Thursday, December 27, 2012

वीर्य से जीतना होगा शौर्य को

  उस समाज में जहां मर्दानगी का एकमात्र पैमाना वीर्य हो वहां और उम्मीद की भी क्या जा सकती है। यह वीर्य किसी जाति, धर्म या समाज में छोटा-बड़ा नहीं बल्कि मर्द होने की पहली शर्त है।

 सबसे पहले रोशनी ( जुझारू लड़की को दिया एक नाम) वह लड़की जो रविवार रात सोलह दिसंबर की रात छह लोगों की हैवानियत का शिकार हुई, उसके लिए प्रार्थना कि वह जल्दी स्वस्थ हो। उन हैवानों ने तो सामूहिक बर्बरता करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। दुष्कर्म के बाद वह चलती हुई बस से सड़क पर फेंक दी गई। यह पहला मौका है जब पूरे देश में दुःख और दर्द की लहर दौड़ गई है। हर लड़की छली हुई महसूस कर रही है तो लड़का भी अपराधबोध से ग्रस्त हो गया है। वह बताना चाह रहा है कि कि हम इस दर्द में तुम्हारे साथ है। इसी का नतीजा है कि दिल्ली का इंडिया गेट इन हमदर्दों से भरा हुआ है। वे आ रहे हैं यह जानते हुए भी कि इस सरकार की मंशा जनरल डायर से कहीं कम नहीं है। जनरल डायर ने अमृतसर के जलियावाला बाग में आजादी के निहत्थे ऐसे ही परवानों पर गोलियां चला दी थीं। यह सरकार आंसू गैस के गोले छोड़ रही है। यह भूलकर कि ये युवक-युवतियां अपने ही देश के नागरिक हैं और बताना चाह रहे हैं कि भारत अब और ज्यादतियां बर्दाश्त नहीं करेगा और इसे भी वुमन फ्रेंडली देश् बनना ही होगा। 
हद है, किस देश में रहते हैं हम जहां दुष्कर्मी तो सीना तानकर चलता है और जुल्म की शिकार लड़की पर्दे में। बाद की जिंदगी उसे सिर ऊंचा करके जीने का साहस ही नहीं दे पाती। वीर्यवान वीर खुद पर जवां मर्द होने का और ठप्पा लगा लेते हैं। उस समाज में जहां मर्दानगी का एकमात्र पैमाना वीर्य हो वहां और उम्मीद की भी क्या जा सकती है। यह वीर्य किसी जाति, धर्म या समाज में छोटा-बड़ा नहीं बल्कि मर्द होने की पहली शर्त है। इस बार जब दिल्ली और देश का युवा इस फर्क को मिटा देना चाहता है तो हमारा दु:शासन  (प्रशासन) पट पर ताल ठोकता हुआ आगे आ गया है।
 बेशक, रोशनी फाइटर है। देश की दुआ उसे यूं धुंधलाने नहीं देगी लेकिन सदियों से पैबस्त मानसिकता देखिए। उन्होंने जो बात अपनी मां से कही वह यह कि मेरे दोस्तों को मत बताना कि मैं कहां हूं। उनसे कहना कि मैं दो-तीन माह में लौट आऊंगी। यह चुप्पी ही है जिसने स्त्री को ज्यादती का शिकार बना रखा है। मर्दों के इस हथियार को उसकी चुप्पी ने ही धार दी है। उसे डराकर रखा जाता है कि वह समय रहते घर लौट आए, किसी को मौका न दे। लड़की को सक्षम बनाने की बात कोई नहीं करता।ऐसी ट्रेनिंग भी नहीं देता कि जब कोई दुष्कर्मी सामने आ जाए तो कैसे मुकाबला करो। राष्ट्रपति आर वेंकटरमन द्वारा शौर्य चक्र से सम्मानित मनीषा शर्मा  पर जब चलती बस में गुंडों ने बलात्कार करने की कोशिश की तो उन्होंने लगातार संघर्ष किया। वे उनके गुप्तांगों पर हमला करती रहीं और चलती बस से कूद पड़ीं। खिलाड़ी थीं तो बहादुरी से खुद को बचा गईं। वीर्य के आगे उनका शौर्य जीत गया। ऐसे ही सुनीता कृष्णन को भी चुप रहना बेमायने लगा वे आज एनजीओ से जुड़ी हैं  और तीन साल से लेकर बड़ी लड़कियों तक को देह व्यापार के धंधे में धकेले जाने से बचा लेती हैं। सुनीता ने हैवानों पर केस नहीं किया लेकिन अपने जीवन को मिशन दे दिया। जिस देश में मासूम बच्चियों से लेकर उम्रदराज स्त्री के साथ भी दुष्कर्म होना आम हो वहां की जनता अगर एकजुट होकर किसी सख्त कानून की मांग करती है तो क्या गलत करती है? कौन है जिसने यह हुक्म दिया है कौन है जिसने धारा १४४ लगा दी है ताकि प्रदर्शनकारी जुट ही न पाएं। इसी  मानसिकता ने अब तक बलात्कारियों के हौसले बुलंद किए हैं वे फक्र से जिंदा रहते हैं और लड़कियां पूरी जिंदगी फिक्र में मरती हुई। ऐसी गलीज मानसिकता न होती तो भटेरी की भंवरी देवी को तक न्याय मिला गया होता। दो दशक से भी ज्यादा वक्त बीत गया भंवरी देवी को न्याय नहीं मिला है। जयपुर के बहुत पास है भटेरी। चाहती तो दिल्ली की तरह जयपुर की जनता भी सड़कों पर आ सकती थी लेकिन वही सोच कि बलात्कार ही किया है जान तो नहीं ली। तत्कालीन  न्यायाधीश ने तो यह तक कह दिया था कि 'ऊंची जात' का व्यक्ति 'नीची जात' के साथ बलात्कार कैसे कर सकता है? गौरतलब है कि भंवरी देवी ने तब बतौर साथिन उस परिवार में बाल विवाह रुकवाया था। परिवार के मर्दों ने भंवरी देवी को सबक सिखाने के लिए उसके पति के सामने दुष्कर्म किया वे भी संख्या में छह थे। पति ही है जो अब तक उनका साथ दे रहे हैं। भंवरी देवी पर फिल्में बनती हैं, पढ़ा-लिखा वर्ग  उन्हें पेंटिंग प्रदर्शनी  के उद्घाटन के लिए भी आमंत्रित कर लेता है। लेकिन नहीं मिलता है तो न्याय। मिल भी कैसे सकता है जिनकी सरकारों में ही बलात्कारी शामिल हैं वे कैसे इसे गंभीर अपराध मानते हुए सख्त कानून लाएंगे? जनता ही जनार्दन है वह जनरल डायर की मानसिकता वाली सरकार को सबक सिखा देगी। 

Saturday, December 1, 2012

छीजता कुछ नहीं



मुकम्मल नज़र आती देह में
रूह का छीजना मुसलसल 
अधूरे चाँद का 
पूरेपन की और बढ़ना मुसलसल 

छीजता कुछ नहीं 
न ही बढ़ता है कुछ 

महसूसने और देखने के 
इस हुनर में ही एक दिन 
ज़िन्दगी हो जाती है मुकम्मलI 

Wednesday, November 28, 2012

सॉफ्ट टार्गेट

shaheen and her friend faced the charges for writing on facebook
rimsha maseeh: pakistani girl facing blassfemy charges
पकिस्तान में चौदह साल की किशोरी रिमशा मसीह को ईशनिंदा के इलज़ाम 
में घेर लिया जाता है  
तो भारत में दो लड़कियां 
केवल इसलिए गिरफ्तार कर ली जाती हैं क्योंकि 
उन्हें भारत की आर्थिक           राजधानी की रफ़्तार के 
     ठहरने पर एतराज़ 
     था आखिर क्यों ढूंढे
     जाते हैं सॉफ्ट टार्गेट   . . .








रसल हमारा तंत्र आसान टार्गेट ढूंढ़ता है।
पाकिस्तान में एक किशोरी ईशनिंदा
कानून से लड़ाई लड़ रही है, तो हमारे
यहां मुम्बई में दो लड़कियों को इसलिए
पकड़ लिया गया,क्योंकि उन्होंने बाल
ठाकरे की मृत्यु पर मुम्बई बंद के दौरान
हो रही परेशानियों का जिक्र फेसबुक
पर कर दिया था। उन्हें अरेस्ट किया
गया और बाद में जमानत पर छोड़ा
गया। उनका कुसूर था कि उन्होंने खुद
को अभिव्यक्त  किया था। एक ने लिखा
और दूसरी ने उसके स्टेटस को
लाइक किया था। शिव सैनिकों को यह
बर्दाश्त नहीं हुआ। गुस्साए
शिव सैनिकों ने स्टेटस
लिखने वाली लड़की के चाचा के
पालघर स्थित क्लिनिक पर हमला बोल
दिया और खूब तोड़-फोड़ मचाई। यह
कैसी श्रद्धा थी कि उनके पुरोधा की चिता
अभी  ठंडी भी  नहीं हुई थी कि उन्होंने
क्लिनिक को ही तहस-नहस कर दिया।
हक्की-बक्की  ये लड़कियां कुछ ही
समय में अपराधी करार दे दी गई थीं।उनके चेहरे ढके हुए थे।
वे माफी मांग रही थीं उस गुनाह की, जो
शायद उनसे हुआ ही नहीं था। माफी के
ये शब्द भीतर से नहीं, बल्कि डर से
उपजे थे।
एक पढ़े-लिखे व्यक्ति का तर्क था
कि मुझे तो गलती इन लड़कियों की ही
लगती है। क्या  जरूरत है वहां अपनी
अक्ल का झंडा बुलंद करने की, जहां
पूरा शहर बंद होकर अपने नेता को
श्रद्धांजलि देने में जुटा हुआ है। आपको
लोगों की भावना का ध्यान रखना ही
चाहिए। जहां श्रद्धा है, वहां कोई तर्क
मायने नहीं रखता। विचारना जरूरी है
कि यह श्रद्धा है या भय? कहना मुश्किल
है कि बाजार, संस्थाएं, सिनेमाघर इस
डर से बंद हुए कि कहीं समर्थक
जबरदस्ती आकर ना बंद करवा दें या
फिर आस्था के सागर ने उन्हें बंद रहने
पर मजबूर किया। खैर , उस दिन पूरी
मुम्बई  ने जरूरी चीजों की किल्लत
महसूस की। दूध नब्बे रुपए लीटर तक
मिला। अस्पताल जाना मुश्किल हुआ।
रोजी कमाने वालों को फाके की नौबत
आई। डर का असर कई हिस्सों में
सफर करता रहा।
 

मुम्बई के बाहर फेसबुक पर
सक्रिय कई मित्रों ने बाद में इन्हीं
लड़कियों के स्टेटस को साझा किया।
वह भी इस चुनौती के साथ कि हमें भी
गिरफ्तार कीजिए। इनमें कई लड़कियां
थीं, लेकिन यह अपराध भी
क्षेत्रीय साबित हुआ। इसका असर वहीं
तक था। हैरत होती है कि तोड़-फोड़
करने वाले दो सौ लोगों में से सिर्फ नौ
गिरफ्तार हुए, जबकि ये लड़कियां
किसी अपराधी की तरह मुंह ढककर
थाने में बैठा दी गई थीं।
उधर, पड़ोसी पाकिस्तान में किशोरी
मलाला युसूफजई को पढऩे की तमन्ना
के लिए तालिबानी गोलियों से छलनी
कर देते हैं, तो चौदह वर्षीय रिमशा
मसीह केवल इसलिए ईशनिंदा
(ब्लासफेमी) कानून का सामना कर
रही है, क्योंकि उसके बस्ते से पवित्र
कुरान शरीफ के जले हुए टुकडे़ मिलते
हैं। फर्ज कीजिए, घर के मंदिर में रखी
भागवत गीता दीपक की आग से
जल जाए । मां  इसे दोबारा बाइंडिंग के
लिए बेटी को दे । सोचिए, अगर
किसी सख्त और तंग सोच वाले की
नजर इस पर पड़ती और बेटी किसी
और धार्मिक पहचान का अनुसरण कर
रही होती, तो जाहिर है उस पर यही
आरोप लगता। पाकिस्तान में ईशनिंदा
कानून का सामना कर रही रिमशा
ईसाई है। हालांकि, हाल ही उसे राहत
मिली है, लेकिन दोषी को मौत की सजा
का भी प्रावधान है।
 

कितने असहिष्णु हो चले हैं हम?
अपनी पहचान और आस्था को लेकर
यही क्यों लगता है कि दूसरा हमारा
विरोधी है और अहित ही चाहता है। इसी
तंग सोच ने पेंटर मकबूल फिदा हुसैन
को भारत से कतर जाने पर मजबूर कर
दिया। तस्लीमा नसरीन ढाका से दूर
कर दी गईं। सलमान रुश्दी को फतवा
जारी होने के बाद नौ साल तक पहचान
छिपाकर रहना पड़ा। अभिव्यक्ति की
आजादी की बातें केवल तंत्र चलाने
वाली किताबों में ही क्यों  नजर आती हैं? अपनी बात बेखौफ 

कहनेवाले क्यों सलाखों के पीछे और इन पर हमला 
करनेवाले क्यों आज़ाद घूमते  हैं। अपनी बात खुलकर कहने वालों से यही
आग्रह- दोस्तो, जरा संभलकर इतनी
आसां नहीं है बदलाव की पैरोकारी।


कलम को कटघरे में रखने का कायम है चलन
 हुक्मरानों की यह अदा बदली नहीं है अभी

Tuesday, October 30, 2012

बेवा तारीख़



एक डूबी तन्हा तारीख है आज
कभी महकते थे फूल इस दिन
चिराग भी होते थे रोशन यहाँ
खुशबू भी डेरा डाले रहती थी

तुम नहीं समझोगे 
तारीख का डूबना क्या होता है
नज़रों के सामने ही यह
ऐसे ख़ुदकुशी करती  है
  कोई हाथ भी नहीं दे पाता
हैरां हूँ एक मुकम्मल तारीख
यूं ओंधे मुंह पड़ी है मेरे सामने
खामोश और तन्हा.

मैंने देखा है एक जोड़ीदार तारीख को बेवा होते

फिर भी मैं उदास नहीं मेरे यार
न ही नमी है आँखों में
इसी तारीख में जागते हैं
बेसबब इरादे
बेसुध लम्हें
बेहिसाब बोसे
बेखुद साँसें
बेशुमार नेमतों से घिरी है यह तारीख...

Thursday, October 18, 2012

वहां तालिबान, यहाँ बयान

brave girl: ham sab malala hain

पडोसी मुल्क में जहाँ पढना चाहने वाली किशोरी मलाला पर गोली दागी जा रही वहीँ हमारे मुल्क बयानों के बाण गहरे घाव कर रहे हैं.
न शब्दों को लिखते हुए स्वर प्रार्थना में डूबे हुए हैं। पंद्रह साल की मलाला
युसुफजई के लिए इसके सिवाय किया भी क्या जा सकता है। महज
स्कूल जाते रहने की जिद एक बच्ची को मौत देने का कारण कैसे बन
सकती है। नौ अक्टूबर को मलाला के सर में उस वक्त गोली मारी गई जब
वह परीक्षा देकर बस से घर लौट रही थी। दो अज्ञात व्यक्ति नकाब ओढे़ बस
में चढ़े और पूछा कि तुममें से मलाला कौन है। मलाला के गोली लगते ही
बस के फर्श पर खून फैल गया। हमले में उसकी दो सहेलियां भी घायल हो
गईं। शाजिया को गोली उसके कंधे पर लगी। इस दर्दनाक मंजर की दास्तान
दोहराते हुए मलाला की दोस्त शाजिया की  में कोई खौफ नहीं
तैरता। वह कहती है, मलाला ठीक हो जाएगी और हम फिर स्कूल जाएंगे।
मलाला को पता था कि उसके साथ यह हादसा हो सकता है। उसे लगातार
धमकियां भी मिल रही थीं, लेकिन एक दिन भी वह स्कूल जाने से नहीं कतराई।

पाकिस्तान की स्वात घाटी बेहद खूबसूरत है, लेकिन गोरे, सुर्ख चेहरे
तालिबानियों से आतंकित हैं। तालिबान का मानना है कि मुसलमान लड़कियों की जगह स्कूल में नहीं, घर में है। उन्होंने उनके स्कूल जाने पर पाबंदी लगा दी है। मलाला वह लड़की है जिसने पढ़ाई को अपना हक मानते
हुए तालिबानियों का विरोध किया। पिता जियाउद्दीन कवि और स्कूल संचालक हैं। मलाला ने ग्यारह साल की उम्र में बीबीसी की उर्दू सेवा के लिए गुल मकई नाम से डायरी लिखी। पांच जनवरी,2009 को वह लिखती है
मैं स्कूल के लिए तैयार हो रही थी और वर्दी पहनने ही वाली थी कि मुझे याद आया कि प्रिंसिपल ने हमसे स्कूल की वर्दी नहीं पहनने के लिए कहा है। उन्होंने कहा है कि हमें सादे कपड़ों में स्कूल आना होगा, इसलिए
मैंने अपनी पसंदीदा गुलाबी रंग की पोशाक पहनी है। मेरी सहेली ने मुझसे पूछा, खुदा  के लिए सच-सच बताओ कि क्या  हमारे स्कूल पर तालिबान हमला करेगा? सुबह असेंबली में हमसे कहा गया था कि हम रंग-बिरंगे परिधान न पहने क्योंकि तालिबान को इस पर आपत्ति होगी।

सात जनवरी को मलाला ने लिखा मैं मोहर्रम की छुट्टियों के लिए बुनैयर आई हूं। यहां के पहाड़ और हरे-भरे खेत बहुत पसंद हैं। मेरी  स्वात घाटी भी बेहद खूबसूरत है लेकिन वहां शांति नहीं है। चौदह जनवरी को
लिखा, स्कूल जाते समय मेरा मूड बिलकुल अच्छा न था क्योंकि कल से सर्दी की छुट्टियां शुरू हो
रही हैं। प्रिंसिपल ने छुट्टियों की तो घोषणा कर दी लेकिन ये नहीं बताया कि स्कूल दोबारा कब क्लेगा।
तालिबान ने पन्द्रह जनवरी से लड़कियों की पढ़ाई पर प्रतिबंध की घोषणा की है। पन्द्रह जनवरी को उन्होंने लिखा कि रातभर तोप की गोलीबारी का शोर होता रहा। आजमैंने अखबार में बीबीसी उर्दू के लिए लिखी गई अपनी डायरी पढ़ी। मेरी मां को मेरा उपनाम गुल मकई पसंद आया और उन्होंने मेरे पिता से कहा,
क्यों न हम इसका नाम बदलकर गुलमकई रख दें। मुझे  भी  ये नाम अच्छा लगा क्योंकि मलाला का मतलब है शौक में डूबा हुआ इनसान।

इसी मलाला को मार डालने के इरादे से उस पर हमला किया गया।
इलाज के लिए उसे इंग्लॅण्ड भेज दिया गया है और पीछे पूरा देश उसकी
सलामती की दुआ कर रहा है। वाकई मलाला के साहस को सौ-सौ सलाम है कि इतनी
सी उम्र में इस लड़की में इतना हौसला समा गया है। इतना कि दुश्मनों की धमकी, गोली सब बेअसर। एक
बच्ची के इरादे कट्टरपंथी तालिबान को इस कदर हिला देते हैं कि वह बंदूक उठाकर मार डालना चाहते
हैं। कलम थामने की चाहत जान की कीमत पर पूरी होती है। पाकिस्तान की पत्रकार सोनिया
फतह लिखती हैं कि मलाला पर हमले ने हर आंख को नम कर दिया है। जाहिर है कि
विचार बुलैटप्रूफ होते हैं। आप कितने ही लोगों को मार दें, उड़ा दें, काट दें विचारों का कुछ भी नहीं
बिगडेग़ा। संभव है की मलाला पर इस हमले के बाद कनफ्यूज  पाकिस्तानी इस दुविधा से उबरेंगे की उन्हें किस दिशा में जाना है .यूं देखा जाए तो भारत में भी हालात बेहतर नहीं हैं। बेटियों के लिए जो बयान हैं वे किसी गोली से कम नहीं। लड़की की शादी सोलह में कर दो,गोत्र में ब्याह  करने वालों के
खिलाफ कानून बना दो, नब्बे  फीसदी लड़कियां स्वेच्छा से दुष्कर्म कराती हैं। किस दौर में जी रहे हैं हम?  इन
जिम्मेदार  लोगों की जुबां पर कैसे तालिबान सवार हो गए हैं ?

Thursday, October 4, 2012

पुष्कर के फूल

कुदरत की गोद में बसा पुष्कर प्रथ्विवासियों के लिए बेहतरीन उपहार है
लेकिन यहाँ  के कथित पुजारी इस सौंदर्य को नष्ट कर रहे हैं वह भी एक फूल देकर .
आप सोच रहे होंगे की फूल ने कभी किसी का  क्या बिगाड़ा है लेकिन ये फूल इन दिनों सैलानियों को डराने का काम कर रहे हैं

  
ब्रह्मा जी के एकमात्र प्राचीन मंदिर के अलावा पुष्कर में कुछ ऐसा है
जो आध्यात्मिक स्तर पर इनसान को बांधने की क्षमता रखता है। पहाड़ों की आभा, मंदिर के घंटों का नाद और घाट पर आस्था में डूबे लोग। यहां हरेक के लिए कुछ न कुछ है। लेकिन कुछ
ऐसा भी है जो तकलीफ देता है। ब्रह्मा जी के मंदिर से घाट तक जाते हुए एक सैलानी जोड़ा भी हमारे साथ
हो लिया। शायद उन्हें लगा था कि हमारे साथ रहते हुए वे धार्मिक
आस्था को ठेस पहुंचाए बिना दर्शन कर सकते हैं। वे हर बार हमसे पूछते
कि  क्या  हम  भीतर जा सकते हैं, क्या यहां जूते उतारने होंगे,   यहां
झुककर प्रणाम करना होगा।  तमाम जिज्ञासाएं वे हमारे साथ साझा करते हुए चल रहे थे । वे स्पेन
से आए थे। बार्सिलोना से। हमने स्पेन की राजधानी का नाम लिया,
मेड्रिड। तब दोनों ने हमें टोकते हुए कहा मद्रीद, हम इसे मद्रीद उच्चारित
करते हैं। हमारे परिवार के एक बच्चे ने उनसे ओला कहा तो वे बहुत  खुश
हुए। स्पेनिश  भाषा में ओला के मायने हैलो है। उन्होंने आगे बताया कि बाय
को एडिओस कहते हैं जिसका अर्थ है ईश्वर के हवाले। कुछ-कुछ  खुदा हाफिज की तरह।

पुष्कर घाट  मोटर के पानी से भर रहा था। मूंह धोना मुश्किल जान पड़ता था . वहां बैठे चंद पल ही गुजरे थे कि सफेद कपड़ों में फूलों की थाली लिए एक व्यक्ति उनके पास आया। उसने उनकी हथेली में लाल फूल
रखकर कहा कि अगर आपको अपने परिजनों और दोस्तों के लिए पूजा
करवानी है तो हम आपकी मदद करेंगे। बस सौ यूरो (यूरोपीय मुद्रा) देने
होंगे। उनके हाथ जोड़कर मना करने के बावजूद वह जोर देकर पूजा की बात करने लगा। वे दोनों उससे
अलग जाकर खडे़ हो गए। अभी वे वहां पहुंचे ही होंगे कि एक और व्यक्ति उनके
पास आकर कहने लगा- आप कल कुछ दान की बात कर रहे थे। मैं आपको सही तरीका बताता हूं।
जोड़ा हैरत में था। हमने निवेदन किया कि आप  यों इन्हें परेशान कर रहे हैं जब इन्हें पूजा नहीं
करवानी तो  क्यों  जोर दे रहे हैं। ये हमारे मेहमान हैं आपका यूं दबाव डालना अच्छा नहीं। ऐसा कहते ही कथित पुजारी गुस्से में चीखा-'अच्छा हम दबाव डाल रहे हैं। एक फूल ही तो दिया है इन्हें,  क्या अपराध कर दिया। कैसे भरें हम ब्राह्मण अपने बच्चों का पेट। हमारे बीवी-बच्चे भूखें मर जाएं। मैं एमए पास हूं। कोई नौकरी नहीं मिली मुझे। नोकरियां तो सारी छीन ली हमसे। कैसे करें हम गुजारा...।
.....तो  क्या आप इन्हें जबरिया पूजा के लिए कहेंगे। ये  क्या छवि लेकर जाएंगे हमारे देश की। थोड़ा पैसा आपको जरूर मिल जाएगा लेकिन आप देश की छवि धूमिल कर रहे हैं।
इस तल्ख़ वार्तालाप के चलते माहौल कुछ गर्म हो चला था। वह स्पेनिश जोड़ा थैंक यू-थैंक  यू कहता हुआ हमारा आभार प्रकट किए जा रहा था। जबकि इसकी कोई जरूरत नहीं थी। वे हमारे सम्मानित अतिथि थे। दरअसल, आस्था और आध्यात्म के बीच पुष्कर की यह भी  एक परंपरा हो गई है। कई तो डराकर उन्हें बद्दुआएं देने लगते हैं कि आपको सांप डस लेगा। पूजा के नाम पर धन ऐंठने का यह कारोबार निर्बाध जारी है जिसके जैसा समझ में आता है सैलानी की जेब खाली करवाता है। कई लोग इस सच से वाकिफ हैं लेकिन देश और पर्यटन की छवि दागदार कर रही इन हरकतों पर कोई सख्ती नहीं है।  पर्यटन की पहली ज़रुरत है  कि सैलानी निःसंकोच और निर्भय होकर घूम-फिर सकें, हैरत होती है कि यही हम अब तक नहीं दे पाए हैं. कैसे पधारेगा पाहुणा हमारे देश??

Wednesday, September 26, 2012

रिश्ता अब फ़रिश्ता सा है

रिश्ता अब फ़रिश्ता सा है
बहुत करीब बैठे भी बेगाने से  हैं
एक  पीली चादर बात करती हुई सी है
बाल्टी का रंग भी  बोल पड़ता है कई बार
वह बांस की टूटी ट्रे भी  सहेजी हुई  है
 बाबा की पेंटिंग तो रोज़ ही रास्ता रोक लेती है  
उन खतों के मुंह सीले हुए से  हैं
वह ब्रश, वह साबुन, सब बात करते हैं
किसी  के खामोश होने से
कितनी चीज़ें बोलती हैं
मुसलसल

मैं भी बोलना चाहती हूँ तुमसे
इतना कि हलक सूख जाए
और ये सारी बोलियाँ थम जाए
मेरी इनमें कोई दिलचस्पी नहीं

तुम बोलो या फिर मुझसे ले लो इन आवाज़ों को समझने का फ़न.

Friday, September 21, 2012

तुम्हारे बाजू में























तुम नहीं थे
तुम थे
तुम नहीं हो
 तुम हो
तुम्हारे होने या न होने के बीच
मैं कहाँ हूँ
ठीक वहीँ, जहाँ तुम हो
तुम्हारे बाजू में   .

मैंने तुम्हें
न खोया
न पाया
न लिबास के रंग बदले

इस आने - जाने पर
न धातुएं ओढ़ी 
न माथा  ही रंगा
फिर ये किस रंग  में रंगी हूँ मैं?
तेरा है ये  रंग
तेरी रूह  पैबस्त है  मेरे भीतर

...और रूह कहीं नहीं आती-जाती
जिस्म आते -जाते हैं |

Tuesday, September 18, 2012

हिंदी में ही करता है साइकल का पहिया पानी की कुल्लियां

 हिदी दिवस पर भी देरी का शिकार है मेरी यह पोस्ट ,उम्मीद है यह आपके कीमती समय का शिकार नहीं करेगी वैसे , कोई इरादा नहीं है कि हिंदी ही बोलने पर जोर
दिया जाए या फिर अंग्रेजी की आलोचना की जाए। हिंदी बेहद काबिल और घोर
वैज्ञानिक भाषा है जो खुद को समय के साथ कहीं भी ले चलने में सक्षम है। क
से लेकर ड तक बोलकर देखिए तालू के एक खास हिस्से पर ही जोर होगा। च से ण
तक जीभ हल्के-हल्के ऊपरी दांतों के नीचे से सरकती जाएगी और व्यंजन बदलते
जाएंगे। ट से न तक के अक्षर तालू के अगले हिस्से से जीभ लगने पर उच्चारित
होते हैं। सभी व्यंजनों के जोड़े ऐसे ही विभक्त हैं।
हिंदी इतनी उदार है कि उसने हर दौर में नए शब्दों और मुहावरों को शामिल
किया। अरबी से तारीख और औरत ले लिया तो फारसी से आदमी आबादी, बाग, चश्मा
और चाकू। तुर्की से तोप और लाश, पोर्चूगीज से पादरी, कमरा, पलटन और
अंग्रेजी के तो अनगिनत शब्दों ने हिंदी से भाईचारा बना लिया है। डॉक्टर,
पैंसिल, कोर्ट, बैंक, होटल, स्टेशन को कौन अंग्रेजी शब्द मानता है।
अंग्रेजी हमारी हुई, हम कब अंग्रेजी के हुए।
हिंदी भाषा पर इतने फक्र की वजह, बेवजह नहीं है। हाल ही जब अंग्रेजी में
पढ़ी-लिखी अपने मित्रों और परिचितों में हिंदी की ओर लौटने की जो
व्यग्रता दिखी वह विस्मय से भर देने वाली थी।  ve एक बेहतरीन ब्लॉगर
हैं। नॉर्थ ईस्ट की शायद ही कोई परंपरा या त्योहार होता होगा जो  unकी
कलम से छूटा हो। देश-विदेश में उसके कई पाठक हैं। अंग्रेजी में लिखा जा
रहा उसका यह ब्लॉग बहुत लोकप्रिय है। अचानक वह ब्लॉग से यह कहकर नाता
तोडऩा चाहती है कि उसे कुछ तलाश है। वह हिंदी में बात करना चाहती हैं।
हिंदी लिखना चाहती हैं। हिंदी फिल्मी गीतों और पहाड़ की लोकधुनों पर
नाचना चाहती हैं। अपने नन्हे बच्चों को बताना चाहती हैं कि उसकी मां की
जड़ें कहां हैं। अपने पति से पूछती हैं, क्यों यह मध्यवय का संकट तो
नहीं। उनके पति हंसकर कहते हैं, तुम बहुत प्यारी हो।एक और प्रोफेसर हैं जिनकी अंग्रेजी ने उन्हें बेहतरीन मुकाम
दिलाया है लेकिन वे भी चुपके से कभी बच्चन तो कभी सर्वेश्वर दयाल
सक्सेना, पड़ोसी देश की सारा शगुफ्ता और परवीन शाकिर को गुनती रहती हैं।
उन्हें हिंदी में रस आता है। इतना कि वे खुद कविताएं करने लगती हैं।
अंग्रेजी ने उन्हें सब कुछ दिया है लेकिन उनकी मूल पहचान कहीं गुम कर दी
है। हिंदी, हिंदीयत और हिंदुस्तानी होने का सुख छीन लिया है। ये दोनों
अपने मर्ज को पहचान गई हैं। लेकिन हममें से कई अब भी लगे हुए हैं उस दौड़
में जिसका नतीजा हमारा सुकून छीन लेगा। अंग्रेजी माध्यमों के इन स्कूलों
में पढऩे वाले बच्चे इस भाषा को सीखने में इतनी मेहनत करते हैं कि अगर यह
सब उनकी अपनी भाषा में हो तो वे आसमां छू लें। अभी उन्हें पचास फीसदी इस
भाषा को देना पड़ता है। केले को बनाना, कद्दू को पंपकिन बोलते-बोलते ये
बच्चे खिचड़ी का भी अनुवाद ढूंढने लगते हैं। कोई पूछे उनसे कि गुलजार जब
लिखते हैं -
बारिश आती है तो मेरे शहर को कुछ हो जाता है

टीन की छत, तिर्पाल का
छज्जा, पीपल,पत्ते पर्नाला सब बहने लगते हैं
तंग गली में जाते-जाते साइकल
का पहिया पानी की कुल्लियां करता है......

अब भला कोई बताए तिर्पाल , पीपल और कुल्लियों का अनुवाद क्या होगा।
अंग्रेजी जाने क्या दे रही है लेकिन हमसे हमारी पहचान जरूर अलग कर रही है
और कुछ समझदार लोग इसे वक्त रहते पहचान लेते हैं लेकिन कई अवसाद से घिरने
लगते हैं। यह ऐसा अवसाद है जो किसी मनोचिकित्सक की पकड़ में नहीं आता
जबकि हमने पूरी जनरेशन को इसकी चपेट में लाने का कार्यक्रम बना दिया है।
हिंदी महज भाषा नहीं हमारी जड़ है। जड़ में मट्ठा तो नहीं ही पडऩा चाहिए।

Thursday, September 13, 2012

गोविंद से पहले



इससे पहले की हिंदी दिवस दस्तक दे ज़रूरी है कि शिक्षक दिवस पर लिखा आपसे साझा कर लिया जाए. देरी से पोस्ट करने की मुआफी के साथ

तीसरी-चौथी कक्षा में हिंदी की पाठ्य पुस्तक  में एक कथा का शीर्षक  था
आरुणी की गुरुभक्ति। वह ऋषि धौम्य के  यहां शिक्षा प्राप्त करता था। एक
रात खूब बारिश हुई। आश्रम पानी से भर न जाए यह देखने के लिए वह खेतों पर गया। ऋषि धौम्य गहरी नींद में थे। आरुणी ने देखा कि खेत की मेड़ का एक हिस्सा टूट रहा है। उसने बहुत कोशिश की मेड़ की मिट्टी को फिर से जमा दे लेकिन तेज पानी उसे बहा ले जाता था। आरुणी पानी रोकने के लिए वहीं लेट गया। मेड़ पर लेटते ही पानी का बहाव रुक  गया। तड़के जब ऋषि की आँख  खुली तो आरुणी को ना पाकर वे चिंतित हुए। खेत में ढूंढ़ते हुए पहुंचे तो आरुणी वहां तेज बुखार के साथ सोया हुआ था। गुरुजी को सामने पाकर उसने पैर छू लिए और गुरुजी ने यह सब देख उसे गले से लगा लिया।
क्या था यह? शिष्य को मिली शिक्षा या शिक्षक के प्रति उपजी स्वत:स्फूर्त
श्रद्धा। दरअसल, ये दोनों थे। शिक्षक  का मान करना ही है , इसे लेकर कोई
दुविधा नहीं थी लेिकन श्रद्धा, भक्ति के भाव निजी तौर पर पनपते हैं।
शिक्षक का आचरण, व्यवहार, पेशे के प्रति लगाव कई बातें सम्मान के लिए
जिम्मेदार होती हैं। आज थोड़ी खाई सी नजर आती है । आज उनका मान करने की अनिवार्यता भी नहीं। धन नियंत्रित इस शिक्षा व्यवस्था में हर चीज के दाम हैं। अच्छी शिक्षा अच्छा दाम बाकी सब तमाम। सवाल किया जा सकता है कि यह अच्छी शिक्षा कैसे हुई?

रामायण काल हो या महाभारत का समय। गुरु वशिष्ठ और गुरु द्रोण ने
राजघरानों को ही संपूर्ण शिक्षा दी। एकलव्य इस शिक्षा से वंचित ही रहा।
गुरु द्रोण की मूर्ति सामने रख दिन-रात अभ्यास के साथ जब वह धनुर्विद्या
में पारंगत हो गया तब द्रोणाचार्य ने उसका अंगूठा ही गुरुदक्षिणा में
मांग लिया। यह कैसा गुरुत्व था? गोविंद से पहले गुरु को प्रणाम करने वाली संस्कृति में गुरू का स्थान बहुत ऊंचा है।  स्वयं भगवान कृष्ण
ने भी गुरु सांदिपनी  का सम्मान अक्षुण्ण रखा। उज्जैन में कृष्ण-बलराम और उनके बाल सखा सुदामा के गुरु सांदिपनी का आश्रम आज भी है।
तब स्त्री शिक्षाकी अवधारणा जरूर रही होगी लेकिन परंपरा नहीं थी। आज ना केवल बेटियां शिक्षा पा रही हैं, पढ़ाने का बीड़ा भी उन्होंने ले रखा है।

कालांतर में तक्षशिला और नालंदा शिक्षा के बड़े केंद्र बने। पूरी दुनिया
से विद्यार्थी यहां शिक्षा प्राप्त करने आते थे। तक्षशिला विभाजन के बाद
अब पाकिस्तान का हिस्सा है। इस शानदार विरासत को युनेस्को ने विश्व की  बेशकीमती  धरोहर माना है। इस प्राचीन उच्च शिक्षा केंद्र  में सोलह की उम्र के  बाद दाखिला दिया जाता था। सैन्य, चिकि त्सा , खगोल कई विषयों की पढ़ाई यहां होती थी। स्वयं चाण्क्य इस केंद्र के शिक्षक  थे। चीनी यात्री फाह्यान यहां आए थे उन्होंने लिखा है कि यह बेहतरीन निजाम था जहां सोलह हजार विद्यार्थी साथ शिक्षा पाते थे।
पांच सितंबर डॉ.सर्वपल्ली राधा कृष्णन, भारत  के  दूसरे राष्ट्रपति का
जन्मदिन। वे शिक्षक  थे। बहुत कुछ बदल गया है। अब स्टूडेंट  टीचर के
दोस्त हैं। कम अज कम सोशल नेटवर्क  पर तो वे यही प्लेटफॉर्म साझा कर रहे हैं।  आपसी सम्मान बरकरार रखते हुए यह मंच बेहतर
नतीजे दे सकता है। खासकर, अन्तर्मुखी बच्चों के लिए यह टीचर से संवाद का अच्छा जरिया है। समस्याएं वहीं आती हैं जहां दोनों के बीच संवादहीनता है। बोलने से कई गिरहें खुलती हैं। इस रिश्ते की सबसे बड़ी अपेक्षा अगर ज्ञान है तो शिष्य को विनयशील होना ही होगा . एक विनयी शिष्य ही शिक्षक के भीतर ज्ञान की थाह ले सकता है . गंडा बंधने की परंपरा का आशय ही यह है कि गुरूजी हम आपकी सेवा में हाज़िर है बस आपकी कृपा हो.

Thursday, September 6, 2012

नकली है कविता मेरी


 मौत तक नहीं पहुँचती कविता मेरी

हाथ कांपते हैं मेरे
डर जाती है देह मेरी
उस मंज़र को दोहराने में 
शांत और निश्छल मुकाम नहीं छूना चाहती कविता मेरी
उसे ज़िन्दगी और मुस्कान चाहिए
ऐसी कुर्बत चाहिए कि हवा भी ठहर जाए
उसे आंसू और मातम से डर लगता है
चुप्पी उसे घेरती है 
सन्नाटा चीरता है 
मौन तोड़ देता है...

नकली है कविता मेरी
वह सिर्फ मोहब्बत के तराने गाती है.

Friday, August 17, 2012

हरी आँखोंवाली लड़की

शफ्फाफ़  रंगतवाली एक लड़की
हरी आँखों से हैरत टपकाए पूछती है
वाकई , उन्होंने आपसे कहा था
जीवन के किसी भी मोड़ पर
तुम्हें लगे कि बस, अब इस रिश्ते से
बहार जा चुकी है और तुम्हें
बाहर आना है
मैं एक पल भी नहीं लगाऊंगा अलग होने में ?

हाँ, कहा था
रिश्तों की जम्हूरियत पर
जब हरियाली पनपती है
 ये ज़मीं जन्नत  मालूम होती है
...और मैंने जी है वो जन्नत
जीते जी

 तुम उम्मीद कायम रखो लड़की.

Thursday, July 26, 2012

रंग ए उल्फ़त

सोच रही हूँ मेरे तुम्हारे बीच
कौन सा रंग है
स्लेटी, इसी रंग की तो थी कमीज़
जो  पहली  बार तुम्हें
तोहफे में दी थी
तुमने उसे पहना ज़रूर
पसंद नहीं किया .
लाल, जब पंडित ने कहा था
लड़की से कहना यही रंग पहने...
हम दोनों
को रास नहीं आया ख़ास
पीला, तुम्हारे उजले रंग में खो-सा जाता था 

गुलाबी,  में तुम्हे छुई-मुई लगती
तुम ऐसे नहीं देखना चाहते थे मुझे
सफ़ेद, में तुम फ़रिश्ता नज़र आते
यह लिखते हुए एक पानी से भरा बादल घिर आया है
हरा और केसरिया
इन पर तो जाने किन का कब्ज़ा हो गया है
नीला
यही,यही तो था
जिस पर मेरी तुम्हारी युति थी
नीले पर कोई शक शुबहा नहीं था हमें
फ़िदा थे हम दिलों जान से .

अब ये सारे रंग मिलकर काला
बुन देते हैं मेरे आस-पास.
मैं हूँ कि वही इन्द्रधनुष बनाने पर तुली हूँ
 जो था हमारे
आस-पास
नीलम आभा के साथ  |

Tuesday, July 24, 2012

यूं ही दो ख़याल

प्रेम 
तुम थे तो थी
 जिद 
तकरार 
अनबन 
उलझन 
केवल तब ही था 
संगीत 
सृजन
हरापन 

...और बस तब ही 
तब ही तो हुआ था मुझे प्रेम |


हिचकी नहीं सिसकी 

अरसा हुआ

कोई हिचकी नहीं आई उसे 
जुबां भी नहीं दबी 

दाँतों के नीचे

बस, याद.... 


शायद,

हिचकी अब 

सिसकी हो गयी है |


Wednesday, July 11, 2012

हमें अफ़सोस है पिंकी प्रमाणिक


लेकिन ख़ुशी  है कि लिंग प्रमाणित  होने से पहले तुम्हारी ज़मानत हो गयी


पिछले दिनों हम सबने एक खबर पढ़ी कि
एशियाई खेलों की स्वर्ण पदक विजेता
एथलीट पिंकी प्रमाणिक पर पश्चिम बंगाल
के 24 परगना क्षेत्र में एक स्त्री ने आरोप
लगाया कि वह एक पुरुष है और उसके
साथ दुष्कृत्य करने की कोशिश की।
खबर ने चौंका दिया कि एशियाई
एथलेटिक्स जैसी स्पर्धाओं में स्वर्ण पदक
विजेता महिला के महिला होने पर ही
संदेह हो गया है। लगा था कि पुलिस और
अस्पताल मिलकर जल्दी ही परिणाम दे
देंगे लेकिन यह इतना आसान नहीं था।
एक लाइन की पुख्ता  खबर किसी को
नहीं मिली है कि पिंकी का जेंडर क्या  है।
इस बीच इस एथलीट के साथ कई
अनाचार हुए। उन्हें पुरुषों की जेल में
रखा गया। पुलिस ने उनके साथ
दुर्व्यवहार किया और लिंग परीक्षण के
मेडिकल मुआयने के दौरान उनका
एमएमएस भी बनाकर लीक कर दिया
गया। शायद, यही सोचकर कि यह तो
पुरुष की देह है, क्या फर्क पड़ता है,
लेकिन दो मिनट ठहरकर विचार कीजिए
कि जिसने पूरी जिंदगी खुद को स्त्री माना
हो और वैसी ही पहचान रखी हो उसे
यकायक आप कैसे बदल सकते हैं। वह
कैसे प्रस्तुत हो सकती है इस बदले हुए
व्यवहार को झेलने के लिए?
अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन के
जर्नल में हाल ही प्रकाशित शोध में एक
बात स्पष्ट है कि किसी का लिंग निर्धारित
करना आसान नहीं है। यह मुश्किल है,
महंगा है और कई बार सही भी  नहीं होता
है। हार्मोन और शरीर के अंगों का
विकास स्त्री-पुरुष में बहुत ज्यादा अंतर
नहीं रखता। दोनों के शरीर में यह
मामूली अंतर पर भी हो सकता है यानी
एक स्त्री में कई बार मेल हार्मोन ज्यादा
हो सकते हैं और कई बार एक पुरुष में
फीमेल हार्मोन। स्त्री और पुरुष को
सीधे-सीधे अलग करना इतना आसान
नहीं। स्त्री कोमल और पुरुष सख्त  जैसा
कोई खाका लिंग निर्धारण में मायने नहीं
रखता। टॉम बॉइश लड़की और लता से
नाजुक लड़के हम सबने देखें  हैं। जेंडर तो
वैसे ही बदला जा सकता है जैसे लीवर,
किडनी या दिल। अर्जेंटीना एक ऐसा देश
है जहां व्यक्ति  अपना जेंडर खुद चुनते हैं
फिर चाहे वे खुद जो भी हों
। वहां के
नागरिक को अपना जेंडर अपनी मर्जी से
चुनने का हक है। वह जो कहेगा वही
माना जाएगा।
एक बात जो महसूस होती है कि
हमारे यहां खेल केवल क्रिकेट है। इसके
अलावा किसी खेल की कोई इज्जत
हमारे दिल में नहीं है। हमने आठ सौ और
चारसौ मीटर में एशिया की पदक विजेता
का अपमान करने में कोई कसर नहीं
छोड़ी। ओलंपिक्स शुरू होने में एक
पखवाड़े का समय शेष है, लेकिन
भारतीय खेलों की दुनिया में बहुत
आशावादी माहौल नहीं है। लॉन टेनिस में
किसका जोड़ीदार कौन हो यही तय नहीं
हो पाता। बहरहाल, पिंकी की गरिमा
अक्षुण्ण रखने की बातचीत का यह अर्थ
नहीं कि उन पर इलजाम लगाने वाली की
सुनवाई ही ना हो। बेशक,फरियाद सुनी
ही जानी चाहिए, लेकिन जांच से पहले ही
पिंकी के साथ बदसलूकी नहीं होनी
चाहिए। सोलह जुलाई तक रिपोर्ट आ
जाएगी। कोई भी आरोपी जांच से पहले
तक निरपराधी है। पिंकी ने जिस जेंडर के
साथ जिंदगी जी है, उसका सम्मान  करना
ही सबका फर्ज है। विजेता खिलाडिय़ों के
अकाल पड़े देश में खिलाड़ी की इतनी
अवमानना तो कभी नहीं होनी चाहिए।

Wednesday, July 4, 2012

जयपुर के अदबी ठिकाने और एक किताब

किताबों के लिए हमारे हृदय में पूजा
भाव है। सर माथे लगाते हैं हम उन्हें।
कभी गलती से पैर भी लग जाए तो
पेशानी से लगा लेते हैं, जैसे माफी
मांग रहे हों। क्यों न हो रामायण,
कुरान शरीफ, बाइबल और गुरुग्रंथ
साहब, सभी किताबें ही तो हैं। लिखे
शब्दों का हम सभी एहतराम करते हैं
,पूजते हैं। इन ग्रंथों को बड़ी पवित्रता
के साथ शुद्ध कपड़ों में लपेटकर रखने
वाले  हम सभी ने देखे हैं। जाहिर है हम
किताबों को इज्जत देने वाला समाज
हैं। यहां से चलकर किताबें किस होड़
में शामिल हो गई हैं, यह किसी से
छिपा नहीं है। एक पूरा मार्केट है जो
लेखक और लेखन की पैकेजिंग
करता है। कुछ ऐसे भी हैं जो बहुत
कम दाम में ज्यादा किताबें पढ़ाने का
बीड़ा उठाए हुए हैं। कुछ ऐसे भी
लेखक हैं, जिन्हें लगता है अगर दो
साल में एक किताब ना निकली तो
व्यर्थ है जिंदगी, फिर चाहे उस किताब
से जिंदगी के तत्व कोसों गायब हों।
खैर, इस चिंता में ना पड़ते हुए पिछले
दिनों जिस किताब से नजरें मिली
उसका जिक्र।
किताब की दुकान किसी हीरों
की दुकान-सी लगती है। हीरे तिजोरी
के अंधेरे को रोशन कर देते हैं तो नई
किताब दिमाग के अंधेरे में रोशनी का
उजास फेंकती हुई। यूं हमारे शहर में
कई अदबी ठिकाने हैं, जहां से पुस्तक
प्रेमी किताबें लाते रहते हैं और
पसंदीदा किताब ना मिले तो तुरंत मंगा
देने की अर्जी लगाकर लौट आते हैं।
किताब तक पहुंचना इतना आसान
नहीं  क्योंकि  ये बुक स्टोर्स पूरे शहर में
नहीं। कुछ ऐसा भी नहीं जहां जाकर
तसल्ली से पढ़ा जाए और पसंद आने
पर खरीद लिया जाए। पंसारी की
दुकान की तरह सामान बंधवाने जैसा
हाल ही है किताबों का। जयपुर में एक
शांत और सुंदर ठिकाना है, जो इस
कमी को पूरा करता है। अधिकांश
किताबें यहां अंग्रेजी की होती है, हिंदी
का पाठक थोड़ा दबा-दबा ही महसूस
करता है यहां। यूं भी देखा गया है कि
किताबें पढऩे का जुनूं वहीं हावी होता
है, जहां जेब मुई खाली होती है।
सरस्वती के साथ चलने पर लक्ष्मी ने
कब आशीष दिए हैं।
बहरहाल, इसी ठिकाने के हिंदी
हिस्से में झांकते हुए विकि आर्य का
कविता संग्रह 'धूप के रंग' नजर आता
है। आवरण पर घोंघे की पृष्ठभूमि में
गुमसुम स्त्री की आकृति। भीतर के
पन्नों पर कई स्केचेस शब्दों से यारी
निभाते हुए। सभी कविताएं
शीर्षकहीन। आवरण, रेखाचित्र
शब्द सब उत्तरांचल  की दून घाटी में
जन्में विकि आर्य के ही। पेंगुइन से
2007 की प्रकाशन तिथि। चंद सतरों पर गौर करें
सोचा था
लिखने बैठूं तो
भर जाएंगे सफे
दुनिया के,
पर कहा तो
 दर्द भी
प्रेम की ही तरह
 बस... ढाई आखर
निकला

 एक और कविता
लोग तो लहसुन से हैं

खुलते नहीं
एक फांक भी।
और मैं- जैसे प्याज  कोई
जो, हर
परत खुलकर
न जाने 
क्या-  क्या कह कर
निर्वसन
सा हुआ जाता है।

प्रेम से भरा कवि
 

घर, आंगन, कमरा, छत, दीवारें
कोने बिस्तर जंगले...
चादर, पर्दे, खिड़की पल्ले...
सब कहीं तुम हो
मैं कहां हूं?/ पता मेरा है,
दरवाजे पर नाम मेरा है
सुना है घर मेरा है...
पर हर तरफ तुम हो/ मैं कहां हूं?
 

जीवन से जुड़े नियंत्रण पर कवि
 

कोरी कॉपियां जो/
बच्चों को थमाई
जाती हैं।/लकीरे 
क्यूं उनमें
पहले
खिंची होती हैं?
केवल उडऩा ही

 काफी नहीं होता
 
क्या?
हर पतंग भला 
क्यों
मांझे से जुड़ी
होती है?
 

विकि आर्य की एक कविता फेसबुक
पर साझा की तो साठ से भी ज्यादा
मित्रों ने पसंद का चटका लगाया,
लेकिन उन्हें जानने वाला कोई नहीं
मिला। कवि-कथाकार उदय प्रकाश
का लिखा सच मालूम होता है कि जब
मशहूर कलाकार जोशुआ बेल ने
वाशिंगटन के मेट्रो स्टेशन पर
वायलिन बजाई तो कोई नहीं ठिठका
सिवाय बच्चों के। उनके खचाखच भरे
कंसर्ट में टिकट की कीमत सौ डॉलर
होती है 
क्योंकि वहां लोग जानते हैं यह
एक मशहूर वायलिन वादक है। यूं श्रेष्ठ
संगीतज्ञ को सुनने की फुर्सत किसी
को नहीं है। कला और लेखन को भी
प्रचार की बैसाखी लगती है शायद।

Thursday, June 28, 2012

मुलाकात प्रेम शिकवा

शिकवा 



मैंने देखा आज सूरज को 
बड़ी तसल्ली और करार से 
ओझल होता है 
पहाड़ नहीं हैं 
मेरे घर के आस-पास 
बिजली घर के पीछे ही चला गया 
कल फिर आने के लिए
और तुम?
यूं ही
अकस्मात्
अनायास
अचानक
कहाँ चले
गए मेरे यार
जाने कहाँ
उदय होने के लिए ?
नहीं सोचा इस हरेपन को
तुम्हारी ही रश्मियों की आदत है


***


 

मुलाक़ात


तुम्हें याद करते हुए
जब घिर आई
आँखों में नमी
खुद से कहा
जाओ मेरी रूह
मुलाकात का वक़्त
ख़त्म हुआ |


***







प्रेम 


ऐ शुक्र तेरा शुक्रिया
कि आज तमतमाए सूरज पर
तुम किसी
खूबसूरत तिल
की तरह मौजूद थे.
क्या हुआ...
सुबह ठंडी थी
और परिंदे हैरान
प्रेम यूं भी लाता है
खुशियों के पैगाम
सौ साल में एक बार.


*** 

Wednesday, June 20, 2012

चरित्र पर फैसला सुनाना हम अपना फर्ज समझते हैं


मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने भी सीता को अग्नि में समर्पित कर आत्मसम्मान  की रक्षा की थी हमारे समाज में यह आज भी बुरा नहीं है।
चरित्रहीनता पर फैसला सुनाना हम अपना फर्ज समझते हैं।
ओगड़सिंह तो बेटी का सर काटकर ही  थाने ले  गया

जयवंती और राजेश की आंखों में बेटी
की विदाई की नमी के साथ-साथ
चमक भी थी। अपने हिसाब से अपनी
बेटी को ब्याह देने की चमक। उनकी
बातों से झलक रहा था कि वे उनके
संस्कार ही थे जो बेटी कहीं 'भटकी'
नहीं। करीब के रिश्तेदार भी उन्हें
कहने से नहीं चूक रहे थे कि वाह,
जयवंती तूने तो गंगा नहा ली। वरना
आजकल के बच्चे मां-बाप को नाकों
चने चबवा देते हैं। ये निर्मला को ही
देख इसकी बेटी ने क्या  कम तांडव
किए थे। तू तो बहुत भाग्यशाली है।
दरअसल निर्मला की बेटी ने मां-बाप
के तय रिश्ते से इनकार कर दिया था।
नहीं मानने पर खाना-पीना छोड़, वह
उदास बंद कमरों में अपने दिन बिताने
लगी थी, लेकिन एक दिन मां-बाप की
धमकी ने उसे डरा दिया, 'अगर तू
यही सब करेगी तो हम जहर खा लेंगे।
मत भूल की तेरी एक छोटी बहन भी
है। उस दिन वह बेटी बहुत डर गई
थी। खुद पर कष्ट तो वह बरदाश्त कर
सकती थी। माता-पिता का यह हाल
उससे नहीं देखा गया। अपने फैसले
को तिरोहित कर समर्पण की बयार में
बह गई। निर्मला बेटी की अपराधी थीं।
नाजुक मौकों पर अक्सर  वे उसके
साथ गले मिलकर रो पड़ती थीं।
जयवंती को मिल रही शाबाशी
का सिलसिला थमता ही नहीं था।
उसकी मिसालें दे-देकर रिश्तेदार भी
अपने बच्चों की नकेल कसने में लगे
थे। शादी की फिक्र को फक्र में बदलने
के प्रयास जारी रहते। बेटी कहीं लिह्रश्वत
हैं, ये उन्हें बरदाश्त नहीं। जब उन्हें
यही बरदाश्त नहीं तो फिर ससुराल से
घर आकर बैठी बेटी का किसी और से
मेल-जोल कैसे बरदाश्त होता। काट
दिया उसका सिर एक खरबूजे की
तरह। एक बेटी को इस तरह काट
दिया पिता ने। यकीन मानिए हाथ
कांपते हैं ऐसा लिखते हुए। बेटी कुर्बान
हो गई अपने बाप के झूठे अहम और
जिद के आगे। कोख में मारते हो,
गलती से पैदा हो गई तो न पढ़ातेलि
खाते हो और ना ठीक से खाने को
देते हो। भेड़-बकरी समझ शहनाई
बजाकर अनजान जगह भेज देते हो
उसे। संपत्ति भी नहीं देते, दहेज देते
हो। कैसा संतान प्रेम है ये, जहां कुछ
भी उसके हित में नहीं।
राजसमंद जिले के चारभुजा क्षेत्र
में अपने बाप के हाथों कत्ल हुई इस
लड़की मंजू का गुनाह चाहे जो हो,
लेकिन उसके बाप को उसके चरित्र
पर शक था। वह घर से गायब थी।
पुलिस ने उसे बरामद किया। यही
बताया कि एक होटल में किसी के
साथ मिली है। बस पिता का गुस्से से
सिर फिर गया और मंजू को बाप की
तलवार से कटना पड़ा।
हम में से कई लोग हैं जो इन
घटनाओं को सही ठहराते हैं। उन्हें
लगता है कि स्त्री की पवित्रता पर
अगर किसी ने हमला किया तो स्त्री
को भी दोषी मानते हुए सजा दो। यह
उसका शरीर है, उसकी आत्मा निर्णय
लेगी ऐसा कोई नहीं सोच पाता। आप
यों मालिक बन रहे हैं एक बालिग
लड़की के। आपके मन का नहीं होता
तो मार रहे हैं उसे। आपके सामाजिक
मानदंडों पर खरी नहीं उतरती तो
कत्ल कर दो उसे।
कई बार खयाल आता है कि हम
दानव युग में जी रहे हैं। बेकार है
विकास की बड़ी-बड़ी बातें करना।
देश को ऐसी कई पंचवर्षीय योजनाएं
बनानी होंगी जिसके तहत स्त्री-पुरुष
को समान नागरिक अधिकार मिल
सकें। संविधान में लिखी बातें कोरी
बातें हैं समाज अब भी अवयस्क है।
दोष न लड़की का है और न
ओगड़सिंह का। ससुराल से मायके
आकर बैठी, बेटी के बारे में वह पहले
बहुत कुछ सुन चुका होगा। लोगों को
अपनी आन का सबूत देते हुए उसने
अपनी बेटी का ही सर कलम कर
दिया। ऐसा उसने अपने सम्मान के
लिए किया। यह सम्मान अक्षुण्ण
रखने के लिए की गई हत्या थी। यही
'ऑनर किलिंग है।
मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने भी
सीता को अग्नि में समर्पित कर आत्मसम्मान  की रक्षा की थी
हमारे समाज
में यह आज भी बुरा नहीं है।
चरित्रहीनता पर फैसला सुनाना हम
अपना फर्ज समझते हैं। ओगड़सिंह
आदतन अपराधी नहीं था, वरना वह
बेटी का सिर लेकर थाने नहीं जाता।
जब तक संबंध, प्रेम, ससुराल से घर
वापसी को समाज अभिशाप मानेगा
तब तक बेटियां कत्ल होने के लिए
अभिशप्त  रहेंगी। समाज दोषी है और
दोषी हैं समाज की इस सोच को सर-माथे
लेने वाले लोग। जिंदगी बड़ी है
या झूठे कायदे? 

क्या फर्क पड़ जाता जो जी लेती बेटी अपनी जि़न्दगी
तुम कटघरे में और वह कब्र में यह तो कोई इन्साफ़  नहीं 

Tuesday, June 5, 2012

आत्मालाप


अभी तो बहुत कुछ कहना-सुनना बाकी था 
क्यों तुमने बीच रास्ते ही जहाज डुबो दिए

ढल ही जाती एक रोज़ ये गहरी काली शब् 
क्यों तुमने सुन्दर
उम्मीद के पंख क़तर दिए
 

मिल ही जाता हमें हमारे हिस्से का आसमां
तुमने क्यों अब्र के हवाले उजाले कर दिए

क्या मैं ही वक़्त से हारने लगी थीं मेरी जां
ज़ख्म क्यों फिर आज अपने हरे कर दिए

नहीं कह पाती खुद से कि यह उसकी रज़ा थी
मैंने देखें हैं तूफ़ानी हवाओं में जलते हुए दीए

एक-दूजे पर था जब चन्दन-पानी सा यकीं

फिर किसने ये रास्ते हमारे जुदा कर दिए


अभी तो बहुत कुछ कहना-सुनना बाकी था 
क्यों तुमने बीच रास्ते ही जहाज डुबो दिए

अब्र-बादल
शब्-रात   

Friday, June 1, 2012

आगत का गीत


सत्ताईस की वह सुबह हैरत भरी थी 
एक आँख सूखी और दूसरी गीली थी 
एक ज़िन्दगी से चमकती
 और दूसरी विदा गीत गाती हुई 
चमकती आँख ने हौले से भीगी आँख को देखा 
मानो पी जाना चाहती हो उसके भीतर की नमी 
इस बात से बेखबर 
कि फिर नमी ही उसकी मेहमां होगी.
आख़िर, ज़िन्दगी  से चमकती आँखे 
क्यों विदा गीत गाना चाहती थीं 

वह चौंक गयी ख्व़ाब से 
...और देखा कि उसकी तो दोनों ही आँखें 
एक ही गीत गा रही हैं 
गत का गीत ....

Wednesday, May 9, 2012

सत्यमेव जयते के पत्रकार आमिर

जनकनंदिनी सीता, कुंतीपुत्र अर्जुन या फिर गंगापुत्र भीष्म और  द्रुपदनंदिनी द्रौपदी  कितनी समरसता है इस वंशावली में। इन व्याख्याओं में ना पड़ते हुए कि पुत्र के साथ मां का और पुत्री के साथ पिता का नाम क्यों है, खुश होने के लिए काफी है कि हम उस परंपरा के वाहक हैं जहां मां का नाम एक उपनाम की तरह नहीं, बल्कि मूल नाम की तरह चलता रहा है। वंश उन्हीं के नाम से आबाद हुए। मां को मान देने वाली संस्कृति का हिस्सा होने के बावजूद ऐसे कौनसे जैविक परिवर्तन के शिकार हम हो गए हैं कि बेटी को कोख में ही मार देने में
पारंगत हो गए। विज्ञान का ऐसा घृणित इस्तेमाल। अल्ट्रासॉनिक मशीन को ईजाद करने वाले वैज्ञानिक अगर इस घिनौने पक्ष को सोच लेते तो उनकी रूह कांप जाती। जो मशीन एक स्वस्थ संतान को जन्म देने का सबब है, उसका इस्तेमाल हम मौत देने के लिए कर रहे हैं।  हालत यह हो गयी  कि जहां पश्चिमी देशों में बच्चे का लिंग पहले ही बता दिया जाता है, वहां हमारे यहां इसे प्रतिबंधित करना पड़ा है। 
किस्सा जोधपुर का है। रेडियोलॉजिस्ट ने उस नए कपल के बच्चे की जांच कर मुस्कुराते हुए कहा कि पांचवें महीने के हिसाब से विकास बिलकुल सामान्य है। पति-पत्नी ने नहीं पूछा कि बेटा है या बेटी। डॉक्टर ने कहा बेटी होगी तो कैसा लगेगा आपको? दोनों ने खुश होते हुए कहा, बहुत अच्छा। वे निश्चिंत थे कि बेटी का ही आगमन होगा, लेकिन जन्म हुआ बेटे का। हैरान माता-पिता समझगए कि डॉक्टर ने यूं ही प्रतिक्रिया लेनी चाही होगी। बहरहाल, स्वस्थ संतान के आगमन को सुनिश्चित करने वाली एक मशीन को हमने हत्यारी बनाकर रख दिया है। सत्यमेव जयते यानी जीत सत्य की ही  होती है। ईसा से भी ढाई सौ साल पहले सम्राट अशोक के कई स्तंभों में यही शब्द  लिखे गए हैं। चार शेरों (नजर केवल तीन आते हैं) के नीचे लिखा सत्यमेव जयते हमारा राष्ट्रीय प्रतीक चिह्न है जो हमारी मुद्राओं पर भी अंकित है। इन दिनों सत्यमेव जयते के एक ही मायने निकल कर आ रहे हैं, आमिर खान का  टीवी कार्यक्रम। आमिर हूबहू एक पत्रकार की भूमीका में नज़र आए। वैसी ही परिकल्पना वैसा ही शोध  एक समय था जब रविवार की सुबह सड़कों पर अघोषित कर्फ्यू  लग जाया करता था। रामानंद सागर की रामायण और बलदेवराज चौपड़ा के महाभारत धारावाहिक को बच्चे-बूढ़े सब देखा करते थे। सड़कों पर अगर सन्नाटा था तो घर की बैठक में भी कई जोड़ी आंखें चुपचाप स्क्रीन पर लगीं होती। सत्यमेव जयते उस दौर को लौटा लाएगा कहना मुश्किल है, लेकिन मित्रों ने, करीबी रिश्तेदारों ने फोन करके एक-दूसरे को देखने की सलाह दी। वर्ग विशेष जिसने टीवी को बुद्धु बक्सा मानते हुए, हाशिए पर ठेल दिया है, वह भी   थोड़ा चकित नजर आया। हमने कई बार राखी के इन्साफ से लेकर बिग बॉस तक 'डर्टी होते जा रहे टीवी का उल्लेख किया  है। किरण बेदी जरूर आपकी कचहरी लेकर आईं थी, जो इनसान के अपराधी हो जाने का सच बयां करता था। आमिर खान के इस कार्यक्रम में सहजता और सरलता नजर आती है और सूरत बदलने की कोशिश भी। यही है, जो उन्हें खतरों के खिलाड़ी अक्षय कुमार खुद को बिग बॉस मानने वाले सलमान
खान, पांचवीं पास से बहुत तेज लगने वाले शाहरुख खान से अलग करता है। यहां तक की कौन बनेगा करोड़पति के अमिताभ बच्चन से भी सत्यमेव जयते इसलिए अलग हो जाता है क्योंकि यह हमारे सामाजिक सरोकारों से जुड़ा है। बुरा लग सकता है कि सामाजिक बुराई का पहला नोटिस राजस्थान सरकार को मिला है, लेकिन यह अच्छे संकेत है कि हम कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ पहले ही उठ खड़े हुए हैं। जयपुर, अलवर, भीलवाड़ा के कई चेहरे अपनी बात कहते नजर आए। हमने अपने ज़ख्म  देख लिए हैं। जोधपुर का ही वो अस्पताल था जहां संक्रमित बोतलें चढ़ा दिए जाने के कारण उनतीस से भी ज्यादा नव प्रसूताओं की जान चली गई। यही वह शहर था जहां एक परिवार यह स्वीकार नहीं पाया कि उनके यहां बेटी का जन्म हुआ है। अपने बहुत निकट का ही उदाहरण। हाल ही एक मां ने दूसरी बेटी को जन्म दिया। उनके चेहरे पर शिकन तक नहीं थी, लेकिन मिलने-जानने वालों का एक ही प्रश्न, जांच नहीं कराई थी क्या ? आजकल तीसरा बच्चा करता ही कौन है, जांच करा लेनी थी। यह नजरिया हमारे भीतर पैबस्त हो चला है। इसके ध्वस्त होने की दरकार है। तेरह मई मदर्स डे है। इस दिन यही शपथ हो। बीते इतवार जरूर देखनेवालों की आँखें नम हुईं, गले में कुछ अटक गया, अनचाहे ही हाथ कभी कान को तो कभी सर को छू गए। वक्त के साथ अगर सत्यमेव जयते के मुद्दे समाज को झकझोरने वाले
रहे तो यकीनन हम एक बेहतर समाज रचने की तरफ होंगे। सामाजिक प्रतिबद्धताएं भी रामायण की तरह  पूजाभाव
जैसी लेनी होंगी

Friday, April 27, 2012

मेरी कुड़माई में


 मेरी कुड़माई  में 
मुझे मिले थे
माटी के गणेशजी
और एक लकड़ी की कंघी 
वही जो आदिवासी लड़का
लड़की को देता है 
मैं भी हो गयी थी तेरी
 सदा के लिए.
क्या कोई मंतर था 
 मिटटी और लकड़ी के टुकड़ों में 
या थी वो नज़र 
जो  सिवाय भरोसे  के
 कुछ और देती ही नहीं थी.



समझ रही हूँ  मिटटी-लकड़ी
देने का सबब
सच, तुम्हारी निगाहें
बहुत दूर तक  देख  लेती थीं .

Tuesday, April 24, 2012

खांकर बजती है राह बनती है


अपने जीते जी मैं कभी शृंगार नहीं
करूंगी लेकिन अंत्येष्टि के समय वे
मुझे सजा देंगे। वसीयत में साफ-साफलिख देने पर वे ऐसा नहीं करेंगे
क्यूं लिखूं मैं? करने दो उन्हें, जिंदगी
में एक बार मैं खूबसूरत लगूंगी -वेरा पावलोवा

 वेरा रूसी कवयित्री हैं, जो शायद
अपने सादगी पर फिदा हैं और इसी
को ही अंतिम सांस तक कायम


रखना चाहती हैं। कोई  ख्वाहिश नहीं
सुंदर दिखने की फिर भी एक
ख्वाहिश कि मरने के बाद भी
खूबसूरत लगूं। सुंदर दिखना हम में
से हरेक की चाहत होती है, लेकिन
क्या सुंदरता केवल लिबास और
अंगों की होती है। मुझे तो छतीसगढ़
के बस्तर जिले में जगदलपुर
के पास कोटमसर गांव की वह
आदिवासी स्त्री भी बहुत खूबसूरत
लगती है जो सड़कों पर धान फैला
रही होती है और वह मेवाती स्त्री भी
जो अलवर के गांव में प्याज़  उगा
रही है। उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल
की वे स्त्रियां भी जिन्होंने अपने दम
पर खोए हुए वन फिर से विकसित
कर लिए हैं। अपने पुरुषों का
पलायन रोक दिया है। उन्होंने अपना
पानी, अपना चारा, अपना ईंधन तो
पाया ही है, अपना स्वाभिमान भी
ऊंचा रखा है। वे बारी-बारी से इस
वन की रक्षा करती हैं। इसके लिए
उनके पास एक लाठी है। इसके
ऊपरी सिरे पर बड़े आकार के दो-
चार घुंघरू लगे हैं। इस असाधारण
लाठी का नाम है खांकर। खांकर
लेकर वे निकल पड़ती हैं। नीरव
 चुप्पी के बीच जब कदम चलते हैं
और खांकर बजते हैं तो बेहद
संगीतमय राह बनती है, जो आगे
खड़ी स्त्री की खांकर से जुड़ जाती
है। शाम को वन की रखवाली के
बाद जब ये स्त्रियां लौटती हैं तो
खांकर किसी और के दरवाजे पर
रख देती हैं। इसका मतलब है कि
कल उन्हें वन की रखवाली करनी
है। बाईस बरसों से जारी यह
सिलसिला दूधातोली (पौड़ी गढ़वाल)
के 136 गांवों को आत्मनिर्भर बना
चुका है। वन के पनपने से पानी की
समस्या भी नहीं रही है। पानी
संरक्षित होने लगा है तो जंगल में
लगने वाली आग भी नियंत्रित हुई है।
जंगल में आग की तरह कुछ फैल
रहा है तो वह है वन संरक्षण का
संदेश। उल्लेखनीय है कि
मध्यप्रदेशन शासन ने 2011 का
प्रतिष्ठित राष्ट्रीय गांधी सम्मान
दूधातोली लोक विकास संस्थान को
प्रदान किया है। ये स्त्रियां बहुत ही
सुंदर और सुगढ़ हैं। वैसी ही भव्य
और आकर्षक है जैसे कोई शास्त्रीय
नर्तकी अपने नृत्य और अभिनय से
कोई जादू जगा रही हो।
अंग्रेजी में कई पत्रिकाएं
निकलती हैं, जिनके चमकीले और
चिकने पन्ने एक तरफ कॉस्मेटिक
आइटम के विज्ञापनों से रंगे होते हैं
तो दूसरी ओर भव्य रजवाड़ी वैभव
का प्रदर्शन करती वहां की महिलाएं
होती हैं। रजवाड़ों के साथ आजकल
नए औद्योगिक रजवाड़े भी पनप गए
हैं। वहां भी स्त्रियों के लिबास और
ब्रांड के
ब्योरों के अलावा कुछ नहीं
होता। खबर होती है कि अंबानी
बहुएं जो कभी पारंपरिक परिधानों में
ही नजर आती थीं, अब पश्चिमी
परिधानों में भी सार्वजनिक कार्यक्रमों
में शामिल होने लगी हैं। उन्होंने
अपना वजन भी काफी घटा लिया है।
बीबीसी पर खबर थी कि हैलो
नामक अंतरराष्ट्रीय पत्रिका अब
पाकिस्तान से अपना संस्करण शुरू
करने जा रही है। जाहिर है यहां भी
धनी लोगों की नकली मुस्कानों की
नुमाइश लगेगी। इनकी वार्डरोब में
झांककर आम 
शख्स भी दर्जियों के
यहां दौड़ते फिरेंगे। रजवाड़ों की
विरासत पर जमीं धूल हटेगी और
मैगजीन के पैर जमेंगे। गरीब मुल्क
के संघर्ष की दास्तां की गुंजाइश इन
पन्नों में नहीं है।
बहरहाल, सुंदरता के पैमाने
चाहे जो हों, पसीना बहाकर निखरी
कुंदन आभा के आगे जिम में निखरी
देह की तस्वीरें सूनी और नकली ही
मालूम होती है। बेहतरीन लाइट
इफेक्ट्स के साथ छपी इन तस्वीरों
में दूधातोली की पहाड़ी स्त्री और
जगदलपुर की आदिवासी स्त्री की
पेंटिंग-सा जादू नहीं हो सकता है।
वेरा धन्य हो तुम जो तुमने अंतिम
सांस तक अपना वजूद कायम रखने
की ठानी है, मशहूरी के बावजूद देह
की नहीं दिल की सुनी है।

[मनोज  पटेलजी   की अनुदित कविता उनके ब्लॉग  पढ़ते-पढ़ते से साभार है ]

Sunday, April 15, 2012

हम भरे-भरे ही हैं दोस्त

उसने कहा मुझसे 
फिर क्यों नहीं 
मैंने कहा 
प्याला रीतता  ही नहीं 
ख़ालीपन के 
एक निर्वात 
दो आंसूं 
तीन हिचकियों 
चार बातों 
और अनगिन यादों 
के बाद 
फिर भर उठता है 
अजब जादूई मसला है
कभी मैं रीतती हूँ 
तो प्याला मुझे भर देता है 
और प्याला रीतता है तो मैं 
हम भरे-भरे ही हैं दोस्त.

Sunday, April 1, 2012

अच्छे लोग मेरा पीछा करते हैं



अच्छे लोग मेरा पीछा करते हैं

ढूंढ ही लेते हैं मुझे आखिरकार  
बावजूद कि मैं हद दर्जा
बेपरवाह 

ज़िन्दगी का सबसे कीमती तोहफा
भी ऐसे ही मिला मुझे 
मैं बेखबर  वह कुर्बान 
मैं जड़ वह चैतन्य  
मैं सुप्त वह जाग्रत
मैं ठूंठ तो वह हरा वट  
मैं तार वह सितार   
मैं  बुत  वह  प्राण   
मैं  इंतज़ार वह इश्क़ 

तेरा लाख शुकराना मेरे रब
दे तौफीक  मुझे  के मैं कर सकूं पीछा अच्छाइयों का 
जो न कर सकूं अच्छे लोगों का तो .

Thursday, February 23, 2012

मोहब्बत के शहर से


अर्से से 
संभाल रखी थी 
मोहब्बत की धरोहर के लिए मशहूर 
शहर से लाई एक सफ़ेद प्लेट
उसकी संग ए मरमरी जाली के पास कई रंग थे 
इक-दूजे की खूबसूरती में लिपटे 
आज, वह प्लेट टूट गयी 
रंग बिखर गए 
सिर्फ सफ़ेद नज़र आता है अब
टूटी यादों को फेंका नहीं उसने
जोड़ा और सहेज लिया

खुद को भी कहाँ फेंका उसने
सहेज रखा है 
अक्षत वनपीस की तरह.

Thursday, February 16, 2012

porn, horn please !!!




अश्लीलता को शब्द  देने वाले
भारतीय कानून के मूल में एक ही
भाव है कि किसी महिला की
गरिमा को ठेस न पहुंचे। यह भाव
सर्वोपरि है कि किसी परिवार के
सामाजिक रुतबे और साख पर
कोई आंच नहीं आए।
हमारे यहां ऐसा है और यूं ये
परिकल्पना पूरी दुनिया के देशों में
वहां की सांस्कृतिक अवधारणा के
हिसाब से बदलती रहती है। ऐसे
में सवाल यह उठता है कि जब
स्त्री की अपनी ही भूमिका परिवार
और समाज में बहुत बदली है वहां
 1860 के अंग्रजों के जमाने के ये
कानून किस तरह साथ देते हैं।
दूसरा सवाल यह उठता है कि जब
सब कुछ एक क्लिक  की दूरी पर
हो, शहर के थिएटर में 'जंगली
जवानी' 
जैसी कोई फिल्म चल
रही हो, प्ले बॉय जैसी पत्रिकाओं
में स्त्री की उत्तेजक तस्वीरें हो,
पारिवारिक पत्रिकाओं में ही
सर्वे के नाम पर कई बातें हो, वहां
इस कानून की रक्षा किस कदर
की जा सकती है?
नर्स भंवरी देवी के एक
विधायक मंत्री 
महिपाल मदेरणा  के साथ संबंधों की
सीडी को कुछ टीवी चैनल्स ने
खूब दिखाया। अखबार के दफ्तरों
ने भी इसे देखा। जाहिर है
प्रकाशन और प्रसारण के निर्णय
से पहले इसे देखना जरूरी था।
कुछ मनचलों ने इसे अपने मित्रों
को भी फॉरवर्ड कर दिया।क्या यह अपराध नहीं था?
इस
पूरे प्रकरण में भंवरी देवी जो कि
एक स्त्री थीं , उनकी गरिमा तारतार
हो चुकी थी। कानूनन यह
सरासर उल्लंघन था। हमने अपने
ही नैतिक मानदंड बना लिए और
कहा कि जब उन्हें अपने चरित्र की
फिक्र नहीं तो हमें क्यों हो। हैरानी
तो तब हुई है जब कई ब्लोग्स ,
बहस और चर्चाओं ने भंवरी के
हश्र (अपहरण के बाद हत्या) को
इसलिए जायज करार दिया
 
क्योंकि वे अति महत्वाकांक्षी थीं
और सत्ता  के गलियारों में
मुंहजोरी करती थीं। क्या तब वह
कानून ताक पर नहीं था।


मरहूम मकबूल फिदा हुसैन
ने जब सरस्वती
 का चित्र

बनाया तो लोगों ने इसे धार्मिक
हमला बताया। उनके खिलाफ कई
अदालतों में मामले दर्ज हो गए।
हमने मां शारदा को इतना ही मान
दिया कि कोई उन्हें पेंट करे और
हम उत्तेजित हो जाएं। हमारी
आस्था ने यही देखा कि वह गैर
हिंदू हैं और उनकी नीयत देवीदेवताओं
 को निर्वस्त्र करने की ही
रही होगी। आस्था ने यह देखने
से इनकार कर दिया कि रामायण
की समूची सीरिज इस कलाकार
ने पेंट की है। इंदिरा गांधी को
दुर्गा के रूप में भी पेंट किया है।
उनकी फिल्म 'गजगामिनी' सौ
फीसदी भारतीय संस्कृति का ही
एहतराम है। भारतीय मिट्टी में जीने
वाले पेंटर की एक पेंटिंग
ने उन्हें अपने ही देश में
अपराधी बना दिया और उन्हें
एक पराए देश की मिट्टी
ओढ़कर सोना पड़ा।

हमारे कायदे कानून न
कलाकार को समझ पा रहे हैं, ना
स्त्री की अस्मिता का मजाक बन
पाने से रोक पा रहे हैं। विज्ञापन,
सिनेमा, रिअलिटी शोज,
मैगजीन्स, कहां पर स्त्री गरिमा के
साथ मौजदू है? पोर्नोग्राफी का
पुरजोर विरोध करने वाले देश का
एक टीवी चैनल पोर्न स्टार को
लाकर लोगों से वोट पड़वाता रहा।
दोहरे और अश्लील संवाद
बोलनेवाले सर्कस की टीआरपी
बरसों-बरस बढ़ती जा रही है।
शीला की जवानी और मुन्नी की
बदनामी इतनी लोकप्रिय होती है
कि अच्छे गीतकार को अपने
वजूद का एहसास होना ही बंद हो
जाता है। आइटम सॉन्ग जो
सम्मान हासिल करता जा रहा है
वह अभूतपूर्व है।
दरअसल, हम दोहरी
मानसिकता में जीने वाला समाज
हैं। देखने की मानसिकता चरम
पर न होती तो ये तमाम संचार
माध्यम स्त्री की मादक अदाकारी
से ना रंगे होते। उसकी सेंशुअस
छवि का बाजार बहुत बड़ा है
योंकि उसकी मांग बहुत है।
सीधे-सपाट चरित्र की कोई पूछ
नहीं है। कोई ट्रेड रेंकिंग नहीं।
श्लीलता की हर रोज मृत्यु हो
रही है। अश्लीलता उस पर
सामाजिक दल बल के साथ हावी
है। समाज बदल रहा है, नैतिकता
के मानदंड बदल रहे हैं। कानून
भी पुरानी हिरासत में कैद नहीं
रहना चाहिए। स्त्रियां भी तय कर
लें कि वह बाजार के मुताबिक
खुद को और अपनी देह को नहीं
ढालेंगी तब ही यह कायदा अपनी
धार बनाकर रख सकता है। नो
मोर डर्टी पिक्चर्स।