Thursday, September 6, 2012

नकली है कविता मेरी


 मौत तक नहीं पहुँचती कविता मेरी

हाथ कांपते हैं मेरे
डर जाती है देह मेरी
उस मंज़र को दोहराने में 
शांत और निश्छल मुकाम नहीं छूना चाहती कविता मेरी
उसे ज़िन्दगी और मुस्कान चाहिए
ऐसी कुर्बत चाहिए कि हवा भी ठहर जाए
उसे आंसू और मातम से डर लगता है
चुप्पी उसे घेरती है 
सन्नाटा चीरता है 
मौन तोड़ देता है...

नकली है कविता मेरी
वह सिर्फ मोहब्बत के तराने गाती है.

3 comments:

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

गहरे भाव लिए पंक्तियाँ

शिवम् मिश्रा said...

वाह क्या बात कही है ... जय हो !



मुझ से मत जलो - ब्लॉग बुलेटिन ब्लॉग जगत मे क्या चल रहा है उस को ब्लॉग जगत की पोस्टों के माध्यम से ही आप तक हम पहुँचते है ... आज आपकी यह पोस्ट भी इस प्रयास मे हमारा साथ दे रही है ... आपको सादर आभार !

प्रवीण पाण्डेय said...

शब्द गहरे उतरें तो बात बने...