रविवार, 15 अप्रैल 2012

हम भरे-भरे ही हैं दोस्त

उसने कहा मुझसे 
फिर क्यों नहीं 
मैंने कहा 
प्याला रीतता  ही नहीं 
ख़ालीपन के 
एक निर्वात 
दो आंसूं 
तीन हिचकियों 
चार बातों 
और अनगिन यादों 
के बाद 
फिर भर उठता है 
अजब जादूई मसला है
कभी मैं रीतती हूँ 
तो प्याला मुझे भर देता है 
और प्याला रीतता है तो मैं 
हम भरे-भरे ही हैं दोस्त.

7 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

रिक्तता कभी रहती नहीं, भर जाती है बहुधा अवसाद से। यदि किसी दृढ़ निश्चय से भरी जाये तो दिशा सामने दिखती है।

वाणी गीत ने कहा…

भीतर से भरा कभी खाली हो नहीं सकता !!

ANULATA RAJ NAIR ने कहा…

वाह......................
अद्भुत भाव..........

अनु

अपूर्व ने कहा…

यह कबीर प्यारे का अबुझ कमंडल है..जितना खाली होता है..उतना ही भरता जाता है..किसी की अनुपस्थिति की रिक्तता को उसकी अनुपस्थिति की उपस्थिति का अहसास भरता रहता है..यह प्याला कभी नही भरता..और खुद को खाली भी नही होने देता....

बेनामी ने कहा…

gahri anubhuti he is kavita me. koi di khali nahi kabhi khushi to kabhi gam
bhopal se 1 pathak

varsha ने कहा…

praveenji sahi kaha dradh nishchay se hi bhari jaani chahiye.
vaaniji shukriya,
anuji aabhaar,
apoorv kahan gum rahte hain aap,wakayee yah pyala kabhi nahin bharta,
bhopal ke pathakji aapka bhi shukriya.

अनूप शुक्ल ने कहा…

सुन्दर भाव!