Tuesday, December 13, 2011

काली शलवार


सच तो यह है कि उर्दू कथाकार सआदत हसन मंटो को याद करना अच्छा लगता है . वे होते तो सौ बरस के होते.




 घरों में जाकर खाना बनाने वाली लाली से
लेकर मिसाइल वुमन टेसी थामस
तक
स्त्री ने खुद को और पूर देश
को तरक्की की राह पर अग्रसर
किया है। स्त्री की बदलती भूमिका
को स्वीकार किए जाने के बावजूद
शेष आधी दुनिया में उसकी छवि
ज्यादा बोलने वाली, ईष्र्यालु, अति
भावुक की ही है, यहां तक कि इसे
भी सत्य की तरह स्थापित कर
दिया गया है कि औरत ही औरत
की सबसे बड़ी दुश्मन है। कहने
वाले कैकई और मंथरा को ही राम के
वनवास का जिम्मेदार  बताते
हुए इस धारणा को और भी मजबूत
करते हैं। महाभारत के युद्ध का
दोषी भी द्रोपदी को ही ठहराया
जाता है। दशरथ और भीष्म
पितामह के सर दोष कम है।
उर्दू कहानीकार सआदत
हसन मंटो ने लगभग सत्तर  साल
पहले एक कहानी लिखी थी, काली
शलवार। कहानी की नायिका
सुल्ताना एक वैश्या है। अंबाले में
उसके पास खूब काम था। गोरे
अंग्रेज खूब पैसा देते थे, लेकिन
जब से वह अपने साथी के साथ
दिल्ली आई है, उसका काम ठप
हो गया है। वह बेचैन है कि
मोहर्रम पर उसके पास काली
शलवार नहीं। उसका साथी पीर-
 पुज्जों में उलझा हुआ है और
काली शलवार का प्रबंध नहीं कर
पाता। उसकी आंख में पड़ोसन
की वही काली शलवार नाच रही है
जो उसने दर्जी से सिलवाई है।
इस बीच उसकी मुलाकात एक
व्यक्ति से होती है। अकेली,उदास
स्त्री बातचीत में उससे भी काली
सलवार का जिक्र छेड़ती है। वह
व्यक्ति कहता है कि मैं आपको
शलवार ला दूंगा, लेकिन बदले में
आपको ये बुंदे मुझे देने होंगे।
सुल्ताना को यह सौदा बुरा नहीं
लगता। मोहर्रम की सुबह, काली
शलवार उसे मिल जाती है। काली
कमीज और दुपट्टा जो उसने
रंगवाए थे, काली शलवार के साथ
पहनकर वह खुश हो ही रही होती
है कि दरवाजे पर दस्तक होती है।
 सामने पड़ोसन को देख वह हैरान
रह जाती है क्योंकि  उसके कान में
वही बुंदे चमक रहे हैं। हैरानी और
खामोशी के बीच दोनों को यह
समझते देर नहीं लगती कि भले
मानस ने उनकी हसरतों का कैसा
मेल करवाया है।
दरअसल, महिला की इस
छवि से इनकार नहीं किया जा
सकता, लेकिन जहां भी शिक्षा ने
अपनी रोशनी डाली है, वहां काली
शलवारों का वजूद खत्म हो गया
है। जब आप अपने पेशे और
हमखयाल लोगों के संपर्क में आते
हें तो मालूम होता है कि उनमें ईर्ष्या,
 द्वेष और एक-दूजे को कमतर
आंकने जैसा भाव नहीं। वे खुल के
सराहना करती है और आलोचना
भी। वे बेखौफ होकर अपनी बात
कहती हैं । ऐसे पुरुष भी बढ़े हैं जो
महिला के खुले मन को स्वीकारते
हैं। कभी कभार जरूर कुछ
शिक्षित पुरुष ऐसा कह जाते हैं,
जिसे स्त्री के स्वाभिमान को ठेस
लगती है। पुष्पा मैत्रेयी की
आत्मकथा पर जब अपशब्दों  में
पिरोई राय आती है तो इस नए
स्वीकार्य भाव को झटका लगता
है, लेकिन समय तेजी से बदल रहा
है। मन का कहने की आदत बनती
जा रही है। यह जरूरी है क्योंकि
न कहने में घुटन है और
अभिव्यक्ति  में आजादी।



कल बदनाम लेखक मंटो का जन्मदिन था

Friday, December 9, 2011

मैंने बीहड़ में रास्ते बनाए हैं

meera by tamanna
मैं नहीं हो पाई सवित्री
न ही जनक नंदिनी सी समाई
धरती में
न याग्यसेनी कि तरह लगी दाव पर
मेरा पति भी शकुन्तला का दुष्यंत नहीं था
कभी कुंती सी भटकी नहीं मैं
न ही उर्मिला सी वेदना ली कभी
मैं वह राधा हूँ जिसे कृष्ण ने
पूरी दुनिया के सामने वरा
अब जब में सावित्री नहीं हो पायी हूँ
मैं हो जाना चाहती हूँ मीरा
उस एक नाम के साथ

पार कर जाना चाहती हूँ यह युग
कालातीत हो जाना चाहती हूँ मैं
राधा को भी मीरा बनना पड़ता है
यही  इस जीवन की
गाथा है.