Thursday, December 27, 2012

वीर्य से जीतना होगा शौर्य को

  उस समाज में जहां मर्दानगी का एकमात्र पैमाना वीर्य हो वहां और उम्मीद की भी क्या जा सकती है। यह वीर्य किसी जाति, धर्म या समाज में छोटा-बड़ा नहीं बल्कि मर्द होने की पहली शर्त है।

 सबसे पहले रोशनी ( जुझारू लड़की को दिया एक नाम) वह लड़की जो रविवार रात सोलह दिसंबर की रात छह लोगों की हैवानियत का शिकार हुई, उसके लिए प्रार्थना कि वह जल्दी स्वस्थ हो। उन हैवानों ने तो सामूहिक बर्बरता करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। दुष्कर्म के बाद वह चलती हुई बस से सड़क पर फेंक दी गई। यह पहला मौका है जब पूरे देश में दुःख और दर्द की लहर दौड़ गई है। हर लड़की छली हुई महसूस कर रही है तो लड़का भी अपराधबोध से ग्रस्त हो गया है। वह बताना चाह रहा है कि कि हम इस दर्द में तुम्हारे साथ है। इसी का नतीजा है कि दिल्ली का इंडिया गेट इन हमदर्दों से भरा हुआ है। वे आ रहे हैं यह जानते हुए भी कि इस सरकार की मंशा जनरल डायर से कहीं कम नहीं है। जनरल डायर ने अमृतसर के जलियावाला बाग में आजादी के निहत्थे ऐसे ही परवानों पर गोलियां चला दी थीं। यह सरकार आंसू गैस के गोले छोड़ रही है। यह भूलकर कि ये युवक-युवतियां अपने ही देश के नागरिक हैं और बताना चाह रहे हैं कि भारत अब और ज्यादतियां बर्दाश्त नहीं करेगा और इसे भी वुमन फ्रेंडली देश् बनना ही होगा। 
हद है, किस देश में रहते हैं हम जहां दुष्कर्मी तो सीना तानकर चलता है और जुल्म की शिकार लड़की पर्दे में। बाद की जिंदगी उसे सिर ऊंचा करके जीने का साहस ही नहीं दे पाती। वीर्यवान वीर खुद पर जवां मर्द होने का और ठप्पा लगा लेते हैं। उस समाज में जहां मर्दानगी का एकमात्र पैमाना वीर्य हो वहां और उम्मीद की भी क्या जा सकती है। यह वीर्य किसी जाति, धर्म या समाज में छोटा-बड़ा नहीं बल्कि मर्द होने की पहली शर्त है। इस बार जब दिल्ली और देश का युवा इस फर्क को मिटा देना चाहता है तो हमारा दु:शासन  (प्रशासन) पट पर ताल ठोकता हुआ आगे आ गया है।
 बेशक, रोशनी फाइटर है। देश की दुआ उसे यूं धुंधलाने नहीं देगी लेकिन सदियों से पैबस्त मानसिकता देखिए। उन्होंने जो बात अपनी मां से कही वह यह कि मेरे दोस्तों को मत बताना कि मैं कहां हूं। उनसे कहना कि मैं दो-तीन माह में लौट आऊंगी। यह चुप्पी ही है जिसने स्त्री को ज्यादती का शिकार बना रखा है। मर्दों के इस हथियार को उसकी चुप्पी ने ही धार दी है। उसे डराकर रखा जाता है कि वह समय रहते घर लौट आए, किसी को मौका न दे। लड़की को सक्षम बनाने की बात कोई नहीं करता।ऐसी ट्रेनिंग भी नहीं देता कि जब कोई दुष्कर्मी सामने आ जाए तो कैसे मुकाबला करो। राष्ट्रपति आर वेंकटरमन द्वारा शौर्य चक्र से सम्मानित मनीषा शर्मा  पर जब चलती बस में गुंडों ने बलात्कार करने की कोशिश की तो उन्होंने लगातार संघर्ष किया। वे उनके गुप्तांगों पर हमला करती रहीं और चलती बस से कूद पड़ीं। खिलाड़ी थीं तो बहादुरी से खुद को बचा गईं। वीर्य के आगे उनका शौर्य जीत गया। ऐसे ही सुनीता कृष्णन को भी चुप रहना बेमायने लगा वे आज एनजीओ से जुड़ी हैं  और तीन साल से लेकर बड़ी लड़कियों तक को देह व्यापार के धंधे में धकेले जाने से बचा लेती हैं। सुनीता ने हैवानों पर केस नहीं किया लेकिन अपने जीवन को मिशन दे दिया। जिस देश में मासूम बच्चियों से लेकर उम्रदराज स्त्री के साथ भी दुष्कर्म होना आम हो वहां की जनता अगर एकजुट होकर किसी सख्त कानून की मांग करती है तो क्या गलत करती है? कौन है जिसने यह हुक्म दिया है कौन है जिसने धारा १४४ लगा दी है ताकि प्रदर्शनकारी जुट ही न पाएं। इसी  मानसिकता ने अब तक बलात्कारियों के हौसले बुलंद किए हैं वे फक्र से जिंदा रहते हैं और लड़कियां पूरी जिंदगी फिक्र में मरती हुई। ऐसी गलीज मानसिकता न होती तो भटेरी की भंवरी देवी को तक न्याय मिला गया होता। दो दशक से भी ज्यादा वक्त बीत गया भंवरी देवी को न्याय नहीं मिला है। जयपुर के बहुत पास है भटेरी। चाहती तो दिल्ली की तरह जयपुर की जनता भी सड़कों पर आ सकती थी लेकिन वही सोच कि बलात्कार ही किया है जान तो नहीं ली। तत्कालीन  न्यायाधीश ने तो यह तक कह दिया था कि 'ऊंची जात' का व्यक्ति 'नीची जात' के साथ बलात्कार कैसे कर सकता है? गौरतलब है कि भंवरी देवी ने तब बतौर साथिन उस परिवार में बाल विवाह रुकवाया था। परिवार के मर्दों ने भंवरी देवी को सबक सिखाने के लिए उसके पति के सामने दुष्कर्म किया वे भी संख्या में छह थे। पति ही है जो अब तक उनका साथ दे रहे हैं। भंवरी देवी पर फिल्में बनती हैं, पढ़ा-लिखा वर्ग  उन्हें पेंटिंग प्रदर्शनी  के उद्घाटन के लिए भी आमंत्रित कर लेता है। लेकिन नहीं मिलता है तो न्याय। मिल भी कैसे सकता है जिनकी सरकारों में ही बलात्कारी शामिल हैं वे कैसे इसे गंभीर अपराध मानते हुए सख्त कानून लाएंगे? जनता ही जनार्दन है वह जनरल डायर की मानसिकता वाली सरकार को सबक सिखा देगी। 

3 comments:

Dileepraaj Nagpal said...

'Khandit Wajood' Yaad Hai... Ye Sarkaaren Hijda Kahlaane Layak Bhi Nahi Bacchi...Unke Paas Kam-Se-Kam Ek Soch To Hai, But...Yahan Sab Dukhad Hi Dukhad Hai...

Dileepraaj Nagpal said...

'Khandit Wajood' Yaad Hai... Ye Sarkaaren Hijda Kahlaane Layak Bhi Nahi Bacchi...Unke Paas Kam-Se-Kam Ek Soch To Hai, But...Yahan Sab Dukhad Hi Dukhad Hai...

रचना said...

http://indianwomanhasarrived.blogspot.in/2012/12/blog-post_26.html