शुक्रवार, 1 जून 2012

आगत का गीत


सत्ताईस की वह सुबह हैरत भरी थी 
एक आँख सूखी और दूसरी गीली थी 
एक ज़िन्दगी से चमकती
 और दूसरी विदा गीत गाती हुई 
चमकती आँख ने हौले से भीगी आँख को देखा 
मानो पी जाना चाहती हो उसके भीतर की नमी 
इस बात से बेखबर 
कि फिर नमी ही उसकी मेहमां होगी.
आख़िर, ज़िन्दगी  से चमकती आँखे 
क्यों विदा गीत गाना चाहती थीं 

वह चौंक गयी ख्व़ाब से 
...और देखा कि उसकी तो दोनों ही आँखें 
एक ही गीत गा रही हैं 
गत का गीत ....

3 टिप्‍पणियां:

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

आशाएं सदैव साथ रहती हैं..... और स्वप्न आँखों में बसते हैं.....

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

आगत का गीत साकार हो..

varsha ने कहा…

dr. monika praveenji aap dono ka abhaar.