Friday, April 27, 2012

मेरी कुड़माई में


 मेरी कुड़माई  में 
मुझे मिले थे
माटी के गणेशजी
और एक लकड़ी की कंघी 
वही जो आदिवासी लड़का
लड़की को देता है 
मैं भी हो गयी थी तेरी
 सदा के लिए.
क्या कोई मंतर था 
 मिटटी और लकड़ी के टुकड़ों में 
या थी वो नज़र 
जो  सिवाय भरोसे  के
 कुछ और देती ही नहीं थी.



समझ रही हूँ  मिटटी-लकड़ी
देने का सबब
सच, तुम्हारी निगाहें
बहुत दूर तक  देख  लेती थीं .

Tuesday, April 24, 2012

खांकर बजती है राह बनती है


अपने जीते जी मैं कभी शृंगार नहीं
करूंगी लेकिन अंत्येष्टि के समय वे
मुझे सजा देंगे। वसीयत में साफ-साफलिख देने पर वे ऐसा नहीं करेंगे
क्यूं लिखूं मैं? करने दो उन्हें, जिंदगी
में एक बार मैं खूबसूरत लगूंगी -वेरा पावलोवा

 वेरा रूसी कवयित्री हैं, जो शायद
अपने सादगी पर फिदा हैं और इसी
को ही अंतिम सांस तक कायम


रखना चाहती हैं। कोई  ख्वाहिश नहीं
सुंदर दिखने की फिर भी एक
ख्वाहिश कि मरने के बाद भी
खूबसूरत लगूं। सुंदर दिखना हम में
से हरेक की चाहत होती है, लेकिन
क्या सुंदरता केवल लिबास और
अंगों की होती है। मुझे तो छतीसगढ़
के बस्तर जिले में जगदलपुर
के पास कोटमसर गांव की वह
आदिवासी स्त्री भी बहुत खूबसूरत
लगती है जो सड़कों पर धान फैला
रही होती है और वह मेवाती स्त्री भी
जो अलवर के गांव में प्याज़  उगा
रही है। उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल
की वे स्त्रियां भी जिन्होंने अपने दम
पर खोए हुए वन फिर से विकसित
कर लिए हैं। अपने पुरुषों का
पलायन रोक दिया है। उन्होंने अपना
पानी, अपना चारा, अपना ईंधन तो
पाया ही है, अपना स्वाभिमान भी
ऊंचा रखा है। वे बारी-बारी से इस
वन की रक्षा करती हैं। इसके लिए
उनके पास एक लाठी है। इसके
ऊपरी सिरे पर बड़े आकार के दो-
चार घुंघरू लगे हैं। इस असाधारण
लाठी का नाम है खांकर। खांकर
लेकर वे निकल पड़ती हैं। नीरव
 चुप्पी के बीच जब कदम चलते हैं
और खांकर बजते हैं तो बेहद
संगीतमय राह बनती है, जो आगे
खड़ी स्त्री की खांकर से जुड़ जाती
है। शाम को वन की रखवाली के
बाद जब ये स्त्रियां लौटती हैं तो
खांकर किसी और के दरवाजे पर
रख देती हैं। इसका मतलब है कि
कल उन्हें वन की रखवाली करनी
है। बाईस बरसों से जारी यह
सिलसिला दूधातोली (पौड़ी गढ़वाल)
के 136 गांवों को आत्मनिर्भर बना
चुका है। वन के पनपने से पानी की
समस्या भी नहीं रही है। पानी
संरक्षित होने लगा है तो जंगल में
लगने वाली आग भी नियंत्रित हुई है।
जंगल में आग की तरह कुछ फैल
रहा है तो वह है वन संरक्षण का
संदेश। उल्लेखनीय है कि
मध्यप्रदेशन शासन ने 2011 का
प्रतिष्ठित राष्ट्रीय गांधी सम्मान
दूधातोली लोक विकास संस्थान को
प्रदान किया है। ये स्त्रियां बहुत ही
सुंदर और सुगढ़ हैं। वैसी ही भव्य
और आकर्षक है जैसे कोई शास्त्रीय
नर्तकी अपने नृत्य और अभिनय से
कोई जादू जगा रही हो।
अंग्रेजी में कई पत्रिकाएं
निकलती हैं, जिनके चमकीले और
चिकने पन्ने एक तरफ कॉस्मेटिक
आइटम के विज्ञापनों से रंगे होते हैं
तो दूसरी ओर भव्य रजवाड़ी वैभव
का प्रदर्शन करती वहां की महिलाएं
होती हैं। रजवाड़ों के साथ आजकल
नए औद्योगिक रजवाड़े भी पनप गए
हैं। वहां भी स्त्रियों के लिबास और
ब्रांड के
ब्योरों के अलावा कुछ नहीं
होता। खबर होती है कि अंबानी
बहुएं जो कभी पारंपरिक परिधानों में
ही नजर आती थीं, अब पश्चिमी
परिधानों में भी सार्वजनिक कार्यक्रमों
में शामिल होने लगी हैं। उन्होंने
अपना वजन भी काफी घटा लिया है।
बीबीसी पर खबर थी कि हैलो
नामक अंतरराष्ट्रीय पत्रिका अब
पाकिस्तान से अपना संस्करण शुरू
करने जा रही है। जाहिर है यहां भी
धनी लोगों की नकली मुस्कानों की
नुमाइश लगेगी। इनकी वार्डरोब में
झांककर आम 
शख्स भी दर्जियों के
यहां दौड़ते फिरेंगे। रजवाड़ों की
विरासत पर जमीं धूल हटेगी और
मैगजीन के पैर जमेंगे। गरीब मुल्क
के संघर्ष की दास्तां की गुंजाइश इन
पन्नों में नहीं है।
बहरहाल, सुंदरता के पैमाने
चाहे जो हों, पसीना बहाकर निखरी
कुंदन आभा के आगे जिम में निखरी
देह की तस्वीरें सूनी और नकली ही
मालूम होती है। बेहतरीन लाइट
इफेक्ट्स के साथ छपी इन तस्वीरों
में दूधातोली की पहाड़ी स्त्री और
जगदलपुर की आदिवासी स्त्री की
पेंटिंग-सा जादू नहीं हो सकता है।
वेरा धन्य हो तुम जो तुमने अंतिम
सांस तक अपना वजूद कायम रखने
की ठानी है, मशहूरी के बावजूद देह
की नहीं दिल की सुनी है।

[मनोज  पटेलजी   की अनुदित कविता उनके ब्लॉग  पढ़ते-पढ़ते से साभार है ]

Sunday, April 15, 2012

हम भरे-भरे ही हैं दोस्त

उसने कहा मुझसे 
फिर क्यों नहीं 
मैंने कहा 
प्याला रीतता  ही नहीं 
ख़ालीपन के 
एक निर्वात 
दो आंसूं 
तीन हिचकियों 
चार बातों 
और अनगिन यादों 
के बाद 
फिर भर उठता है 
अजब जादूई मसला है
कभी मैं रीतती हूँ 
तो प्याला मुझे भर देता है 
और प्याला रीतता है तो मैं 
हम भरे-भरे ही हैं दोस्त.

Sunday, April 1, 2012

अच्छे लोग मेरा पीछा करते हैं



अच्छे लोग मेरा पीछा करते हैं

ढूंढ ही लेते हैं मुझे आखिरकार  
बावजूद कि मैं हद दर्जा
बेपरवाह 

ज़िन्दगी का सबसे कीमती तोहफा
भी ऐसे ही मिला मुझे 
मैं बेखबर  वह कुर्बान 
मैं जड़ वह चैतन्य  
मैं सुप्त वह जाग्रत
मैं ठूंठ तो वह हरा वट  
मैं तार वह सितार   
मैं  बुत  वह  प्राण   
मैं  इंतज़ार वह इश्क़ 

तेरा लाख शुकराना मेरे रब
दे तौफीक  मुझे  के मैं कर सकूं पीछा अच्छाइयों का 
जो न कर सकूं अच्छे लोगों का तो .