Saturday, December 1, 2012

छीजता कुछ नहीं



मुकम्मल नज़र आती देह में
रूह का छीजना मुसलसल 
अधूरे चाँद का 
पूरेपन की और बढ़ना मुसलसल 

छीजता कुछ नहीं 
न ही बढ़ता है कुछ 

महसूसने और देखने के 
इस हुनर में ही एक दिन 
ज़िन्दगी हो जाती है मुकम्मलI 

4 comments:

expression said...

बहुत सुन्दर.........

अनु

प्रवीण पाण्डेय said...

बेहतरीन..

Arvind Mishra said...

सच!

प्रदीप कांत said...

महसूसने और देखने के
इस हुनर में ही एक दिन
ज़िन्दगी हो जाती है मुकम्मलI
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ज़िन्दगी को मुकम्मल तरीके से देखने का ये भी एक नजरिया है