराई मस्जिद की दीवार है, जिसके लिए  कोई अनुमति नहीं ली गयी थी तो नेताओं की ऐसी सोच विकास की कौनसी सीढ़ी चढ़ेगी नहीं  कहा जा सकता । यह तो जबरदस्ती उन मुद्दों को हवा देना है जिसकी ओर देश का ध्यान ही नहीं था.  माफिया से राजनेताओं की साँठ-गाँठ  है  जो इस व्यवस्था को और  पंगू बना रही है.एक पढ़े-लिखे युवा मुख्य मंत्री ने यह कार्यवाही कर निराश किया है तो  दूसरे  पढ़े-लिखे मुख्य मंत्री ने मंदसौर की सांसद मीनाक्षी नटराजन को सौ टंच माल कहकर साफ़ ज़ाहिर कर दिया है कि  वे स्त्री के लिए चीज़ और माल से बेहतर कोई  उपाधि नहीं खोज सकते


एक सियासत में अच्छे मुकाम पर हैं, तो दूसरी ब्यू
रोक्रेसी में अच्छे ओहदे पर। करिअर में खुद को ऐसी जगह देखने की ख्वाहिश में कई युवतियां दिन-रात मेहनत कर रही हैं, लेकिन मेहनत की दुनिया से निकलने के बाद होता क्या है? मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के प्रवक्ता महिला सांसद को ' सौ टंच माल' कह देते हैं और दूसरी को उत्तर  प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पद से ही निलंबित कर देते हैं। पहले बात 2009  बैच की आईएएस अधिकारी दुर्गा शक्ति  नागपाल की, जो निलंबन से पहले नोएडा की एसडीएम थीं। जब से वे इस पद पर आई थीं रेत खनन माफिया के खिलाफ उन्होंने एक माह में दो दर्जन से भी ज्यादा चालान कटवाए थे। ये अवैध रेत खनन यमुना और हिंडन नदी के किनारों से होता था। वे उनके डंपर और जेसीबी जब्त  कर लेती थीं। कई अवैध पुल भी उन्होंने ध्वस्त कराए । उनकी इस कार्रवाई से हड़कंप मचा हुआ था। अवैध कारोबार को रोकने के इनाम स्वरूप उत्तर  प्रदेश सरकार ने इस अधिकारी को यह कहकर निलंबित कर दिया कि ग्रेटर नोएडा के गांव कादलपुर क्षेत्र में इन्होंने एक निर्माणाधीन मस्जिद की दीवार गिरा दी। मस्जिद का निर्माण एक निजी जमीन पर हो रहा था, जिसकी कोई अनुमति प्रशासन से नहीं ली गई थी। मुख्यमंत्री से जब पत्रकारों ने पूछा कि एसडीएम का निलंबन  क्यों  हुआ, तो उनका कहना था कि जब हम एक्शन  नहीं लेते, तो आप लोग कहते हैं कि एक्शन नहीं लिया और जब एक्शन  लिया, तो आप कहते हैं सख्त कार्रवाई कर दी।
               दुर्गा शक्ति 
पंजाब कैडर की आईएएस हैं, जो 2011 की यूपी कैडर के अभिषेक सिंह से शादी के बाद उत्तर  प्रदेश आ गई थीं। उन्हें इलाके में एक ईमानदार अधिकारी के रूप में जाना जाने लगा था। उन्होंने एक स्पेशल उडऩ दस्ता बनाया था जो अवैध काम को रोकता था। गौरतलब
है कि मार्च 2012 
में अवैध खनन को रोकने में लगे आइपीएस नरेंद्र कुमार
सिंह की तो मध्य प्रदेश के मुरैना में हत्या ही कर दी गई थी।
                

उधर, दिग्विजय सिंह ने मध्य प्रदेश की मंदसौर जिले की सांसद मीनाक्षी नटराजन को 'टंच माल' कहकर जाहिर कर दिया है कि वे साथी स्त्रियों को किस नजर से देखते हैं। उन्होंने भले ही सफाई दी हो कि उनका इरादा खरेपन और साफ छवि वाली कहने का था, लेकिन मध्यप्रदेश, यूपी, बिहार में सब जानते हैं कि यह किन संदर्भों में इस्तेमाल किया जाता है।  'टंच माल' टिप्पणी  है, जिसका अर्थ दैहिक संदर्भों में है। यह कतई किसी स्त्री की कार्यकुशलता को पूरे अंक देने के लिए नहीं कहा जाता। इन दलों के नेता आपसी बैठकों में लाख कह लें कि बयानबाजी बहुत सोच समझकर की जानी चाहिए लेकिन जब वरिष्ठ नेताओं की  ज़ुबां  ही सार्वजनिक मंचों पर फिसल-फिसल जाती है, तो आमतौर पर क्या  होता होगा इसकी
कल्पना सहज की जा सकती है।
            राहुल गांधी ने मीनाक्षी नटराजन को 2008 
में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति का सचिव नियुक्त किया था। 2009  में उन्होंने मंदसौर सीट से सांसद का चुनाव जीता। इस टिप्पणी  का कारगर विरोध अब तक उनकी ओर से नहीं आया है। उन्होंने कमजोर जवाब दिया कि यह
उनके कामकाज के संदर्भ में की गई टिप्पणी 
थी। यूं भी सियासत में महिलाओं की भागीदारी न के बराबर है और जब ऐसी अवमाननाकारी टिप्पणियाँ  कथित वरिष्ठों की ओर से आएगी, तो हालात समझे जा सकते हैं। हमारे ग्रामीण विकास मंत्री महोदय ने एक वजनी महिला चिकित्सक को रोडरोलर बता दिया और कहा कि इनके पति को पद्मविभूषण मिलना चाहिए इसका क्या अर्थ है ये श्रीमान जयराम रमेश जी ही जाने. पता नहीं क्या उनके मन मे उमड़-घुमड़ रहा था. लेकिन इस सब को बढ़ावा तब मिलता है जब ये चिकित्सक कहती है कि i could read the wit and humour  in his comments and it not be seen as a personal comment on a lady doctor. स्त्री विरोधी टिप्पणी में सबसे पहले चरित्र हनन का सहारा लिया जाता है, दूसरा स्थान देह पर टीका टिप्पणी  का है। अधिकारी, खिलाड़ी कोई इस से बच नहीं पाता। सियासत जिनके हाथ में है, वे अब भी ईमानदार और समर्पण का सम्मान  कर पाना नहीं सीखे हैं।  ये महिलाएं ज़रूर टंच यानी  खरी हैं लेकिन ये  नेता चंट हैं. इन 'सेक्सिस्ट कमेंट्स'  का विरोध जब तक मुखर होकर नहीं किया जाएगा, तब तक बराबरी की बातें केवल किताबी हैं। तरक्की  की सीढ़ी अगर अवमानना के रास्ते से गुजरती हो तो वह अधूरी है

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Wednesday, July 24, 2013

बोतल में बार, बार में डांस

रोजी सबका हक है  फिर चाहे वह नाचकर ही क्यों न कमाई जा रही हो….   बुरा लगता  है  तो इस अनपढ़,बेबस,लाचार आबादी को  काम दीजिये उसके बाद इस पेशे को  जी भरकर कोसिये …मेरी  राय में तो यदि पुरुषों  के नाच में महिलाओं को आनंद आता है तो उन पुरुषों को भी  पूरा हक़ है कि वे अपने पेशे को जारी रखें


बार डांसर्स पर कवर फोटो के लिए जब तलाश शुरू हुई तो किसी भी फोटो पर निगाह ठहर न सकी। इन तस्वीरों में मौजूद बेबसी, लाचारी और दोहराव की मजबूरी को, मोटे मेकअप की परत भी छिपा नहीं पा रही थी। तस्वीरों के किसी भी हिस्से में सुकून नहीं था। ना बार डांसर्स के चेहरों पर और न उन निगाहों में जो उन्हें  देखने वहां आई थीं। नतीजतन, कवर पर ऐसी किसी भी तस्वीर का फैसला तर्क हो गया ।
जाहिर है जिस काम के छायाचित्र ही आप में ऊर्जा का संचार नहीं करते, वह पेशा कैसे जारी रखा जा सकता है? सर्वोच्च न्यायालय को क्योंकर जरूरी लगा कि डांस बारों को बंद करने का महाराष्ट्र सरकार का फैसला गैर-कानूनी था और महाराष्ट्र सरकार को
सा भरोसा क्यों था जो वह मुंबई उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में गई?  दरअसल, मुंबई, पुणे और अन्य शहरों में साल २००5 तक अस्सी हजार से भी ज्यादा बार डांसर्स थीं। अस्सी से नब्बे फीसदी स्त्रियां वहां इच्छा से नहीं मजबूरी से हैं। किसी का पति बीमार है, किसी ने प्रेम में धोखा खाया है, किसी के पास बूढे़ माता-पिता के साथ छोटे भाई-बहनों की जिम्मेदारी है, तो कोई इतनी फुर्ती से अब नहीं नाच सकती जितनी कि फिल्मों की एक्स्ट्रा को नाचना पड़ता है। ये पेशा उन्हें  रोटी देता है। यह काम है उनका, वैसे ही जैसे आप समय पर दफ्तर जाते हैं। बहुत अधिक अवसर थे कि ये सभी किसी चकलाघर में धकेल दी जातीं जहां देह बेचकर उन्हें रोजी कमानी पड़ती। लेकिन बार डांसर्स यहां नाचकर उस जिल्लत से बची हुई थीं।
   सवाल किया जा सकता है कि यही काम क्यों जरूरी है? दूसरी मेहनतकश महिलाओं की तरह वे भी घरों में काम कर सकती हैं, मजदूरी कर सकती हैं। जैनब और मोनिका के बयानों पर गौर कीजिए- 'आपको लगता है कि हम सीधे इस जगह पर आ गए। हम भी काम मांगने ही निकले थे। ज्यादा नहीं पांच- हजार रुपया महीना कमाने की ख्वाहिश थी लेकिन काम ढूंढ़ते-ढूंढ़ते ही हमें यहां तक पहुंचा दिया गया। हमारी गलती यह रही कि हम गरीब, कम पढ़ी-लिखी और जरूरतमंद थीं। यहां कोई परेशानी नहीं। कोई टच भी नहीं करता हम लोग को। बस, इन पुलिसवालों का ही डर सवार रहता है। '
      शायद हमारे देश में किसी भी तरह की रोक या प्रतिबंध से पहले प्रति व्यक्ति आय यानी आम देशवासी की माली हालत पर गौर करना बहुत जरूरी है। एक बड़ी आबादी आज भी कुपोषण, अशिक्षा और खराब स्वास्थ्य के साथ जीने को मजबूर है। रोजगार के अवसर
सी आबादी के लिए ना के बराबर हैं। घरों में काम करने वाली महिलाओं का काम तब तक ही सलामत है जब तक वे काम कर रही हैं। भविष्य तो असुरक्षित है ही वर्तमान भी महंगाई की मार से धुंधला गया है। अंधेरे में चल रहे रोजगारों की तरफ मुडऩा मजबूरी है। हमारे मानदंड दोहरे हैं। हम बड़ी महफिलों में ठुमके लगाने वाली फिल्मी अदाकारों का तो मान करते हैं लेकिन रोजी के लिए नाच रहीं इन स्त्रियों का नहीं। वरना क्या कारण है कि आठ सालों तक थ्री स्टार्स, फाइव स्टार्स में तो डांस बार चलते रहे लेकिन बाकी जगह इन्हें प्रतिबंधित कर दिया गया। 
  सरकार के पास योजनाओं के नाम पर मुफ्त अनाज बांटने जैसी नीतियां हैं। मुफ्त खाना मिलेगा लेकिन रोजगार नहीं। मिड डे मील भी
सी ही योजना है। थोड़ी देर के लिए अच्छा लगता है कि कुपोषित बच्चे भोजन के लालच में स्कूल आएंगे और शिक्षा भी पाएंगे। मुफ्त की ये योजनाएं जाने क्यों चलती भी उतने ही उन्मुक्त तरीकों से हैं। हम किन सरकारी महकमों को अपनी जिम्मेदारियों के लिए उत्तरदायी बना पाएं हैं जो यहां सा हो पाता? न आप और ना योजना बनाने वाले  इस भोजन को खा सकते हैं तो कैसे उम्मीद करते हैं कि यह अभियान सफल होगा। उन्हें काम मिले आर्थिक सहयोग मिले, यह तो समझ में आता है ताकि वे अपने हिसाब से अपने भोजन की आवश्यकता पूरी कर सकें लेकिन कोई कैसे बेस्वाद भोजन को रोज निगल सकता है। बिहार के छपरा में वह स्कूल कब्रिस्तान में बदल चुका है। मौत की यह सरसराहट पूरे देश में फैल गई है। दुनिया की इस सबसे बड़ी मिड डे मील योजना के हर निवाले में शंका पसर गई है। न खाकर भी मौत है और खाकर भी मौत। हर भारतीय को सम्मानजनक रोजगार मिले इसके लिए आजाद भारत को और कितने साल लगेंगे? चुनावी साल में सब देश को बांटने की बयानबाजी में लग गए हैं। इन मुद्दों पर क्यों कोई अपना विजन नहीं रखता?

Wednesday, July 17, 2013

इश्क़ करूँ या करूँ इबादत इक्कोइ गल है


 मिल्खा सिंह ने चोरी-चकारी के जीवन को तज कर दौड़ जीतने के लिए जिस मेहनत  से  इश्क़  किया वही जज़्बा  और जूनून राकेश ओम  प्रकाश मेहरा की टीम ने भी रचा  है 

"जब से देश आजाद हुआ है, तब से
केवल पांच एथलीट ओलंपिक्स
 
के
फाइनल मुकाबलों में पहुंचे हैं लेकिन
मेडल कोई नहीं जीत पाया। मैं,
गुरुजीत सिंह रंधावा, पीटी उषा, राम
सिंह और अंजू बॉबी जॉर्ज। मैं जब तक
जिंदा हूं मेरी आंखों में एक ही सपना
रहेगा कि भारत का तिरंगा वहां
लहराता देखूं" - मिल्खा सिंह

 

 अठहत्तर  साल के मिल्खा सिंह यानी
भारत के वो एथलीट, जिन्होंने जान
की बाजी लगाकर पसीना बहाया।
कई बार तो इतना कि मुंह से खून
बनकर निकला। सारी दुनिया को
लगता था कि चार सौ मीटर का
गोल्ड मेडल तो मिल्खा ही
जीतेंगे , क्योंकि उन्होंने ८० में से ७७
दौड़ें अपने नाम की थीं, लेकिन सेकंड
के सौंवे हिस्से से मिल्खा चूक गए।
ओलंपिक का पदक उनके हाथ से
निकल गया और एक अफसोस
उनके भीतर हमेशा के लिए पैबस्त हो
गया।
मिल्खा के पास जब निर्देशक
राकेश ओमप्रकाश मेहरा आए, तो
उनके गोल्फर बेटे जीव मिल्खा सिंह
ने कहा कि पापा अगर आप पर कोई
फिल्म बनाए, तो ये ही बनाएं,
मैंने इनकी रंग दे बसंती देखी है।
गौरतलब है कि स्वयं मिल्खा सिंह ने
१९६० से कोई फिल्म नहीं देखी।
उन्हें नहीं मालूम कि कौनसे एक्टर
इन दिनों अच्छा और खराब काम कर
रहे हैं। मिल्खा सिंह के शब्दों 
में- इस
बच्चे 'फरहान अख्तर' ने बहुत
मेहनत की है। मैं चाहता था कि
फिल्म ऐसी 
बने कि लोग उठ खड़े हों
और भारत की झोली में मेडल आएं।
दरअसल, भाग मिल्खा भाग फिल्म
महज तीन घंटे का प्रवाह भर नहीं,
बल्कि ऐसा
तूफान है, जो आपके साथ
लंबे समय तक रहता है। दर्शकों को लगता है कि
वह सिनेमा हॉल में
नहीं स्टेडियम में हैं, क्योंकि  वैसी ही
सांसें रुकती हैं और तालियों की गडग़ड़ाहट वहां गूंजती है। फिल्म
से पहले फरहान को लगता था कि वे दौड़ लेंगे लेकिन जब उनके ट्रैक
एंड फील्ड कोच मैल्विन ने उन्हें दौड़ते हुए देखा, तो कहा कि कोई
भी धावक ऐसे 
  नहीं दौड़ता। यह
ट्रेड 
मिल की दौड़ है। भाग मिल्खा भाग जिंदगी का ऐसा चित्र है, जिसे
देखकर पता चलता है कि एक एथलीट किस कदर हार्डवर्क और समर्पण की
मिसाल होता है। पसीना उसका गौरव रचता है। मिल्खा सिंह कहते हैं, जब
मैं पाकिस्तान में दौड़ा, तो स्टेडियम में मौजूद दस हजार बुर्कानशीनों ने बुर्का
उतारकर मुझे देखा। यही नायकत्व है कि दुश्मन देश को आप बंदूक के
जोर पर नहीं, बल्कि अपने कौशल पर आत्म समर्पण करने को मजबूर कर
दें। खिलाड़ी के जोश-ओ-जुनून के साथ भाग मिल्खा भाग इसीलिए न्याय कर पाती है, क्योंकि 
इसके निर्देशक राकेश ओमप्रकाश मेहरा भी खेलों की
दुनिया से आते हैं। नई दिल्ली, १९८२ के एशियन गेम्स
में वे तैराकी टीम के सदस्य रहे थे। मिल्खा अगर कहते हैं  कि मैं मौत को तली में ले के आगे बढ़ा हूं, तो राकेश ओमप्रकाश मेहरा की टीम ने भी एक ऐसी  फिल्म रची है, जो यकीनन नए खिलाडि़यों को प्रेरित करेगी। अभिनव बिंद्रा ने जब ओलंपिक्स में स्वर्ण पदक पहना था, हर भारतवासी का सीना चौड़ा और दिल भर आया था।
ब्ले
जर पर लिखा इंडिया खिलाड़ी को किस कदर
रोमांचित करता है यह फिल्म बताती है। बाल्टीभर पसीना, आय एम नॉट रिलेक्सिंग 
आय एम मिल्खा सिंह। टूटी गेंद में लिखे प्रेम पत्र, एथलीट फरहान का भुजाएं फड़काने वाला डांस, बचपन के दोस्त का पाकिस्तान में रहते हुए मौलवी के यहां बड़ा होना, बड़ी बहन का प्यार शंकर-एहसान-लॉय के संगीत पर प्रसून जोशी के थिरकते बोल फिल्म को अलहदा बनाते हैं। मिल्खा सिंह की नजरों के सामने ऐसे  बायोपिक का बन जाना मायने रखता है।  क्या उडऩपरी पीटी उषा के साथ भी ऐसा  होगा? वे भी सेकंड के सौवें हिस्से से मेडल चूक गई थीं।
अंत में जिस बात को मिल्खा सिंह कोट करते हैं, वही आपके
  लिए
मत घबरा तू तूफानों से 

ये तो चलते हैं तुझे ऊपर उठाने के लिए

Saturday, July 13, 2013

xxx और 00 !! आप नहीं समझेंगे



चौदह जुलाई को किया जानेवाला तार भारत का अंतिम तार होगा , इसी के साथ १ ६ ० साल पुरानी  यह तकनीक हमेशा के लिए अलविदा कह देगी 

ह समय तार को शोक संदेश भेजने का
है। आज  के बाद तार इतिहास
बनकर रह जाएगा। वह तार जिसका
अतीत वाकई सुनहरे लफ्जों में लिखा
है। इतना सुनहरा कि इसके बारे में
जानते-समझते हुए आपका दिमाग
रोशन होता हुआ मालूम होता है। संदेश
भेजने की भूख इंसान में हमेशा से रही
है। इमारतों से निकलते धुंए  , दूत, नगाडे़, कबूतर, बोतल में रखी
चिट्ठी से भी जब इंसान का मन शांत
नहीं हुआ, तो वह सुनियोजित डाक की
ओर मुड़ा। खत वक़्त  लेते थे और आवाजाही
की बेहतर व्यवस्था ही इन्हें सुगम
बनाती थी, लेकिन तार विद्युत तरंगों से
उपजी ध्वनि को पढऩे की तकनीक थी।
गर्र गर्र..गट्ट गट्ट.. की आवाज से
ट्रेंड टेलीग्राफिस्ट मैसेज को नोट करता
था। अगर जो संदेश ००० श्रेणी का है,
तो वह पहली प्राथमिकता के साथ भेजा
जाता। संदेश आते ही तुरंत 'बॉय
पियन' को आवाज दी जाती थी। वह
दौड़ता हुआ आता था । उसकी उम्र 16 से
20 तक की होती थी ताकि स्फूर्ति से दौड़ सके, संदेश रिकॉर्ड में
दर्ज होता और मैसेंजर तुरंत उसे गंतव्य
तक पहुंचा देता । यह २४ घंटे की सेवा थी। तार घरों
में ही डोरमैट्रीज बनी होती थी, जहां तार
बाबू आराम कर सकते थे । ओवर टाइम
तो लगभग हर कर्मचारी के हिस्से आता
था। डबल एक्स  मैसेज के तहत मृत्यु के
संदेश आते थे, जो भी प्राथमिकता के
तहत डिलीवर होते थे। सेना, सरकार
और मौसम से जुडे़ संदेश ००० के तहतहोता
ही भेजे जाते थे।
०००  बेहद ज़रूरी सन्देश अंग्रेजों का स्थापित यह
नेटवर्क इतना जबरदस्त था कि गलती
करने वाले पर तुरंत एक्शन  होता था।

मैसेज आते ही रिसीवर अपना नाम दर्ज
करते थे। रिसीविंग का टाइम और
डिलीवरी का टाइम बकायदा नोट होता
था और जो इसमें कोई चूक हुई, तो
सख्त कार्यवाही तय थी।
इंडियन टेलीग्राफ डिपार्टमेंट में वर्ष
१९६६ में जब एक २१ साल का नौजवान
शामिल हुआ, तो वह सचमुच वाकिफ
नहीं था कि आखिर वह किस विभाग से
जुड़ रहा है। ट्रेनिंग पीरियड के दौरान
जब अधिकारियों ने कहा कि वे दुनिया
की एक श्रेष्ठ सेवा और बेहतरीन विभाग
से जुड़ रहे हैं, तब भी नौजवान को
यकीन नहीं हुआ। उनके वरिष्ठ का
कहना था कि हालांकि तार अपना श्रेष्ठ
समय देख चुका है, लेकिन अभी भी
इसके जलवे कुछ समय बरकरार
रहेंगे। नौजवान ने ट्रेनिंग के दौरान ही
जान लिया कि यदि आप बुद्धिमान हैं और
आपको अपना सौ फीसदी देना आता है
तो आप कामयाब हैं, क्योंकि  संचार की

इस दुनिया में गलती की कोई गुंजाइश
नहीं थी और एक सिपाही की तरह ही
मोर्चा संभालना होता था। शायद किसी भी
सेवा को बेहतर बनाना काम के दौरान
हो रही गलतियों को समझने के साथ ही
हो सकता है और टेलीग्राम में गलतियों
की कोई माफी नहीं थी, वे बाकायदा
दर्ज होती थीं।
इस नौजवान ने १९८० तक तार का
जलवा देखा था उसके बाद आई संचार
क्रांति में फोन बेमिसाल साबित हुए। वैसे
नौजवान का अनुभव यह भी कहता है
कि आप तो आज तेज गति से संदेश आदान-प्रदान
करते ही हैं,हम भी जब कई बार जब मोर्स

तकनीक से संदेश पढ़ते हैं, तो भेजने
वाले की गति और समझ के हिसाब से
ही दूसरे स्टेशन पर बैठे बंदे का नाम
जान जाया करते थे। कभी-कभार जब
संदेश का दबाव नहीं होता, तो हम मित्रों
से यूं ही मोर्स पर बात किया करते। यह
आज की चैटिंग ही थी। नौजवान २००६
में इस विभाग को अलविदा कह चुका
है। भले ही आपको उन्हें अब भी नौजवान
कहना मुनासिब ना लगे, लेकिन इन
चालीस बरसों में ही उन्होंने बीस साल
तार को दौड़ते हुए देखा, तो आखिरी
बीस साल हांफते हुए। इस मैराथन में
विजयी रहे, क्योंकि विभाग ने उनके
फख्र में हमेशा इजाफा किया। वक़्त  के
साथ तकनीक और तकनीक के साथ
संचार भी हमेशा बदलेगा, लेकिन अगर
कोई विभाग इंसान के जुनून और आत्म
स्मान को कायम रख पाता है, तो यही
उसकी सार्थकता है। तार विभाग अब
तक औपचारिकता पूरी करने के लिए
चल रहा है। बेशक यह संचार की
मजबूत नींव रहा, लेकिन अब ये तार
आज के जमाने से सुर-ताल
नहीं मिला पा रहा। अलविदा तार। तुम
याद रहोगे।
illustration courtesy : HINDU


Sunday, July 7, 2013

सलाम तो सीधे खुदा को जाता है



क्यों करता है वह सलाम
और क्यों ऊंचा हो जाता है मेरा कद
रोज़ मेरे आस-पास ऐसा ही होता
फिर एक दिन अचानक
मेरे ही पाले से आती है एक आवाज़
सलाम हुज़ूर!!
सलाम बजानेवाला चौंक उठता है
ये मेरी आवाज़ में कौन बोला
मेरा सुर इस कंठ
में कैसे गूंजा


 .....तभी से मैं और वह हो लेते हैं
इस आवाज़ के साथ
जो कहता है
मैं कहूं, तुम कहो क्या फर्क पड़ता है
न कहने वाला छोटा
न लेने वाला बड़ा

सलाम तो सीधे खुदा को जाता है .

Wednesday, July 3, 2013

तीसरा तेरह साल बाद

शाहरुख खान और गौरी खान के घर तीसरी संतान अब्राहम का आगमन हुआ है। यह उनका सरोगेट बेबी है यानी जैविक रूप से वे दोनों ही बच्चे के माता-पिता हैं, लेकिन उसे जन्म देने वाली यानी नौ माह कोख में रखने वाली मां कोई और है। इस मामले में सरोगेट मां की भूमिका गौरी की भाभी नमिता छिब्बर ने अदा की है। बच्चे का जन्म समय से दो माह पहले ही हो गया और उसे मुंबई के प्रमुख अस्पताल की इंटेसिव केअर युनिट में रखना पड़ा। पूरी देखरेख डॉ. इंदिरा हिंदुजा की रही, जिन्होंने १९८६ में   देश के पहले टेस्ट ट्यूब बेबी का जन्म करवाया था। शाहरुख-गौरी के दो बच्चे पहले ही हैं। बेटा आर्यन पंद्रह साल का है और बेटी सुहाना तेरह साल की। शाहरुख पर इलजाम है कि उन्होंने अपने तीसरे बेटे का लिंग परीक्षण पहले ही करा लिया था।
अभिनेता शाहरुख से जब पत्रकार इस मसले पर बात करना चाहते हैं, तो वे चुप्पी साध लेते हैं और उन्हें अब्राहम की बजाय अपनी नई फिल्म चेन्नई एक्सप्रेस के बारे में बात करना ज्यादा सुहाता है।
बहरहाल, शाहरुख खान के निजी मसलों पर न्यायाधीश बनने का कोई इरादा नहीं है, लेकिन सवाल उठता है कि ऐसे फैसले आखिर उनके चाहने वालों को क्या संदेश देते हैं। माता-पिता, एक बेटा और बेटी शायद यही अवधारणा है पूरे परिवार की। दो बेटे या दो बेटियों वाले परिवार भी उतने ही खुशहाल हो सकते हैं, लेकिन अगर कोई जोड़ा दोनों को पालने का सुख पाना चाहता है, तो यहां वह भी पूरा होता था। सैंतालिस बरस के शाहरुख लिंग परीक्षण के बाद तीसरी संतान पैदा करते हैं। वे किसी अनाथ बच्चे को गोद नहीं लेते। ठीक वैसे ही सोचते हुए लगते हैं, जैसे कोई धनी  व्यवसाई अपने अम्पायर को संभालने के लिए खुद का वारिस चाहता हो। वह भी बेटा। आज जब देश में आबादी सबसे गंभीर चुनौती बनकर सामने आ रही है, वहीं हमारे स्थापित कलाकार तीसरे बच्चे का संदेश देते हैं। हो सकता है की आप निजी टूर पर कई बच्चों  पलने की कुव्वत रखते हों लेकिन संसाधनों को बढ़ने की क्षमता तो  आप में नहीं है न ?
कभी-कभार लगता है कि हमारे ये कथित हीरो इस बात से बेखबर हैं कि उनके किए-धरे को उनके प्रश्संक देखते हैं। अमिताभ बच्चन अपनी होने वाली बहू की शादी पहले एक पेड़ से कराते हैं। यह उनका अनहोनी टालने का एक प्रयोजन होता है। फिर पोता होगा या पोती के संदर्भ में उनकी सारी प्रतिक्रियाएं पोते को केंद्र में रखकर ही आती हैं। हमारे देश में जहां आज भी लड़कियां गर्भ में ही गिरा दी जाती हैं, वहां ये स्टार्स अपने कद का ध्यान रखते हुए संयत नहीं हो सकते? 
          एक अठारह साल की लड़की सौम्या मिली थी पिछले दिनों। कह रही थी मैंने आमिर खान के सत्यमेव जयते का हर एपिसोड  देखा। सभी मुद्दे जरूरी थे, लेकिन  जब वे अंतरधार्मिक प्रेम के मुद्दे को लेकर आए, तो मैं समझ ही नहीं पाई कि मैं किसे ध्यान में रखकर उनकी बात समझूं। उनकी पहली पत्नी रीना को लेकर या दूसरी किरण। वे जब बच्चों के साथ ज्यादातियों की बात कर रहे थे, तो मैं सोच रही थी कि वे किसके लिए ज्यादा संजीदा होंगे पहली शादी के दो बच्चों से या फिर दूसरी शादी से जन्में बेटे आज़ाद का ? सौम्या का कहना था कि सेलिब्रिटीज का बहुत असर हम पर पड़ता है। वे जो करते हैं उसका तो और भी ज्यादा। सौम्या कहती हैं, मैं इनसे ज्यादा सुष्मिता सेन का सम्मान कर पाती हूं, जो दो अनाथ बच्चियों को अपनी बेटी की तरह पाल रही हैं।
अठारह साल की सौम्या उनमें से हैं, जो सफल लोगों के निर्णयों को पूरी गंभीरता से जज करती हैं। वह खुद कोई फैसला नहीं सुनाती, लेकिन गौर करती हैं कि पब्लिक के पैसों पर बड़ा साम्राज्य बनाने वाले अपने लोक दायित्वों के प्रति कितने जिम्मेदार हैं। वह नेताओं के साथ बिजनेसमैन और बॉलीवुड के तोप सितारों को भी इसी कैटेगिरी में रखती हैं, जो संकट के समय सही निर्णय लेने की बजाय या तो खूब बोलते हैं या फिर परदे के पीछे चुप्पी साध लेते हैं। नेता उसे खूब बोलने वाले और सितारे उसे चुप्पे लगते हैं। उत्तराखंड त्रासदी का पहाड़ सर पर टूटा  है, पर बहुत कम हाथ उस ओर बढ़े हैं।
पहाड़ों पर टूटा है कैसा कहर आज
खामोश हैं पहाड़-सा कद रखने वाले

Friday, June 21, 2013

मैंने चाहा था ख़ुशबू को मुट्ठी में कैद करना


ख़ुशबू
मैंने चाहा था ख़ुशबू को मुट्ठी में कैद करना
ऐसा कब होना था
वह तो सबकी थी
उड़ गयी
मेरी मुट्ठी में रह गया वह लम्स
उसकी लर्ज़िश
और खूबसूरत एहसास
काफ़ी है एक उम्र के लिए 


  

 नासमझी
 

अक्सर दुआओं में उठे
तुम्हारे हाथ देखकर,
मैं कहती
इनकी सुनना मौला
मैं नासमझ नादाँ
कहाँ समझ पाई थी
कि तुम्हारी
हर अरदास
हर अर्ज़
हर इबादत
में मैं थी.
काश, कोई एक सजदा
कभी अपने लिए भी किया होता तुमने ..
.

Wednesday, June 12, 2013

ग़ैर मुल्क में कोई अपना

यह चेहरा है अमेरिकी  नागरिक  एडवर्ड स्नोडेन का , जो अमेरिका  की  सुरक्षा एजेंसी(एनएसए) में कार्यरत हैं। उनतीस साल के  एडवर्ड का अच्छा खासा जॉब है लेकिन रक्षा विभाग में काम क रते हुए उन्हें लगा कि   सुरक्षा के  नाम पर अमेरिका उन करोड़ों नागरिकों  की  निजता का  हनन कर रहा है, जो गूगल, फेसबुक स्काइप, यू ट्यूब, माइक्रोसॉफ्ट, एप्पल, याहू जैसी साइट्स पर सक्रिय  हैं। अमेरिकी  सुरक्षा एजेंसियों की  पहुंच इन्हें चलाने वालों के सर्वर तक है। इन कम्पपनियों के  संचालक भले ही कहते फिरें कि  हमने अमेरिकी  सरकार से इन सूचनाओं को  साझा नहीं किया है, लेकिन एडवर्ड स्नोडेन की माने, तो उनके  जमीर ने यह गवारा नहीं किया कि  हर गैर-अमेरिकी का  निजी खाता महज इसलिए अमेरिकी  सरकार के  पास हो, क्योंकी  उन्हें अपनी सुरक्षा की  चिंता है।  
अचरज की  बात है, लेकि न सच्चाई यही है कि  आप अपनी मासूमियत के  चलते जो भी इन सोशल नेटवर्किंग  साइट्स पर साझा करते है, वह अमेरिका  को  मालूम है। एडवर्ड ने जब इसे उजागर किया, तो उन्हें अमेरिका  छोडऩा पड़ा। उन्हें मालूम हो गया है कि  उनका  यह कदम देशद्रोह की  श्रेणी में रखा जा सकता है। एडवर्ड ने इन दिनों हॉन्गकोंग़  में शरण ले रखी  है और खुद को  एक  होटल में कैद क र लिया है।अपनी पहचान ज़ाहिर करने की इच्छा भी उन्ही की है .
       
जाहिर है कि  अमेरिका  को  जब भी लगेगा कि किसी व्यक्ति की टिप्पणी, तस्वीर, सरकारी कामकाज में दखल है या उसकी रीति-नीति के  अनुरूप नहीं है, तो वह दुनिया के  किसी भी हिस्से में हो उसकी  गिद्ध निगाहों में है। हम भारतीय जो इन पोर्टल्स पर उछल-उछलक र अपने इरादे जाहिर करते रहते हैं वे सब खुफिया निगाहों में हैं। आपके  प्रणय निवेदन,  तस्वीरें, ख़त  सब पर खोजी निगाहें हैं।
यह भी सामने आया है कि  ये तमाम डीटेल्स व्यावसायिक कम्पनियों के  साथ भी साझा किए गए हैं। मत भूलिए कि  जी-मेल खुलते ही आपसे अकसर फोन नंबर मांगता है। कई-कई बार। बार-बार पूछे जाने पर एक  बार तो आप ट्रैप में आ ही जाते हैं। अगर आपका  फोन नंबर मेल में है, तो किसी  भी बंदे के  स्मार्ट एन्ड्रॉइड फोन खरीदते ही आपका  ई-मेल फोन नंबर सहित उसके  फोन में अपडेट हो जाता है, फिर चाहे आपने कभी औपचारिक  काम  के  लिए ई मेल क्यों न कि या हो। काम का नंबर गायब और अनचाहे नंबर मोबाइल में पसर जाते हैं . ये सौदेबाजी व्यावसायिक  स्तर पर तो आपको  इस्तेमाल करती ही है लेकि न एडवर्ड के  खुलासे के  बाद तो सुरक्षा के नाम पर गैर-अमेरिकी  कभी भी जाल में फंस सकते हैं।
अमेरिकी  नीतियों का  विरोध आपको  महंगा पड़ सकता है। मित्रों, इतना मत चहचहाओ, क्योंकि  ये न हमारे देश का  सर्वर है और न हमारे देश का  को ई कानून वहां चलने वाला है। ये मार्केटिंग का  दौर है। आपकी  हर इच्छा के दाम हैं और इस पर नियंत्रण बाजार का  है। घर, गाड़ी, पॉलिसी खरीदने की इच्छा प्रकट की जिए बाजार में लोग जाल बिछाए बैठे हैं। कहां से आते हैं इतने संदेश आपके  मोबाइल पर। यहां से लोन लीजिए, यहां से दुनिया की  सैर   कीजिए, इस रेस्त्रां में चले आइए, खरा सोना यहां मिलेगा जैसे तमाम संदेसे आपको  इस छोटे से डिब्बे में अनचाहे ही मिलते रहते हैं। किसी भी मॉल में जाइए, लकी  ड्रॉ के  नाम पर पर्ची-पेन लेकर बंदे तैनात हैं। वे इनाम तो क्या देंगे, लेकि न आपकी  निजी जानकारी जरूर हथिया लेंगे , जो आपने लकी  ड्रॉ की  उम्मीद में उन्हें सौंप दी है। यह पहला कदम है जो आप अज्ञानता के  चलते बढ़ा देते हैं। सोशल नेटवर्वर्किंग  साइट्स भी इसी फंडे पर अपना व्यापार चलाती हैं।
अमेरिकी  अखबार में यही सब छप रहा है इन दिनों। जॉर्ज बुश के  समय से यानी २००७ से प्रिज्म नामक यह अभियान चला हुआ है,जिसमें लोगों की  निजी जानका री चुरा ली जाती है। बराक ओबामा के  शासन काल में थोड़ी-सी पूछताछ के  बाद भी यह यथावत है। लोग पूछ रहे हैं कि  किस स्तर तक आपने हमारी जानकारियां जुटाई हैं। ये तकनीक वाकई इनसान को मशीन बनाने पर ही तुली हुई है । न खुलो न खिलो। मन की बात, किसी सरकारी नीति की  आलोचना  आपको महंगी पड़ सकती है। आप शिकंजे में हैं। आपके जाहिर होने में बहुत  नुकसान   है।
और तो और हमारे देश के तो सरकारी कामकाज भी इन्हीं साइट्स पर चल रहे हैं।
   फर्ज कीजिए कि  आप उठते-बैठते किसी साए की  निगाहों में हों, तो कैसा लगेगा। मुमकिन है कि  आप इस परिस्थिति से भाग जाना चाहें। मानव सामाजिक  प्राणी होकर भी आजादी का  पैरोकार है लेकिन इस बार तकनीक का  रूप धरकर आए अंग्रेज ने हमें फिर से गुलाम बना लिया है। हम लट्टू होकर जाहिर हुए जा रहे हैं, बगैर ये जाने कि  ये किसी ग़ैर मुल्क  के  गुप्त बहीखातों में जमा हो रहा है।
दीवाना है अहमक लिखे जा रहा है आभासीय कागज़ों पर
नहीं जानता कि  कभी यही लफ्ज बरसेंगे बारूद बनकर 

ps : बताया जा रहा है कि  एडवर्ड हांगकांग की उस होटल से गायब हैं 

Thursday, May 23, 2013

जॉली वुमन


बात  ऐसी स्त्री की जिसने अपनी माँ को स्तन कैंसर से मरते हुए देखा और जब जाना कि उनके अन्दर भी वही जीन है तो उन्होंने स्तन ही हटवा लिए . यह फैसला मशहूर हॉलीवुड अदाकरा एंजलीना जॉली का है . क्या वाकई यह एक जॉली वुमन का सहस से भरा  निर्णय है जिससे दुनिया की तमाम स्त्रियों को एक दिशा मिलेग। किसी अंग को महज आशंका में यूं कटवा देना बीमारी का बर्बर इलाज नहीं ?.
 हॉलीवुड अभिनेत्री एंजलीना जोली के
इस निर्णय का  विरोध ·रते हुए एक
अमेरिकी  शिक्षिका  ने ·हा है कि  वे
अमीर हैं, उनके  पास सारी सुखसुविधाएं
हैं, उनकी  देखभाल के  लिए लंबा-चौड़ा स्टाफ मौजूद है इसलिए वे
महंगी सर्जरी करा सकती हैं। एंजलीना
के  इसे उजागर करने से मेरी जैसी
कई  मध्यमवर्गीय परिवारों को  बेहद
तकलीफ हुई है क्योंकि हम इस खर्च
का  भार नहीं उठा सकते। मेरी मां को
भी कैंसर था और मेरे अंदर भी
बीआरएसी 1 जीन हो सकता है  लेकि न

मैं परीक्षण को करा पाने में सक्षम नहीं।
ऐसा कहने  वाली डे.बी जेंटाइल न्यू
जर्सी में नन्हें बच्चों को  पढ़ाती हैं।
एंजलीना ने जिस न्यू यॉर्क टाइम्स
अखबार में लिख कर अपने स्तन
हटवाने की  घोषणा की  है बाद में उसी
अखबार के  संपादक ने भी लिखकर
इस बात स्वीकारा है कि एंजलीना
का सच पूरे अमेरिका का  सच नहीं हो
सकता।
सवाल यह उठता है कि  सिर्फ
आशंका  में आप इतना बड़ा निर्णय कैसे
ले सकते हैं? एंजलीना के  मुताबिक
जिस ब्रेस्ट कैंसर का  खतरा पहले 83
फीसदी था वह अब घटकर  पांच फीसदी रह गया है। यह पांच फीसदी
.क्या है जो बच गया है? अगर सिर्फ
आशंका  के  चलते इतना कुछ हुआ है तो
यह हमारे साथ क ब नहीं होती। घर से
चलते वक्त से रात को  सोने तक  हर
पल हम आशंकित हैं। फिर भी मानव अपने हौसलों से जीता है।  मनुष्य को शुरुआत में हर फल चखने से
पहले आशंका  ही हुई होगी लेकिन फिर
भी उसने चखा होगा। उसी का  नतीजा
है की  आज हमारे पास खाद्य और
अखाद्य की  लंबी फेहरिस्त है। रहस्यों  से
angelina jolly
आवरण हटाते हुए इंसान ने जो
खूबसूरत दुनिया अपनी अगली पीढ़ी
  को दी वह बेहतर से बेहतर होने की
ओर थी। आज भी वही सब हो रहा है
लेकिन आज सब तकनीक  और
आधुनिक  विज्ञान के हवाले कर दिया
गया है जो की  सिर्फ चंद समर्थ लोगों
की  पहुंच में है। वह एक ऐसा निजाम रचती
हैं कि  जो समर्थ नहीं है वह भी उसी
दिशा में प्रवृत्त  हो। सिलेब्रिटी को कुछ
होना और फिर उसका सुनियोजित
प्रचार क हीं ज्यादा आशंकाओं को  जन्म
देता है।
एंजलीना ने अपने लेख को  काफी
भावनात्मक  रंग में रंगा है। यह लेख
एक  सामान्य स्तंभ की  तरह अखबार में
जगह पा गया ऐसा  नहीं है। अखबार के लिए भले ही यह रहस्योद्घाटन
ब्रेकिंग  न्यूज हो लेकिन एंजलीना के  हर
शब्द पर कई बार विचार हुआ होगा।
वैसे एंजलीना ने कहाँ कैसे और कब
 इसे कराया। यह सब लेख में है। वे लिखती हैं उनकी  मां
दस साल तक कैसर से लड़ते हुए 56
साल में चल बसीं और नवासे-नवासियो
को  अपने वात्सल्य की  छाया
नहीं दे पाईं। एंजलीना ने लिखा है कि
कम अज कम उनके बच्चों को  यह डर
नहीं है कि  उनकी मां भी एक  दिन ब्रेस्ट
कैसर से मर जाएगी।
यहां यह ·कहना बिलकुल भी ठीक
नहीं होगा कि  एंजलीना जैसी
परिस्थितियों से घिरने पर हरेक को
मैस्टैकटॉमी यानी स्तन हटवा लेने
चाहिए। यह जीन वाकई जिन्न होता है
यह निजी हालत पर ज्यादा निर्भर
 रता है। सैंतीस वर्षीय एंजलीना के
हालात से अमेरिकी स्त्रियों की  तुलना
नहीं हो सकती और भारतीयों की  तो
बिलकुल भी नहीं। आशंकाओं का
बिजनेस बहुत बड़ा है। इसके मायाजाल
को  समझना जरूरी है। दुनिया के
ज्यादातर शोध आशंकाओं  पर ही होते
है। मनुष्य इतने बरसों से दीर्घायु जीवन
कैसे जीता रहा इस पर नहीं होता। कम
जांच, कम दवाएं   कैसे काया को  निरोगी
रख सकती हैं इस बारे में बताने वाला
कोई नहीं। यह धंधा बड़ा विचित्र है।
पहले परीक्षण, फिर स्तन हटवाना और
अंत में उन्हें नए सिरे से इम्प्लाट कराना
बड़ा निवेश मांगता है और अब तो
एंजलीना उससे जुड़ गई हैं। दुनिया
हॉलीवुड की  इस मूवी स्टार को  पसंद
करती है। उनके नेक कामों के चर्चे पूरी 
दुनिया में पहले ही हैं। उन्होंने
अफगानिस्तान में स्कूल  खोले हैं। यूएन
की  वे गुडविल एंबेसेडर रही हैं। कहा
जा स·ता है कि  बीआरएसी1 जीन ने
भी एंजलीना को  अपना ब्रांड एंबेसेडर
चुनने में कोई देरी देरी नहीं की है । वे 37 की  हैं
और इसी उम्र के  आसपास ब्रेस्ट कैंसर
का खतरा भी सर्वाधिक  होता है। आम
महिला को  कतई एंजलीना के पदचिन्हों
पर चलने की  जरूरत नहीं है।  अन्य कैंसर  की  तुलना में
ब्रेस्ट कैंसर  का सर्वाइवल रेट 93
प्रतिशत है। जोली का  यह कहना ठीक
नहीं  कि  मेरे केस से अन्य महिलाओं
को  प्रेरणा मिलेगी। जीवन को
चिकीत्स्कीय  झंझटों में डालकर आगे
बढ़ाने की  बजाय बेहतर है कि  उसे
कुदरती बनाया जाए क्योंकि  हम हैं तो
आखिर माटी के  ही पुतले।

Wednesday, April 24, 2013

गुड़िया भीतर गुड़ियाएं

हम सब गुस्से में हैं। हमारी
संवेदनाओं को एक  बार फिर
बिजली के नंगे तारों ने छू दिया है।
हम खूब बोल रहे हैं, लिख रहे हैं
लेकिन  कोई नहीं बोल रहा है तो
वो सरका र और
कानून व्यवस्था
  के लिए  ज़िम्मेदार लोग। खूब
बोल-लिख कर  भी लग रहा है कि
क्या यह काफी है ? कोई हल है हमारे पास कि  बच्चों
का  यौन शोषण न हो और बेटियों
के  साथ बलात्कार का  सिलसिला
रुक जाए। ऐसी जादू की  छड़ी किसी कानून के पास नहीं लेकिन
कानून लागू करने वालों के  पास
एक शक्ति है वह है इच्छा शक्ति।
ईमानदारी से लागू करने की  इच्छा
शक्ति। हमने किसी  भी सरकारी
मुखिया को  सख्ती से यह कहते
नहीं सुना कि  बहुत हुआ, अब और
नहीं। मेरे देश, मेरे प्रदेश में इस
तरह का कोई  भी अपराध बर्दाश्त
नहीं किया जाएगा। हर मुखिया
बचता नजर आता है। बयान आते
हैं पुलिस क्या करे वह हर दीवार,
हर कौने की  चौकसी नहीं कर
सकती; दुष्कर्म एक सामाजिक
अपराध है; कोई भी सरकार हो,
इलजाम तो सरकार पर ही लगते
हैं; ऐसे उबा देनेवाले बयानों की
लंबी फेहरिस्त है। कोई सख्त
आवाज नहीं गूंजती कि ऐसे
वहशियाना कृत्य को  अंजाम देने
वाले दरिंदों को  बख्शा नहीं
जाएगा। ऐसा  कोई संदेश जब
ऊपर से नहीं आता तो नीचे वाले
अपने आप ही मुक्त हो जाते हैं ।
दरअसल, हमारा समाज अब भी
की  मानसिकता में नहीं है। क्या
हुआ लड़के  ने जोर जबरदस्ती की
चलो शादी कर दो इन दोनों की ।
आज भी यही हल दिखाई देता है
बलात्कारियों का । इसकी  पुष्टि
पकडे़ गए आरोपी मनोज के घर
से भी होती है। दिल्ली में पांच
साल की  बच्ची से दुराचार करने
वाले मनोज ने अपनी पत्नी के
साथ भी यही हरकत की  थी।
पंचायत ने फिर उनका  ब्याह करा
दिया। अपनी साली के  साथ भी
यही व्यवहार दोहराया था और पांच
साल की  मासूम से पहले भी वह
न जाने कितने बच्चों को  अपना
शिकार बना चुका  हो। जरूरी नहीं
कि  इसमें बेटियां ही हों। बेटे भी तो
हो सकते हैं। लड़कों के  माता-पिता
को कतई बेखौफ होने की
जरूरत नहीं।
हम इस अपराध को  अपराध
ही नहीं मानते शायद तभी हर
लड़की  का  अपने जीवन में ऐसे कई अपराधियों से सामना होता
है। घर, छत, गली, थिएटर,
बाथरूम, यहां तक कि  पूजा स्थलों
पर भी ऐसे शिकारी घात लगाए
बैठे होते हैं। लड़की खुद को बचने में  ऊर्जा खर्च
करती हैं वहीं ये दुराचारी अपनी
कुचेष्टाओं को  धारदार बनाने में
लगे रहते हैं। यह जितना प्रचलित
है उतनी ही प्रचलित है घरवालों
की लापरवाही। हर लड़की को  यह
घुट्टी पिला दी जाती है कि  चुप रह,
ज्यादा शोर न मचाना। दुष्कर्मी
पहला शिकार परिवार से ही ढूंढता
है और जब परिवारों की चुप्पी  उसे
शह देती है तो वह निरंकुश हो
जाता है।
इन घटनाओं को  लड़कियों
की  इज्जत से जोड़कर देखा जाता
है। अपराध सहते रहो तो इज्जत
बरकरार है और ज्यों ही आवाज
उठाई वह तार-तार हुई। यह कैसी
इज्जत है जो चुप्पी  से चलती है।
हरकत करने वाला बाइज्जत बरी
और लड़की  बेइज्जत। अभी भी
कई जगह लिखा जा रहा है कि
गुडि़या की  अस्मत की कीमत
पुलिस ने दो हजार रुपए लगाई।
पुलिस की  यह भूमिका  बड़ी रोचक
है। जो पेशकश   अपराधी की  ओर
से होनी चाहिए थी वह पुलिस की
ओर से हो रही थी यानी
अपराधी-पुलिस भाई-भाई।
पांच साल की  गुडिय़ा अकेली
नहीं है। गुडिय़ा भीतर कई
गुडिय़ाएं हैं असंख्य अपराधियों से
घिरीं। एक  समय था डायन, सती,
विधवा प्रताडऩा, नाता जैसी कई
कुप्रथाओं से घिरा था समाज।
राजा राममोहन राय, दयानंद
सरस्वती जैसे समाज सुधारकों  ने
लंबी लड़ाई लड़ी। यह लड़ाई
मुसलसल यानी लगातार जारी
रहनी चाहिए थी। आज उस
भूमिका  में कोई नहीं रह गया है।
दुष्कर्म, अपचार जैसी सामाजि·
बुराईयां बढ़ी हैं। यह दो
राजनैतिक  दलों के  लचर बयानों
से नहीं जानेवाली। इन दलों का
लक्ष्य समाज को  स्वस्थ और
मजबूत बनाने का  नहीं बल्कि सत्ता
प्राप्ति का  है। इनसे और इनके
सिस्टम से न्याय मिलेगा इसमें
संदेह है हर भारतवासी को .

Sunday, April 21, 2013

जान मेरी

जान मेरी
जाने किस पड़ाव पर हूँ ज़िन्दगी के
कोई वाक़या नहीं
कोई मसला नहीं
कोई सिलसिला नहीं
कोई इल्तजा नहीं
कोई मशवरा नहीं
कोई एतराज़ नहीं 
कोई ख़लिश नहीं
कोई रंजिश भी नहीं
है तो बस मोहब्बत की वह  पाक सुराही
छलक  रहा है जहाँ से
 रंग  सुकूं अब भी मेरे लिए .