Wednesday, September 26, 2012

रिश्ता अब फ़रिश्ता सा है

रिश्ता अब फ़रिश्ता सा है
बहुत करीब बैठे भी बेगाने से  हैं
एक  पीली चादर बात करती हुई सी है
बाल्टी का रंग भी  बोल पड़ता है कई बार
वह बांस की टूटी ट्रे भी  सहेजी हुई  है
 बाबा की पेंटिंग तो रोज़ ही रास्ता रोक लेती है  
उन खतों के मुंह सीले हुए से  हैं
वह ब्रश, वह साबुन, सब बात करते हैं
किसी  के खामोश होने से
कितनी चीज़ें बोलती हैं
मुसलसल

मैं भी बोलना चाहती हूँ तुमसे
इतना कि हलक सूख जाए
और ये सारी बोलियाँ थम जाए
मेरी इनमें कोई दिलचस्पी नहीं

तुम बोलो या फिर मुझसे ले लो इन आवाज़ों को समझने का फ़न.

Friday, September 21, 2012

तुम्हारे बाजू में























तुम नहीं थे
तुम थे
तुम नहीं हो
 तुम हो
तुम्हारे होने या न होने के बीच
मैं कहाँ हूँ
ठीक वहीँ, जहाँ तुम हो
तुम्हारे बाजू में   .

मैंने तुम्हें
न खोया
न पाया
न लिबास के रंग बदले

इस आने - जाने पर
न धातुएं ओढ़ी 
न माथा  ही रंगा
फिर ये किस रंग  में रंगी हूँ मैं?
तेरा है ये  रंग
तेरी रूह  पैबस्त है  मेरे भीतर

...और रूह कहीं नहीं आती-जाती
जिस्म आते -जाते हैं |

Tuesday, September 18, 2012

हिंदी में ही करता है साइकल का पहिया पानी की कुल्लियां

 हिदी दिवस पर भी देरी का शिकार है मेरी यह पोस्ट ,उम्मीद है यह आपके कीमती समय का शिकार नहीं करेगी वैसे , कोई इरादा नहीं है कि हिंदी ही बोलने पर जोर
दिया जाए या फिर अंग्रेजी की आलोचना की जाए। हिंदी बेहद काबिल और घोर
वैज्ञानिक भाषा है जो खुद को समय के साथ कहीं भी ले चलने में सक्षम है। क
से लेकर ड तक बोलकर देखिए तालू के एक खास हिस्से पर ही जोर होगा। च से ण
तक जीभ हल्के-हल्के ऊपरी दांतों के नीचे से सरकती जाएगी और व्यंजन बदलते
जाएंगे। ट से न तक के अक्षर तालू के अगले हिस्से से जीभ लगने पर उच्चारित
होते हैं। सभी व्यंजनों के जोड़े ऐसे ही विभक्त हैं।
हिंदी इतनी उदार है कि उसने हर दौर में नए शब्दों और मुहावरों को शामिल
किया। अरबी से तारीख और औरत ले लिया तो फारसी से आदमी आबादी, बाग, चश्मा
और चाकू। तुर्की से तोप और लाश, पोर्चूगीज से पादरी, कमरा, पलटन और
अंग्रेजी के तो अनगिनत शब्दों ने हिंदी से भाईचारा बना लिया है। डॉक्टर,
पैंसिल, कोर्ट, बैंक, होटल, स्टेशन को कौन अंग्रेजी शब्द मानता है।
अंग्रेजी हमारी हुई, हम कब अंग्रेजी के हुए।
हिंदी भाषा पर इतने फक्र की वजह, बेवजह नहीं है। हाल ही जब अंग्रेजी में
पढ़ी-लिखी अपने मित्रों और परिचितों में हिंदी की ओर लौटने की जो
व्यग्रता दिखी वह विस्मय से भर देने वाली थी।  ve एक बेहतरीन ब्लॉगर
हैं। नॉर्थ ईस्ट की शायद ही कोई परंपरा या त्योहार होता होगा जो  unकी
कलम से छूटा हो। देश-विदेश में उसके कई पाठक हैं। अंग्रेजी में लिखा जा
रहा उसका यह ब्लॉग बहुत लोकप्रिय है। अचानक वह ब्लॉग से यह कहकर नाता
तोडऩा चाहती है कि उसे कुछ तलाश है। वह हिंदी में बात करना चाहती हैं।
हिंदी लिखना चाहती हैं। हिंदी फिल्मी गीतों और पहाड़ की लोकधुनों पर
नाचना चाहती हैं। अपने नन्हे बच्चों को बताना चाहती हैं कि उसकी मां की
जड़ें कहां हैं। अपने पति से पूछती हैं, क्यों यह मध्यवय का संकट तो
नहीं। उनके पति हंसकर कहते हैं, तुम बहुत प्यारी हो।एक और प्रोफेसर हैं जिनकी अंग्रेजी ने उन्हें बेहतरीन मुकाम
दिलाया है लेकिन वे भी चुपके से कभी बच्चन तो कभी सर्वेश्वर दयाल
सक्सेना, पड़ोसी देश की सारा शगुफ्ता और परवीन शाकिर को गुनती रहती हैं।
उन्हें हिंदी में रस आता है। इतना कि वे खुद कविताएं करने लगती हैं।
अंग्रेजी ने उन्हें सब कुछ दिया है लेकिन उनकी मूल पहचान कहीं गुम कर दी
है। हिंदी, हिंदीयत और हिंदुस्तानी होने का सुख छीन लिया है। ये दोनों
अपने मर्ज को पहचान गई हैं। लेकिन हममें से कई अब भी लगे हुए हैं उस दौड़
में जिसका नतीजा हमारा सुकून छीन लेगा। अंग्रेजी माध्यमों के इन स्कूलों
में पढऩे वाले बच्चे इस भाषा को सीखने में इतनी मेहनत करते हैं कि अगर यह
सब उनकी अपनी भाषा में हो तो वे आसमां छू लें। अभी उन्हें पचास फीसदी इस
भाषा को देना पड़ता है। केले को बनाना, कद्दू को पंपकिन बोलते-बोलते ये
बच्चे खिचड़ी का भी अनुवाद ढूंढने लगते हैं। कोई पूछे उनसे कि गुलजार जब
लिखते हैं -
बारिश आती है तो मेरे शहर को कुछ हो जाता है

टीन की छत, तिर्पाल का
छज्जा, पीपल,पत्ते पर्नाला सब बहने लगते हैं
तंग गली में जाते-जाते साइकल
का पहिया पानी की कुल्लियां करता है......

अब भला कोई बताए तिर्पाल , पीपल और कुल्लियों का अनुवाद क्या होगा।
अंग्रेजी जाने क्या दे रही है लेकिन हमसे हमारी पहचान जरूर अलग कर रही है
और कुछ समझदार लोग इसे वक्त रहते पहचान लेते हैं लेकिन कई अवसाद से घिरने
लगते हैं। यह ऐसा अवसाद है जो किसी मनोचिकित्सक की पकड़ में नहीं आता
जबकि हमने पूरी जनरेशन को इसकी चपेट में लाने का कार्यक्रम बना दिया है।
हिंदी महज भाषा नहीं हमारी जड़ है। जड़ में मट्ठा तो नहीं ही पडऩा चाहिए।

Thursday, September 13, 2012

गोविंद से पहले



इससे पहले की हिंदी दिवस दस्तक दे ज़रूरी है कि शिक्षक दिवस पर लिखा आपसे साझा कर लिया जाए. देरी से पोस्ट करने की मुआफी के साथ

तीसरी-चौथी कक्षा में हिंदी की पाठ्य पुस्तक  में एक कथा का शीर्षक  था
आरुणी की गुरुभक्ति। वह ऋषि धौम्य के  यहां शिक्षा प्राप्त करता था। एक
रात खूब बारिश हुई। आश्रम पानी से भर न जाए यह देखने के लिए वह खेतों पर गया। ऋषि धौम्य गहरी नींद में थे। आरुणी ने देखा कि खेत की मेड़ का एक हिस्सा टूट रहा है। उसने बहुत कोशिश की मेड़ की मिट्टी को फिर से जमा दे लेकिन तेज पानी उसे बहा ले जाता था। आरुणी पानी रोकने के लिए वहीं लेट गया। मेड़ पर लेटते ही पानी का बहाव रुक  गया। तड़के जब ऋषि की आँख  खुली तो आरुणी को ना पाकर वे चिंतित हुए। खेत में ढूंढ़ते हुए पहुंचे तो आरुणी वहां तेज बुखार के साथ सोया हुआ था। गुरुजी को सामने पाकर उसने पैर छू लिए और गुरुजी ने यह सब देख उसे गले से लगा लिया।
क्या था यह? शिष्य को मिली शिक्षा या शिक्षक के प्रति उपजी स्वत:स्फूर्त
श्रद्धा। दरअसल, ये दोनों थे। शिक्षक  का मान करना ही है , इसे लेकर कोई
दुविधा नहीं थी लेिकन श्रद्धा, भक्ति के भाव निजी तौर पर पनपते हैं।
शिक्षक का आचरण, व्यवहार, पेशे के प्रति लगाव कई बातें सम्मान के लिए
जिम्मेदार होती हैं। आज थोड़ी खाई सी नजर आती है । आज उनका मान करने की अनिवार्यता भी नहीं। धन नियंत्रित इस शिक्षा व्यवस्था में हर चीज के दाम हैं। अच्छी शिक्षा अच्छा दाम बाकी सब तमाम। सवाल किया जा सकता है कि यह अच्छी शिक्षा कैसे हुई?

रामायण काल हो या महाभारत का समय। गुरु वशिष्ठ और गुरु द्रोण ने
राजघरानों को ही संपूर्ण शिक्षा दी। एकलव्य इस शिक्षा से वंचित ही रहा।
गुरु द्रोण की मूर्ति सामने रख दिन-रात अभ्यास के साथ जब वह धनुर्विद्या
में पारंगत हो गया तब द्रोणाचार्य ने उसका अंगूठा ही गुरुदक्षिणा में
मांग लिया। यह कैसा गुरुत्व था? गोविंद से पहले गुरु को प्रणाम करने वाली संस्कृति में गुरू का स्थान बहुत ऊंचा है।  स्वयं भगवान कृष्ण
ने भी गुरु सांदिपनी  का सम्मान अक्षुण्ण रखा। उज्जैन में कृष्ण-बलराम और उनके बाल सखा सुदामा के गुरु सांदिपनी का आश्रम आज भी है।
तब स्त्री शिक्षाकी अवधारणा जरूर रही होगी लेकिन परंपरा नहीं थी। आज ना केवल बेटियां शिक्षा पा रही हैं, पढ़ाने का बीड़ा भी उन्होंने ले रखा है।

कालांतर में तक्षशिला और नालंदा शिक्षा के बड़े केंद्र बने। पूरी दुनिया
से विद्यार्थी यहां शिक्षा प्राप्त करने आते थे। तक्षशिला विभाजन के बाद
अब पाकिस्तान का हिस्सा है। इस शानदार विरासत को युनेस्को ने विश्व की  बेशकीमती  धरोहर माना है। इस प्राचीन उच्च शिक्षा केंद्र  में सोलह की उम्र के  बाद दाखिला दिया जाता था। सैन्य, चिकि त्सा , खगोल कई विषयों की पढ़ाई यहां होती थी। स्वयं चाण्क्य इस केंद्र के शिक्षक  थे। चीनी यात्री फाह्यान यहां आए थे उन्होंने लिखा है कि यह बेहतरीन निजाम था जहां सोलह हजार विद्यार्थी साथ शिक्षा पाते थे।
पांच सितंबर डॉ.सर्वपल्ली राधा कृष्णन, भारत  के  दूसरे राष्ट्रपति का
जन्मदिन। वे शिक्षक  थे। बहुत कुछ बदल गया है। अब स्टूडेंट  टीचर के
दोस्त हैं। कम अज कम सोशल नेटवर्क  पर तो वे यही प्लेटफॉर्म साझा कर रहे हैं।  आपसी सम्मान बरकरार रखते हुए यह मंच बेहतर
नतीजे दे सकता है। खासकर, अन्तर्मुखी बच्चों के लिए यह टीचर से संवाद का अच्छा जरिया है। समस्याएं वहीं आती हैं जहां दोनों के बीच संवादहीनता है। बोलने से कई गिरहें खुलती हैं। इस रिश्ते की सबसे बड़ी अपेक्षा अगर ज्ञान है तो शिष्य को विनयशील होना ही होगा . एक विनयी शिष्य ही शिक्षक के भीतर ज्ञान की थाह ले सकता है . गंडा बंधने की परंपरा का आशय ही यह है कि गुरूजी हम आपकी सेवा में हाज़िर है बस आपकी कृपा हो.

Thursday, September 6, 2012

नकली है कविता मेरी


 मौत तक नहीं पहुँचती कविता मेरी

हाथ कांपते हैं मेरे
डर जाती है देह मेरी
उस मंज़र को दोहराने में 
शांत और निश्छल मुकाम नहीं छूना चाहती कविता मेरी
उसे ज़िन्दगी और मुस्कान चाहिए
ऐसी कुर्बत चाहिए कि हवा भी ठहर जाए
उसे आंसू और मातम से डर लगता है
चुप्पी उसे घेरती है 
सन्नाटा चीरता है 
मौन तोड़ देता है...

नकली है कविता मेरी
वह सिर्फ मोहब्बत के तराने गाती है.