बुधवार, 26 सितंबर 2012

रिश्ता अब फ़रिश्ता सा है

रिश्ता अब फ़रिश्ता सा है
बहुत करीब बैठे भी बेगाने से  हैं
एक  पीली चादर बात करती हुई सी है
बाल्टी का रंग भी  बोल पड़ता है कई बार
वह बांस की टूटी ट्रे भी  सहेजी हुई  है
 बाबा की पेंटिंग तो रोज़ ही रास्ता रोक लेती है  
उन खतों के मुंह सीले हुए से  हैं
वह ब्रश, वह साबुन, सब बात करते हैं
किसी  के खामोश होने से
कितनी चीज़ें बोलती हैं
मुसलसल

मैं भी बोलना चाहती हूँ तुमसे
इतना कि हलक सूख जाए
और ये सारी बोलियाँ थम जाए
मेरी इनमें कोई दिलचस्पी नहीं

तुम बोलो या फिर मुझसे ले लो इन आवाज़ों को समझने का फ़न.

10 टिप्‍पणियां:

शिवम् मिश्रा ने कहा…

कुछ तो फर्क है, कि नहीं - ब्लॉग बुलेटिन ब्लॉग जगत मे क्या चल रहा है उस को ब्लॉग जगत की पोस्टों के माध्यम से ही आप तक हम पहुँचते है ... आज आपकी यह पोस्ट भी इस प्रयास मे हमारा साथ दे रही है ... आपको सादर आभार !

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

इन आवाजों को समझने का हुनर सीखने से पहले भावनाओं में डूबना होता है।

Unknown ने कहा…

सुंदर एहसासों से सजी सुंदर रचना |
मेरी नई पोस्ट:-
♥♥*चाहो मुझे इतना*♥♥

yashoda Agrawal ने कहा…

आपकी यह बेहतरीन रचना शनिवार 29/09/2012 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

बेनामी ने कहा…

aankhe num hui padh kAR. APKI HAR KAVITA AIK SE BAD KAR AIK HE

Asha Joglekar ने कहा…

तुम बोलो या मुझसे ले लो िन आवाजों को सुनने का फन ।

भावभीनी ।

ANULATA RAJ NAIR ने कहा…

बहुत खूबसूरत...
एहसासों को अभिव्यक्त करना यूँ आसान नहीं...

अनु

निवेदिता श्रीवास्तव ने कहा…

ऐसी आवाजें न बोलने देती हैं और न ही खामोश रहने देती हैं .....

kavita verma ने कहा…

bhavbheeni abhivyakti..

varsha ने कहा…

shivamji, praveenji, pradeepki yashodaji,anuji, niveditaji bahut shukriya...anonymousji shukriya hari aankhon wali ladki mein shaffak ko shaffaf kar diya hai, aashaji arse baad aapka aana sukhad hai, kavita khoob milin tum.