Friday, April 27, 2012

मेरी कुड़माई में


 मेरी कुड़माई  में 
मुझे मिले थे
माटी के गणेशजी
और एक लकड़ी की कंघी 
वही जो आदिवासी लड़का
लड़की को देता है 
मैं भी हो गयी थी तेरी
 सदा के लिए.
क्या कोई मंतर था 
 मिटटी और लकड़ी के टुकड़ों में 
या थी वो नज़र 
जो  सिवाय भरोसे  के
 कुछ और देती ही नहीं थी.



समझ रही हूँ  मिटटी-लकड़ी
देने का सबब
सच, तुम्हारी निगाहें
बहुत दूर तक  देख  लेती थीं .

10 comments:

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

समझ रही हूँ मिटटी-लकड़ी
देने का सबब
सच, तुम्हारी निगाहें
बहुत दूर तक देख लेती थीं .

शायद आप जीवन में खुशियों की शुरुआत और अंत के सफ़र दोनों की बात कर रही हैं.... गहरे भाव हैं

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

बहुत सुन्दर। परम्परायें शायद वैसी अर्थहीन नहीं जैसी कई बार समझी जाती हैं।

अनूप शुक्ल said...

रोचक। सुन्दर!

वाणी गीत said...

समझ रही हूँ मिटटी-लकड़ी
देने का सबब
सच, तुम्हारी निगाहें
बहुत दूर तक देख लेती थीं ...
परम्पराएँ यूँ ही हमारे जीवन का अंग नहीं बनती ...
परम्परा से अलग देखूं तो कविता अपने भाव से कलेजे पर वार कर रही है ,इन शब्दों में जो एहसास छिपे हैं , उन्हें समझा तो !

सदा said...

समझ रही हूँ मिटटी-लकड़ी
देने का सबब
सच, तुम्हारी निगाहें
बहुत दूर तक देख लेती थीं .
मन को छूते हुए अहसासात ... भावमय शब्‍द संयोजन ।

प्रवीण पाण्डेय said...

माटी और लकड़ी में छिपी है मन की सजावट..

Anonymous said...

zindagi ke kathin tajurbe ki kirchen jab kahi gahre dhas jati hen tab yah shabd ubharte hen. nisandeh jab apne kore kagaz par qalam rakhi hogi to lafz khud bakhud akar lene lage honge. yah kavita mere antarman ko jhakjhor gai.

रंजना said...

साधारण से लगने वाले प्रतीकों के माध्यम से कितनी गहरी बात कह दी आपने...ओह...

निःशब्द कर दिया...क्या प्रशंशा करूँ...?

अद्वितीय..!!!

varsha said...

dr. monkika, anuraagji,vaaniji sadaji,praveenji anamji,ranjana ji aap sabka bahut aabhar.

कविता रावत said...

समझ रही हूँ मिटटी-लकड़ी
देने का सबब
सच, तुम्हारी निगाहें
बहुत दूर तक देख लेती थीं .
....puri grahsthi ka samaan saath chalta hai..
bahut badiya prampara hi aisi hai.. ab surat badalti jaa rahi hai..
bahut badiya