शुक्रवार, 21 सितंबर 2012

तुम्हारे बाजू में























तुम नहीं थे
तुम थे
तुम नहीं हो
 तुम हो
तुम्हारे होने या न होने के बीच
मैं कहाँ हूँ
ठीक वहीँ, जहाँ तुम हो
तुम्हारे बाजू में   .

मैंने तुम्हें
न खोया
न पाया
न लिबास के रंग बदले

इस आने - जाने पर
न धातुएं ओढ़ी 
न माथा  ही रंगा
फिर ये किस रंग  में रंगी हूँ मैं?
तेरा है ये  रंग
तेरी रूह  पैबस्त है  मेरे भीतर

...और रूह कहीं नहीं आती-जाती
जिस्म आते -जाते हैं |

9 टिप्‍पणियां:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बिलकुल सही कहा ... सुंदर प्रस्तुति

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

साथ के मायने तो यही हैं, आत्माएं आपस में जुड़ जाये.....

यशवन्त माथुर (Yashwant Raj Bali Mathur) ने कहा…

कल 23/09/2012 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

स्मृतियाँ शरीर में व्याप्त हो जाती हैं।

मेरा मन पंछी सा ने कहा…

बहुत सुन्दर..
:-)

मेरा मन पंछी सा ने कहा…

बहुत सुन्दर..
:-)

ANULATA RAJ NAIR ने कहा…

वाह......
आखरी पक्तियों में रूह बसी है....
बहुत सुन्दर!!

अनु

रश्मि शर्मा ने कहा…

वाह...

varsha ने कहा…

sangeeta ji, dr. monika, yashwantji, praveenji,reenaji, anuji, rrashmi ji aap sabka bahut shukriya.