मंगलवार, 5 जून 2012

आत्मालाप


अभी तो बहुत कुछ कहना-सुनना बाकी था 
क्यों तुमने बीच रास्ते ही जहाज डुबो दिए

ढल ही जाती एक रोज़ ये गहरी काली शब् 
क्यों तुमने सुन्दर
उम्मीद के पंख क़तर दिए
 

मिल ही जाता हमें हमारे हिस्से का आसमां
तुमने क्यों अब्र के हवाले उजाले कर दिए

क्या मैं ही वक़्त से हारने लगी थीं मेरी जां
ज़ख्म क्यों फिर आज अपने हरे कर दिए

नहीं कह पाती खुद से कि यह उसकी रज़ा थी
मैंने देखें हैं तूफ़ानी हवाओं में जलते हुए दीए

एक-दूजे पर था जब चन्दन-पानी सा यकीं

फिर किसने ये रास्ते हमारे जुदा कर दिए


अभी तो बहुत कुछ कहना-सुनना बाकी था 
क्यों तुमने बीच रास्ते ही जहाज डुबो दिए

अब्र-बादल
शब्-रात   

6 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

गहरी अभिव्यक्ति..

वाणी गीत ने कहा…

इस क्यों पर किसका वश चला है !!

यशवन्त माथुर (Yashwant Raj Bali Mathur) ने कहा…

बेहतरीन

सादर

बेनामी ने कहा…

nisandeh apka padhya' apke gadhya se kahin behtar hota ja raha he. zati tajurbe ki tees aksar ghara ghav deti he. apki ye kavita unki judai k ahsas se upji pieeda ko bakhubi ubharti he. 1-1 shabd gahri samvedna se bavasta he. kya in sari kavitao ka kavita sangrah prakashit hoga

varsha ने कहा…

shukriya gadya aur padya donon ko padhne ka aur raay dene ka ...aapne kitab ka zikra bhi kiya hai lekin aapko yoon pardedari ki kya zaroorat hai anonymousji ??

varsha ने कहा…

praveenji vaaniji yaswantji aapka shukriya.