Thursday, July 26, 2012

रंग ए उल्फ़त

सोच रही हूँ मेरे तुम्हारे बीच
कौन सा रंग है
स्लेटी, इसी रंग की तो थी कमीज़
जो  पहली  बार तुम्हें
तोहफे में दी थी
तुमने उसे पहना ज़रूर
पसंद नहीं किया .
लाल, जब पंडित ने कहा था
लड़की से कहना यही रंग पहने...
हम दोनों
को रास नहीं आया ख़ास
पीला, तुम्हारे उजले रंग में खो-सा जाता था 

गुलाबी,  में तुम्हे छुई-मुई लगती
तुम ऐसे नहीं देखना चाहते थे मुझे
सफ़ेद, में तुम फ़रिश्ता नज़र आते
यह लिखते हुए एक पानी से भरा बादल घिर आया है
हरा और केसरिया
इन पर तो जाने किन का कब्ज़ा हो गया है
नीला
यही,यही तो था
जिस पर मेरी तुम्हारी युति थी
नीले पर कोई शक शुबहा नहीं था हमें
फ़िदा थे हम दिलों जान से .

अब ये सारे रंग मिलकर काला
बुन देते हैं मेरे आस-पास.
मैं हूँ कि वही इन्द्रधनुष बनाने पर तुली हूँ
 जो था हमारे
आस-पास
नीलम आभा के साथ  |

Tuesday, July 24, 2012

यूं ही दो ख़याल

प्रेम 
तुम थे तो थी
 जिद 
तकरार 
अनबन 
उलझन 
केवल तब ही था 
संगीत 
सृजन
हरापन 

...और बस तब ही 
तब ही तो हुआ था मुझे प्रेम |


हिचकी नहीं सिसकी 

अरसा हुआ

कोई हिचकी नहीं आई उसे 
जुबां भी नहीं दबी 

दाँतों के नीचे

बस, याद.... 


शायद,

हिचकी अब 

सिसकी हो गयी है |


Wednesday, July 11, 2012

हमें अफ़सोस है पिंकी प्रमाणिक


लेकिन ख़ुशी  है कि लिंग प्रमाणित  होने से पहले तुम्हारी ज़मानत हो गयी


पिछले दिनों हम सबने एक खबर पढ़ी कि
एशियाई खेलों की स्वर्ण पदक विजेता
एथलीट पिंकी प्रमाणिक पर पश्चिम बंगाल
के 24 परगना क्षेत्र में एक स्त्री ने आरोप
लगाया कि वह एक पुरुष है और उसके
साथ दुष्कृत्य करने की कोशिश की।
खबर ने चौंका दिया कि एशियाई
एथलेटिक्स जैसी स्पर्धाओं में स्वर्ण पदक
विजेता महिला के महिला होने पर ही
संदेह हो गया है। लगा था कि पुलिस और
अस्पताल मिलकर जल्दी ही परिणाम दे
देंगे लेकिन यह इतना आसान नहीं था।
एक लाइन की पुख्ता  खबर किसी को
नहीं मिली है कि पिंकी का जेंडर क्या  है।
इस बीच इस एथलीट के साथ कई
अनाचार हुए। उन्हें पुरुषों की जेल में
रखा गया। पुलिस ने उनके साथ
दुर्व्यवहार किया और लिंग परीक्षण के
मेडिकल मुआयने के दौरान उनका
एमएमएस भी बनाकर लीक कर दिया
गया। शायद, यही सोचकर कि यह तो
पुरुष की देह है, क्या फर्क पड़ता है,
लेकिन दो मिनट ठहरकर विचार कीजिए
कि जिसने पूरी जिंदगी खुद को स्त्री माना
हो और वैसी ही पहचान रखी हो उसे
यकायक आप कैसे बदल सकते हैं। वह
कैसे प्रस्तुत हो सकती है इस बदले हुए
व्यवहार को झेलने के लिए?
अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन के
जर्नल में हाल ही प्रकाशित शोध में एक
बात स्पष्ट है कि किसी का लिंग निर्धारित
करना आसान नहीं है। यह मुश्किल है,
महंगा है और कई बार सही भी  नहीं होता
है। हार्मोन और शरीर के अंगों का
विकास स्त्री-पुरुष में बहुत ज्यादा अंतर
नहीं रखता। दोनों के शरीर में यह
मामूली अंतर पर भी हो सकता है यानी
एक स्त्री में कई बार मेल हार्मोन ज्यादा
हो सकते हैं और कई बार एक पुरुष में
फीमेल हार्मोन। स्त्री और पुरुष को
सीधे-सीधे अलग करना इतना आसान
नहीं। स्त्री कोमल और पुरुष सख्त  जैसा
कोई खाका लिंग निर्धारण में मायने नहीं
रखता। टॉम बॉइश लड़की और लता से
नाजुक लड़के हम सबने देखें  हैं। जेंडर तो
वैसे ही बदला जा सकता है जैसे लीवर,
किडनी या दिल। अर्जेंटीना एक ऐसा देश
है जहां व्यक्ति  अपना जेंडर खुद चुनते हैं
फिर चाहे वे खुद जो भी हों
। वहां के
नागरिक को अपना जेंडर अपनी मर्जी से
चुनने का हक है। वह जो कहेगा वही
माना जाएगा।
एक बात जो महसूस होती है कि
हमारे यहां खेल केवल क्रिकेट है। इसके
अलावा किसी खेल की कोई इज्जत
हमारे दिल में नहीं है। हमने आठ सौ और
चारसौ मीटर में एशिया की पदक विजेता
का अपमान करने में कोई कसर नहीं
छोड़ी। ओलंपिक्स शुरू होने में एक
पखवाड़े का समय शेष है, लेकिन
भारतीय खेलों की दुनिया में बहुत
आशावादी माहौल नहीं है। लॉन टेनिस में
किसका जोड़ीदार कौन हो यही तय नहीं
हो पाता। बहरहाल, पिंकी की गरिमा
अक्षुण्ण रखने की बातचीत का यह अर्थ
नहीं कि उन पर इलजाम लगाने वाली की
सुनवाई ही ना हो। बेशक,फरियाद सुनी
ही जानी चाहिए, लेकिन जांच से पहले ही
पिंकी के साथ बदसलूकी नहीं होनी
चाहिए। सोलह जुलाई तक रिपोर्ट आ
जाएगी। कोई भी आरोपी जांच से पहले
तक निरपराधी है। पिंकी ने जिस जेंडर के
साथ जिंदगी जी है, उसका सम्मान  करना
ही सबका फर्ज है। विजेता खिलाडिय़ों के
अकाल पड़े देश में खिलाड़ी की इतनी
अवमानना तो कभी नहीं होनी चाहिए।

Wednesday, July 4, 2012

जयपुर के अदबी ठिकाने और एक किताब

किताबों के लिए हमारे हृदय में पूजा
भाव है। सर माथे लगाते हैं हम उन्हें।
कभी गलती से पैर भी लग जाए तो
पेशानी से लगा लेते हैं, जैसे माफी
मांग रहे हों। क्यों न हो रामायण,
कुरान शरीफ, बाइबल और गुरुग्रंथ
साहब, सभी किताबें ही तो हैं। लिखे
शब्दों का हम सभी एहतराम करते हैं
,पूजते हैं। इन ग्रंथों को बड़ी पवित्रता
के साथ शुद्ध कपड़ों में लपेटकर रखने
वाले  हम सभी ने देखे हैं। जाहिर है हम
किताबों को इज्जत देने वाला समाज
हैं। यहां से चलकर किताबें किस होड़
में शामिल हो गई हैं, यह किसी से
छिपा नहीं है। एक पूरा मार्केट है जो
लेखक और लेखन की पैकेजिंग
करता है। कुछ ऐसे भी हैं जो बहुत
कम दाम में ज्यादा किताबें पढ़ाने का
बीड़ा उठाए हुए हैं। कुछ ऐसे भी
लेखक हैं, जिन्हें लगता है अगर दो
साल में एक किताब ना निकली तो
व्यर्थ है जिंदगी, फिर चाहे उस किताब
से जिंदगी के तत्व कोसों गायब हों।
खैर, इस चिंता में ना पड़ते हुए पिछले
दिनों जिस किताब से नजरें मिली
उसका जिक्र।
किताब की दुकान किसी हीरों
की दुकान-सी लगती है। हीरे तिजोरी
के अंधेरे को रोशन कर देते हैं तो नई
किताब दिमाग के अंधेरे में रोशनी का
उजास फेंकती हुई। यूं हमारे शहर में
कई अदबी ठिकाने हैं, जहां से पुस्तक
प्रेमी किताबें लाते रहते हैं और
पसंदीदा किताब ना मिले तो तुरंत मंगा
देने की अर्जी लगाकर लौट आते हैं।
किताब तक पहुंचना इतना आसान
नहीं  क्योंकि  ये बुक स्टोर्स पूरे शहर में
नहीं। कुछ ऐसा भी नहीं जहां जाकर
तसल्ली से पढ़ा जाए और पसंद आने
पर खरीद लिया जाए। पंसारी की
दुकान की तरह सामान बंधवाने जैसा
हाल ही है किताबों का। जयपुर में एक
शांत और सुंदर ठिकाना है, जो इस
कमी को पूरा करता है। अधिकांश
किताबें यहां अंग्रेजी की होती है, हिंदी
का पाठक थोड़ा दबा-दबा ही महसूस
करता है यहां। यूं भी देखा गया है कि
किताबें पढऩे का जुनूं वहीं हावी होता
है, जहां जेब मुई खाली होती है।
सरस्वती के साथ चलने पर लक्ष्मी ने
कब आशीष दिए हैं।
बहरहाल, इसी ठिकाने के हिंदी
हिस्से में झांकते हुए विकि आर्य का
कविता संग्रह 'धूप के रंग' नजर आता
है। आवरण पर घोंघे की पृष्ठभूमि में
गुमसुम स्त्री की आकृति। भीतर के
पन्नों पर कई स्केचेस शब्दों से यारी
निभाते हुए। सभी कविताएं
शीर्षकहीन। आवरण, रेखाचित्र
शब्द सब उत्तरांचल  की दून घाटी में
जन्में विकि आर्य के ही। पेंगुइन से
2007 की प्रकाशन तिथि। चंद सतरों पर गौर करें
सोचा था
लिखने बैठूं तो
भर जाएंगे सफे
दुनिया के,
पर कहा तो
 दर्द भी
प्रेम की ही तरह
 बस... ढाई आखर
निकला

 एक और कविता
लोग तो लहसुन से हैं

खुलते नहीं
एक फांक भी।
और मैं- जैसे प्याज  कोई
जो, हर
परत खुलकर
न जाने 
क्या-  क्या कह कर
निर्वसन
सा हुआ जाता है।

प्रेम से भरा कवि
 

घर, आंगन, कमरा, छत, दीवारें
कोने बिस्तर जंगले...
चादर, पर्दे, खिड़की पल्ले...
सब कहीं तुम हो
मैं कहां हूं?/ पता मेरा है,
दरवाजे पर नाम मेरा है
सुना है घर मेरा है...
पर हर तरफ तुम हो/ मैं कहां हूं?
 

जीवन से जुड़े नियंत्रण पर कवि
 

कोरी कॉपियां जो/
बच्चों को थमाई
जाती हैं।/लकीरे 
क्यूं उनमें
पहले
खिंची होती हैं?
केवल उडऩा ही

 काफी नहीं होता
 
क्या?
हर पतंग भला 
क्यों
मांझे से जुड़ी
होती है?
 

विकि आर्य की एक कविता फेसबुक
पर साझा की तो साठ से भी ज्यादा
मित्रों ने पसंद का चटका लगाया,
लेकिन उन्हें जानने वाला कोई नहीं
मिला। कवि-कथाकार उदय प्रकाश
का लिखा सच मालूम होता है कि जब
मशहूर कलाकार जोशुआ बेल ने
वाशिंगटन के मेट्रो स्टेशन पर
वायलिन बजाई तो कोई नहीं ठिठका
सिवाय बच्चों के। उनके खचाखच भरे
कंसर्ट में टिकट की कीमत सौ डॉलर
होती है 
क्योंकि वहां लोग जानते हैं यह
एक मशहूर वायलिन वादक है। यूं श्रेष्ठ
संगीतज्ञ को सुनने की फुर्सत किसी
को नहीं है। कला और लेखन को भी
प्रचार की बैसाखी लगती है शायद।