Thursday, February 23, 2012

मोहब्बत के शहर से


अर्से से 
संभाल रखी थी 
मोहब्बत की धरोहर के लिए मशहूर 
शहर से लाई एक सफ़ेद प्लेट
उसकी संग ए मरमरी जाली के पास कई रंग थे 
इक-दूजे की खूबसूरती में लिपटे 
आज, वह प्लेट टूट गयी 
रंग बिखर गए 
सिर्फ सफ़ेद नज़र आता है अब
टूटी यादों को फेंका नहीं उसने
जोड़ा और सहेज लिया

खुद को भी कहाँ फेंका उसने
सहेज रखा है 
अक्षत वनपीस की तरह.

11 comments:

रश्मि प्रभा... said...

खुद को भी कहाँ फेंका उसने
सहेज रखा है
अक्षत वनपीस की तरह...बहुत कुछ कह दिया और साबित कर दिया

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

अक्षत वनपीस....

हर हाल में संवरना है ....बिखरना नहीं....

सदा said...

खुद को भी कहाँ फेंका उसने
सहेज रखा है
अक्षत वनपीस की तरह.
वाह ...बहुत ही बढिया।

प्रवीण पाण्डेय said...

मन को एक बनाये संजोये रखना है, जीवन भर।

रश्मि प्रभा... said...

yadi aap mere dwara sampadit kavy sangrah mein shamil hona chahte hain to sampark karen
rasprabha@gmail.com

sandeep sharma said...

वर्षा मैम

बहुत ही खूबसूरत और तरोताजा रचना...

pradeep mishra said...

achchhi pankti ke liye badhayee. pradeep mishra indore

प्रदीप कांत said...

खुद को भी कहाँ फेंका उसने
सहेज रखा है
अक्षत वनपीस की तरह.

....................

varsha said...

bahut abhaar aur shukriya rashmiji,monikaji,anamilakaji,praveenji, sandeepji, aur donon pradeepj ka.

varsha said...

bahut abhaar aur shukriya rashmiji,monikaji,anamilakaji,praveenji, sandeepji, aur donon pradeepj ka.

expression said...

बहुत सुन्दर....
जाने क्या क्या व्यक्त हो गया इन चंद अल्फाजों में...
बहुत खूब.......

अनु